अयोध्याकाण्ड, सर्ग 49
रामोऽपि रात्रिशेषेण तेनैव महदन्तरम् । जगाम पुरुषव्याघ्रः पितुराज्ञामनुस्मरन् ॥ १ ॥ तथैव गच्छतस्तस्य व्यपायाद् रजनी शिवा । उपास्य तु शिवां संध्यां विषयानत्यगाहत ॥ २ ॥
भावार्थ
उधर पुरुषसिंह श्रीराम भी पिताकी आज्ञाका बारंबार स्मरण करते हुए उस शेष रात्रिमें ही बहुत दूर निकल गये ॥ उसी तरह चलते-चलते उनकी वह कल्याणमयी रजनी भी व्यतीत हो गयी । सबेरा होनेपर मङ्गलमयी संध्योपासना करके वे विभिन्न जनपदोंको लाँघते हुए चल दिये ॥ २ ॥
ग्रामान् विकृष्टसीमान्तान् पुष्पितानि वनानि च । पश्यन्नतिययौ शीघ्रं शनैरिव हयोत्तमैः ॥ ३ ॥
भावार्थ
जिनकी सीमाके पासकी भूमि जोत दी गयी थी, उन ग्रामों तथा फूलोंसे सुशोभित वनोंको देखते हुए वे उन उत्तम घोड़ोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े जा रहे थे तथापि सुन्दर दृश्योंके देखनेमें तन्मय रहनेके कारण उन्हें उस रथकी गति धीमी-सी ही जान पड़ती थी ॥ ३ ॥
शृण्वन् वाचो मनुष्याणां ग्रामसंवासवासिनाम् । राजानं धिग् दशरथं कामस्य वशमास्थितम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
मार्गमें जो बड़े और छोटे गाँव मिलते थे, उनमें निवास करनेवाले मनुष्योंकी निम्नाङ्कित बातें उनके कानोंमें पड़ रही थीं—‘अहो ! कामके वशमें पड़े हुए राजा दशरथको धिक्कार है ! ॥ ४ ॥
हा नृशंसाद्य कैकेयी पापा पापानुबन्धिनी । तीक्ष्णा सम्भिन्नमर्यादा तीक्ष्णकर्मणि वर्तते ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘हाय ! हाय ! पापशीला, पापासक्त, क्रूर तथा धर्ममर्यादाका त्याग करनेवाली कैकेयीको तो दया छू भी नहीं गयी है, वह क्रूर अब निष्ठुर कर्मेंमें ही लगी रहती है ॥ ५ ॥
या पुत्रमीदृशं राज्ञः प्रवासयति धार्मिकम् । वनवासे महाप्राज्ञं सानुक्रोशं जितेन्द्रियम् ॥ ६ ॥ कथं नाम महाभागा सीता जनकनन्दिनी । सदा सुखेष्वभिरता दुःखान्यनुभविष्यति ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘जिसने महाराजके ऐसे धर्मात्मा, महाज्ञानी, दयालु और जितेन्द्रिय पुत्रको वनवासके लिये घरसे निकलवा दिया है ॥ ‘जनकनन्दिनी महाभागा सीता, जो सदा सुखोंमें ही रत रहती थीं, अब वनवासके दुःख कैसे भोग सकेंगी ? ॥ ७ ॥
अहो दशरथो राजा निःस्नेहः स्वसुतं प्रति । प्रजानामनघं रामं परित्यक्तुमिहेच्छति ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘अहो ! क्या राजा दशरथ अपने पुत्रके प्रति इतने स्नेहहीन हो गये, जो प्रजाओंके प्रति कोई अपराध न करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीका यहाँ परित्याग कर देना चाहते हैं’ ॥ ८ ॥
एता वाचो मनुष्याणां ग्रामसंवासवासिनाम् । शृण्वन्नतिययौ वीरः कोसलान् कोसलेश्वरः ॥ ९ ॥
भावार्थ
छोटे-बड़े गाँवोंमें रहनेवाले मनुष्योंकी ये बातें सुनते हुए वीर कोसलपति श्रीराम कोसल जनपदकी सीमा लाँघकर आगे बढ़ गये ॥ ९ ॥
ततो वेदश्रुतिं नाम शिववारिवहां नदीम् । उत्तीर्याभिमुखः प्रायादगस्त्याध्युषितां दिशम् ॥ १० ॥
भावार्थ
तदनन्तर शीतल एवं सुखद जल बहानेवाली वेदश्रुति नामक नदीको पार करके श्रीरामचन्द्रजी अगस्त्यसेवित दक्षिण-दिशाकी ओर बढ़ गये ॥ १० ॥
गत्वा तु सुचिरं कालं ततः शीतवहां नदीम् । गोमतीं गोयुतानूपामतरत् सागरङ्गमाम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
दीर्घकालतक चलकर उन्होंने समुद्रगामिनी गोमती नदीको पार किया, जो शीतल जलका स्रोत बहाती थी । उसके कछारमें बहुत-सी गौएँ विचरती थीं ॥ ११ ॥
गोमतीं चाप्यतिक्रम्य राघवः शीघ्रगैर्हयैः । मयूरहंसाभिरुतां ततार स्यन्दिकां नदीम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा गोमती नदीको लाँघ करके श्रीरघुनाथजीने मोरों और हंसोंके कलरवोंसे व्याप्त स्यन्दिका नामक नदीको भी पार किया ॥ १२ ॥
स महीं मनुना राज्ञा दत्तामिक्ष्वाकवे पुरा । स्फीतां राष्ट्रवृतां रामो वैदेहीमन्वदर्शयत् ॥ १३ ॥
भावार्थ
वहाँ जाकर श्रीरामने धन-धान्यसे सम्पन्न और अनेक अवान्तर जनपदोंसे घिरी हुई भूमिका सीताको दर्शन कराया, जिसे पूर्वकालमें राजा मनुने इक्ष्वाकुको दिया था ॥ १३ ॥
सूत इत्येव चाभाष्य सारथिं तमभीक्ष्णशः । हंसमत्तस्वरः श्रीमानुवाच पुरुषोत्तमः ॥ १४ ॥
भावार्थ
फिर श्रीमान् पुरुषोत्तम श्रीरामने ‘सूत !’ कहकर सारथिको बारंबार सम्बोधित किया और मदमत्त हंसके समान मधुर स्वरमें इस प्रकार कहा—॥ १४ ॥
कदाहं पुनरागम्य सरय्वाः पुष्पिते वने । मृगयां पर्यटिष्यामि मात्रा पित्रा च संगतः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘सूत ! मैं कब पुनः लौटकर माता-पितासे मिलूँगा और सरयूके पार्श्ववर्ती पुष्पित वनमें मृगयाके लिये भ्रमण करूँगा ? ॥ १५ ॥
नात्यर्थमभिकाङ्क्षामि मृगयां सरयूवने । रतिर्ह्येषातुला लोके राजर्षिगणसम्मता ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘मैं सरयूके वनमें शिकार खेलनेकी बहुत अधिक अभिलाषा नहीं रखता । यह लोकमें एक प्रकारकी अनुपम क्रीड़ा है, जो राजर्षियोंके समुदायको अभिमत है ॥ १६ ॥
राजर्षीणां हि लोकेऽस्मिन् रत्यर्थं मृगया वने । काले कृतां तां मनुजैर्धन्विनामभिकाङ्क्षिताम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘इस लोकमें वनमें जाकर शिकार खेलना राजर्षियोंकी क्रीड़ाके लिये प्रचलित हुआ था । अतः मनुपुत्रोंद्वारा उस समय की गयी यह क्रीड़ा अन्य धनुर्धरोंको भी अभीष्ट हुई’ ॥ १७ ॥
स तमध्वानमैक्ष्वाकः सूतं मधुरया गिरा ।
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें