अयोध्याकाण्ड, सर्ग 37
महामात्रवचः श्रुत्वा रामो दशरथं तदा। अभ्यभाषत वाक्यं तु विनयज्ञो विनीतवत् ॥ १ ॥
भावार्थ
प्रधान मन्त्रीकी पूर्वोक्त बात सुनकर विनयके ज्ञाता श्रीरामने उस समय राजा दशरथसे विनीत होकर कहा—॥१ ॥
त्यक्तभोगस्य मे राजन् वने वन्येन जीवतः। किं कार्यमनुयात्रेण त्यक्तसङ्गस्य सर्वतः ॥ २ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! मैं भोगोंका परित्याग कर चुका हूँ। मुझे जंगलके फल-मूलोंसे जीवन निर्वाह करना है। जब मैं सब ओरसे आसक्ति छोड़ चुका हूँ, तब मुझे सेनासे क्या प्रयोजन है ? ॥ २ ॥
यो हि दत्त्वा द्विपश्रेष्ठं कक्ष्यायां कुरुते मनः। रज्जुस्नेहेन किं तस्य त्यजतः कुञ्जरोत्तमम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘जो श्रेष्ठ गजराजका दान करके उसके रस्सेमें मन लगाता है—लोभवश रस्सेको रख लेना चाहता है, वह अच्छा नहीं करता; क्योंकि उत्तम हाथीका त्याग करनेवाले पुरुषको उसके रस्सेमें आसक्ति रखनेकी क्या आवश्यकता है ? ॥ ३ ॥
तथा मम सतां श्रेष्ठ किं ध्वजिन्या जगत्पते। सर्वाण्येवानुजानामि चीराण्येवानयन्तु मे ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाराज ! इसी तरह मुझे सेना लेकर क्या करना है ? मैं ये सारी वस्तुएँ भरतको अर्पित करनेकी अनुमति देता हूँ। मेरे लिये तो ( माता कैकेयीकी दासियाँ ) चीर ( चिथड़े या वल्कलवस्त्र) ला दें ॥ ४ ॥
खनित्रपिटके चोभे समानयत गच्छत। चतुर्दश वने वासं वर्षाणि वसतो मम ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘दासियो ! जाओ, खन्ती और पेटारी अथवा कुदारी और खाँची ये दोनों वस्तुएँ लाओ। चौदह वर्षोंतक वनमें रहनेके लिये ये चीजें उपयोगी हो सकती हैं’ ॥ ५ ॥
अथ चीराणि कैकेयी स्वयमाहृत्य राघवम्। उवाच परिधत्स्वेति जनौघे निरपत्रपा ॥ ६ ॥
भावार्थ
कैकेयी लाज-संकोच छोड़ चुकी थी। वह स्वयं ही जाकर बहुत-सी चीर ले आयी और जनसमुदायमें श्रीरामचन्द्रजीसे बोली, ‘लो, पहन लो’ ॥ ६ ॥
स चीरे पुरुषव्याघ्रः कैकेय्याः प्रतिगृह्य ते। सूक्ष्मवस्त्रमवक्षिप्य मुनिवस्त्राण्यवस्त ह ॥ ७ ॥
भावार्थ
पुरुषसिंह श्रीरामने कैकेयीके हाथसे दो चीर ले लिये और अपने महीन वस्त्र उतारकर मुनियोंके-से वस्त्र धारण कर लिये ॥ ७ ॥
लक्ष्मणश्चापि तत्रैव विहाय वसने शुभे। तापसाच्छादने चैव जग्राह पितुरग्रतः ॥ ८ ॥
भावार्थ
इसी प्रकार लक्ष्मणने भी अपने पिताके सामने ही दोनों सुन्दर वस्त्र उतारकर तपस्वियोंके-से वल्कल-वस्त्र पहन लिये ॥ ८ ॥
अथात्मपरिधानार्थं सीता कौशेयवासिनी । सम्प्रेक्ष्य चीरं संत्रस्ता पृषती वागुरामिव ॥ ९ ॥ सा व्यपत्रपमाणेव प्रगृह्य च सुदुर्मनाः । कैकेय्याः कुशचीरे ते जानकी शुभलक्षणा ॥ १० ॥ अश्रुसम्पूर्णनेत्रा च धर्मज्ञा धर्मदर्शिनी । गन्धर्वराजप्रतिमं भर्तारमिदमब्रवीत् ॥ ११ ॥ कथं नु चीरं बध्नन्ति मुनयो वनवासिनः । इति ह्यकुशला सीता सा मुमोह मुहुर्मुहुः ॥ १२ ॥
भावार्थ
तदनन्तर रेशमी वस्त्र पहनने और धर्मपर ही दृष्टि रखनेवाली धर्मज्ञा शुभलक्षणा जनकनन्दिनी सीता अपने पहननेके लिये भी चीर वस्त्रको प्रस्तुत देख उसी प्रकार डर गयीं, जैसे मृगी बिछे हुए जालको देखकर भयभीत हो जाती है । वे कैकेयीके हाथसे दो वल्कल वस्त्र लेकर लज्जित-सी हो गयीं । उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ और नेत्रोंमें आँसू भर आये । उस समय उन्होंने गन्धर्वराजके समान तेजस्वी पतिसे इस प्रकार पूछा—‘नाथ ! वनवासी मुनिलोग चीर कैसे बाँधते हैं ?’ यह कहकर उसे धारण करनेमें कुशल न होनेके कारण सीता बारंबार मोहमें पड़ जाती थीं—भूल कर बैठती थीं ॥ ९–१२ ॥
कृत्वा कण्ठे स्म सा चीरमेकमादाय पाणिना । तस्थौ ह्यकुशला तत्र व्रीडिता जनकात्मजा ॥ १३ ॥
भावार्थ
चीर-धारणमें कुशल न होनेसे जनकनन्दिनी सीता लज्जित हो एक वल्कल गलेमें डाल दूसरा हाथमें लेकर चुपचाप खड़ी रहीं ॥ १३ ॥
तस्यास्तत् क्षिप्रमागत्य रामो धर्मभृतां वरः । चीरं बबन्ध सीतायाः कौशेयस्योपरि स्वयम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीराम जल्दीसे उनके पास आकर स्वयं अपने हाथोंसे उनके रेशमी वस्त्रके ऊपर वल्कल-वस्त्र बाँधने लगे ॥ १४ ॥
रामं प्रेक्ष्य तु सीताया बध्नन्तं चीरमुत्तमम् । अन्तःपुरचरा नार्यो मुमुचुर्वारि नेत्रजम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
सीताको उत्तम चीरवस्त्र पहनाते हुए श्रीरामकी ओर देखकर रनवासकी स्त्रियाँ अपने नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं ॥ १५ ॥
ऊचुश्च परमायत्ता रामं ज्वलिततेजसम् । वत्स नैवं नियुक्तेयं वनवासे मनस्विनी ॥ १६ ॥
भावार्थ
वे सब अत्यन्त खिन्न होकर उद्दीप्त तेजवाले श्रीरामसे बोलीं–‘बेटा ! मनस्विनी सीताको इस प्रकार वनवासकी आज्ञा नहीं दी गयी है ॥ १६ ॥
पितुर्वाक्यानुरोधेन गतस्य विजनं वनम् । तावद् दर्शनमस्या नः सफलं भवतु प्रभो ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! तुम पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये जबतक निर्जन वनमें जाकर रहोगे, तबतक इसीको देखकर हमारा जीवन सफल होने दो ॥ १७ ॥
लक्ष्मणेन सहायेन वनं गच्छस्व पुत्रक । नेयमर्हति कल्याणी वस्तुं तापसवद् वने ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘बेटा ! तुम लक्ष्मणको अपना साथी बनाकर उनके साथ वनको जाओ, परंतु यह कल्याणी सीता तपस्वी मुनिकी भाँति वनमें निवास करनेके योग्य नहीं है ॥ १८ ॥
कुरु नो याचनां पुत्र सीता तिष्ठतु भामिनी । धर्मनित्यः स्वयं स्थातुं नहीदानीं त्वमिच्छसि ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘पुत्र ! तुम हमारी यह याचना सफल करो । भामिनी सीता यहीं रहे । तुम तो नित्य धर्मपरायण हो अतः स्वयं इस समय यहाँ नहीं रहना चाहते हो ( परंतु सीताको तो रहने दो )’ ॥ १९ ॥
तासामेवंविधा वाचः शृण्वन् दशरथात्मजः । बबन्धैव तथा चीरं सीतया तुल्यशीलया ॥ २० ॥ चीरे गृहीते तु तया सबाष्पो नृपतेर्गुरुः । निवार्य सीतां कैकेयीं वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥ २१ ॥
भावार्थ
माताओंकी ऐसी बातें सुनते हुए भी दशरथनन्दन श्रीरामने सीताको वल्कलवस्त्र पहना ही दिया । पतिके समान शीलस्वभाववाली सीताके वल्कल धारण कर लेनेपर राजाके गुरु वसिष्ठजीके नेत्रोंमें आँसू भर आया । उन्होंने सीताको रोककर कैकेयीसे कहा—॥ २०-२१ ॥
अतिप्रवृत्ते दुर्मेधे कैकेयि कुलपांसनि । वञ्चयित्वा तु राजानं न प्रमाणेऽवतिष्ठसि ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘मर्यादाका उल्लङ्घन करके अधर्मकी ओर पैर बढ़ानेवाली दुर्बुद्धि कैकेयी ! तू केकयराजके कुलकी जीती-जागती कलङ्क है । अरी ! राजाको धोखा देकर अब तू सीमाके भीतर नहीं रहना चाहती है ? ॥ २२ ॥
न गन्तव्यं वनं देव्या सीतया शीलवर्जिते । अनुष्ठास्यति रामस्य सीता प्रकृतमासनम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘शीलका परित्याग करनेवाली दुष्टे ! देवी सीता वनमें नहीं जायँगी । रामके लिये प्रस्तुत हुए राजसिंहासनपर ये ही बैठेंगी ॥ २३ ॥
आत्मा हि दाराः सर्वेषां दारसंग्रहवर्तिनाम् । आत्मेयमिति रामस्य पालयिष्यति मेदिनीम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘सम्पूर्ण गृहस्थोंकी पत्नियाँ उनका आधा अङ्ग हैं। इस तरह सीता देवी भी श्रीरामकी आत्मा हैं; अतः उनकी जगह ये ही इस राज्यका पालन करेंगी ॥ २४ ॥
अथ यास्यति वैदेही वनं रामेण संगता । वयमत्रानुयास्यामः पुरं चेदं गमिष्यति ॥ २५ ॥ अन्तपालाश्च यास्यन्ति सदारो यत्र राघवः । सहोपजीव्यं राष्ट्रं च पुरं च सपरिच्छदम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘यदि विदेहनन्दिनी सीता श्रीरामके साथ वनमें जायँगी तो हमलोग भी इनके साथ चले जायँगे । यह सारा नगर भी चला जायगा और अन्तःपुरके रक्षक भी चले जायँगे । अपनी पत्नीके साथ श्रीरामचन्द्रजी जहाँ निवास करेंगे, वहीं इस राज्य और नगरके लोग भी धन-दौलत और आवश्यक सामान लेकर चले जायँगे ॥ २५-२६ ॥
भरतश्च सशत्रुघ्नश्चीरवासा वनेचरः । वने वसन्तं काकुत्स्थमनुवत्स्यति पूर्वजम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘भरत और शत्रुघ्न भी चीरवस्त्र धारण करके वनमें रहेंगे और वहाँ निवास करनेवाले अपने बड़े भाई श्रीरामकी सेवा करेंगे ॥ २७ ॥
ततः शून्यां गतजनां वसुधां पादपैः सह । त्वमेका शाधि दुर्वृत्ता प्रजानामहिते स्थिता ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘फिर तू वृक्षोंके साथ अकेली रहकर इस निर्जन एवं सूनी पृथ्वीका राज्य करना । तू बड़ी दुराचारिणी है और प्रजाका अहित करनेमें लगी हुई है ॥ २८ ॥
न हि तद् भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपतिः । तद् वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामो निवत्स्यति ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘याद रख, श्रीराम जहाँके राजा न होंगे, वह राज्य राज्य नहीं रह जायगा—जंगल हो जायगा तथा श्रीराम जहाँ निवास करेंगे, वह वन एक स्वतन्त्र राष्ट्र बन जायगा ॥ २९ ॥
न ह्यदत्तां मही पित्रा भरतः शास्तुमिच्छति । त्वयि वा पुत्रवद् वस्तुं यदि जातो महीपतेः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘यदि भरत राजा दशरथसे पैदा हुए हैं तो पिताके प्रसन्नतापूर्वक दिये बिना इस राज्यको कदापि लेना नहीं चाहेंगे तथा तेरे साथ पुत्रवत् बर्ताव करनेके लिये भी यहाँ बैठे रहनेकी इच्छा नहीं करेंगे ॥ ३० ॥
यद्यपि त्वं क्षितितलाद् गगनं चोत्पतिष्यसि । पितृवंशचरित्रज्ञः सोऽन्यथा न करिष्यति ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘तू पृथ्वी छोड़कर आसमानमें उड़ जाय तो भी अपने पितृकुलके आचार-व्यवहारको जाननेवाले भरत उसके विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे ॥ ३१ ॥
तत् त्वया पुत्रगर्धिन्या पुत्रस्य कृतमप्रियम् । लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘तूने पुत्रका प्रिय करनेकी इच्छासे वास्तवमें उसका अप्रिय ही किया है; क्योंकि संसारमें कोई ऐसा पुरुष नहीं है जो श्रीरामका भक्त न हो ॥ ३२ ॥
द्रक्ष्यस्यैव कैकेयि पशुव्यालमृगद्विजान् । गच्छतः सह रामेण पादपांश्च तदुन्मुखान् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘कैकेयि ! तू आज ही देखेगी कि वनको जाते हुए श्रीरामके साथ पशु, सर्प, मृग और पक्षी भी चले जा रहे हैं । औरोंकी तो बात ही क्या, वृक्ष भी उनके साथ जानेको उत्सुक हैं ॥ ३३ ॥
अथोत्तमान्याभरणानि देवि देहि स्नुषायै व्यपनीय चीरम् । न चीरमस्याः प्रविधीयतेति न्यवारयत् तद् वसनं वसिष्ठः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘देवि ! सीता तेरी पुत्रवधू हैं । इनके शरीरसे वल्कल वस्त्र हटाकर तू इन्हें पहननेके लिये उत्तमोत्तम वस्त्र और आभूषण दे । इनके लिये वल्कलवस्त्र देना कदापि उचित नहीं है ।’ ऐसा कहकर वसिष्ठने उसे जानकीको वल्कलवस्त्र पहनानेसे मना किया ॥ ३४ ॥
एकस्य रामस्य वने निवास- स्त्वया वृतः केकयराजपुत्रि । विभूषितेयं प्रतिकर्मनित्या वसत्वरण्ये सह राघवेण ॥ ३५ ॥ यानैश्च मुख्यैः परिचारकैश्च सुसंवृता गच्छतु राजपुत्री । वस्त्रैश्च सर्वैः सहितैर्विधानै- र्नेयं वृता ते वरसम्प्रदाने ॥ ३६ ॥
भावार्थ
वे फिर बोले—‘केकयराजकुमारी ! तूने अकेले श्रीरामके लिये ही वनवासका वर माँगा है ( सीताके लिये नहीं ); अतः ये राजकुमारी वस्त्राभूषणोंसे विभूषित होकर सदा शृङ्गार धारण करके वनमें श्रीरामचन्द्रजीके साथ निवास करें ॥ ‘राजकुमारी सीता मुख्य-मुख्य सेवकों तथा सवारियोंके साथ सब प्रकारके वस्त्रों और आवश्यक उपकरणोंसे सम्पन्न होकर वनकी यात्रा करें । तूने वर माँगते समय पहले सीताके वनवासकी कोई चर्चा नहीं की थी (अतः इन्हें वल्कलवस्त्र नहीं पहनाया जा सकता )’ ॥ ३६ ॥
तस्मिंस्तथा जल्पति विप्रमुख्ये गुरौ नृपस्याप्रतिमप्रभावे । नैव स्म सीता विनिवृत्तभावा प्रियस्य भर्तुः प्रतिकारकामा ॥ ३७ ॥
भावार्थ
ब्राह्मणशिरोमणि अप्रतिम प्रभावशाली राजगुरु महर्षि वसिष्ठके ऐसा कहनेपर भी सीता अपने प्रियतम पतिके समान ही वेश-भूषा धारण करनेकी इच्छा रखकर उस चीर-धारणसे विरत नहीं हुईं ॥ ३७ ॥
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