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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 4

गतेष्वथ नृपो भूयः पौरेषु सह मन्त्रिभिः । मन्त्रयित्वा ततश्चक्रे निश्चयज्ञः स निश्चयम् ॥ १ ॥ श्व एव पुष्यो भविता श्वोऽभिषेच्यस्तु मे सुतः । रामो राजीवपत्राक्षो युवराज इति प्रभुः ॥ २ ॥ अथान्तर्गृहमाविश्य राजा दशरथस्तदा । सूतमामन्त्रयामास रामं पुनरिहानय ॥ ३ ॥

भावार्थ

राजसभासे पुरवासियोंके चले जानेपर कार्यसिद्धिके योग्य देश-कालके नियमको जाननेवाले प्रभावशाली नरेशने पुनः मन्त्रियोंके साथ सलाह करके यह निश्चय किया कि ‘कल ही पुष्य नक्षत्र होगा, अतः कल ही मुझे अपने पुत्र कमलनयन श्रीरामका युवराजके पदपर अभिषेक कर देना चाहिये’ ॥ तदनन्तर अन्तःपुरमें जाकर महाराज दशरथने सूतको बुलाया और आज्ञा दी—‘जाओ, श्रीरामको एक बार फिर यहाँ बुला लाओ’ ॥ ३ ॥

प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं सूतः पुनरुपाययौ । रामस्य भवनं शीघ्रं राममानयितुं पुनः ॥ ४ ॥

भावार्थ

उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके सुमन्त्र श्रीरामको शीघ्र बुला लानेके लिये पुनः उनके महलमें गये ॥ ४ ॥

द्वाःस्थैरावेदितं तस्य रामायागमनं पुनः । श्रुत्वैव चापि रामस्तं प्राप्तं शङ्कान्वितोऽभवत् ॥ ५ ॥

भावार्थ

द्वारपालोंने श्रीरामको सुमन्त्रके पुनः आगमनकी सूचना दी । उनका आगमन सुनते ही श्रीरामके मनमें संदेह हो गया ॥ ५ ॥

प्रवेश्य चैनं त्वरितो रामो वचनमब्रवीत् । यदागमनकृत्यं ते भूयस्तद्ब्रूह्यशेषतः ॥ ६ ॥

भावार्थ

उन्हें भीतर बुलाकर श्रीरामने उनसे बड़ी उतावलीके साथ पूछा—‘आपको पुनः यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ी ?’ यह पूर्णरूपसे बताइये ॥ ६ ॥

तमुवाच ततः सूतो राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति । श्रुत्वा प्रमाणं तत्र त्वं गमनायेतराय वा ॥ ७ ॥

भावार्थ

तब सूतने उनसे कहा—‘महाराज आपसे मिलना चाहते हैं । मेरी इस बातको सुनकर वहाँ जाने या न जानेका निर्णय आप स्वयं करें’ ॥ ७ ॥

इति सूतवचः श्रुत्वा रामोऽपि त्वरयान्वितः । प्रययौ राजभवनं पुनर्द्रष्टुं नरेश्वरम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

सूतका यह वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी महाराज दशरथका पुनः दर्शन करनेके लिये तुरंत उनके महलकी ओर चल दिये ॥ ८ ॥

तं श्रुत्वा समनुप्राप्तं रामं दशरथो नृपः । प्रवेशयामास गृहं विवक्षुः प्रियमुत्तमम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

श्रीरामको आया हुआ सुनकर राजा दशरथने उनसे प्रिय तथा उत्तम बात कहनेके लिये उन्हें महलके भीतर बुला लिया ॥ ९ ॥

प्रविशन्नेव च श्रीमान् राघवो भवनं पितुः । ददर्श पितरं दूरात् प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥ १० ॥

भावार्थ

पिताके भवनमें प्रवेश करते ही श्रीमान् रघुनाथजीने उन्हें देखा और दूरसे ही हाथ जोड़कर वे उनके चरणोंमें पड़ गये ॥ १० ॥

प्रणमन्तं तमुत्थाप्य सम्परिष्वज्य भूमिपः । प्रदिश्य चासनं चास्मै रामं च पुनरब्रवीत् ॥ ११ ॥

भावार्थ

प्रणाम करते हुए श्रीरामको उठाकर महाराजने छातीसे लगा लिया और उन्हें बैठनेके लिये आसन देकर पुनः उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ११ ॥

राम वृद्धोऽस्मि दीर्घायुर्भुक्ता भोगा यथेप्सिताः । अन्नवद्भिः क्रतुशतैर्यथेष्टं भूरिदक्षिणैः ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! अब मैं बूढ़ा हुआ । मेरी आयु बहुत अधिक हो गयी । मैंने बहुत-से मनोवाञ्छित भोग भोग लिये, अन्न और बहुत-सी दक्षिणाओंसे युक्त सैकड़ों यज्ञ भी कर लिये ॥ १२ ॥

जातमिष्टमपत्यं मे त्वमद्यानुपमं भुवि । दत्तमिष्टमधीतं च मया पुरुषसत्तम ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘पुरुषोत्तम ! तुम मेरे परम प्रिय अभीष्ट संतानके रूपमें प्राप्त हुए जिसकी इस भूमण्डलमें कहीं उपमा नहीं है, मैंने दान, यज्ञ और स्वाध्याय भी कर लिये ॥ १३ ॥

अनुभूतानि चेष्टानि मया वीर सुखान्यपि । देवर्षिपितृविप्राणामनृणोऽस्मि तथाऽऽत्मनः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘वीर ! मैंने अभीष्ट सुखोंका भी अनुभव कर लिया । मैं देवता, ऋषि, पितर और ब्राह्मणोंके तथा अपने ऋणसे भी उऋण हो गया ॥ १४ ॥

न किंचिन्मम कर्तव्यं तवान्यत्राभिषेचनात् । अतो यत्त्वामहं ब्रूयां तन्मे त्वं कर्तुमर्हसि ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘अब तुम्हें युवराज-पदपर अभिषिक्त करनेके सिवा और कोई कर्तव्य मेरे लिये शेष नहीं रह गया है, अतः मैं तुमसे जो कुछ कहूँ, मेरी उस आज्ञाका तुम्हें पालन करना चाहिये ॥१५॥

अद्य प्रकृतयः सर्वास्त्वामिच्छन्ति नराधिपम् । अतस्त्वां युवराजानमभिषेक्ष्यामि पुत्रक ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘बेटा ! अब सारी प्रजा तुम्हें अपना राजा बनाना चाहती है, अतः मैं तुम्हें युवराजपदपर अभिषिक्त करूँगा ॥१६ ॥

अपि चाद्याशुभान् राम स्वप्नान् पश्यामि राघव । सनिर्घाता दिवोल्काश्च पतन्ति हि महास्वनाः ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘रघुकुलनन्दन श्रीराम ! आजकल मुझे बड़े बुरे सपने दिखायी देते हैं । दिनमें वज्रपातके साथ-साथ बड़ा भयंकर शब्द करनेवाली उल्काएँ भी गिर रही हैं ॥ १७ ॥

अवष्टब्धं च मे राम नक्षत्रं दारुणग्रहैः । आवेदयन्ति दैवज्ञाः सूर्याङ्गारकराहुभिः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! ज्योतिषियोंका कहना है कि मेरे जन्मनक्षत्रको सूर्य, मङ्गल और राहु नामक भयंकर ग्रहोंने आक्रान्त कर लिया है ॥ १८ ॥

प्रायेण च निमित्तानामीदृशानां समुद्भवे । राजा हि मृत्युमाप्नोति घोरां चापदमृच्छति ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘ऐसे अशुभ लक्षणोंका प्राकट्य होनेपर प्रायः राजा घोर आपत्तिमें पड़ जाता है और अन्ततोगत्वा उसकी मृत्यु भी हो जाती है ॥ १९ ॥

तद् यावदेव मे चेतो न विमुह्यति राघव । तावदेवाभिषिञ्चस्व चला हि प्राणिनां मतिः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘अतः रघुनन्दन ! जबतक मेरे चित्तमें मोह नहीं छा जाता, तबतक ही तुम युवराज-पदपर अपना अभिषेक करा लो; क्योंकि प्राणियोंकी बुद्धि चञ्चल होती है ॥ २० ॥

अद्य चन्द्रोऽभ्युपगमत् पुष्यात् पूर्वं पुनर्वसुम् । श्वः पुष्ययोगं नियतं वक्ष्यन्ते दैवचिन्तकाः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘आज चन्द्रमा पुष्यसे एक नक्षत्र पहले पुनर्वसुपर विराजमान हैं, अतः निश्चय ही कल वे पुष्य नक्षत्रपर रहेंगे— ऐसा ज्योतिषी कहते हैं ॥ २१ ॥

तत्र पुष्येऽभिषिञ्चस्व मनस्त्वरयतीव माम् । श्वस्त्वाहमभिषेक्ष्यामि यौवराज्ये परंतप ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘इसलिये उस पुष्यनक्षत्रमें ही तुम अपना अभिषेक करा लो । शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर ! मेरा मन इस कार्यमें बहुत शीघ्रता करनेको कहता है । इस कारण कल अवश्य ही मैं तुम्हारा युवराजपदपर अभिषेक कर दूँगा ॥ २२ ॥

तस्मात् त्वयाद्यप्रभृति निशेयं नियतात्मना । सह वध्वोपवस्तव्या दर्भप्रस्तरशायिना ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘अतः तुम इस समयसे लेकर सारी रात इन्द्रियसंयमपूर्वक रहते हुए वधू सीताके साथ उपवास करो और कुशकी शय्यापर सोओ ॥ २३ ॥

सुहृदश्चाप्रमत्तास्त्वां रक्षन्त्वद्य समन्ततः । भवन्ति बहुविघ्नानि कार्याण्येवंविधानि हि ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘आज तुम्हारे सुहृद् सावधान रहकर सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करें; क्योंकि इस प्रकारके शुभ कार्योंमें बहुत-से विघ्न आनेकी सम्भावना रहती है ॥ २४ ॥

विप्रोषितश्च भरतो यावदेव पुरादितः । तावदेवाभिषेकस्ते प्राप्तकालो मतो मम ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘जबतक भरत इस नगरसे बाहर अपने मामाके यहाँ निवास करते हैं, तबतक ही तुम्हारा अभिषेक हो जाना मुझे उचित प्रतीत होता है ॥ २५ ॥

कामं खलु सतां वृत्ते भ्राता ते भरतः स्थितः । ज्येष्ठानुवर्ती धर्मात्मा सानुक्रोशो जितेन्द्रियः ॥ २६ ॥ किं नु चित्तं मनुष्याणामनित्यमिति मे मतम् । सतां च धर्मनित्यानां कृतशोभि च राघव ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे भाई भरत सत्पुरुषोंके आचार-व्यवहारमें स्थित हैं, अपने बड़े भाईका अनुसरण करनेवाले, धर्मात्मा, दयालु और जितेन्द्रिय हैं तथापि मनुष्योंका चित्त प्रायः स्थिर नहीं रहता——ऐसा मेरा मत है । रघुनन्दन ! धर्मपरायण सत्पुरुषोंका मन भी विभिन्न कारणोंसे राग-द्वेषादिसे संयुक्त हो जाता है’ ॥ २६-२७ ॥

इत्युक्तः सोऽभ्यनुज्ञातः श्वोभाविन्यभिषेचने । व्रजेति रामः पितरमभिवाद्याभ्ययाद् गृहम् ॥ २८ ॥ प्रविश्य चात्मनो वेश्म राज्ञाऽऽदिष्टेऽभिषेचने । तत्क्षणादेव निष्क्रम्य मातुरन्तःपुरं ययौ ॥ २९ ॥

भावार्थ

राजाके इस प्रकार कहने और कल होनेवाले राज्याभिषेकके निमित्त व्रतपालनके लिये जानेकी आज्ञा देनेपर श्रीरामचन्द्रजी पिताको प्रणाम करके अपने महलमें गये ॥ राजाने राज्याभिषेकके लिये व्रतपालनके निमित्त जो आज्ञा दी थी, उसे सीताको बतानेके लिये अपने महलके भीतर प्रवेश करके जब श्रीरामने वहाँ सीताको नहीं देखा, तत्र वे तत्काल ही वहाँसे निकलकर माताके अन्तःपुरमें चले गये ॥ २९ ॥

तत्र तां प्रवणामेव मातरं क्षौमवासिनीम् । वाग्यतां देवतागारे ददर्शायाचतीं श्रियम् ॥ ३० ॥

भावार्थ

वहाँ जाकर उन्होंने देखा माता कौसल्या रेशमी वस्त्र पहने मौन हो देवमन्दिरमें बैठकर देवताकी आराधनामें लगी हैं और पुत्रके लिये राजलक्ष्मीकी याचना कर रही हैं ॥ ३० ॥

प्रागेव चागता तत्र सुमित्रा लक्ष्मणस्तथा । सीता चानयिता श्रुत्वा प्रियं रामाभिषेचनम् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

श्रीरामके राज्याभिषेकका प्रिय समाचार सुनकर सुमित्रा और लक्ष्मण वहाँ पहलेसे ही आ गये थे तथा बादमें सीता वहीं बुला ली गयी थीं ॥ ३१ ॥

तस्मिन् कालेऽपि कौसल्या तस्थावामीलितेक्षणा । सुमित्रयान्वास्यमाना सीतया लक्ष्मणेन च ॥ ३२ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजी जब वहाँ पहुँचे, उस समय भी कौसल्या नेत्र बंद किये ध्यान लगाये बैठी थीं और सुमित्रा, सीता तथा लक्ष्मण उनकी सेवामें खड़े थे ॥ ३२ ॥

श्रुत्वा पुष्ये च पुत्रस्य यौवराज्येऽभिषेचनम् । प्राणायामेन पुरुषं ध्यायमाना जनार्दनम् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

पुष्यनक्षत्रके योगमें पुत्रके युवराजपदपर अभिषिक्त होनेकी बात सुनकर वे उसकी मङ्गलकामनासे प्राणायामके द्वारा परमपुरुष नारायणका ध्यान कर रही थीं ॥ ३३ ॥

तथा सनियमामेव सोऽभिगम्याभिवाद्य च । उवाच वचनं रामो हर्षयंस्तामिदं वरम् ॥ ३४ ॥

भावार्थ

इस प्रकार नियममें लगी हुई माताके निकट उसी अवस्थामें जाकर श्रीरामने उनको प्रणाम किया और उन्हें हर्ष प्रदान करते हुए यह श्रेष्ठ बात कही—॥ ३४ ॥

अम्ब पित्रा नियुक्तोऽस्मि प्रजापालनकर्मणि । भविता श्वोऽभिषेको मे यथा मे शासनं पितुः ॥ ३५ ॥ सीतयाप्युपवस्तव्या रजनीयं मया सह । एवमुक्तमुपाध्यायैः स हि मामुक्तवान् पिता ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘माँ ! पिताजीने मुझे प्रजापालनके कर्ममें नियुक्त किया है । कल मेरा अभिषेक होगा । जैसा कि मेरे लिये पिताजीका आदेश है, उसके अनुसार सीताको भी मेरे साथ इस रातमें उपवास करना होगा । उपाध्यायोंने ऐसी ही बात बतायी थी, जिसे पिताजीने मुझसे कहा है ॥ ३५-३६ ॥

यानि यान्यत्र योग्यानि श्वोभाविन्यभिषेचने । तानि मे मङ्गलान्यद्य वैदेह्याश्चैव कारय ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘अतः कल होनेवाले अभिषेकके निमित्तसे आज मेरे और सीताके लिये जो-जो मङ्गलकार्य आवश्यक हों, वे सब कराओ’ ॥ ३७ ॥

एतच्छ्रुत्वा तु कौसल्या चिरकालाभिकाङ्क्षितम् । हर्षबाष्पाकुलं वाक्यमिदं राममभाषत ॥ ३८ ॥

भावार्थ

चिरकालसे माताके हृदयमें जिस बातकी अभिलाषा थी, उसकी पूर्तिको सूचित करनेवाली यह बात सुनकर माता कौसल्याने आनन्दके आँसू बहाते हुए गद्गद कण्ठसे इस प्रकार कहा—॥ ३८ ॥

वत्स राम चिरं जीव हतास्ते परिपन्थिनः । ज्ञातीन् मे त्वं श्रिया युक्तः सुमित्रायाश्च नन्दय ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘बेटा श्रीराम ! चिरञ्जीवी होओ । तुम्हारे मार्गमें विघ्न डालनेवाले शत्रु नष्ट हो जायँ । तुम राजलक्ष्मीसे युक्त होकर मेरे और सुमित्राके बन्धु-बान्धवोंको आनन्दित करो ॥ ३९ ॥

कल्याणे बत नक्षत्रे मया जातोऽसि पुत्रक । येन त्वया दशरथो गुणैराराधितः पिता ॥ ४० ॥

भावार्थ

‘बेटा ! तुम मेरे द्वारा किसी मङ्गलमय नक्षत्रमें उत्पन्न हुए थे, जिससे तुमने अपने गुणोंद्वारा पिता दशरथको प्रसन्न कर लिया ॥ ४० ॥

अमोघं बत मे क्षान्तं पुरुषे पुष्करेक्षणे । येयमिक्ष्वाकुराजश्रीः पुत्र त्वां संश्रयिष्यति ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘बड़े हर्षकी बात है कि मैंने कमलनयन भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये जो व्रत-उपवास आदि किया था, वह आज सफल हो गया । बेटा ! उसीके फलसे यह इक्ष्वाकुकुलकी राजलक्ष्मी तुम्हें प्राप्त होनेवाली है’ ॥ ४१ ॥

इत्येवमुक्तो मात्रा तु रामो भ्रातरमब्रवीत् । प्राञ्जलिं प्रह्वमासीनमभिवीक्ष्य स्मयन्निव ॥ ४२ ॥

भावार्थ

माताके ऐसा कहनेपर श्रीरामने विनीतभावसे हाथ जोड़कर खड़े हुए अपने भाई लक्ष्मणकी ओर देखकर मुसकराते हुए-से कहा—॥ ४२ ॥

लक्ष्मणेमां मया सार्धं प्रशाधि त्वं वसुंधराम् । द्वितीयं मेऽन्तरात्मानं त्वामियं श्रीरुपस्थिता ॥ ४३ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! तुम मेरे साथ इस पृथ्वीके राज्यका शासन ( पालन ) करो । तुम मेरे द्वितीय अन्तरात्मा हो । यह राजलक्ष्मी तुम्हींको प्राप्त हो रही है ॥ ४३ ॥

सौमित्रे भुङ्क्ष्व भोगांस्त्वमिष्टान् राज्यफलानि च । जीवितं चापि राज्यं च त्वदर्थमभिकामये ॥ ४४ ॥

भावार्थ

‘सुमित्रानन्दन ! तुम अभीष्ट भोगों और राज्यके श्रेष्ठ फलोंका उपभोग करो । तुम्हारे लिये ही मैं इस जीवन तथा राज्यकी अभिलाषा करता हूँ’ ॥ ४४ ॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामो मातरावभिवाद्य च । अभ्यनुज्ञाप्य सीतां च यर्यौ स्वं च निवेशनम् ॥ ४५ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर श्रीरामने दोनों माताओंको प्रणाम किया और सीताको भी साथ चलनेकी आज्ञा दिलाकर वे उनको लिये हुए अपने महलमें चले गये ॥ ४५ ॥

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