अयोध्याकाण्ड, सर्ग 38
तस्यां चीरं वसानायां नाथवत्यामनाथवत् । प्रचुक्रोश जनः सर्वो धिक् त्वां दशरथं त्विति॥ १ ॥
भावार्थ
सीताजी सनाथ होकर भी जब अनाथकी भाँति चीर-वस्त्र धारण करने लगीं, तब सब लोग चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे—‘राजा दशरथ ! तुम्हें धिक्कार है !’ ॥ १ ॥
तेन तत्र प्रणादेन दुःखितः स महीपतिः । चिच्छेद जीविते श्रद्धां धर्मे यशसि चात्मनः ॥ २ ॥ स निःश्वस्योष्णमैक्ष्वाकस्तां भार्यामिदमब्रवीत् । कैकेयि कुशचीरेण न सीता गन्तुमर्हति ॥ ३ ॥
भावार्थ
वहाँ होनेवाले उस कोलाहलसे दुखी हो इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथने अपने जीवन, धर्म और यशकी उत्कट इच्छा त्याग दी । फिर वे गरम साँस खींचकर अपनी भार्या कैकेयीसे इस प्रकार बोले—‘कैकेयि ! सीता कुश-चीर (वल्कलवस्त्र ) पहनकर वनमें जानेके योग्य नहीं है ॥ २–३ ॥
सुकुमारी च बाला च सततं च सुखोचिता । नेयं वनस्य योग्येति सत्यमाह गुरुर्मम ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘यह सुकुमारी है, बालिका है और सदा सुखोंमें ही पली है । मेरे गुरुजी ठीक कहते हैं कि यह सीता वनमें जाने योग्य नहीं है ॥ ४ ॥
इयं हि कस्यापि करोति किंचित् तपस्विनी राजवरस्य पुत्री । या चीरमासाद्य जनस्य मध्ये स्थिता विसंज्ञा श्रमणीव काचित्॥ ५ ॥
भावार्थ
‘राजाओंमें श्रेष्ठ जनककी यह तपस्विनी पुत्री क्या किसीका भी कुछ बिगाड़ती है ? जो इस प्रकार जन-समुदायके बीच किसी किंकर्तव्यविमूढ भिक्षुकीके समान चीर धारण करके खड़ी है ? ॥ ५ ॥
चीराण्यपास्याज्जनकस्य कन्या नेयं प्रतिज्ञा मम दत्तपूर्वा । यथासुखं गच्छतु राजपुत्री वनं समग्रा सह सर्वरत्नैः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘जनकनन्दिनी अपने चीर-वस्त्र उतार डाले । ‘यह इस रूपमें वन जाय’ ऐसी कोई प्रतिज्ञा मैंने पहले नहीं की है और न किसीको इस तरहका वचन ही दिया है । अतः राजकुमारी सीता सम्पूर्ण वस्त्रालंकारोंसे सम्पन्न हो सब प्रकारके रत्नोंके साथ जिस तरह भी वह सुखी रह सके, उसी तरह वनको जा सकती है ॥ ६ ॥
अजीवनार्हेण मया नृशंसा कृता प्रतिज्ञा नियमेन तावत् । त्वया हि बाल्यात् प्रतिपन्नमेतत् तन्मा दहेद् वेणुमिवात्मपुष्पम्॥ ७ ॥
भावार्थ
‘मैं जीवित रहनेयोग्य नहीं हूँ । मैंने तेरे वचनोंमें बँधकर एक तो यों ही नियम ( शपथ ) पूर्वक बड़ी क्रूर प्रतिज्ञा कर डाली है, दूसरे तूने अपनी नादानीके कारण सीताको इस तरह चीर पहनाना प्रारम्भ कर दिया । जिस प्रकार बाँसका फूल उसीको सुखा डालता है, उसी प्रकार मेरी की हुई प्रतिज्ञा मुझीको भस्म किये डालती है ॥ ७ ॥
रामेण यदि ते पापे किंचित्कृतमशोभनम् । अपकारः क इह ते वैदेह्या दर्शितोऽधमे ॥ ८ ॥ मृगीवोत्फुल्लनयना मृदुशीला मनस्विनी । अपकारं कमिव ते करोति जनकात्मजा ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘नीच पापिनि ! यदि श्रीरामने तेरा कोई अपराध किया है तो ( उन्हें तो तू वनवास दे ही चुकी ) विदेहनन्दिनी सीताने ऐसा दण्ड पानेयोग्य तेरा कौन-सा अपकार कर डाला है ? ॥ ‘जिसके नेत्र हरिणीके नेत्रोंके समान खिले हुए हैं, जिसका स्वभाव अत्यन्त कोमल एवं मधुर है, वह मनस्विनी जनकनन्दिनी तेरा कौन-सा अपराध कर रही है ॥ ९ ॥
ननु पर्याप्तमेवं ते पापे रामविवासनम् । किमेभिः कृपणैर्भूयः पातकैरपि ते कृतैः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘पापिनि ! तूने श्रीरामको वनवास देकर ही पूरा पाप कमा लिया है । अब सीताको भी वनमें भेजने और वल्कल पहनाने आदिका अत्यन्त दुःखद कार्य करके फिर तू इतने पातक किसलिये बटोर रही है ? ॥ १० ॥
प्रतिज्ञातं मया तावत् त्वयोक्तं देवि शृण्वता । रामं यदभिषेकाय त्वमिहागतमब्रवीः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘देवि ! श्रीराम जब अभिषेकके लिये यहाँ आये थे, उस समय तूने उनसे जो कुछ कहा था, उसे सुनकर मैंने उतनेके लिये ही प्रतिज्ञा की थी ॥ ११ ॥
तत्त्वेतत् समतिक्रम्य निरयं गन्तुमिच्छसि । मैथिलीमपि या हि त्वमीक्षसे चीरवासिनीम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘उसका उल्लङ्घन करके जो तू मिथिलेशकुमारी जानकीको भी वल्कल वस्त्र पहने देखना चाहती है, इससे जान पड़ता है, तुझे नरकमें ही जानेकी इच्छा हो रही है’ ॥ १२ ॥
एवं ब्रुवन्तं पितरं रामः सम्प्रस्थितो वनम् । अवाक्शिरःसमासीनमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १३ ॥
भावार्थ
राजा दशरथ सिर नीचा किये बैठे हुए जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय वनकी ओर जाते हुए श्रीरामने पितासे इस प्रकार कहा—॥ १३ ॥
इयं धार्मिक कौसल्या मम माता यशस्विनी । वृद्धा चाक्षुद्रशीला च न च त्वां देव गर्हते ॥ १४ ॥ मया विहीनां वरद प्रपन्नां शोकसागरम् । अदृष्टपूर्वव्यसनां भूयः सम्मन्तुमर्हसि ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘धर्मात्मन् ! ये मेरी यशस्विनी माता कौसल्या अब वृद्ध हो चली हैं । इनका स्वभाव बहुत ही उच्च और उदार है । देव ! यह कभी आपकी निन्दा नहीं करती हैं । इन्होंने पहले कभी ऐसा भारी संकट नहीं देखा होगा । वरदायक नरेश ! ये मेरे न रहनेसे शोकके समुद्रमें डूब जायँगी । अतः आप सदा इनका अधिक सम्मान करते रहें ॥ १४-१५ ॥
पुत्रशोकं यथा नच्छेत् त्वया पूज्येन पूजिता । मांहि संचिन्तयन्ती सा त्वयि जीवेत् तपस्विनी ॥ १६॥
भावार्थ
‘आप पूज्यतम पतिसे सम्मानित हो जिस प्रकार यह पुत्रशोकका अनुभव न कर सकें और मेरा चिन्तन करती हुई भी आपके आश्रयमें ही ये मेरी तपस्विनी माता जीवन धारण करें, ऐसा प्रयत्न आपको करना चाहिये ॥ १६ ॥
इमां महेन्द्रोपम जातगर्धिनीं तथा विधातुं जननीं ममार्हसि । यथा वनस्थे मयि शोककर्शिता न जीवितं न्यस्य यमक्षयं व्रजेत् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘इन्द्रके समान तेजस्वी महाराज ! ये निरन्तर अपने बिछुड़े हुए बेटेको देखनेके लिये उत्सुक रहेंगी । कहीं ऐसा न हो मेरे वनमें रहते समय ये शोकसे कातर हो अपने प्राणोंको त्याग करके यमलोकको चली जायँ । अतः आप मेरी माताको सदा ऐसी ही परिस्थितिमें रखें, जिससे उक्त आशङ्काके लिये अवकाश न रह जाय’ ॥ १७ ॥
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