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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 35

ततो निधूय सहसा शिरो निःश्वस्य चासकृत् । पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य दन्तान् कटकटाय्य च ॥ १ ॥ लोचने कोपसंरक्ते वर्णं पूर्वोचितं जहत् । कोपाभिभूतः सहसा संतापमशुभं गतः ॥ २ ॥ मनः समीक्षमाणश्च सूतो दशरथस्य च । कम्पयन्निव कैकेय्या हृदयं वाक्शरैः शितैः ॥ ३ ॥

भावार्थ

तदनन्तर होशमें आनेपर सारथि सुमन्त्र सहसा उठकर खड़े हो गये । उनके मनमें बड़ा संताप हुआ, जो अमङ्गलकारी था । वे क्रोधके मारे काँपने लगे । उनके शरीर और मुखकी पहली स्वाभाविक कान्ति बदल गयी । वे क्रोधसे आँखें लाल करके दोनों हाथोंसे सिर पीटने लगे और बारंबार लंबी साँस खींचकर, हाथसे हाथ मलकर, दाँत कटकटाकर राजा दशरथके मनकी वास्तविक अवस्था देखते हुए अपने वचनरूपी तीखे बाणोंसे कैकेयीके हृदयको कम्पित-सा करने लगे ॥ १–३ ॥

वाक्यवज्रैरनुपमैर्निर्भिन्दन्निव चाशुभैः । कैकेय्याः सर्वमर्माणि सुमन्त्रः प्रत्यभाषत ॥ ४ ॥

भावार्थ

अपने अशुभ एवं अनुपम वचनरूपी वज्रसे कैकेयीके सारे मर्मस्थानोंको विदीर्ण-से करते हुए सुमन्त्रने उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ४ ॥

यस्यास्तव पतिस्त्यक्तो राजा दशरथः स्वयम् । भर्ता सर्वस्य जगतः स्थावरस्य चरस्य च ॥ ५ ॥ नह्यकार्यतमं किंचित्तव देवीह विद्यते । पतिघ्नीं त्वामहं मन्ये कुलघ्नीमपि चान्ततः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘देवि ! जब तुमने सम्पूर्ण चराचर जगत्के स्वामी स्वयं अपने पति महाराज दशरथका ही त्याग कर दिया, तब इस जगत्में कोई ऐसा कुकर्म नहीं है, जिसे तुम न कर सको; मैं तो समझता हूँ कि तुम पतिकी हत्या करनेवाली तो हो ही; अन्ततः कुलघातिनी भी हो ॥ ५-६ ॥

यन्महेन्द्रमिवाजय्यं दुष्प्रकम्प्यमिवाचलम् । महोदधिमिवाक्षोभ्यं संतापयसि कर्मभिः ॥ ७ ॥ मावमंस्था दशरथं भर्तारं वरदं पतिम् । भर्तुरिच्छा हि नारीणां पुत्रकोट्या विशिष्यते ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘ओह ! जो देवराज इन्द्रके समान अजेय, पर्वतके समान अकम्पनीय और महासागरके समान क्षोभरहित हैं, उन महाराज दशरथको भी तुम अपने कर्मोंसे संतप्त कर रही हो॥ राजा दशरथ तुम्हारे पति, पालक और वरदाता हैं । तुम इनका अपमान न करो । नारियोंके लिये पतिकी इच्छाका महत्त्व करोड़ों पुत्रोंसे भी अधिक है ॥ ८ ॥

यथावयो हि राज्यानि प्राप्नुवन्ति नृपक्षये । इक्ष्वाकुकुलनाथेऽस्मिंस्तं लोपयितुमिच्छसि ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘इस कुलमें राजाका परलोकवास हो जानेपर उसके पुत्रोंकी अवस्थाका विचार करके जो ज्येष्ठ पुत्र होते हैं, वे ही राज्य पाते हैं । राजकुलके इस परम्परागत आचारको तुम इन इक्ष्वाकुवंशके स्वामी महाराज दशरथके जीते-जी ही मिटा देना चाहती हो ॥ ९ ॥

राजा भवतु ते पुत्रो भरतः शास्तु मेदिनीम् । वयं तत्र गमिष्यामो यत्र रामो गमिष्यति ॥ १० ॥

भावार्थ

‘तुम्हारे पुत्र भरत राजा हो जायँ और इस पृथ्वीका शासन करें; किंतु हमलोग तो वहीं चले जायँगे जहाँ श्रीराम जायँगे ॥ १० ॥

न च ते विषये कश्चिद् ब्राह्मणो वस्तुमर्हति । तादृशं त्वममर्यादमद्य कर्म करिष्यसि ॥ ११ ॥ नूनं सर्वे गमिष्यामो मार्गं रामनिषेवितम् ।

भावार्थ

‘तुम्हारे राज्यमें कोई भी ब्राह्मण निवास नहीं करेगा; यदि तुम आज वैसा मर्यादाहीन कर्म करोगी तो निश्चय ही हम सब लोग उसी मार्गपर चले जायँगे, जिसका श्रीरामने सेवन किया है ॥ ११½ ॥

त्यक्ता या बान्धवैः सर्वैर्ब्राह्मणैः साधुभिः सदा॥ १२ ॥ का प्रीती राज्यलाभेन तव देवि भविष्यति । तादृशं त्वममर्यादं कर्म कर्तुं चिकीर्षसि ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘सम्पूर्ण बन्धु-बान्धव और सदाचारी ब्राह्मण भी तुम्हारा त्याग कर देंगे । देवि ! फिर इस राज्यको पाकर तुम्हें क्या आनन्द मिलेगा । ओह ! तुम ऐसा मर्यादाहीन कर्म करना चाहती हो ॥ १२-१३ ॥

आश्चर्यमिव पश्यामि यस्यास्ते वृत्तमीदृशम् । आचरन्त्या न विदता सद्यो भवति मेदिनी ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘मुझे तो यह देखकर आश्चर्य-सा हो रहा है कि तुम्हारे इतने बड़े अत्याचार करनेपर भी पृथ्वी तुरंत फट क्यों नहीं जाती ? ॥ १४ ॥

महाब्रह्मर्षिसृष्टा वा ज्वलन्तो भीमदर्शनाः । धिग्वाग्दण्डा न हिंसन्ति रामप्रव्राजने स्थिताम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘अथवा बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियोंके धिक्कारपूर्ण वाग्दण्ड (शाप) जो देखनेमें भयंकर और जलाकर भस्म कर देनेवाले होते हैं, श्रीरामको घरसे निकालनेके लिये तैयार खड़ी हुई तुम-जैसी पाषाणहृदयाका सर्वनाश क्यों नहीं कर डालते हैं ? ॥ १५ ॥

आम्रं छित्त्वा कुठारेण निम्बं परिचरेत् तु कः । यश्चैनं पयसा सिञ्चेन्नैवास्य मधुरो भवेत् ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘भला आमको कुल्हाड़ीसे काटकर उसकी जगह नीमका सेवन कौन करेगा ? जो आमकी जगह नीमको ही दूधसे सींचता है, उसके लिये भी यह नीम मीठा फल देनेवाला नहीं हो सकता ( अतः वरदानके बहाने श्रीरामको वनवास देकर कैकेयीके चित्तको संतुष्ट करना राजाके लिये कभी सुखद परिणामका जनक नहीं हो सकता )॥ १६ ॥

आभिजात्यं हि ते मन्ये यथा मातुस्तथैव च । न हि निम्बात् स्रवेत् क्षौद्रं लोके निगदितं वचः॥ १७ ॥

भावार्थ

‘कैकेयि ! मैं समझता हूँ कि तुम्हारी माताका अपने कुलके अनुरूप जैसा स्वभाव था, वैसा ही तुम्हारा भी है । लोकमें कही जानेवाली यह कहावत सत्य ही है कि नीमसे मधु नहीं टपकता ॥ १७ ॥

तव मातुरसद्ग्राहं विद्म पूर्वं यथा श्रुतम् । पितुस्ते वरदः कश्चिद् ददौ वरमनुत्तमम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘तुम्हारी माताके दुराग्रहकी बात भी हम जानते हैं । इसके विषयमें पहले जैसा सुना गया है, वह बताया जाता है । एक समय किसी वर देनेवाले साधुने तुम्हारे पिताको अत्यन्त उत्तम वर दिया था ॥ १८ ॥

सर्वभूतरुतं तस्मात् संजज्ञे वसुधाधिपः । तेन तिर्यग्गतानां च भूतानां विदितं वचः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘उस वरके प्रभावसे केकयनरेश समस्त प्राणियोंकी बोली समझने लगे । तिर्यक् योनिमें पड़े हुए प्राणियोंकी बातें भी उनकी समझमें आ जाती थीं ॥ १९ ॥

ततो जृम्भस्य शयने विरुताद् भूरिवर्चसः । पितुस्ते विदितो भावः स तत्र बहुधाहसत् ॥ २० ॥

भावार्थ

‘एक दिन तुम्हारे महातेजस्वी पिता शय्यापर लेटे हुए थे । उसी समय जृम्भ नामक पक्षीकी आवाज उनके कानोंमें पड़ी । उसकी बोलीका अभिप्राय उनकी समझमें आ गया । अतः वे वहाँ कई बार हँसे ॥ २० ॥

तत्र ते जननी क्रुद्धा मृत्युपाशमभीप्सती । हासं ते नृपते सौम्य जिज्ञासामीति चाब्रवीत् ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘उसी शय्यापर तुम्हारी माँ भी सोयी थी । वह यह समझकर कि राजा मेरी ही हँसी उड़ा रहे हैं, कुपित हो उठी और गलेमें मौतकी फाँसी लगानेकी इच्छा रखती हुई बोली— ‘सौम्य ! नरेश्वर ! तुम्हारे हँसनेका क्या कारण है, यह मैं जानना चाहती हूँ’ ॥ २१ ॥

नृपश्चोवाच तां देवीं हासं शंसामि ते यदि । ततो मे मरणं सद्यो भविष्यति न संशयः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘तब राजाने उस देवीसे कहा—‘रानी ! यदि मैं अपने हँसनेका कारण बता दूँ तो उसी क्षण मेरी मृत्यु हो जायगी, इसमें संशय नहीं है’ ॥ २२ ॥

माता ते पितरं देवि पुनः केकयमब्रवीत् । शंस मे जीववा मा वा न मां त्वं प्रहसिष्यसि ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘देवि ! यह सुनकर तुम्हारी रानी माताने तुम्हारे पिता केकय-राजसे फिर कहा—‘तुम जीओ या मरो, मुझे कारण बता दो । भविष्यमें तुम फिर मेरी हँसी नहीं उड़ा सकोगे’ ॥ २३ ॥

प्रियया च तथोक्तः स केकयः पृथिवीपतिः । तस्मै तं वरदायार्थं कथयामास तत्त्वतः ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘अपनी प्यारी रानीके ऐसा कहनेपर केकयनरेशने उस वर देनेवाले साधुके पास जाकर सारा समाचार ठीक-ठीक कह सुनाया ॥ २४ ॥

ततः स वरदः साधू राजानं प्रत्यभाषत । म्रियतां ध्वंसतां वेयं मा शंसीस्त्वं महीपते ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘तब उस वर देनेवाले साधुने राजाको उत्तर दिया— ‘महाराज ! रानी मरे या घरसे निकल जाय; तुम कदापि यह बात उसे न बताना’ ॥ २५ ॥

स तच्छ्रुत्वा वचस्तस्य प्रसन्नमनसो नृपः । मातरं ते निरस्याशु विजहार कुबेरवत् ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘प्रसन्न चित्तवाले उस साधुका यह वचन सुनकर केकयनरेशने तुम्हारी माताको तुरंत घरसे निकाल दिया और स्वयं कुबेरके समान विहार करने लगे ॥ २६ ॥

तथा त्वमपि राजानं दुर्जनाचरिते पथि । असद्ग्राहमिमं मोहात् कुरुषे पापदर्शिनी ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘तुम भी इसी प्रकार दुर्जनोंके मार्गपर स्थित हो पापपर ही दृष्टि रखकर मोहवश राजासे यह अनुचित आग्रह कर रही हो ॥ २७ ॥

सत्यश्चात्र प्रवादोऽयं लौकिकः प्रतिभाति मा । पितॄन् समनुजायन्ते नरा मातरमङ्गनाः ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘आज मुझे यह लोकोक्ति सोलह आने सच मालूम होती है कि पुत्र पिताके समान होते हैं और कन्याएँ माताके समान ॥ २८ ॥

नैवं भव गृहाणेदं यदाह वसुधाधिपः । भर्तुरिच्छामुपास्वेह जनस्यास्य गतिर्भव ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘तुम ऐसी न बनो—इस लोकोक्तिको अपने जीवनमें चरितार्थ न करो । राजाने जो कुछ कहा है, उसे स्वीकार करो ( श्रीरामका राज्याभिषेक होने दो ) । अपने पतिकी इच्छाका अनुसरण करके इस जन-समुदायको यहाँ शरण देनेवाली बनो ॥ २९ ॥

मा त्वं प्रोत्साहिता पापैर्देवराजसमप्रभम् । भर्तारं लोकभर्तारमसद्धर्ममुपाद्य ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘पापपूर्ण विचार रखनेवाले लोगोंके बहकावेमें आकर तुम देवराज इन्द्रके तुल्य तेजस्वी अपने लोक-प्रतिपालक स्वामीको अनुचित कर्ममें न लगाओ ॥ ३० ॥

नहि मिथ्या प्रतिज्ञातं करिष्यति तवानघः । श्रीमान् दशरथो राजा देवि राजीवलोचनः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘देवि ! कमलनयन श्रीमान् राजा दशरथ पापसे दूर रहते हैं । वे अपनी प्रतिज्ञा झूठी नहीं करेंगे ॥ ३१ ॥

ज्येष्ठो वदान्यः कर्मण्यः स्वधर्मस्यापि रक्षिता । रक्षिता जीवलोकस्य बली रामोऽभिषिच्यताम् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘श्रीरामचन्द्रजी अपने भाइयोंमें ज्येष्ठ, उदार, कर्मठ, स्वधर्मके पालक, जीवजगत्के रक्षक और बलवान् हैं । इनका इस राज्यपर अभिषेक होने दो ॥ ३२ ॥

परिवादो हि ते देवि महाँल्लोके चरिष्यति । यदि रामो वनं याति विहाय पितरं नृपम् ॥ ३३ ॥ स्वराज्यं राघवः पातु भव त्वं विगतज्वरा । नहि ते राघवादन्यः क्षमः पुरवरे वसन् ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘देवि ! यदि श्रीराम अपने पिता राजा दशरथको छोड़कर वनको चले जायँगे तो संसारमें तुम्हारी बड़ी निन्दा होगी ॥ ‘अतः श्रीरामचन्द्रजी ही अपने राज्यका पालन करें और तुम निश्चिन्त होकर बैठो । श्रीरामके सिवा दूसरा कोई राजा इस श्रेष्ठ नगरमें रहकर तुम्हारे अनुकूल आचरण नहीं कर सकता ॥ ३४ ॥

रामे हि यौवराज्यस्थे राजा दशरथो वनम् । प्रवेक्ष्यति महेष्वासः पूर्ववृत्तमनुस्मरन् ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘श्रीरामके युवराजपदपर प्रतिष्ठित हो जानेके बाद महाधनुर्धर राजा दशरथ पूर्वजोंके वृत्तान्तका स्मरण करके स्वयं वनमें प्रवेश करेंगे’ ॥ ३५ ॥

इति सान्त्वैश्च तीक्ष्णैश्च कैकेयीं राजसंसदि । भूयः संक्षोभयामास सुमन्त्रस्तु कृताञ्जलिः ॥ ३६ ॥ नैव सा क्षुभ्यते देवी न च स्म परिदूयते । न चास्या मुखवर्णस्य लक्ष्यते विक्रिया तदा ॥ ३७ ॥

भावार्थ

इस प्रकार सुमन्त्रने हाथ जोड़कर कैकेयीको उस राजभवनमें सान्त्वनापूर्ण तथा तीखे वचनोंसे भी बारंबार विचलित करनेकी चेष्टा की; किंतु वह टस-से-मस न हुई । देवी कैकेयीके मनमें न तो क्षोभ हुआ और न दुःख ही । उस समय उसके चेहरेके रंगमें भी कोई फर्क पड़ता नहीं दिखायी दिया ॥ ३६-३७ ॥

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