Ramayana.com

अयोध्याकाण्ड, सर्ग 36

ततः सुमन्त्रमैक्ष्वाकः पीडितोऽत्र प्रतिज्ञया । सबाष्पमतिनिःश्वस्य जगादेदं पुनर्वचः ॥ १ ॥

भावार्थ

तब इक्ष्वाकुकुलनन्दन राजा दशरथ वहाँ अपनी प्रतिज्ञासे पीड़ित हो आँसू बहाते हुए लंबी साँस खींचकर सुमन्त्रसे फिर इस प्रकार बोले—॥ १ ॥

सूत रत्नसुसम्पूर्णा चतुर्विधबला चमूः । राघवस्यानुयात्रार्थं क्षिप्रं प्रतिविधीयताम् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘सूत ! तुम शीघ्र ही रत्नोंसे भरी-पूरी चतुरङ्गिणी सेनाको श्रीरामके पीछे-पीछे जानेकी आज्ञा दो ॥ २ ॥

रूपाजीवाश्च वादिन्यो वणिजश्च महाधनाः । शोभयन्तु कुमारस्य वाहिनीः सुप्रसारिताः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘रूपसे आजीविका चलाने और सरस वचन बोलनेवाली स्त्रियाँ तथा महाधनी एवं विक्रययोग्य द्रव्योंका प्रसारण करनेमें कुशल वैश्य राजकुमार श्रीरामकी सेनाओंको सुशोभित करें ॥ ३ ॥

ये चैनमुपजीवन्ति रमते यैश्च वीर्यतः । तेषां बहुविधं दत्त्वा तानप्यत्र नियोजय ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘जो श्रीरामके पास रहकर जीवन-निर्वाह करते हैं तथा जिन मल्लोंसे ये उनका पराक्रम देखकर प्रसन्न रहते हैं, उन सबको अनेक प्रकारका धन देकर उन्हें भी इनके साथ जानेकी आज्ञा दे दो ॥ ४ ॥

आयुधानि च मुख्यानि नागराः शकटानि च । अनुगच्छन्तु काकुत्स्थं व्याधाश्चारण्यकोविदाः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘मुख्य-मुख्य आयुध, नगरके निवासी, छकड़े तथा वनके भीतरी रहस्यको जाननेवाले व्याध ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामके पीछे-पीछे जायँ ॥ ५ ॥

निघ्नन् मृगान् कुञ्जरांश्च पिबंश्चारण्यकं मधु । नदीश्च विविधाः पश्यन् न राज्यं संस्मरिष्यति ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘वे रास्तेमें आये हुए मृगों एवं हाथियोंको पीछे लौटाते, जंगली मधुका पान करते और नाना प्रकारकी नदियोंको देखते हुए अपने राज्यका स्मरण नहीं करेंगे ॥ ६ ॥

धान्यकोशश्च यः कश्चिद् धनकोशश्च मामकः । तौ राममनुगच्छेतां वसन्तं निर्जने वने ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम निर्जन वनमें निवास करनेके लिये जा रहे हैं, अतः मेरा खजाना और अन्नभण्डार—ये दोनों वस्तुएँ इनके साथ जायँ ॥ ७ ॥

यजन् पुण्येषु देशेषु विसृजंश्चाप्तदक्षिणाः । ऋषिभिश्चापि संगम्य प्रवत्स्यति सुखं वने ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘ये वनके पावन प्रदेशोंमें यज्ञ करेंगे, उनमें आचार्य आदिको पर्याप्त दक्षिणा देंगे तथा ऋषियोंसे मिलकर वनमें सुखपूर्वक रहेंगे ॥ ८ ॥

भरतश्च महाबाहुरयोध्यां पालयिष्यति । सर्वकामैः पुनःश्रीमान् रामः संसाध्यतामिति ॥ ९ ॥ एवं ब्रुवति काकुत्स्थे कैकेय्या भयमागतम् । मुखं चाप्यगमच्छोषं स्वरश्चापि व्यरुध्यत ॥ १० ॥

भावार्थ

‘महाबाहु भरत अयोध्याका पालन करेंगे । श्रीमान् रामको सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न करके यहाँसे भेजा जाय’ ॥ जब महाराज दशरथ ऐसी बातें कहने लगे, तब कैकेयीको बड़ा भय हुआ । उसका मुँह सूख गया और उसका स्वर भी रुँध गया ॥ १० ॥

सा विषण्णा च संत्रस्ता मुखेन परिशुष्यता । राजानमेवाभिमुखी कैकेयी वाक्यमब्रवीत् ॥ ११ ॥

भावार्थ

वह केकयराजकुमारी विषादग्रस्त एवं त्रस्त होकर सूखे मुँहसे राजाकी ओर ही मुँह करके बोली—॥ ११ ॥

राज्यं गतधनं साधो पीतमण्डां सुरामिव । निरास्वाद्यतमं शून्यं भरतो नाभिपत्स्यते ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘श्रेष्ठ महाराज ! जिसका सारभाग पहलेसे ही पी लिया गया हो, उस आस्वादरहित सुराको जैसे उसका सेवन करनेवाले लोग नहीं ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार इस धन-हीन और सूने राज्यको, जो कदापि सेवन करने योग्य नहीं रह जायगा, भरत कदापि नहीं ग्रहण करेंगे’ ॥ १२ ॥

कैकेय्यां मुक्तलज्जायां वदन्त्यामतिदारुणम् । राजा दशरथो वाक्यमुवाचायतलोचनाम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

कैकेयी लाज छोड़कर जब वह अत्यन्त दारुण वचन बोलने लगी, तब राजा दशरथने उस विशाललोचना कैकेयीसे इस प्रकार कहा—॥ १३ ॥

वहन्तं किं तुदसि मां नियुज्य धुरि माहिते । अनार्ये कृत्यमारब्धं किं न पूर्वमुपारुधः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘अनार्ये ! अहितकारिणि ! तू रामको वनवास देनेके दुर्वह भारमें लगाकर जब मैं उस भारको ढो रहा हूँ, उस अवस्थामें क्यों अपने वचनोंका चाबुक मारकर मुझे पीड़ा दे रही है ? इस समय जो कार्य तूने आरम्भ किया है अर्थात् श्रीरामके साथ सेना और सामग्री भेजनेमें जो प्रतिबन्ध लगाया है, इसके लिये तूने पहले ही क्यों नहीं प्रार्थना की थी ? ( अर्थात् पहले ही यह क्यों नहीं कह दिया था कि श्रीरामको अकेले वनमें जाना पड़ेगा, उनके साथ सेना आदि सामग्री नहीं जा सकती )‘ ॥ १४ ॥

तस्यैतत् क्रोधसंयुक्तमुक्तं श्रुत्वा वराङ्गना । कैकेयी द्विगुणं क्रुद्धा राजानमिदमब्रवीत् ॥ १५ ॥

भावार्थ

राजाका यह क्रोधयुक्त वचन सुनकर सुन्दरी कैकेयी उनकी अपेक्षा दूना क्रोध करके उनसे इस प्रकार बोली—॥१५॥

तवैव वंशे सगरो ज्येष्ठपुत्रमुपारुधत् । असमञ्ज इति ख्यातं तथायं गन्तुमर्हति ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! आपके ही वंशमें पहले राजा सगर हो गये हैं, जिन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र असमञ्जको निकालकर उसके लिये राज्यका दरवाजा सदाके लिये बंद कर दिया था । इसी तरह इनको भी यहाँसे निकल जाना चाहिये‘ ॥ १६ ॥

एवमुक्तो धिगित्येव राजा दशरथोऽब्रवीत् । व्रीडितश्च जनः सर्वः सा च तन्नावबुध्यत ॥ १७ ॥

भावार्थ

उसके ऐसा कहनेपर राजा दशरथने कहा—‘धिक्कार है ।‘ वहाँ जितने लोग बैठे थे सभी लाजसे गड़ गये; किंतु कैकेयी अपने कथनके अनौचित्यको अथवा राजाद्वारा दिये गये धिक्कारके औचित्यको नहीं समझ सकी ॥ १७ ॥

तत्र वृद्धो महामात्रः सिद्धार्थो नाम नामतः । शुचिर्बहुमतो राज्ञः कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥ १८ ॥

भावार्थ

उस समय वहाँ राजाके प्रधान और वयोवृद्ध मन्त्री सिद्धार्थ बैठे थे । वे बड़े ही शुद्ध स्वभाववाले और राजाके विशेष आदरणीय थे । उन्होंने कैकेयीसे इस प्रकार कहा—॥ १८ ॥

असमञ्जो गृहीत्वा तु क्रीडतः पथि दारकान् । सरय्वां प्रक्षिपन्नप्सु रमते तेन दुर्मतिः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘देवि ! असमञ्ज बड़ी दुष्ट बुद्धिका राजकुमार था । वह मार्गपर खेलते हुए बालकोंको पकड़कर सरयूके जलमें फेंक देता था और ऐसे ही कार्योंसे अपना मनोरञ्जन करता था ॥ १९ ॥

तं दृष्ट्वा नागराः सर्वे क्रुद्धा राजानमब्रुवन् । असमञ्जं वृणीष्वैकमस्मान् वा राष्ट्रवर्धन ॥ २० ॥ तानुवाच ततो राजा किंनिमित्तमिदं भयम् । ताश्चापि राजा सम्पृष्टा वाक्यं प्रकृतयोऽब्रुवन् ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘उसकी यह करतूत देखकर सभी नगरनिवासी कुपित हो राजाके पास जाकर बोले—‘राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले महाराज ! या तो आप अकेले असमञ्जको लेकर रहिये या इन्हें निकालकर हमें इस नगरमें रहने दीजिये‘ ॥ ‘तब राजाने उनसे पूछा—‘तुम्हें असमञ्जसे किस कारण भय हुआ है !‘ राजाके पूछनेपर उन प्रजाजनोंने यह बात कही—॥ २१ ॥

क्रीडतस्त्वेष नः पुत्रान् बालानुद्भ्रान्तचेतसः । सरय्वां प्रक्षिपन्मौर्ख्यादतुलां प्रीतिमश्नुते ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! यह हमारे खेलते हुए छोटे-छोटे बच्चोंको पकड़ लेते हैं और जब वे बहुत घबरा जाते हैं, तब उन्हें सरयूमें फेंक देते हैं । मूर्खतावश ऐसा करके इन्हें अनुपम आनन्द प्राप्त होता है‘ ॥ २२ ॥

स तासां वचनं श्रुत्वा प्रकृतीनां नराधिपः । तं तत्याजाहितं पुत्रं तासां प्रियचिकीर्षया ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘उन प्रजाजनोंकी यह बात सुनकर राजा सगरने उनका प्रिय करनेकी इच्छासे अपने उस अहितकारक दुष्ट पुत्रको त्याग दिया ॥ २३ ॥

तं यानं शीघ्रमारोप्य सभार्यं सपरिच्छदम् । यावज्जीवं विवास्योऽयमिति तानन्वशात् पिता ॥ २४ ॥ स फालपिटकं गृह्य गिरिदुर्गाण्यलोकयत् । दिशः सर्वास्त्वनुचरन् स यथा पापकर्मकृत् ॥ २५ ॥ इत्येनमत्यजद् राजा सगरो वै सुधार्मिकः । रामः किमकरोत् पापं येनैवमुपरुध्यते ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘पिताने अपने उस पुत्रको पत्नी और आवश्यक सामग्रीसहित शीघ्र रथपर बिठाकर अपने सेवकोंको आज्ञा दी—‘इसे जीवनभरके लिये राज्यसे बाहर निकाल दो‘॥ ‘असमञ्जने फाल और पिटारी लेकर पर्वतोंकी दुर्गम गुफाओंको ही अपने निवासके योग्य देखा और कन्द आदिके लिये वह सम्पूर्ण दिशाओंमें विचरने लगा । वह जैसा कि बताया गया है, पापाचारी था, इसलिये परम धार्मिक राजा सगरने उसको त्याग दिया था । श्रीरामने ऐसा कौन-सा अपराध किया है, जिसके कारण इन्हें इस तरह राज्य पानेसे रोका जा रहा है ?॥ २५-२६ ॥

नहि कंचन पश्यामो राघवस्यागुणं वयम् । दुर्लभो ह्यस्य निरयः शशाङ्कस्येव कल्मषम् ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘हमलोग तो श्रीरामचन्द्रजीमें कोई अवगुण नहीं देखते हैं; जैसे ( शुक्लपक्षकी द्वितीयाके ) चन्द्रमामें मलिनताका दर्शन दुर्लभ है, उसी प्रकार इनमें कोई पाप या अपराध ढूँढ़नेसे भी नहीं मिल सकता ॥ २७ ॥

अथवा देवि त्वं कंचिद् दोषं पश्यसि राघवे । तमद्य ब्रूहि तत्त्वेन तदा रामो विवास्यते ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘अथवा देवि ! यदि तुम्हें श्रीरामचन्द्रजीमें कोई दोष दिखायी देता हो तो आज उसे ठीक-ठीक बताओ । उस दशामें श्रीरामको निकाल दिया जा सकता है ॥ २८ ॥

अदुष्टस्य हि संत्यागः सत्पथे निरतस्य च । निर्दहेदपि शक्रस्य द्युतिं धर्मविरोधवान् ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘जिसमें कोई दुष्टता नहीं है, जो सदा सन्मार्गमें ही स्थित है, ऐसे पुरुषका त्याग धर्मसे विरुद्ध माना जाता है । ऐसा धर्मविरोधी कर्म तो इन्द्रके भी तेजको दग्ध कर देगा ॥ २९ ॥

तदलं देवि रामस्य श्रिया विहतया त्वया। लोकतोऽपि हि ते रक्ष्यः परिवादः शुभानने ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘अतः देवि ! श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकमें विघ्न डालनेसे तुम्हें कोई लाभ नहीं होगा । शुभानने ! तुम्हें लोकनिन्दासे भी बचनेकी चेष्टा करनी चाहिये’॥ ३० ॥

श्रुत्वा तु सिद्धार्थवचो राजा श्रान्ततरस्वरः। शोकोपहतया वाचा कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

सिद्धार्थकी बातें सुनकर राजा दशरथ अत्यन्त थके हुए स्वरसे शोकाकुल वाणीमें कैकेयीसे इस प्रकार बोले—॥ ३१ ॥

पतद्वचो नेच्छसि पापरूपे हितं न जानासि ममात्मनोऽथवा। आस्थाय मार्गं कृपणं कुचेष्टा चेष्टा हि ते साधुपथादपेता ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘पापिनि ! क्या तुझे यह बात नहीं रुची ? तुझे मेरे या अपने हितका भी बिल्कुल ज्ञान नहीं है ? तू दुःखद मार्गका आश्रय लेकर ऐसी कुचेष्टा कर रही है। तेरी यह सारी चेष्टा साधु पुरुषोंके मार्गके विपरीत है ॥ ३२ ॥

अनुव्रजिष्याम्यहमद्य रामं राज्यं परित्यज्य सुखं धनं च। सर्वे च राजा भरतेन च त्वं यथासुखं भुङ्क्ष्व चिराय राज्यम्॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘अब मैं भी यह राज्य, धन और सुख छोड़कर श्रीरामके पीछे चला जाऊँगा। ये सब लोग भी उन्हींके साथ जायँगे। तू अकेली राजा भरतके साथ चिरकालतक सुखपूर्वक राज्य भोगती रह’ ॥ ३३ ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें