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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 47

प्रभातायां तु शर्वर्यां पौरास्ते राघवं विना । शोकोपहतनिश्चेष्टा बभूवुर्हतचेतसः ॥ १ ॥

भावार्थ

इधर रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब अयोध्यावासी मनुष्य श्रीरघुनाथजीको न देखकर अचेत हो गये । शोकसे व्याकुल होनेके कारण उनसे कोई भी चेष्टा करते न बनी ॥ १ ॥

शोकजाश्रुपरिद्यूना वीक्षमाणास्ततस्ततः । आलोकमपि रामस्य न पश्यन्ति स्म दुःखिताः ॥ २ ॥

भावार्थ

वे शोकजनित आँसू बहाते हुए अत्यन्त खिन्न हो गये तथा इधर-उधर उनकी खोज करने लगे । परंतु उन दुखी पुरवासियोंको श्रीराम किधर गये, इस बातका पता देनेवाला कोई चिह्नतक नहीं दिखायी दिया ॥ २ ॥

ते विषादार्तवदना रहितास्तेन धीमता । कृपणाः करुणा वाचो वदन्ति स्म मनीषिणः ॥ ३ ॥

भावार्थ

बुद्धिमान् श्रीरामसे विलग होकर वे अत्यन्त दीन हो गये । उनके मुखपर विषादजनित वेदना स्पष्ट दिखायी देती थी । वे मनीषी पुरवासी करुणाभरे वचन बोलते हुए विलाप करने लगे—॥ ३ ॥

धिगस्तु खलु निद्रां तां ययापहृतचेतसः । नाद्य पश्यामहे रामं पृथूरस्कं महाभुजम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘हाय ! हमारी उस निद्राको धिक्कार है, जिससे अचेत हो जानेके कारण हम उस समय विशाल वक्षवाले महाबाहु श्रीरामके दर्शनसे वञ्चित हो गये हैं ॥ ४ ॥

कथं रामो महाबाहुः स तथावितथक्रियः। भक्तं जनमभित्यज्य प्रवासं तापसो गतः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘जिनकी कोई भी क्रिया कभी निष्फल नहीं होती, वे तापसवेषधारी महाबाहु श्रीराम हम भक्तजनोंको छोड़कर परदेश ( वन ) में कैसे चले गये ? ॥ ५ ॥

यो नः सदा पालयति पिता पुत्रानिवौरसान् । कथं रघूणां स श्रेष्ठस्त्यक्त्वा नो विपिनं गतः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका पालन करता है, उसी प्रकार जो सदा हमारी रक्षा करते थे, वे ही रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम आज हमें छोड़कर वनको क्यों चले गये ? ॥ ६ ॥

इहैव निधनं याम महाप्रस्थानमेव वा। रामेण रहितानां नो किमर्थं जीवितं हितम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘अब हमलोग यहीं प्राण दे दें या मरनेका निश्चय करके उत्तर दिशाकी ओर चल दें । श्रीरामसे रहित होकर हमारा जीवन-धारण किसलिये हितकर हो सकता है ? ॥ ७ ॥

सन्ति शुष्काणि काष्ठानि प्रभूतानि महान्ति च । तैः प्रज्वाल्य चितां सर्वे प्रविशामोऽथवा वयम् ॥८॥

भावार्थ

‘अथवा यहाँ बहुत-से बड़े-बड़े सूखे काठ पड़े हैं, उनसे चिता जलाकर हम सब लोग उसीमें प्रवेश कर जायँ ॥ ८ ॥

किं वक्ष्यामो महाबाहुरनसूयः प्रियंवदः । नीतः स राघवोऽस्माभिरिति वक्तुं कथं क्षमम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘( यदि हमसे कोई श्रीरामका वृत्तान्त पूछेगा तो हम उसे क्या उत्तर देंगे ? ) क्या हम यह कहेंगे कि जो किसीके दोष नहीं देखते और सबसे प्रिय वचन बोलते हैं, उन महाबाहु श्रीरघुनाथजीको हमने वनमें पहुँचा दिया है ? हाय ! यह अयोग्य बात हमारे मुँहसे कैसे निकल सकती है ? ॥ ९ ॥

सा नूनं नगरी दीना दृष्ट्वास्मान् राघवं विना । भविष्यति निरानन्दा सस्त्रीबालवयोऽधिका ॥ १० ॥

भावार्थ

‘श्रीरामके बिना हमलोगोंको लौटा हुआ देखकर स्त्री, बालक और वृद्धोंसहित सारी अयोध्यानगरी निश्चय ही दीन और आनन्दहीन हो जायगी ॥ १० ॥

निर्यातास्तेन वीरेण सह नित्यं महात्मना । विहीनास्तेन च पुनः कथं द्रक्ष्याम तां पुरीम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘हमलोग वीरवर महात्मा श्रीरामके साथ सर्वदा निवास करनेके लिये निकले थे । अब उनसे बिछुड़कर हम अयोध्यापुरीको कैसे देख सकेंगे’ ॥ ११ ॥

इतीव बहुधा वाचो बाहुमुद्यम्य ते जनाः । विलपन्ति स्म दुःखार्ता हतवत्सा इवाग्र्यगाः ॥ १२ ॥

भावार्थ

इस प्रकार अनेक तरहकी बातें कहते हुए वे समस्त पुरवासी अपनी भुजा उठाकर विलाप करने लगे । वे बछड़ोंसे बिछुड़ी हुई अग्रगामिनी गौओंकी भाँति दुःखसे व्याकुल हो रहे थे ॥ १२ ॥

ततो मार्गानुसारेण गत्वा किंचित् ततः क्षणम् । मार्गनाशाद् विषादेन महता समभिप्लुताः ॥ १३ ॥

भावार्थ

फिर रास्तेपर रथकी लीक देखते हुए सब-के-सब कुछ दूरतक गये; किंतु क्षणभरमें मार्गका चिह्न न मिलनेके कारण वे महान् शोकमें डूब गये ॥ १३ ॥

रथमार्गानुसारेण न्यवर्तन्त मनस्विनः । किमिदं किं करिष्यामो दैवेनोपहता इति ॥ १४ ॥

भावार्थ

उस समय यह कहते हुए कि ‘यह क्या हुआ ? अब हम क्या करें ? दैवने हमें मार डाला’ वे मनस्वी पुरुष रथकी लीकका अनुसरण करते हुए अयोध्याकी ओर लौट पड़े ॥ १४ ॥

तदा यथागतेनैव मार्गेण क्लान्तचेतसः । अयोध्यामगमन् सर्वे पुरीं व्यथितसज्जनाम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

उनका चित्त क्लान्त हो रहा था । वे सब जिस मार्गसे गये थे, उसीसे लौटकर अयोध्यापुरीमें जा पहुँचे, जहाँके सभी सत्पुरुष श्रीरामके लिये व्यथित थे ॥ १५ ॥

आलोक्य नगरीं तां च क्षयव्याकुलमानसाः । आवर्तयन्त तेऽश्रूणि नयनैः शोकपीडितैः ॥ १६ ॥

भावार्थ

उस नगरीको देखकर उनका हृदय दुःखसे व्याकुल हो उठा । वे अपने शोकपीड़ित नेत्रोंद्वारा आँसुओंकी वर्षा करने लगे ॥ १६ ॥

एषा रामेण नगरी रहिता नातिशोभते । आपगा गरुडेनेव ह्रदादुद्धृतपन्नगा ॥ १७ ॥

भावार्थ

( वे बोले—) ‘जिसके गहरे कुण्डसे वहाँका नाग गरुड़के द्वारा निकाल लिया गया हो, वह नदी जैसे शोभाहीन हो जाती है, उसी प्रकार श्रीरामसे रहित हुई यह अयोध्यानगरी अब अधिक शोभा नहीं पाती है’ ॥ १७ ॥

चन्द्रहीनमिवाकाशं तोयहीनमिवार्णवम् । अपश्यन् निहतानन्दं नगरं ते विचेतसः ॥ १८ ॥

भावार्थ

उन्होंने देखा, सारा नगर चन्द्रहीन आकाश और जलहीन समुद्रके समान आनन्दशून्य हो गया है । पुरीकी यह दुरवस्था देख वे अचेत-से हो गये ॥ १८ ॥

ते तानि वेश्मानि महाधनानि दुःखेन दुःखोपहता विशन्तः । नैव प्रजग्मुः स्वजनं परं वा निरीक्ष्यमाणाः प्रविनष्टहर्षाः ॥ १९ ॥

भावार्थ

उनके हृदयका सारा उल्लास नष्ट हो चुका था । वे दुःखसे पीड़ित हो उन महान् वैभवसम्पन्न गृहोंमें बड़े क्लेशके साथ प्रविष्ट हो सबको देखते हुए भी अपने और परायेकी पहचान न कर सके ॥ १९ ॥

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