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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 46

ततस्तु तमसातीरं रम्यमाश्रित्य राघवः । सीतामुद्वीक्ष्य सौमित्रिमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

तदनन्तर तमसाके रमणीय तटका आश्रय लेकर श्रीरामने सीताकी ओर देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

इयमद्य निशा पूर्वा सौमित्रे प्रहिता वनम् । वनवासस्य भद्रं ते न चोत्कण्ठितुमर्हसि ॥ २ ॥

भावार्थ

‘सुमित्रानन्दन ! तुम्हारा कल्याण हो । हमलोग जो वनकी ओर प्रस्थित हुए हैं, हमारे उस वनवासकी आज यह पहली रात प्राप्त हुई है; अतः अब तुम्हें नगरके लिये उत्कण्ठित नहीं होना चाहिये ॥ २ ॥

पश्य शून्यान्यरण्यानि रुदन्तीव समन्ततः । यथा निलयमायद्भिर्निलीनानि मृगद्विजैः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘इन सूने वनोंकी ओर तो देखो, इनमें वन्य पशु-पक्षी अपने-अपने स्थानपर आकर अपनी बोली बोल रहे हैं। उनके शब्दसे सारी वनस्थली व्याप्त हो गयी है, मानो ये सारे वन हमें इस अवस्थामें देखकर खिन्न हो सब ओरसे रो रहे हैं ॥ ३ ॥

अद्यायोध्या तु नगरी राजधानी पितुर्मम । सस्त्रीपुंसा गतानस्माञ्शोचिष्यति न संशयः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘आज मेरे पिताकी राजधानी अयोध्या नगरी वनमें आये हुए हमलोगोंके लिये समस्त नर-नारियोंसहित शोक करेगी, इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥

अनुरक्ता हि मनुजा राजानं बहुभिर्गुणैः । त्वां च मां च नरव्याघ्र शत्रुघ्नभरतौ तथा ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘पुरुषसिंह ! अयोध्याके मनुष्य बहुत-से सद्गुणोंके कारण महाराजमें, तुममें, मुझमें तथा भरत और शत्रुघ्नमें भी अनुरक्त हैं ॥ ५ ॥

पितरं चानुशोचामि मातरं च यशस्विनीम् । अपि नान्धौ भवेतां नौ रुदन्तौ तावभीक्ष्णशः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘इस समय मुझे पिता और यशस्विनी माताके लिये बड़ा शोक हो रहा है; कहीं ऐसा न हो कि वे निरन्तर रोते रहनेके कारण अंधे हो जायँ ॥ ६ ॥

भरतः खलु धर्मात्मा पितरं मातरं च मे । धर्मार्थकामसहितैर्वाक्यैराश्वासयिष्यति ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘परंतु भरत बड़े धर्मात्मा हैं । अवश्य ही वे धर्म, अर्थ और काम—तीनोंके अनुकूल वचनोंद्वारा पिताजीको और मेरी माताको भी सान्त्वना देंगे ॥ ७ ॥

भरतस्यानृशंसत्वं संचिन्त्याहं पुनः पुनः । नानुशोचामि पितरं मातरं च महाभुज ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! जब मैं भरतके कोमल स्वभावका बार-बार स्मरण करता हूँ, तब मुझे माता-पिताके लिये अधिक चिन्ता नहीं होती ॥ ८ ॥

त्वया कार्यं नरव्याघ्र मामनुव्रजता कृतम् । अन्वेष्टव्या हि वैदेह्या रक्षणार्थं सहायता ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ! तुमने मेरे साथ आकर बड़ा ही महत्त्वपूर्ण कार्य किया है; क्योंकि तुम न आते तो मुझे विदेहकुमारी सीताकी रक्षाके लिये कोई सहायक ढूँढ़ना पड़ता ॥ ९ ॥

अद्भिरेव हि सौमित्रे वत्स्याम्यद्य निशामिमाम् । एतद्धि रोचते मह्यं वन्येऽपि विविधे सति ॥ १० ॥

भावार्थ

‘सुमित्रानन्दन ! यद्यपि यहाँ नाना प्रकारके जंगली फल-मूल मिल सकते हैं तथापि आजकी यह रात मैं केवल जल पीकर ही बिताऊँगा । यही मुझे अच्छा जान पड़ता है’ ॥१०॥

एवमुक्त्वा तु सौमित्रिं सुमन्त्रमपि राघवः । अप्रमत्तस्त्वमश्वेषु भव सौम्येत्युवाच ह ॥ ११ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजीने सुमन्त्रसे भी कहा—‘सौम्य ! अब आप घोड़ोंकी रक्षापर ध्यान दें, उनकी ओरसे असावधान न हों’ ॥ ११ ॥

सोऽश्वान् सुमन्त्रः संयम्य सूर्येऽस्तं समुपागते । प्रभूतयवसान् कृत्वा बभूव प्रत्यनन्तरः ॥ १२ ॥

भावार्थ

सुमन्त्रने सूर्यास्त हो जानेपर घोड़ोंको लाकर बाँध दिया और उनके आगे बहुत-सा चारा डालकर वे श्रीरामके पास आ गये ॥ १२ ॥

उपास्य तु शिवां संध्यां दृष्ट्वा रात्रिमुपागताम् । रामस्य शयनं चक्रे सूतः सौमित्रिणा सह ॥ १३ ॥

भावार्थ

फिर ( वर्णानुकूल ) कल्याणमयी संध्योपासना करके रात आयी देख लक्ष्मणसहित सुमन्त्रने श्रीरामचन्द्रजीके शयन करनेयोग्य स्थान और आसन ठीक किया ॥ १३ ॥

तां शय्यां तमसातीरे वीक्ष्य वृक्षदलैर्वृताम् । रामः सौमित्रिणा सार्धं सभार्यः संविवेश ह ॥ १४ ॥

भावार्थ

तमसाके तटपर वृक्षके पत्तोंसे बनी हुई वह शय्या देखकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सीताके साथ उसपर बैठे ॥१४॥

सभार्यं सम्प्रसुप्तं तु श्रान्तं सम्प्रेक्ष्य लक्ष्मणः । कथयामास सूताय रामस्य विविधान् गुणान् ॥ १५ ॥

भावार्थ

थोड़ी देरमें सीतासहित श्रीरामको थककर सोया हुआ देख लक्ष्मण सुमन्त्रसे उनके नाना प्रकारके गुणोंका वर्णन करने लगे ॥ १५ ॥

जाग्रतोरेव तां रात्रिं सौमित्रेरुदितो रविः । सूतस्य तमसातीरे रामस्य ब्रुवतो गुणान् ॥ १६ ॥

भावार्थ

सुमन्त्र और लक्ष्मण तमसाके किनारे श्रीरामके गुणोंकी चर्चा करते हुए रातभर जागते रहे । इतनेहीमें सूर्योदयका समय निकट आ पहुँचा ॥ १६ ॥

गोकुलाकुलतीरायास्तमसाया विदूरतः । अवसत् तत्र तां रात्रिं रामः प्रकृतिभिः सह ॥ १७ ॥

भावार्थ

तमसाका वह तट गौओंके समुदायसे भरा हुआ था । श्रीरामचन्द्रजीने प्रजाजनोंके साथ वहीं रात्रिमें निवास किया । वे प्रजाजनोंसे कुछ दूरपर सोये थे ॥ १७ ॥

उत्थाय च महातेजाः प्रकृतीस्ता निशाम्य च । अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं पुण्यलक्षणम् ॥ १८ ॥ अस्मद्व्यपेक्षान् सौमित्रे निर्व्यपेक्षान् गृहेष्वपि । वृक्षमूलेषु संसक्तान् पश्य लक्ष्मण साम्प्रतम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

महातेजस्वी श्रीराम तड़के ही उठे और प्रजाजनोंको सोते देख पवित्र लक्षणोंवाले भाई लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले—॥ ‘सुमित्राकुमार लक्ष्मण ! इन पुरवासियोंकी ओर देखो, ये इस समय वृक्षोंकी जड़से सटकर सो रहे हैं । इन्हें केवल हमारी चाह है । ये अपने घरोंकी ओरसे भी पूर्ण निरपेक्ष हो गये हैं ॥ १९ ॥

यथैते नियमं पौराः कुर्वन्त्यस्मन्निवर्तने । अपि प्राणान् न्यसिष्यन्ति न तु त्यक्ष्यन्ति निश्चयम् ॥२०॥

भावार्थ

‘हमें लौटा ले चलनेके लिये ये जैसा उद्योग कर रहे हैं, इससे जान पड़ता है, ये अपना प्राण त्याग देंगे; किंतु अपना निश्चय नहीं छोड़ेंगे ॥ २० ॥

यावदेव तु संसुप्तास्तावदेव वयं लघु । रथमारुह्य गच्छामः पन्थानमकुतोभयम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘अतः जबतक ये सो रहे हैं तभीतक हमलोग रथपर सवार होकर शीघ्रतापूर्वक यहाँसे चल दें । फिर हमें इस मार्गपर और किसीके आनेका भय नहीं रहेगा ॥ २१ ॥

अतो भूयोऽपि नेदानीमिक्ष्वाकुपुरवासिनः । स्वपेयुरनुरक्ता मा वृक्षमूलेषु संश्रिताः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘अयोध्यावासी हमलोगोंके अनुरागी हैं । जब हम यहाँसे निकल चलेंगे, तब उन्हें फिर अब इस प्रकार वृक्षोंकी जड़ोंसे सटकर नहीं सोना पड़ेगा ॥ २२ ॥

पौरा ह्यात्मकृताद् दुःखाद् विप्रमोच्या नृपात्मजैः । न तु खल्वात्मना योज्या दुःखेन पुरवासिनः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘राजकुमारोंका यह कर्तव्य है कि वे पुरवासियोंको अपने द्वारा होनेवाले दुःखसे मुक्त करें, न कि अपना दुःख देकर उन्हें और दुखी बना दें’ ॥ २३ ॥

अब्रवील्लक्ष्मणो रामं साक्षाद् धर्ममिव स्थितम् । रोचते मे तथा प्राज्ञ क्षिप्रमारुह्यतामिति ॥ २४ ॥

भावार्थ

यह सुनकर लक्ष्मणने साक्षात् धर्मके समान विराजमान भगवान् श्रीरामसे कहा—‘परम बुद्धिमान् आर्य ! मुझे आपकी राय पसंद है । शीघ्र ही रथपर सवार होइये’ ॥ २४ ॥

अथ रामोऽब्रवीत् सूतं शीघ्रं संयुज्यतां रथः । गमिष्यामि ततोऽरण्यं गच्छ शीघ्रमितः प्रभो ॥ २५ ॥

भावार्थ

तब श्रीरामने सुमन्त्रसे कहा—‘प्रभो ! आप जाइये और शीघ्र ही रथ जोतकर तैयार कीजिये । फिर मैं जल्दी ही यहाँसे वनकी ओर चलूँगा’ ॥ २५ ॥

सूतस्ततः संत्वरितः स्यन्दनं तैर्हयोत्तमैः । योजयित्वा तु रामस्य प्राञ्जलिः प्रत्यवेदयत् ॥ २६ ॥ अयं युक्तो महाबाहो रथस्ते रथिनां वर । त्वरयाऽऽरोह भद्रं ते ससीतः सहलक्ष्मणः ॥ २७ ॥

भावार्थ

आज्ञा पाकर सुमन्त्रने उन उत्तम घोड़ोंको तुरंत ही रथमें जोत दिया और श्रीरामके पास हाथ जोड़कर निवेदन किया–॥ ‘महाबाहो ! रथियोंमें श्रेष्ठ वीर ! आपका कल्याण हो । आपका यह रथ जुता हुआ तैयार है । अब सीता और लक्ष्मणके साथ शीघ्र इसपर सवार होइये’ ॥ २७ ॥

तं स्यन्दनमधिष्ठाय राघवः सपरिच्छदः । शीघ्रगामाकुलावर्तां तमसामतरन्नदीम् ॥ २८ ॥ स संतीर्य महाबाहुः श्रीमाञ्छिवमकण्टकम् । प्रापद्यत महामार्गमभयं भयदर्शिनाम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजी सबके साथ रथपर बैठकर तीव्र-गतिसे बहनेवाली भँवरोंसे भरी हुई तमसा नदीके उस पार गये ॥ नदीको पार करके महाबाहु श्रीमान् राम ऐसे महान् मार्गपर जा पहुँचे जो कल्याणप्रद, कण्टकरहित तथा सर्वत्र भय देखने-वालोंके लिये भी भयसे रहित था ॥ २९ ॥

मोहनार्थं तु पौराणां सूतं रामोऽब्रवीद् वचः । उदङ्मुखः प्रयाहि त्वं रथमारुह्य सारथे ॥ ३० ॥ मुहूर्तं त्वरितं गत्वा निवर्तय रथं पुनः । यथा न विद्युः पौरा मां तथा कुरु समाहितः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

उस समय श्रीरामने पुरवासियोंको भुलावा देनेके लिये सुमन्त्रसे यह बात कही—‘सारथे ! ( हमलोग तो यहीं उतर जाते हैं;) परंतु आप रथपर आरूढ़ होकर पहले उत्तर दिशाकी ओर जाइये । दो घड़ीतक तीव्र गतिसे उत्तर जाकर फिर दूसरे मार्गसे रथको यहीं लौटा लाइये । जिस तरह भी पुरवासियोंको मेरा पता न चले, वैसा एकाग्रतापूर्वक प्रयत्न कीजिये’॥३०-३१॥

रामस्य तु वचः श्रुत्वा तथा चक्रे च सारथिः । प्रत्यागम्य च रामस्य स्यन्दनं प्रत्यवेदयत् ॥ ३२ ॥ तौ सम्प्रयुक्तं तु रथं समास्थितौ तदा ससीतौ रघुवंशवर्धनौ । प्रचोदयामास ततस्तुरंगमान् स सारथिर्येन पथा तपोवनम् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

श्रीरामजीका यह वचन सुनकर सारथिने वैसा ही किया और लौटकर पुनः श्रीरामकी सेवामें रथ उपस्थित कर दिया॥ तत्पश्चात् सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मण, जो रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले थे, लौटाकर लाये गये उस रथपर चढ़े । तदनन्तर सारथिने घोड़ोंको उस मार्गपर बढ़ा दिया, जिससे तपोवनमें पहुँचा जा सकता था ॥ ३३ ॥

ततः समास्थाय रथं महारथः ससारथिर्दाशरथिर्वनं ययौ । उदङ्मुखं तं तु रथं चकार प्रयाणमाङ्गल्यनिमित्तदर्शनात् ॥ ३४ ॥

भावार्थ

तदनन्तर सारथिसहित महारथी श्रीरामने यात्राकालिक मङ्गलसूचक शकुन देखनेके लिये पहले तो उस रथको उत्तराभिमुख खड़ा किया; फिर वे उस रथपर आरूढ़ होकर वनकी ओर चल दिये ॥ ३४ ॥

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