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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 6

गते पुरोहिते रामः स्नातो नियतमानसः। सह पत्न्या विशालाक्ष्या नारायणमुपागमत्॥ १ ॥

भावार्थ

पुरोहितजीके चले जानेपर मनको संयममें रखनेवाले श्रीरामने स्नान करके अपनी विशाललोचना पत्नीके साथ श्रीनारायणकी उपासना आरम्भ की ॥ १ ॥

प्रगृह्य शिरसा पात्रीं हविषो विधिवत् ततः। महते दैवतायाज्यं जुहाव ज्वलितानले ॥ २ ॥

भावार्थ

उन्होंने हविष्य-पात्रको सिर झुकाकर नमस्कार किया और प्रज्वलित अग्निमें महान् देवता ( शेषशायी नारायण ) की प्रसन्नताके लिये विधिपूर्वक उस हविष्यकी आहुति दी ॥ २ ॥

शेषं च हविषस्तस्य प्राश्याशास्यात्मनः प्रियम्। ध्यायन्नारायणं देवं स्वास्तीर्णे कुशसंस्तरे ॥ ३ ॥ वाग्यतः सह वैदेह्या भूत्वा नियतमानसः। श्रीमत्यायतने विष्णोः शिश्ये नरवरात्मजः ॥ ४ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् अपने प्रिय मनोरथकी सिद्धिका संकल्प लेकर उन्होंने उस यज्ञशेष हविष्यका भक्षण किया और मनको संयममें रखकर मौन हो वे राजकुमार श्रीराम विदेहनन्दिनी सीताके साथ भगवान् विष्णुके सुन्दर मन्दिरमें श्रीनारायण देवका ध्यान करते हुए वहाँ अच्छी तरह बिछी हुई कुशकी चटाईपर सोये ॥ ३-४ ॥

एकयामावशिष्टायां रात्र्यां प्रतिविबुध्य सः। अलंकारविधिं सम्यक् कारयामास वेश्मनः ॥ ५ ॥

भावार्थ

जब तीन पहर बीतकर एक ही पहर रात शेष रह गयी, तब वे शयनसे उठ बैठे । उस समय उन्होंने सभामण्डपको सजानेके लिये सेवकोंको आज्ञा दी ॥ ५ ॥

तत्र शृण्वन् सुखा वाचः सूतमागधवन्दिनाम्। पूर्वां संध्यामुपासीनो जजाप सुसमाहितः ॥ ६ ॥

भावार्थ

वहाँ सूत, मागध और बंदियोंकी श्रवणसुखद वाणी सुनते हुए श्रीरामने प्रातःकालिक संध्योपासना की; फिर एकाग्रचित्त होकर वे जप करने लगे ॥ ६ ॥

तुष्टाव प्रणतश्चैव शिरसा मधुसूदनम्। विमलक्षौमसंवीतो वाचयामास स द्विजान् ॥ ७ ॥

भावार्थ

तदनन्तर रेशमी वस्त्र धारण किये हुए श्रीरामने मस्तक झुकाकर भगवान् मधुसूदनको प्रणाम और उनका स्तवन किया; इसके बाद ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया ॥ ७ ॥

तेषां पुण्याहघोषोऽथ गम्भीरमधुरस्तथा। अयोध्यां पूरयामास तूर्यघोषानुनादितः ॥ ८ ॥

भावार्थ

उन ब्राह्मणोंका पुण्याहवाचनसम्बन्धी गम्भीर एवं मधुर घोष नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे व्याप्त होकर सारी अयोध्यापुरीमें फैल गया ॥ ८ ॥

कृतोपवासं तु तदा वैदेह्या सह राघवम्। अयोध्यानिलयः श्रुत्वा सर्वः प्रमुदितो जनः ॥ ९ ॥

भावार्थ

उस समय अयोध्यावासी मनुष्योंने जब यह सुना कि श्रीरामचन्द्रजीने सीताके साथ उपवास-व्रत आरम्भ कर दिया है, तब उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ९ ॥

ततः पौरजनः सर्वः श्रुत्वा रामाभिषेचनम्। प्रभातां रजनीं दृष्ट्वा चक्रे शोभयितुं पुरीम् ॥ १० ॥

भावार्थ

सबेरा होनेपर श्रीरामके राज्याभिषेकका समाचार सुनकर समस्त पुरवासी अयोध्यापुरीको सजानेमें लग गये ॥ १० ॥

सिताभ्रशिखराभेषु देवतायतनेषु च। चतुष्पथेषु रथ्यासु चैत्येष्वट्टालकेषु च ॥ ११ ॥ नानापण्यसमृद्धेषु वणिजामापणेषु च। कुटुम्बिनां समृद्धेषु श्रीमत्सु भवनेषु च ॥ १२ ॥ सभासु चैव सर्वासु वृक्षेष्वालक्षितेषु च। ध्वजाः समुच्छ्रिताः साधु पताकाश्चाभवंस्तथा॥ १३ ॥

भावार्थ

जिनके शिखरोंपर श्वेत बादल विश्राम करते हैं, उन पर्वतोंके समान गगनचुम्बी देवमन्दिरों, चौराहों, गलियों, देववृक्षों, समस्त सभाओं, अट्टालिकाओं, नाना प्रकारकी बेचने योग्य वस्तुओंसे भरी हुई व्यापारियोंकी बड़ी-बड़ी दूकानों तथा कुटुम्बी गृहस्थोंके सुन्दर समृद्धिशाली भवनोंमें और दूरसे दिखायी देनेवाले वृक्षोंपर भी ऊँची ध्वजाएँ लगायी गयीं और उनमें पताकाएँ फहरायी गयीं ॥ ११—१३ ॥

नटनर्तकसङ्घानां गायकानां च गायताम्। मनःकर्णसुखा वाचः शुश्राव जनता ततः ॥ १४ ॥

भावार्थ

उस समय वहाँकी जनता सब ओर नटों और नर्तकोंके समूहों तथा गानेवाले गायकोंकी मन और कानोंको सुख देनेवाली वाणी सुनती थी ॥ १४ ॥

रामाभिषेकयुक्ताश्च कथाश्चक्रुर्मिथो जनाः । रामाभिषेके सम्प्राप्ते चत्वरेषु गृहेषु च ॥ १५ ॥

भावार्थ

श्रीरामके राज्याभिषेकका शुभ अवसर प्राप्त होनेपर प्रायः सब लोग चौराहोंपर और घरोंमें भी आपसमें श्रीरामके राज्याभिषेककी ही चर्चा करते थे ॥ १५ ॥

बाला अपि क्रीडमाना गृहद्वारेषु सङ्घशः । रामाभिषवसंयुक्ताश्चक्रुरेव कथा मिथः ॥ १६ ॥

भावार्थ

घरोंके दरवाजोंपर खेलते हुए झुंड-के-झुंड बालक भी आपसमें श्रीरामके राज्याभिषेककी ही बातें करते थे ॥१६॥

कृतपुष्पोपहारश्च धूपगन्धाधिवासितः । राजमार्गः कृतः श्रीमान् पौरै रामाभिषेचने ॥ १७ ॥

भावार्थ

पुरवासियोंने श्रीरामके राज्याभिषेकके समय राजमार्गपर फूलोंकी भेंट चढ़ाकर वहाँ सब ओर धूपकी सुगन्ध फैला दी; ऐसा करके उन्होंने राजमार्गको बहुत सुन्दर बना दिया ॥१७॥

प्रकाशकरणार्थं च निशागमनशङ्कया । दीपवृक्षांस्तथा चक्रुरनुरथ्यासु सर्वशः ॥ १८ ॥

भावार्थ

राज्याभिषेक होते-होते रात हो जानेकी आशङ्कासे प्रकाश-की व्यवस्था करनेके लिये पुरवासियोंने सब ओर सड़कोंके दोनों तरफ वृक्षकी भाँति अनेक शाखाओंसे युक्त दीपस्तम्भ खड़े कर दिये ॥ १८ ॥

अलंकारं पुरस्यैवं कृत्वा तत् पुरवासिनः । आकाङ्क्षमाणा रामस्य यौवराज्याभिषेचनम् ॥ १९ ॥ समेत्य सङ्घशः सर्वे चत्वरेषु सभासु च । कथयन्तो मिथस्तत्र प्रशशंसुर्जनाधिपम् ॥ २० ॥

भावार्थ

इस प्रकार नगरको सजाकर श्रीरामके युवराजपदपर अभिषेककी अभिलाषा रखनेवाले समस्त पुरवासी चौराहों और सभाओंमें झुंड-के-झुंड एकत्र हो वहाँ परस्पर बातें करते हुए महाराज दशरथकी प्रशंसा करने लगे–॥१९-२०॥

अहो महात्मा राजायमिक्ष्वाकुकुलनन्दनः । ज्ञात्वा वृद्धं स्वमात्मानं रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘अहो ! इक्ष्वाकुकुलको आनन्दित करनेवाले ये राजा दशरथ बड़े महात्मा हैं, जो कि अपने-आपको बूढ़ा हुआ जानकर श्रीरामका राज्याभिषेक करने जा रहे हैं ॥ २१ ॥

सर्वे ह्यनुगृहीताः स्म यन्नो रामो महीपतिः । चिराय भविता गोप्ता दृष्टलोकपरावरः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘भगवान्का हम सब लोगोंपर बड़ा अनुग्रह है कि श्रीरामचन्द्रजी हमारे राजा होंगे और चिरकालतक हमारी रक्षा करते रहेंगे; क्योंकि वे समस्त लोकोंके निवासियोंमें जो भलाई या बुराई है, उसे अच्छी तरह देख चुके हैं ॥ २२ ॥

अनुद्धतमना विद्वान् धर्मात्मा भ्रातृवत्सलः । यथा च भ्रातृषु स्निग्धस्तथास्मास्वपि राघवः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘श्रीरामका मन कभी उद्धत नहीं होता । वे विद्वान्, धर्मात्मा और अपने भाइयोंपर स्नेह रखनेवाले हैं। उनका अपने भाइयोंपर जैसा स्नेह है, वैसा ही हमलोगोंपर भी है ॥ २३ ॥

चिरं जीवतु धर्मात्मा राजा दशरथोऽनघः । यत्प्रसादेनाभिषिक्तं रामं द्रक्ष्यामहे वयम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘धर्मात्मा एवं निष्पाप राजा दशरथ चिरकालतक जीवित रहें, जिनके प्रसादसे हमें श्रीरामके राज्याभिषेकका दर्शन सुलभ होगा’ ॥ २४ ॥

एवंविधं कथयतां पौराणां शुश्रुवुः परे । दिग्भ्यो विश्रुतवृत्तान्ताः प्राप्ता जानपदा जनाः ॥ २५ ॥

भावार्थ

अभिषेकका वृत्तान्त सुनकर नाना दिशाओंसे उस जनपदके लोग भी वहाँ पहुँचे थे, उन्होंने उपर्युक्त बातें कहनेवाले पुरवासियोंकी सभी बातें सुनीं ॥ २५ ॥

ते तु दिग्भ्यः पुरीं प्राप्ता द्रष्टुं रामाभिषेचनम् । रामस्य पूरयामासुः पुरीं जानपदा जनाः ॥ २६ ॥

भावार्थ

वे सब-के-सब श्रीरामका राज्याभिषेक देखनेके लिये अनेक दिशाओंसे अयोध्यापुरीमें आये थे। उन जनपदनिवासी मनुष्योंने श्रीरामपुरीको अपनी उपस्थितिसे भर दिया था ॥ २६ ॥

जनौघैस्तैर्विसर्पद्भिः शुश्रुवे तत्र निःस्वनः । पर्वसूदीर्णवेगस्य सागरस्येव निःस्वनः ॥ २७ ॥

भावार्थ

वहाँ मनुष्योंकी भीड़-भाड़ बढ़नेसे जो जनरव सुनायी देता था, वह पर्वोंके दिन बढ़े हुए वेगवाले महासागरकी गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ २७ ॥

ततस्तदिन्द्रक्षयसंनिभं पुरं दिदृक्षुभिर्जानपदैरुपाहितैः । समन्ततः सस्वनमाकुलं बभौ समुद्रयादोभिरिवार्णवोदकम् ॥ २८ ॥

भावार्थ

उस समय श्रीरामके अभिषेकका उत्सव देखनेके लिये पधारे हुए जनपदवासी मनुष्योंद्वारा सब ओरसे भरा हुआ वह इन्द्रपुरीके समान नगर अत्यन्त कोलाहलपूर्ण होनेके कारण मकर, नक्र, तिमिङ्गल आदि विशाल जल-जन्तुओंसे परिपूर्ण महासागरके समान प्रतीत होता था ॥ २८ ॥

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