अयोध्याकाण्ड, सर्ग 50
विशालान् कोसलान् रम्यान् यात्वा लक्ष्मणपूर्वजः । अयोध्यामुन्मुखो धीमान् प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥ आपृच्छे त्वां पुरिश्रेष्ठे काकुत्स्थपरिपालिते । दैवतानि च यानि त्वां पालयन्त्यावसन्ति च ॥ २ ॥
भावार्थ
इस प्रकार विशाल और रमणीय कोसलदेशकी सीमाको पार करके लक्ष्मणके बड़े भाई बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजीने अयोध्याकी ओर अपना मुख किया और हाथ जोड़कर कहा-॥ ‘ककुत्स्थवंशी राजाओंसे परिपालित पुरीशिरोमणि अयोध्ये ! मैं तुमसे तथा जो-जो देवता तुम्हारी रक्षा करते और तुम्हारे भीतर निवास करते हैं, उनसे भी वनमें जानेकी आज्ञा चाहता हूँ ॥ २ ॥
निवृत्तवनवासस्त्वामनृणो जगतीपतेः । पुनर्द्रक्ष्यामि मात्रा च पित्रा च सह संगतः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘वनवासकी अवधि पूरी करके महाराजके ऋणसे उऋण हो मैं पुनः लौटकर तुम्हारा दर्शन करूँगा और अपने माता-पितासे भी मिलूँगा’ ॥ ३ ॥
ततो रुचिरताम्राक्षो भुजमुच्चम्य दक्षिणम् । अश्रुपूर्णमुखो दीनोऽब्रवीज्जानपदं जनम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
इसके बाद सुन्दर एवं अरुण नेत्रवाले श्रीरामने दाहिनी भुजा उठाकर नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए दुखी होकर जनपदके लोगोंसे कहा—॥ ४ ॥
अनुक्रोशो दया चैव यथार्हं मयि वः कृतः । चिरं दुःखस्य पापीयो गम्यतामर्थसिद्धये ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘आपने मुझपर बड़ी कृपा की और यथोचित दया दिखायी । मेरे लिये आपलोगोंने बहुत देरतक कष्ट सहन किया । इस तरह आपका देरतक दुःखमें पड़े रहना अच्छा नहीं है; इसलिये अब आपलोग अपना-अपना कार्य करनेके लिये जाइये’ ॥ ५ ॥
तेऽभिवाद्य महात्मानं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । विलपन्तो नरा घोरं व्यतिष्ठंश्च कचित् कचित् ॥ ६ ॥
भावार्थ
यह सुनकर उन मनुष्योंने महात्मा श्रीरामको प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और घोर विलाप करते हुए वे जहाँ-तहाँ खड़े हो गये ॥ ६ ॥
तथा विलपतां तेषामतृप्तानां च राघवः । अचक्षुर्विषयं प्रायाद् यथार्कः क्षणदामुखे ॥ ७ ॥
भावार्थ
उनकी आँखें अभी श्रीरामके दर्शनसे तृप्त नहीं हुई थीं और वे पूर्वोक्त रूपसे विलाप कर ही रहे थे, इतनेमें श्रीरघुनाथजी उनकी दृष्टिसे ओझल हो गये, जैसे सूर्य प्रदोषकालमें छिप जाते हैं ॥ ७ ॥
ततो धान्यधनोपेतान् दानशीलजनान्वितान् । अकुतश्चिद्भयान् रम्यांश्चैत्ययूपसमावृतान् ॥ ८ ॥ उद्यानाम्रवणोपेतान् सम्पन्नसलिलाशयान् । तुष्टपुष्टजनाकीर्णान् गोकुलाकुलसेवितान् ॥ ९ ॥ रक्षणीयान् नरेन्द्राणां ब्रह्मघोषाभिनादितान् । रथेन पुरुषव्याघ्रः कोसलानत्यवर्तत ॥ १० ॥
भावार्थ
इसके बाद पुरुषसिंह श्रीराम रथके द्वारा ही उस कोसल जनपदको लाँघ गये, जो धन-धान्यसे सम्पन्न और सुखदायक था । वहाँके सब लोग दानशील थे । उस जनपदमें कहींसे कोई भय नहीं था । वहाँके भूभाग रमणीय एवं चैत्य-वृक्षों तथा यज्ञसम्बन्धी यूपोंसे व्याप्त थे । बहुत-से उद्यान और आमोंके वन उस जनपदकी शोभा बढ़ाते थे । वहाँ जलसे भरे हुए बहुत-से जलाशय सुशोभित थे । सारा जनपद हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरा था; गौओंके समूहोंसे व्याप्त और सेवित था । वहाँके ग्रामोंकी बहुत-से नरेश रक्षा करते थे तथा वहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँजती रहती थी ॥ ८–१० ॥
मध्येन मुदितं स्फीतं रम्योद्यानसमाकुलम् । राज्यं भोज्यं नरेन्द्राणां ययौ धृतिमतां वरः ॥ ११ ॥
भावार्थ
कोसलदेशसे आगे बढ़नेपर धैर्यवानोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी मध्यमार्गसे ऐसे राज्यमें होकर निकले, जो सुख-सुविधासे युक्त, धन-धान्यसे सम्पन्न, रमणीय उद्यानोंसे व्याप्त तथा सामन्त नरेशोंके उपभोगमें आनेवाला था ॥ ११ ॥
तत्र त्रिपथगां दिव्यां शीततोयामशैवलाम् । ददर्श राघवो गङ्गां रम्यामृषिनिषेविताम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
उस राज्यमें श्रीरघुनाथजीने त्रिपथगामिनी दिव्यनदी गङ्गाका दर्शन किया, जो शीतल जलसे भरी हुई, सेवारोंसे रहित तथा रमणीय थीं । बहुत-से महर्षि उनका सेवन करते थे ॥ १२ ॥
आश्रमैरविदूरस्थैः श्रीमद्भिः समलंकृताम् । कालेऽप्सरोभिर्हृद्याभिः सेविताम्भोह्रदां शिवाम्॥१३॥
भावार्थ
उनके तटपर थोड़ी-थोड़ी दूरपर बहुत-से सुन्दर आश्रम बने थे, जो उन देवनदीकी शोभा बढ़ाते थे । समय-समयपर हर्षभरी अप्सराएँ भी उतरकर उनके जलकुण्डका सेवन करती हैं । वे गङ्गा सबका कल्याण करनेवाली हैं ॥ १३ ॥
देवदानवगन्धर्वैः किंनरैरुपशोभिताम् । नागगन्धर्वपत्नीभिः सेवितां सततं शिवाम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर उन शिवस्वरूपा भागीरथीकी शोभा बढ़ाते हैं । नागों और गन्धर्वोंकी पत्नियाँ उनके जलका सदा सेवन करती हैं ॥ १४ ॥
देवाक्रीडशताकीर्णा देवोद्यानयुता नदीम् । देवार्थमाकाशगतां विख्याता देवपद्मिनीम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
गङ्गाके दोनों तटोंपर देवताओंके सैकड़ों पर्वतीय क्रीड़ा-स्थल हैं । उनके किनारे देवताओंके बहुत-से उद्यान भी हैं । वे देवताओंकी क्रीड़ाके लिये आकाशमें भी विद्यमान हैं और वहाँ देवपद्मिनीके रूपमें विख्यात हैं ॥ १५ ॥
जलाघाताट्टहासोग्रां फेननिर्मलहासिनीम् । क्वचिद् वेणीकृतजलां क्वचिदावर्तशोभिताम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
प्रस्तरखण्डोंसे गङ्गाके जलके टकरानेसे जो शब्द होता है, वही मानो उनका उग्र अट्टहास है । जलसे जो फेन प्रकट होता है, वही उन दिव्य नदीका निर्मल हास है । कहीं तो उनका जल वेणीके आकारका है और कहीं वे भँवरोंसे सुशोभित होती हैं ॥ १६ ॥
क्वचित् स्तिमितगम्भीरां क्वचिद् वेगसमाकुलाम् । क्वचिद्गम्भीरनिर्घोषां क्वचिद् भैरवनिःस्वनाम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
कहीं उनका जल निश्चल एवं गहरा है । कहीं वे महान् वेगसे व्याप्त हैं । कहीं उनके जलसे मृदङ्ग आदिके समान गम्भीर घोष प्रकट होता है और कहीं वज्रपात आदिके समान भयंकर नाद सुनायी पड़ता है ॥ १७ ॥
देवसंघाप्लुतजलां निर्मलोत्पलसंकुलाम् । क्वचिदाभोगपुलिनां क्वचिन्निर्मलवालुकाम्॥१८॥
भावार्थ
उनके जलमें देवताओंके समुदाय गोते लगाते हैं । कहीं-कहीं उनका जल नील कमलों अथवा कुमुदोंसे आच्छादित होता है । कहीं विशाल पुलिनका दर्शन होता है तो कहीं निर्मल बालुका-राशिका ॥१८॥
हंससारससंघुष्टां चक्रवाकोपशोभिताम् । सदामत्तैश्च विहगैरभिपन्नामनिन्दिताम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
हंसों और सारसोंके कलरव वहाँ गूँजते रहते हैं । चकवे उन देवनदीकी शोभा बढ़ाते हैं । सदा मदमत्त रहनेवाले विहंगम उनके जलपर मँडराते रहते हैं । वे उत्तम शोभासे सम्पन्न हैं ॥१९॥
क्वचित् तीररुहैर्वृक्षैर्मालाभिरिव शोभिताम् । क्वचित् फुल्लोत्पलच्छन्नां क्वचित् पद्मवनाकुलाम्॥२०॥
भावार्थ
कहीं तटवर्ती वृक्ष मालाकार होकर उनकी शोभा बढ़ाते हैं । कहीं तो उनका जल खिले हुए उत्पलोंसे आच्छादित है और कहीं कमलवनोंसे व्याप्त ॥ २० ॥
क्वचित् कुमुदखण्डैश्च कुड्मलैरुपशोभिताम् । नानापुष्परजोध्वस्तां समदामिव च क्वचित् ॥ २१ ॥
भावार्थ
कहीं कुमुदसमूह तथा कहीं कलिकाएँ उन्हें सुशोभित करती हैं । कहीं नाना प्रकारके पुष्पोंके परागोंसे व्याप्त होकर वे मदमत्त नारीके समान प्रतीत होती हैं ॥ २१ ॥
व्यपेतमलसंघातां मणिनिर्मलदर्शनाम् । दिशागजैर्वनगजैर्मत्तैश्च वरवारणैः ॥ २२ ॥ देवराजोपवाह्यैश्च संनादितवनान्तराम् ।
भावार्थ
वे मलसमूह (पापराशि) दूर कर देती हैं । उनका जल इतना स्वच्छ है कि मणिके समान निर्मल दिखायी देता है । उनके तटवर्ती वनका भीतरी भाग मदमत्त दिग्गजों, जंगली हाथियों तथा देवराजकी सवारीमें आनेवाले श्रेष्ठ गजराजोंसे कोलाहलपूर्ण बना रहता है ॥ २२½ ॥
प्रमदामिव यत्नेन भूषितां भूषणोत्तमैः ॥ २३ ॥ फलपुष्पैः किसलयैर्वृतां गुल्मैर्द्विजैस्तथा । विष्णुपादच्युतां दिव्यामपापां पापनाशिनीम् ॥ २४ ॥ शिंशुमारैश्च नक्रैश्च भुजंगैश्च समन्विताम् । शंकरस्य जटाजूटाद् भ्रष्टां सागरतेजसा ॥ २५ ॥ समुद्रमहिषीं गङ्गां सारसक्रौञ्चनादिताम् । आससाद महाबाहुः शृङ्गवेरपुरं प्रति ॥ २६ ॥
भावार्थ
वे फलों, फूलों, पल्लवों, गुल्मों तथा पक्षियोंसे आवृत होकर उत्तम आभूषणोंसे यत्नपूर्वक विभूषित हुई युवतीके समान शोभा पाती हैं । उनका प्राकट्य भगवान् विष्णुके चरणोंसे हुआ है । उनमें पापका लेश भी नहीं है । वे दिव्य नदी गङ्गा जीवोंके समस्त पापोंका नाश कर देनेवाली हैं ॥ उनके जलमें सूँस, घड़ियाल और सर्प निवास करते हैं । सगरवंशी राजा भगीरथके तपोमय तेजसे जिनका शंकरजीके जटाजूटसे अवतरण हुआ था, जो समुद्रकी रानी हैं तथा जिनके निकट सारस और क्रौञ्च पक्षी कलरव करते रहते हैं, उन्हीं देवनदी गङ्गाके पास महाबाहु श्रीरामजी पहुँचे । गङ्गाकी वह धारा शृङ्गवेरपुरमें बह रही थी ॥ २५–२६ ॥
तामूर्मिकलिलावर्तामन्ववेक्ष्य महारथः । सुमन्त्रमब्रवीत् सूतमिहैवाद्य वसामहे ॥ २७ ॥
भावार्थ
जिनके आवर्त (भँवरें) लहरोंसे व्याप्त थे, उन गङ्गाजीका दर्शन करके महारथी श्रीरामने सारथि सुमन्त्रसे कहा—‘सूत ! आज हमलोग यहीं रहेंगे’ ॥ २७ ॥
अविदूरादयं नद्या बहुपुष्पप्रवालवान् । सुमहानिङ्गुदीवृक्षो वसामोऽत्रैव सारथे ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘सारथे ! गङ्गाजीके समीप ही जो यह बहुत-से फूलों और नये-नये पल्लवोंसे सुशोभित महान् इङ्गुदीका वृक्ष है, इसीके नीचे आज रातमें हम निवास करेंगे ॥ २८ ॥
प्रेक्षामि सरितां श्रेष्ठां सम्मान्यसलिलां शिवाम् । देवमानवगन्धर्वमृगपन्नगपक्षिणाम् ॥२९॥
भावार्थ
‘जिनका जल देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों, सर्पों, पशुओं तथा पक्षियोंके लिये भी समादरणीय है, उन कल्याणस्वरूपा, सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाजीका भी मुझे यहाँसे दर्शन होता रहेगा’ ॥ २९ ॥
लक्ष्मणश्च सुमन्त्रश्च बाढमित्येव राघवम् । उक्त्वा तमिङ्गुदीवृक्षं तदोपययतुर्हयैः ॥ ३० ॥ रामोऽभियाय तं रम्यं वृक्षमिक्ष्वाकुनन्दनः । रथादवतरत् तस्मात् सभार्यः सहलक्ष्मणः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
तब लक्ष्मण और सुमन्त्र भी श्रीरामचन्द्रजीसे बहुत अच्छा कहकर अश्वोंद्वारा उस इङ्गुदी वृक्षके समीप गये ॥ उस रमणीय वृक्षके पास पहुँचकर इक्ष्वाकुनन्दन श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ रथसे उतर गये ॥ ३१ ॥
सुमन्त्रोऽप्यवतीर्याथ मोचयित्वा हयोत्तमान् । वृक्षमूलगतं राममुपतस्थे कृताञ्जलिः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
फिर सुमन्त्रने भी उतरकर उत्तम घोड़ोंको खोल दिया और वृक्षकी जड़पर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ ३२ ॥
तत्र राजा गुहो नाम रामस्यात्मसमः सखा । निषादजात्यो बलवान् स्थपतिश्चेति विश्रुतः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
शृङ्गवेरपुरमें गुहनामका राजा राज्य करता था । वह श्रीरामचन्द्रजीका प्राणोंके समान प्रिय मित्र था । उसका जन्म निषादकुलमें हुआ था । वह शारीरिक शक्ति और सैनिक शक्तिकी दृष्टिसे भी बलवान् था तथा वहाँके निषादोंका सुविख्यात राजा था ॥ ३३ ॥
स श्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं रामं विषयमागतम् । वृद्धैः परिवृतोऽमात्यैर्ज्ञातिभिश्चाप्युपागतः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
उसने जब सुना कि पुरुषसिंह श्रीराम मेरे राज्यमें पधारे हैं, तब वह बूढ़े मन्त्रियों और बन्धु-बान्धवोंसे घिरा हुआ वहाँ आया ॥ ३४ ॥
ततो निषादाधिपतिं दृष्ट्वा दूरादुपस्थितम् । सह सौमित्रिणा रामः समागच्छद् गुहेन सः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
निषादराजको दूरसे आया हुआ देख श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ आगे बढ़कर उससे मिले ॥ ३५ ॥
तमार्तः सम्परिष्वज्य गुहो राघवमब्रवीत् । यथायोध्या तथेदं ते राम किं करवाणि ते ॥ ३६ ॥ ईदृशं हि महाबाहो कः प्राप्स्यत्यतिथिं प्रियम् ।
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीको वल्कल आदि धारण किये देख गुहको बड़ा दुःख हुआ । उसने श्रीरघुनाथजीको हृदयसे लगाकर कहा—‘श्रीराम ! आपके लिये जैसे अयोध्याका राज्य है, उसी प्रकार यह राज्य भी है । बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ? महाबाहो ! आप-जैसा प्रिय अतिथि किसको सुलभ होगा ?’ ॥ ३६½ ॥
ततो गुणवदन्नाद्यमुपादाय पृथग्विधम् ॥ ३७ ॥ अर्घ्यं चोपानयच्छीघ्रं वाक्यं चेदमुवाच ह । स्वागतं ते महाबाहो तवेयमखिला मही ॥ ३८ ॥ वयं प्रेष्या भवान् भर्ता साधु राज्यं प्रशाधि नः । भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च लेह्यं चैतदुपस्थितम् । शयनानि च मुख्यानि वाजिनां खादनं च ते ॥ ३९ ॥
भावार्थ
फिर भाँति-भाँतिका उत्तम अन्न लेकर वह सेवामें उपस्थित हुआ । उसने शीघ्र ही अर्घ्य निवेदन किया और इस प्रकार कहा—‘महाबाहो ! आपका स्वागत है । यह सारी भूमि, जो मेरे अधिकारमें है, आपकी ही है । हम आपके सेवक हैं और आप हमारे स्वामी, आजसे आप ही हमारे इस राज्यका भलीभाँति शासन करें । यह भक्ष्य ( अन्न आदि ), भोज्य ( खीर आदि ), पेय ( पानकरस आदि ) तथा लेह्य ( चटनी आदि ) आपकी सेवामें उपस्थित है, इसे स्वीकार करें । ये उत्तमोत्तम शय्याएँ हैं तथा आपके घोड़ोंके खानेके लिये चने और घास आदि भी प्रस्तुत हैं—ये सब सामग्री ग्रहण करें’ ॥ ३७–३९ ॥
गुहमेवं ब्रुवाणं तु राघवः प्रत्युवाच ह । अर्चिताश्चैव हृष्टाश्च भवता सर्वदा वयम् ॥ ४० ॥ पद्भ्यामभिगमाच्चैव स्नेहसंदर्शनेन च ।
भावार्थ
गुहके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उसे इस प्रकार उत्तर दिया—‘सखे ! तुम्हारे यहाँतक पैदल आने और स्नेह दिखानेसे ही हमारा सदाके लिये भलीभाँति पूजन--स्वागत-सत्कार हो गया । तुमसे मिलकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है’ ॥ ४०½ ॥
भुजाभ्यां साधुवृत्ताभ्यां पीडयन् वाक्यमब्रवीत् ४१ दिष्ट्या त्वां गुह पश्यामि ह्यरोगं सह बान्धवैः । अपि ते कुशलं राष्ट्रे मित्रेषु च वनेषु च ॥ ४२ ॥
भावार्थ
फिर श्रीरामने अपनी दोनों गोल-गोल भुजाओंसे गुहका अच्छी तरह आलिङ्गन करते हुए कहा—‘गुह ! सौभाग्यकी बात है कि मैं आज तुम्हें बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वस्थ एवं सानन्द देख रहा हूँ । बताओ, तुम्हारे राज्यमें, मित्रोंके यहाँ तथा वनोंमें सर्वत्र कुशल तो है ? ॥ ४१-४२ ॥
यत् विदं भवता किंचित् प्रीत्या समुपकल्पितम् । सर्वं तदनुजानामि नहि वर्ते प्रतिग्रहे ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘तुमने प्रेमवश यह जो कुछ सामग्री प्रस्तुत की है, इसे स्वीकार करके मैं तुम्हें वापिस ले जानेकी आज्ञा देता हूँ; क्योंकि इस समय दूसरोंकी दी हुई कोई भी वस्तु मैं ग्रहण नहीं करता—अपने उपयोगमें नहीं लाता ॥ ४३ ॥
कुशचीराजिनधरं फलमूलाशनं च माम् । विद्धि प्रणिहितं धर्मे तापसं वनगोचरम् ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘वल्कल और मृगचर्म धारण करके फल-मूलका आहार करता हूँ और धर्ममें स्थित रहकर तापसवेशमें वनके भीतर ही विचरता हूँ । इन दिनों तुम मुझे इसी नियममें स्थित जानो ॥ ४४ ॥
अश्वानां खादनेनाहमर्थी नान्येन केनचित् । एतावतात्र भवता भविष्यामि सुपूजितः ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘इन सामग्रियोंमें जो घोड़ोंके खाने-पीनेकी वस्तु है, उसीकी इस समय मुझे आवश्यकता है, दूसरी किसी वस्तुकी नहीं । घोड़ोंको खिला-पिला देनेमात्रसे तुम्हारे द्वारा मेरा पूर्ण सत्कार हो जायगा ॥ ४५ ॥
एते हि दयिता राज्ञः पितुर्दशरथस्य मे । एतैः सुविहितैरश्वैर्भविष्याम्यहमर्चितः ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘ये घोड़े मेरे पिता महाराज दशरथको बहुत प्रिय हैं । इनके खाने-पीनेका सुन्दर प्रबन्ध कर देनेसे मेरा भलीभाँति पूजन हो जायगा’ ॥ ४६ ॥
अश्वानां प्रतिपानं च खादनं चैव सोऽन्वशात् । गुहस्तत्रैव पुरुषांस्त्वरितं दीयतामिति ॥ ४७ ॥
भावार्थ
तब गुहने अपने सेवकोंको उसी समय यह आज्ञा दी कि तुम घोड़ोंके खाने-पीनेके लिये आवश्यक वस्तुएँ शीघ्र लाकर दो ॥ ४७ ॥
ततश्चीरोत्तरासङ्गः संध्यामन्वास्य पश्चिमाम् । जलमेवाददे भोज्यं लक्ष्मणेनाहृतं स्वयम् ॥ ४८ ॥ तस्य भूमौ शयानस्य पादौ प्रक्षाल्य लक्ष्मणः । सभार्यस्य ततोऽभ्येत्य तस्थौ वृक्षमुपाश्रितः ॥ ४९ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् वल्कलका उत्तरीय-वस्त्र धारण करनेवाले श्रीरामने सायंकालकी संध्योपासना करके भोजनके नामपर स्वयं लक्ष्मणका लाया हुआ केवल जलमात्र पी लिया ॥ फिर पत्नीसहित श्रीराम भूमिपर ही तृणकी शय्या बिछाकर सोये । उस समय लक्ष्मण उनके दोनों चरणोंको धोपोंछकर वहाँसे कुछ दूरपर हट आये और एक वृक्षका सहारा लेकर बैठ गये ॥ ४९ ॥
गुहोऽपि सह सूतेन सौमित्रिमनुभाषयन् । अन्वजाग्रत् ततो राममप्रमत्तो धनुर्धरः ॥ ५० ॥
भावार्थ
गुह भी सावधानीके साथ धनुष धारण करके सुमन्त्रके साथ बैठकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे बातचीत करता हुआ श्रीरामकी रक्षाके लिये रातभर जागता रहा ॥ ५० ॥
तथा शयानस्य ततो यशस्विनो मनस्विनो दाशरथेर्महात्मनः । अदृष्टदुःखस्य सुखोचितस्य सा तदा व्यतीता सुचिरेण शर्वरी ॥ ५१ ॥
भावार्थ
इस प्रकार सोये हुए यशस्वी मनस्वी दशरथनन्दन महात्मा श्रीरामकी, जिन्होंने कभी दुःख नहीं देखा था तथा जो सुख भोगनेके ही योग्य थे, वह रात उस समय ( नींद न आनेके कारण ) बहुत देरके बाद व्यतीत हुई ॥ ५१ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें