Ramayana.com

अयोध्याकाण्ड, सर्ग 5

संदिश्य रामं नृपतिः श्वोभाविन्यभिषेचने । पुरोहितं समाहूय वसिष्ठमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

उधर महाराज दशरथ जब श्रीरामचन्द्रजीको दूसरे दिन होनेवाले अभिषेकके विषयमें आवश्यक संदेश दे चुके, तब अपने पुरोहित वसिष्ठजीको बुलाकर बोले—॥ १ ॥

गच्छोपवासं काकुत्स्थं कारयाद्य तपोधन । श्रेयसे राज्यलाभाय वध्वा सह यतव्रत ॥ २ ॥

भावार्थ

‘नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले तपोधन ! आप जाइये और विघ्ननिवारणरूप कल्याणकी सिद्धि तथा राज्यकी प्राप्तिके लिये बहूसहित श्रीरामसे उपवासव्रतका पालन कराइये’॥ २ ॥

तथेति च स राजानमुक्त्वा वेदविदां वरः । स्वयं वसिष्ठो भगवान् ययौ रामनिवेशनम् ॥ ३ ॥ उपवासयितुं वीरं मन्त्रविन्मन्त्रकोविदम् । ब्राह्मं रथवरं युक्तमास्थाय सुधृतव्रतः ॥ ४ ॥

भावार्थ

तब राजासे ‘तथास्तु’ कहकर वेदवेत्ता विद्वानोंमें श्रेष्ठ तथा उत्तम व्रतधारी स्वयं भगवान् वसिष्ठ मन्त्रवेत्ता वीर श्रीरामको उपवास-व्रतकी दीक्षा देनेके लिये ब्राह्मणके चढ़ने-योग्य जुते-जुताये श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो श्रीरामके महलकी ओर चल दिये ॥ ३-४ ॥

स रामभवनं प्राप्य पाण्डुराभ्रघनप्रभम् । तिस्रः कक्ष्या रथेनैव विवेश मुनिसत्तमः ॥ ५ ॥

भावार्थ

श्रीरामका भवन श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल था, उसके पास पहुँचकर मुनिवर वसिष्ठने उसकी तीन ड्योढ़ियोंमें रथके द्वारा ही प्रवेश किया ॥ ५ ॥

तमागतमृषिं रामस्त्वरन्निव ससम्भ्रमम् । मानयिष्यन् स मानार्हं निश्चक्राम निवेशनात् ॥ ६ ॥

भावार्थ

वहाँ पधारे हुए उन सम्माननीय महर्षिका सम्मान करनेके लिये श्रीरामचन्द्रजी बड़ी उतावलीके साथ वेगपूर्वक घरसे बाहर निकले ॥ ६ ॥

अभ्येत्य त्वरमाणोऽथ रथाभ्याशं मनीषिणः । ततोऽवतारयामास परिगृह्य रथात् स्वयम् ॥ ७ ॥ स चैनं प्रश्रितं दृष्ट्वा सम्भाष्याभिप्रसाद्य च । प्रियार्हं हर्षयन् राममित्युवाच पुरोहितः ॥ ८ ॥ प्रसन्नस्ते पिता राम यत्त्वं राज्यमवाप्स्यसि । उपवासं भवानद्य करोतु सह सीतया ॥ ९ ॥

भावार्थ

उन मनीषी महर्षिके रथके समीप शीघ्रतापूर्वक जाकर श्रीरामने स्वयं उनका हाथ पकड़कर उन्हें रथसे नीचे उतारा॥ श्रीराम प्रिय वचन सुननेके योग्य थे । उन्हें इतना विनीत देखकर पुरोहितजीने ‘वत्स !’ कहकर पुकारा और उन्हें प्रसन्न करके उनका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार कहा—॥ ‘श्रीराम ! तुम्हारे पिता तुमपर बहुत प्रसन्न हैं, क्योंकि तुम्हें उनसे राज्य प्राप्त होगा; अतः आजकी रातमें तुम वधू सीताके साथ उपवास करो ॥ ९ ॥

प्रातस्त्वामभिषेक्ता हि यौवराज्ये नराधिपः । पिता दशरथः प्रीत्या ययातिं नहुषो यथा ॥ १० ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! जैसे नहुषने ययातिका अभिषेक किया था, उसी प्रकार तुम्हारे पिता महाराज दशरथ कल प्रातःकाल बड़े प्रेमसे तुम्हारा युवराज-पदपर अभिषेक करेंगे’ ॥ १० ॥

इत्युक्त्वा स तदा राममुपवासं यतव्रतः । मन्त्रवत् कारयामास वैदेह्या सहितं शुचिः ॥ ११ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर उन व्रतधारी एवं पवित्र महर्षिने मन्त्रोच्चारणपूर्वक सीतासहित श्रीरामको उस समय उपवास-व्रतकी दीक्षा दी ॥ ११ ॥

ततो यथावद् रामेण स राज्ञो गुरुरर्चितः । अभ्यनुज्ञाप्य काकुत्स्थं ययौ रामनिवेशनात् ॥ १२ ॥

भावार्थ

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने महाराजके भी गुरु वसिष्ठका यथावत् पूजन किया; फिर वे मुनि श्रीरामकी अनुमति ले उनके महलसे बाहर निकले ॥ १२ ॥

सुहृद्भिस्तत्र रामोऽपि सहासीनः प्रियंवदैः । सभाजितो विवेशाथ ताननुज्ञाप्य सर्वशः ॥ १३ ॥

भावार्थ

श्रीराम भी वहाँ प्रियवचन बोलनेवाले सुहृदोंके साथ कुछ देरतक बैठे रहे; फिर उनसे सम्मानित हो उन सबकी अनुमति ले पुनः अपने महलके भीतर चले गये ॥ १३ ॥

हृष्टनारीनरयुतं रामवेश्म तदा बभौ । यथा मत्तद्विजगणं प्रफुल्लनलिनं सरः ॥ १४ ॥

भावार्थ

उस समय श्रीरामका भवन हर्षोत्फुल्ल नर-नारियोंसे भरा हुआ था और मतवाले पक्षियोंके कलरवोंसे युक्त खिले हुए कमलवाले तालाबके समान शोभा पा रहा था ॥ १४ ॥

स राजभवनप्रख्यात् तस्माद् रामनिवेशनात् । निर्गत्य दद्दशे मार्गे वसिष्ठो जनसंवृतम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

राजभवनोंमें श्रेष्ठ श्रीरामके महलसे बाहर आकर वसिष्ठजीने सारे मार्ग मनुष्योंकी भीड़से भरे हुए देखे ॥१५॥

वृन्दवृन्दैरयोध्यायां राजमार्गाः समन्ततः । बभूवुरभिसम्बाधाः कुतूहलजनैर्वृताः ॥ १६ ॥

भावार्थ

अयोध्याकी सड़कोंपर सब ओर झुंड-के-झुंड मनुष्य, जो श्रीरामका राज्याभिषेक देखनेके लिये उत्सुक थे, खचाखच भरे हुए थे; सारे राजमार्ग उनसे घिरे हुए थे ॥ १६ ॥

जनवृन्दोर्मिसंघर्षहर्षस्वनवृतस्तदा । बभूव राजमार्गस्य सागरस्येव निःस्वनः ॥ १७ ॥ सिक्तसम्मृष्टरथ्या हि तथा च वनमालिनी । आसीदयोध्या तदहः समुच्छ्रितगृहध्वजा ॥ १८ ॥

भावार्थ

जनसमुदायरूपी लहरोंके परस्पर टकरानेसे उस समय जो हर्षध्वनि प्रकट होती थी, उससे व्याप्त हुआ राजमार्गका कोलाहल समुद्रकी गर्जनाकी भाँति सुनायी देता था ॥ उस दिन वन और उपवनोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित हुई अयोध्यापुरीके घर-घरमें ऊँची-ऊँची ध्वजाएँ फहरा रही थीं; वहाँकी सभी गलियों और सड़कोंको झाड़-बुहारकर वहाँ छिड़काव किया गया था ॥ १८ ॥

तदा ह्ययोध्यानिलयः सस्त्रीबालाकुलो जनः । रामाभिषेकमाकाङ्क्षन्नाकाङ्क्षन्नुदयं रवेः ॥ १९ ॥

भावार्थ

स्त्रियों और बालकोंसहित अयोध्यावासी जनसमुदाय श्रीरामके राज्याभिषेकको देखनेकी इच्छासे उस समय शीघ्र सूर्योदय होनेकी कामना कर रहा था ॥ १९ ॥

प्रजालंकारभूतं च जनस्यानन्दवर्धनम् । उत्सुकोऽभूज्जनो द्रष्टुं तमयोध्यामहोत्सवम् ॥ २० ॥

भावार्थ

अयोध्याका वह महान् उत्सव प्रजाओंके लिये अलंकार-रूप और सब लोगोंके आनन्दको बढ़ानेवाला था; वहाँके सभी मनुष्य उसे देखनेके लिये उत्कण्ठित हो रहे थे ॥ २० ॥

एवं तज्जनसम्बाधं राजमार्गे पुरोहितः । व्यूहन्निव जनौघं तं शनै राजकुलं ययौ ॥ २१ ॥

भावार्थ

इस प्रकार मनुष्योंकी भीड़से भरे हुए राजमार्गपर पहुँचकर पुरोहितजी उस जनसमूहको एक ओर करते हुए-से धीरे-धीरे राजमहलकी ओर गये ॥ २१ ॥

सिताभ्रशिखरप्रख्यं प्रासादमधिरुह्य च । समीयाय नरेन्द्रेण शक्रेणेव बृहस्पतिः ॥ २२ ॥

भावार्थ

श्वेत जलद-खण्डके समान सुशोभित होनेवाले महलके ऊपर चढ़कर वसिष्ठजी राजा दशरथसे उसी प्रकार मिले जैसे बृहस्पति देवराज इन्द्रसे मिल रहे हों ॥ २२ ॥

तमागतमभिप्रेक्ष्य हित्वा राजासनं नृपः । पप्रच्छ स्वमतं तस्मै कृतमित्यभिवेदयत् ॥ २३ ॥

भावार्थ

उन्हें आया देख राजा सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और पूछने लगे—‘मुने ! क्या आपने मेरा अभिप्राय सिद्ध किया ।’ वसिष्ठजीने उत्तर दिया—‘हाँ ! कर दिया’ ॥ २३ ॥

तेन चैव तदा तुल्यं सहासीनाः सभासदः । आसनेभ्यः समुत्तस्थुः पूजयन्तः पुरोहितम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

उनके साथ ही उस समय वहाँ बैठे हुए अन्य सभासद् भी पुरोहितका समादर करते हुए अपने-अपने आसनोंसे उठकर खड़े हो गये ॥ २४ ॥

गुरुणा त्वभ्यनुज्ञातो मनुजौघं विसृज्य तम् । विवेशान्तःपुरं राजा सिंहो गिरिगुहामिव ॥ २५ ॥

भावार्थ

तदनन्तर गुरुजीकी आज्ञा ले राजा दशरथने उस जनसमुदायको विदा करके पर्वतकी कन्दरामें घुसनेवाले सिंहके समान अपने अन्तःपुरमें प्रवेश किया ॥ २५ ॥

तदग्र्यवेषप्रमदाजनाकुलं महेन्द्रवेश्मप्रतिमं निवेशनम् । व्यदीपयंश्चारु विवेश पार्थिवः शशीव तारागणसंकुलं नभः ॥ २६ ॥

भावार्थ

सुन्दर वेश-भूषा धारण करनेवाली सुन्दरियोंसे भरे हुए इन्द्रसदनके समान उस मनोहर राजभवनको अपनी शोभासे प्रकाशित करते हुए राजा दशरथने उसके भीतर उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे चन्द्रमा ताराओंसे भरे हुए आकाशमें पदार्पण करते हैं ॥ २६ ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें