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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 48

तेषामेवं विषण्णानां पीडितानामतीव च । बाष्पविप्लुतनेत्राणां सशोकानां मुमूर्षया ॥ १ ॥ अभिगम्य निवृत्तानां रामं नगरवासिनाम् । उद्गतानीव सत्त्वानि बभूवुरमनस्विनाम् ॥ २ ॥

भावार्थ

इस प्रकार जो विषादग्रस्त, अत्यन्त पीड़ित, शोकमग्न तथा प्राण त्याग देनेकी इच्छासे युक्त हो नेत्रोंसे आँसू बहा रहे थे, श्रीरामचन्द्रजीके साथ जाकर भी जो उन्हें लिये बिना लौट आये थे और इसीलिये जिनका चित्त ठिकाने नहीं था, उन नगरवासियोंकी ऐसी दशा हो रही थी मानो उनके प्राण निकल गये हों ॥ १-२ ॥

स्वं स्वं निलयमागम्य पुत्रदारैः समावृताः । अश्रूणि मुमुचुः सर्वे बाष्पेण पिहितानना: ॥ ३ ॥

भावार्थ

वे सब अपने-अपने घरमें आकर पत्नी और पुत्रोंसे घिरे हुए आँसू बहाने लगे । उनके मुख अश्रुधारासे आच्छादित थे ॥ ३ ॥

न चाहृष्यन् न चामोदन् वणिजो न प्रसारयन् । न चाशोभन्त पण्यानि नापचन् गृहमेधिनः ॥ ४ ॥

भावार्थ

उनके शरीरमें हर्षका कोई चिह्न नहीं दिखायी देता था तथा मनमें भी आनन्दका अभाव ही था । वैश्योंने अपनी दुकानें नहीं खोलीं । क्रय-विक्रयकी वस्तुएँ बाजारोंमें फैलायी जानेपर भी उनकी शोभा नहीं हुई ( उन्हें लेनेके लिये ग्राहक नहीं आये ) । उस दिन गृहस्थोंके घरमें चूल्हे नहीं जले--रसोई नहीं बनी ॥ ४ ॥

नष्टं दृष्ट्वा नाभ्यनन्दन् विपुलं वा धनागमम् । पुत्रं प्रथमजं लब्ध्वा जननी नाप्यनन्दत ॥ ५ ॥

भावार्थ

खोयी हुई वस्तु मिल जानेपर भी किसीको प्रसन्नता नहीं हुई, विपुल धन-राशि प्राप्त हो जानेपर भी किसीने उसका अभिनन्दन नहीं किया । जिसने प्रथम बार पुत्रको जन्म दिया था, वह माता भी आनन्दित नहीं हुई ॥ ५ ॥

गृहे गृहे रुदत्यश्च भर्तारं गृहमागतम् । व्यगर्हयन्त दुःखार्ता वाग्भिस्तोत्त्रैरिव द्विपान् ॥ ६ ॥

भावार्थ

प्रत्येक घरकी स्त्रियाँ अपने पतियोंको श्रीरामके बिना ही लौटकर आये देख रो पड़ीं और दुःखसे आतुर हो कठोर वचनोंद्वारा उन्हें कोसने लगीं, मानो महावत अङ्कुशोंसे हाथियोंको मार रहे हों ॥ ६ ॥

किं नु तेषां गृहैः कार्यं किं दारैः किं धनेन वा । पुत्रैर्वापि सुखैर्वापि ये न पश्यन्ति राघवम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

वे बोलीं—‘जो लोग श्रीरामको नहीं देखते, उन्हें घर-द्वार, स्त्री-पुत्र, धन-दौलत और सुख-भोगोंसे क्या प्रयोजन है ? ॥ ७ ॥

एकः सत्पुरुषो लोके लक्ष्मणः सह सीतया । योऽनुगच्छति काकुत्स्थं रामं परिचरन् वने ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘संसारमें एकमात्र लक्ष्मण ही सत्पुरुष हैं, जो सीताके साथ श्रीरामकी सेवा करनेके लिये उनके पीछे-पीछे वनमें जा रहे हैं ॥ ८ ॥

आपगाः कृतपुण्यास्ताः पद्मिन्यश्च सरांसि च । येषु यास्यति काकुत्स्थो विगाह्य सलिलं शुचि ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘उन नदियों, कमलमण्डित बावड़ियों तथा सरोवरोंने अवश्य ही बहुत पुण्य किया होगा, जिनके पवित्र जलमें स्नान करके श्रीरामचन्द्रजी आगे जायँगे ॥ ९ ॥

शोभयिष्यन्ति काकुत्स्थमटव्यो रम्यकाननाः । आपगाश्च महानूपाः सानुमन्तश्च पर्वताः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘जिनमें रमणीय वृक्षावलियाँ शोभा पाती हैं, वे सुन्दर वनश्रेणियाँ, बड़े कछारवाली नदियाँ और शिखरोंसे सम्पन्न पर्वत श्रीरामकी शोभा बढ़ायेंगे ॥ १० ॥

काननं वापि शैलं वा यं रामोऽनुगमिष्यति । प्रियातिथिमिव प्राप्तं नैनं शक्ष्यन्त्यनर्चितुम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम जिस वन अथवा पर्वतपर जायँगे, वहाँ उन्हें अपने प्रिय अतिथिकी भाँति आया हुआ देख वे वन और पर्वत उनकी पूजा किये बिना नहीं रह सकेंगे ॥ ११ ॥

विचित्रकुसुमापीडा बहुमञ्जरिधारिणः । राघवं दर्शयिष्यन्ति नगा भ्रमरशालिनः ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘विचित्र फूलोंके मुकुट पहने और बहुत-सी मञ्जरियाँ धारण किये भ्रमरोंसे सुशोभित वृक्ष वनमें श्रीरामचन्द्रजीको अपनी शोभा दिखायेंगे ॥ १२ ॥

अकाले चापि मुख्यानि पुष्पाणि च फलानि च । दर्शयिष्यन्त्यनुक्रोशाद् गिरयो राममागतम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘वहाँके पर्वत अपने यहाँ पधारे हुए श्रीरामको अत्यन्त आदरके कारण असमयमें भी उत्तम-उत्तम फूल और फल दिखायेंगे ( भेंट करेंगे ) ॥ १३ ॥

प्रस्रविष्यन्ति तोयानि विमलानि महीधराः । विदर्शयन्तो विविधान् भूयश्चित्रांश्च निर्झरान् ॥ १४ ॥ पादपाः पर्वताग्रेषु रमयिष्यन्ति राघवम् । यत्र रामो भयं नात्र नास्ति तत्र पराभवः ॥ १५ ॥ स हि शूरो महाबाहुः पुत्रो दशरथस्य च । पुरा भवति नोऽदूरादनुगच्छाम राघवम् ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘वे पर्वत बारंबार नाना प्रकारके विचित्र झरने दिखाते हुए श्रीरामके लिये निर्मल जलके स्रोत बहायेंगे ॥ ‘पर्वत-शिखरोंपर लहलहाते हुए वृक्ष श्रीरघुनाथजीका मनोरञ्जन करेंगे । जहाँ श्रीराम हैं वहाँ न तो कोई भय है और न किसीके द्वारा पराभव ही होसकता है; क्योंकि दशरथनन्दन महाबाहु श्रीराम बड़े शूरवीर हैं । अतः जबतक वे हमलोगोंसे बहुत दूर नहीं निकल जाते, इसके पहले ही हमें उनके पास पहुँचकर पीछे लग जाना चाहिये ॥ १५-१६ ॥

पादच्छाया सुखं भर्तुस्तादृशस्य महात्मनः । स हि नाथो जनस्यास्य स गतिः स परायणम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘उनके-जैसे महात्मा एवं स्वामीके चरणोंकी छाया ही हमारे लिये परम सुखद है । वे ही हमारे रक्षक, गति और परम आश्रय हैं ॥ १७ ॥

वयं परिचरिष्यामः सीतां यूयं च राघवम् । इति पौरस्त्रियोभर्तॄन् दुःखार्तास्तत्तदब्रुवन् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘हम स्त्रियाँ सीताजीकी सेवा करेंगी और तुम सब लोग श्रीरघुनाथजीकी सेवामें लगे रहना ।’ इस प्रकार पुरवासियोंकी स्त्रियाँ दुःखसे आतुर हो अपने पतियोंसे उपर्युक्त बातें कहने लगीं ॥ १८ ॥

युष्माकं राघवोऽरण्ये योगक्षेमं विधास्यति । सीता नारीजनस्यास्य योगक्षेमं करिष्यति ॥ १९ ॥

भावार्थ

( वे पुनः बोलीं–) ‘वनमें श्रीरामचन्द्रजी आपलोगोंका योगक्षेम सिद्ध करेंगे और सीताजी हम नारियोंके योगक्षेमका निर्वाह करेंगी ॥ १९ ॥

को न्वनेनाप्रतीतेन सोत्कण्ठितजनेन च । सम्प्रीयेतामनोज्ञेन वासेन हतचेतसा ॥ २० ॥

भावार्थ

‘यहाँका निवास प्रीति और प्रतीतिसे रहित है । यहाँके सब लोग श्रीरामके लिये उत्कण्ठित रहते हैं । किसीको यहाँका रहना अच्छा नहीं लगता तथा यहाँ रहनेसे मन अपनी सुध-बुध खो बैठता है । भला, ऐसे निवाससे किसको प्रसन्नता होगी ? ॥ २० ॥

कैकेय्या यदि चेद् राज्यं स्यादधर्म्यमनाथवत् । न हि नो जीवितेनार्थः कुतः पुत्रैः कुतो धनैः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘यदि इस राज्यपर कैकेयीका अधिकार हो गया तो यह अनाथ-सा हो जायगा । इसमें धर्मकी मर्यादा नहीं रहने पायेगी । ऐसे राज्यमें तो हमें जीवित रहनेकी ही आवश्यकता नहीं जान पड़ती, फिर यहाँ धन और पुत्रोंसे क्या लेना है ? ॥ २१ ॥

यया पुत्रश्च भर्ता च त्यक्तावैश्वर्यकारणात् । कं सा परिहरेदन्यं कैकेयी कुलपांसनी ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘जिसने राज्य-वैभवके लिये अपने पुत्र और पतिको त्याग दिया, वह कुलकलङ्किनी कैकेयी दूसरे किसका त्याग नहीं करेगी ? ॥ २२ ॥

कैकेय्या न वयं राज्ये भृतका हि वसेमहि । जीवन्त्या जातु जीवन्त्यः पुत्रैरपि शपामहे ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘हम अपने पुत्रोंकी शपथ खाकर कहती हैं कि जबतक कैकेयी जीवित रहेगी, तबतक हम जीते-जी कभी उसके राज्यमें नहीं रह सकेंगी, भले ही यहाँ हमारा पालन-पोषण होता रहे ( फिर भी हम यहाँ रहना नहीं चाहेंगी ) ॥ २३ ॥

या पुत्रं पार्थिवेन्द्रस्य प्रवासयति निर्घृणा । कस्तां प्राप्य सुखं जीवेदधर्म्यां दुष्टचारिणीम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘जिस निर्दय स्वभाववाली नारीने महाराजके पुत्रको राज्यसे बाहर निकलवा दिया है, उस अधर्मपरायणा दुराचारिणी कैकेयीके अधिकारमें रहकर कौन सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है ? ॥ २४ ॥

उपद्रुतमिदं सर्वमनालम्भमनायकम् । कैकेय्यास्तु कृते सर्वं विनाशमुपयास्यति ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘कैकेयीके कारण यह सारा राज्य अनाथ एवं यज्ञरहित होकर उपद्रवका केन्द्र बन गया है, अतः एक दिन सबका विनाश हो जायगा ॥ २५ ॥

नहि प्रव्रजिते रामे जीविष्यति महीपतिः । मृते दशरथे व्यक्तं विलोपस्तदनन्तरम् ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘श्रीरामचन्द्रजीके वनवासी हो जानेपर महाराज दशरथ जीवित नहीं रहेंगे । साथ ही यह भी स्पष्ट है कि राजा दशरथकी मृत्युके पश्चात् इस राज्यका लोप हो जायगा ॥ २६ ॥

ते विषं पिबतालोड्य क्षीणपुण्याः सुदुःखिताः । राघवं वानुगच्छध्वमश्रुतिं वापि गच्छत ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘इसलिये अब तुमलोग यह समझ लो कि अब हमारे पुण्य समाप्त हो गये । यहाँ रहकर हमें अत्यन्त दुःख ही भोगना पड़ेगा । ऐसी दशामें या तो जहर घोलकर पी जाओ या श्रीरामका अनुसरण करो अथवा किसी ऐसे देशमें चले चलो, जहाँ कैकेयीका नाम भी न सुनायी पड़े ॥ २७ ॥

मिथ्याप्रव्राजितो रामः सभार्यः सहलक्ष्मणः । भरते संनिबद्धाः स्मः सौनिके पशवो यथा ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘झूठे वरकी कल्पना करके पत्नी और लक्ष्मणके साथ श्रीरामको देशनिकाला दे दिया गया और हमें भरतके साथ बाँध दिया गया । अब हमारी दशा कसाईके घर बँधे हुए पशुओंके समान हो गयी है ॥ २८ ॥

पूर्णचन्द्राननः श्यामो गूढजत्रुररिंदमः । आजानुबाहुः पद्माक्षो रामो लक्ष्मणपूर्वजः ॥ २९ ॥ पूर्वाभिभाषी मधुरः सत्यवादी महाबलः । सौम्यश्च सर्वलोकस्य चन्द्रवत् प्रियदर्शनः ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मणके ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर है। उनके शरीरकी कान्ति श्याम, गलेकी हँसली मांससे ढकी हुई, भुजाएँ घुटनोंतक लंबी और नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं । वे सामने आनेपर पहले ही बातचीत छेड़ते हैं तथा मीठे और सत्य वचन बोलते हैं । श्रीराम शत्रुओंका दमन करनेवाले और महान् बलवान् हैं । समस्त जगत्के लिये सौम्य ( कोमल स्वभाववाले ) हैं । उनका दर्शन चन्द्रमाके समान प्यारा है ॥ २९-३० ॥

नूनं पुरुषशार्दूलो मत्तमातङ्गविक्रमः । शोभयिष्यत्यरण्यानि विचरन् स महारथः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘निश्चय ही मतवाले गजराजके समान पराक्रमी पुरुषसिंह महारथी श्रीराम भूतलपर विचरते हुए वनस्थलियोंकी शोभा बढ़ायेंगे’ ॥ ३१ ॥

तास्तथा विलपन्त्यस्तु नगरे नागरस्त्रियः । चुक्रुशुर्दुःखसंतप्ता मृत्योरिव भयागमे ॥ ३२ ॥

भावार्थ

नगरमें नागरिकोंकी स्त्रियाँ इस प्रकार विलाप करती हुई दुःखसे संतप्त हो इस तरह जोर-जोरसे रोने लगीं मानो उनपर मृत्युका भय आ गया हो ॥ ३२ ॥

इत्येवं विलपन्तीनां स्त्रीणां वेश्मसु राघवम् । जगामास्तं दिनकरो रजनी चाभ्यवर्तत ॥ ३३ ॥

भावार्थ

अपने-अपने घरोंमें श्रीरामके लिये स्त्रियाँ इस प्रकार दिनभर विलाप करती रहीं । धीरे-धीरे सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और रात हो गयी ॥ ३३ ॥

नष्टज्वलनसंतापा प्रशान्ताध्यायसत्कथा । तिमिरेणानुलिप्तेव तदा सा नगरी बभौ ॥ ३४ ॥

भावार्थ

उस समय किसीके घरमें अग्निहोत्रके लिये भी आग नहीं जली । स्वाध्याय और कथावार्ता भी नहीं हुई । सारी अयोध्यापुरी अन्धकारसे पुती हुई-सी प्रतीत होती थी ॥ ३४ ॥

उपशान्तवणिक्पण्या नष्टहर्षा निराश्रया । अयोध्या नगरी चासीन्नष्टतारमिवाम्बरम् ॥ ३५ ॥

भावार्थ

बनियोंकी दुकानें बंद होनेके कारण वहाँ चहल-पहल नहीं थी, सारी पुरीकी हँसी-खुशी छिन गयी थी, श्रीरामरूपी आश्रयसे रहित अयोध्यानगरी जिसके तारे छिप गये हों, उस आकाशके समान श्रीहीन जान पड़ती थी॥ ३५ ॥

तदा स्त्रियो रामनिमित्तमातुरा यथा सुते भ्रातरि वा विवासिते । विलप्य दीना रुरुदुर्विचेतसः सुतैर्हितासामधिकोऽपि सोऽभवत्।३६।

भावार्थ

उस समय नगरवासिनी स्त्रियाँ श्रीरामके लिये इस तरह शोकातुर हो रही थीं, मानो उनके सगे बेटे या भाईको देशनिकाला दे दिया गया हो । वे अत्यन्त दीनभावसे विलाप करके रोने लगीं और रोते-रोते अचेत हो गयीं; क्योंकि श्रीराम उनके लिये पुत्रों ( तथा भाइयों )से भी बढ़कर थे ॥ ३६ ॥

प्रशान्तगीतोत्सवनृत्यवादना विभ्रष्टहर्षा पिहितापणोदया । तदा ह्ययोध्या नगरी बभूव सा महार्णवः संक्षपितोदको यथा ॥ ३७ ॥

भावार्थ

वहाँ गाने, बजाने और नाचनेके उत्सव बंद हो गये, सबका उत्साह जाता रहा, बाजारकी दुकानें नहीं खुलीं, इन सब कारणोंसे उस समय अयोध्यानगरी जलहीन समुद्रके समान सूनसान लग रही थी ॥ ३७ ॥

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