अयोध्याकाण्ड, सर्ग 45
अनुरक्ता महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् । अनुजग्मुः प्रयान्तं तं वनवासाय मानवाः ॥ १ ॥
भावार्थ
उधर सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम जब वनकी ओर जाने लगे, उस समय उनके प्रति अनुराग रखनेवाले बहुत-से अयोध्यावासी मनुष्य वनमें निवास करनेके लिये उनके पीछे-पीछे चल दिये ॥ १ ॥
निवर्तितेऽतीव बलात् सुहृद्धर्मेण राजनि । नैव ते संन्यवर्तन्त रामस्यानुगता रथम् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘जिसके जल्दी लौटनेकी कामना की जाय, उस स्वजन-को दूरतक नहीं पहुँचाना चाहिये’—इत्यादि रूपसे बताये गये सुहृद्धर्मके अनुसार जब राजा दशरथ बलपूर्वक लौटा दिये गये, तब भी जो श्रीरामजीके रथके पीछे-पीछे लगे हुए ये, वे अयोध्यावासी अपने घरकी ओर नहीं लौटे ॥ २ ॥
अयोध्यानिलयानां हि पुरुषाणां महायशाः । बभूव गुणसम्पन्नः पूर्णचन्द्र इव प्रियः ॥ ३ ॥
भावार्थ
क्योंकि अयोध्यावासी पुरुषोंके लिये सद्गुणसम्पन्न महायशस्वी श्रीराम पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रिय हो गये थे ॥ ३ ॥
स याच्यमानः काकुत्स्थस्ताभिः प्रकृतिभिस्तदा । कुर्वाणः पितरं सत्यं वनमेवान्वपद्यत ॥ ४ ॥
भावार्थ
उन प्रजाजनोंने श्रीरामसे घर लौट चलनेके लिये बहुत प्रार्थना की; किंतु वे पिताके सत्यकी रक्षा करनेके लिये वनकी ओर ही बढ़ते गये ॥ ४ ॥
अवेक्षमाणः सस्नेहं चक्षुषा प्रपिबन्निव । उवाच रामः सस्नेहं ताः प्रजाः स्वाः प्रजा इव ॥ ५ ॥
भावार्थ
वे प्रजाजनोंको इस प्रकार स्नेहभरी दृष्टिसे देख रहे थे मानो नेत्रोंसे उन्हें पी रहे हों । उस समय श्रीरामने अपनी संतानके समान प्रिय उन प्रजाजनोंसे स्नेहपूर्वक कहा—॥५॥
या प्रीतिर्बहुमानश्च मय्ययोध्यानिवासिनाम् । मत्प्रियार्थं विशेषेण भरते सा विधीयताम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘अयोध्यानिवासियोंका मेरे प्रति जो प्रेम और आदर है, वह मेरी ही प्रसन्नताके लिये भरतके प्रति और अधिकरूपमें होना चाहिये ॥ ६ ॥
स हि कल्याणचारित्रः कैकेय्यानन्दवर्धनः । करिष्यति यथावद् वः प्रियाणि च हितानि च ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘उनका चरित्र बड़ा ही सुन्दर और सबका कल्याण करनेवाला है । कैकेयीका आनन्द बढ़ानेवाले भरत आप लोगोंका यथावत् प्रिय और हित करेंगे ॥ ७ ॥
ज्ञानवृद्धो वयोबालो मृदुर्वीर्यगुणान्वितः । अनुरूपः स वो भर्ता भविष्यति भयापहः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘वे अवस्थामें छोटे होनेपर भी ज्ञानमें बड़े हैं । पराक्रमोचित गुणोंसे सम्पन्न होनेपर भी स्वभावके बड़े कोमल हैं । वे आपलोगोंके लिये योग्य राजा होंगे और प्रजाके भयका निवारण करेंगे ॥ ८ ॥
स हि राजगुणैर्युक्तो युवराजः समीक्षितः । अपि चापि मया शिष्टैः कार्यं वो भर्तृशासनम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘वे मुझसे भी अधिक राजोचित गुणोंसे युक्त हैं, इसीलिये महाराजने उन्हें युवराज बनानेका निश्चय किया है; अतः आपलोगोंको अपने स्वामी भरतकी आज्ञाका सदा पालन करना चाहिये ॥ ९ ॥
न संतप्येद् यथा चासौ वनवासं गते मयि । महाराजस्तथा कार्यो मम प्रियचिकीर्षया ॥१०॥
भावार्थ
‘मेरे वनमें चले जानेपर महाराज दशरथ जिस प्रकार भी शोकसे संतप्त न होने पावें, इस बातके लिये आपलोग सदा चेष्टा रखें । मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे आपको मेरी इस प्रार्थनापर अवश्य ध्यान देना चाहिये’ ॥ १० ॥
यथा यथा दाशरथिर्धर्ममेवाश्रितो भवेत् । तथा तथा प्रकृतयो रामं पतिमकामयन् ॥ ११ ॥
भावार्थ
दशरथनन्दन श्रीरामने ज्यों-ज्यों धर्मका आश्रय लेनेके लिये ही दृढ़ता दिखायी, त्यों-ही-त्यों प्रजाजनोंके मनमें उन्हींको अपना स्वामी बनानेकी इच्छा प्रबल होती गयी ॥ ११ ॥
बाष्पेण पिहितं दीनं रामः सौमित्रिणा सह । चकर्षेव गुणैर्बद्धं जनं पुरनिवासिनम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
समस्त पुरवासी अत्यन्त दीन होकर आँसू बहा रहे थे और लक्ष्मणसहित श्रीराम मानो अपने गुणोंमें बाँधकर उन्हें खींचे लिये जा रहे थे ॥ १२ ॥
ते द्विजास्त्रिविधं वृद्धा ज्ञानेन वयसौजसा । वयःप्रकम्पशिरसो दूरादूचुरिदं वचः ॥ १३ ॥
भावार्थ
उनमें बहुत-से ब्राह्मण थे, जो ज्ञान, अवस्था और तपोबल—तीनों ही दृष्टियोंसे बड़े थे । वृद्धावस्थाके कारण कितनोंके तो सिर काँप रहे थे । वे दूरसे ही इस प्रकार बोले—॥ १३ ॥
वहन्तो जवना रामं भो भो जात्यास्तुरंगमाः । निवर्तध्वं न गन्तव्यं हिता भवत भर्तरि ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘अरे ! ओ तेज चलनेवाले अच्छी जातिके घोड़ो ! तुम बड़े वेगशाली हो और श्रीरामको वनकी ओर लिये जा रहे हो, लौटो ! अपने स्वामीके हितैषी बनो ! तुम्हें वनमें नहीं जाना चाहिये ॥ १४ ॥
कर्णवन्ति हि भूतानि विशेषेण तुरङ्गमाः । यूयं तस्मान्निवर्तध्वं याचनां प्रतिवेदिताः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘क्यों तो सभी प्राणियोंके कान होते हैं, परंतु घोड़ोंके कान बड़े होते हैं; अतः तुम्हें हमारी याचनाका ज्ञान तो हो ही गया होगा; इसलिये घरकी ओर लौट चलो ॥ १५ ॥
धर्मतः स विशुद्धात्मा वीरः शुभदृढव्रतः । उपवाह्यस्तु वो भर्ता नापवाह्यः पुराद् वनम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘तुम्हारे स्वामी श्रीराम विशुद्धात्मा, वीर और उत्तम व्रतका दृढ़तासे पालन करनेवाले हैं, अतः तुम्हें इनका उपवहन करना चाहिये—इन्हें बाहरसे नगरके समीप ले चलना चाहिये । नगरसे वनकी ओर इनका अपवहन करना–इन्हें ले जाना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है’ ॥ १६ ॥
एवमार्तप्रलापांस्तान् वृद्धान् प्रलपतो द्विजान् । अवेक्ष्य सहसा रामो रथादवततार ह ॥ १७ ॥ पद्भ्यामेव जगामाथ ससीतः सहलक्ष्मणः । संनिकृष्टपदन्यासो रामो वनपरायणः ॥ १८ ॥
भावार्थ
वृद्ध ब्राह्मणोंको इस प्रकार आर्तभावसे प्रलाप करते देख श्रीरामचन्द्रजी सहसा रथसे नीचे उतर गये ॥ वे सीता और लक्ष्मणके साथ पैदल ही चलने लगे । ब्राह्मणोंका साथ न छूटे, इसके लिये वे अपना पैर बहुत निकट रखते थे—लंबे डगसे नहीं चलते थे । वनमें पहुँचना ही उनकी यात्राका परम लक्ष्य था ॥ १८ ॥
द्विजातीन् हि पदातींस्तान् रामश्चारित्रवत्सलः । न शशाक घृणाचक्षुः परिमोक्तुं रथेन सः ॥ १९ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीके चरित्रमें वात्सल्य-गुणकी प्रधानता थी । उनकी दृष्टिमें दया भरी हुई थी; इसलिये वे रथके द्वारा चलकर उन पैदल चलनेवाले ब्राह्मणोंको पीछे छोड़नेका साहस न कर सके ॥ १९ ॥
गच्छन्तमेव तं दृष्ट्वा रामं सम्भ्रान्तमानसाः । ऊचुः परमसंतप्ता रामं वाक्यमिदं द्विजाः ॥ २० ॥
भावार्थ
श्रीरामको अब भी वनकी ओर ही जाते देख वे ब्राह्मण मन-ही-मन घबरा उठे और अत्यन्त संतप्त होकर उनसे इस प्रकार बोले—॥ २० ॥
ब्राह्मण्यं कृत्स्नमेतत् त्वां ब्रह्मण्यमनुगच्छति । द्विजस्कन्धाधिरूढास्त्वामग्नयोऽप्यनुयान्त्वमी ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! तुम ब्राह्मणोंके हितैषी हो, इसीसे यह सारा ब्राह्मण-समाज तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा है । इन ब्राह्मणोंके कंधोंपर चढ़कर अग्निदेव भी तुम्हारा अनुसरण कर रहे हैं ॥ २१ ॥
वाजपेयसमुत्थानि च्छत्राण्येतानि पश्य नः । पृष्ठतोऽनुप्रयातानि मेघानिव जलात्यये ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘वर्षा बीतनेपर शरद् ऋतुमें दिखायी देनेवाले सफेद बादलोंके समान हमारे इन श्वेत छत्रोंकी ओर देखो, जो तुम्हारे पीछे-पीछे चल पड़े हैं । ये हमें वाजपेय यज्ञमें प्राप्त हुए थे ॥ २२ ॥
अनवाप्तातपत्रस्य रश्मिसंतापितस्य ते । एभिश्छायां करिष्यामः स्वैश्छत्रैर्वाजपेयकैः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘तुम्हें राजकीय श्वेतच्छत्र नहीं प्राप्त हुआ, अतएव तुम सूर्यदेवकी किरणोंसे संतप्त हो रहे हो । इस अवस्थामें हम वाजपेय यज्ञमें प्राप्त हुए इन अपने छत्रोंद्वारा तुम्हारे लिये छाया करेंगे ॥ २३ ॥
या हि नः सततं बुद्धिर्वेदमन्त्रानुसारिणी । त्वत्कृते सा कृता वत्स वनवासानुसारिणी ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘वत्स ! हमारी जो बुद्धि सदा वेदमन्त्रोंके पीछे चलती थी—उन्हींके चिन्तनमें लगी रहती थी, वही तुम्हारे लिये वनवासका अनुसरण करनेवाली हो गयी है ॥ २४ ॥
हृदयेष्ववतिष्ठन्ते वेदा ये नः परं धनम् । वत्स्यन्त्य पिगृहेष्वेव दाराश्चारित्ररक्षिताः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘जो हमारे परम धन वेद हैं, वे हमारे हृदयोंमें स्थित हैं । हमारी स्त्रियाँ अपने चरित्रबलमे सुरक्षित रहकर घरोंमें ही रहेंगी ॥ २५ ॥
पुनर्न निश्चयः कार्यस्त्वद्गतौ सुकृता मतिः । त्वयि धर्मव्यपेक्षे तु किं स्याद् धर्मपथे स्थितम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘अब हमें अपने कर्तव्यके विषयमें पुनः कुछ निश्चय नहीं करना है । हमने तुम्हारे साथ जानेका विचार स्थिर कर लिया है । तो भी हमें इतना अवश्य कहना है कि ‘जब तुम ही ब्राह्मणकी आज्ञाके पालनरूपी धर्मकी ओरसे निरपेक्ष हो जाओगे, तब दूसरा कौन प्राणी धर्ममार्गपर स्थित रह सकेगा ॥ २६ ॥
याचितो नो निवर्तस्व हंसशुक्लशिरोरुहैः । शिरोभिर्निभृताचार महीपतनपांसुलैः ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘सदाचारका पोषण करनेवाले श्रीराम ! हमारे सिरके बाल पक कर हंसके समान सफेद हो गये हैं और पृथ्वीपर पड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम करनेसे इनमें धूल भर गयी है । हम अपने ऐसे मस्तकोंको झुकाकर तुमसे याचना करते हैं कि तुम घरको लौट चलो ( वे तत्त्वज्ञ ब्राह्मण यह जानते थे कि श्रीराम साक्षात् भगवान् विष्णु हैं । इसीलिये उनका श्रीरामके प्रति प्रणाम करना दोषकी बात नहीं है ) ॥ २७ ॥
बहूनां वितता यज्ञा द्विजानां य इहागताः । तेषां समाप्तिरायत्ता तव वत्स निवर्तने ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘( इतनेपर भी जब श्रीराम नहीं रुके, तब वे ब्राह्मण बोले—) वत्स ! जो लोग यहाँ आये हैं, इनमें बहुत-से ऐसे ब्राह्मण हैं, जिन्होंने यज्ञ आरम्भ कर दिया है; अब इनके यज्ञोंकी समाप्ति तुम्हारे लौटनेपर ही निर्भर है ॥ २८ ॥
भक्तिमन्तीह भूतानि जङ्गमाजङ्गमानि च । याचमानेषु तेषु त्वं भक्तिं भक्तेषु दर्शय ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘संसारके स्थावर और जङ्गम सभी प्राणी तुम्हारे प्रति भक्ति रखते हैं । वे सब तुमसे लौट चलनेकी प्रार्थना कर रहे हैं । अपने उन भक्तोंपर तुम अपना स्नेह दिखाओ ॥ २९ ॥
अनुगन्तुमशक्तास्त्वां मूलैरुद्धतवेगिनः । उन्नता वायुवेगेन विक्रोशन्तीव पादपाः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘ये वृक्ष अपनी जड़ोंके कारण अत्यन्त वेगहीन हैं, इसीसे तुम्हारे पीछे नहीं चल सकते; परंतु वायुके वेगसे इनमें जो सनसनाहट पैदा होती है, उनके द्वारा ये ऊँचे वृक्ष मानो तुम्हें पुकार रहे हैं—तुमसे लौट चलनेकी प्रार्थना कर रहे हैं ॥ ३० ॥
निश्चेष्टाहारसंचारा वृक्षैकस्थाननिश्चिताः । पक्षिणोऽपि प्रयाचन्ते सर्वभूतानुकम्पिनम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘जो सब प्रकारकी चेष्टा छोड़ चुके हैं, चारा चुगनेके लिये भी कहीं उड़कर नहीं जाते हैं और निश्चितरूपसे वृक्षके एक स्थानपर ही पड़े रहते हैं, वे पक्षी भी तुमसे लौट चलनेके लिये प्रार्थना कर रहे हैं; क्योंकि तुम समस्त प्राणियोंपर कृपा करनेवाले हो’ ॥ ३१ ॥
एवं विक्रोशतां तेषां द्विजातीनां निवर्तने । दद्दशे तमसा तत्र वारयन्तीव राघवम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
इस प्रकार श्रीरामसे लौटनेके लिये पुकार मचाते हुए उन ब्राह्मणोंपर मानो कृपा करनेके लिये मार्गमें तमसा नदी दिखायी दी, जो अपने तिर्यक्-प्रवाह ( तिरछी धारा ) से श्रीरघुनाथजीको रोकती हुई-सी प्रतीत होती थी ॥ ३२ ॥
ततः सुमन्त्रोऽपि रथाद् विमुच्य श्रान्तान् हयान् सम्परिवर्त्य शीघ्रम् । पीतोदकांस्तोयपरिप्लुताङ्गा- नचारयद् वै तमसाविदूरे ॥ ३३ ॥
भावार्थ
वहाँ पहुँचनेपर सुमन्त्रने भी थके हुए घोड़ोंको शीघ्र ही रथसे खोलकर उन सबको टहलाया, फिर पानी पिलाया और नहलाया, तत्पश्चात् तमसाके निकट ही चरनेके लिये छोड़ दिया ॥ ३३ ॥
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