अयोध्याकाण्ड, सर्ग 22
अथ तं व्यथया दीनं सविशेषममर्षितम् । सरोषमित्र नागेन्द्रं रोषविस्फारितेक्षणम् ॥ १ ॥ आसाद्य रामः सौमित्रिं सुहृदं भ्रातरं प्रियम् । उवाचेदं स धैर्येण धारयन् सत्त्वमात्मवान् ॥ २ ॥
भावार्थ
( श्रीरामके राज्याभिषेकमें विघ्न पड़नेके कारण ) सुमित्राकुमार लक्ष्मण मानसिक व्यथासे बहुत दुखी थे। उनके मनमें विशेष अमर्ष भरा हुआ था । वे रोषसे भरे हुए गजराजकी भाँति क्रोधसे आँखें फाड़-फाड़कर देख रहे थे । अपने मनको वशमें रखनेवाले श्रीराम धैर्यपूर्वक चित्तको निर्विकाररूपसे काबूमें रखते हुए अपने हितैषी सुहृद् प्रिय भाई लक्ष्मणके पास जाकर इस प्रकार बोले—॥ १-२ ॥
निगृह्य रोषं शोकं च धैर्यमाश्रित्य केवलम् । अवमानं निरस्यैनं गृहीत्वा हर्षमुत्तमम् ॥ ३ ॥ उपक्लृप्तं यदेतन्मे अभिषेकार्थमुत्तमम् । सर्वं निवर्तय क्षिप्रं कुरु कार्यं निरव्ययम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! केवल धैर्यका आश्रय लेकर अपने मनके क्रोध और शोकको दूर करो, चित्तसे अपमानकी भावना निकाल दो और हृदयमें भलीभाँति हर्ष भरकर मेरे अभिषेकके लिये यह जो उत्तम सामग्री एकत्र की गयी है, इसे शीघ्र हटा दो और ऐसा कार्य करो, जिससे मेरे वनगमनमें बाधा उपस्थित न हो ॥ ३-४ ॥
सौमित्रे योऽभिषेकार्थे मम सम्भारसम्भ्रमः । अभिषेकनिवृत्त्यर्थे सोऽस्तु सम्भारसम्भ्रमः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘सुमित्रानन्दन ! अबतक अभिषेकके लिये सामग्री जुटानेमें जो तुम्हारा उत्साह था, वह इसे रोकने और मेरे वन जानेकी तैयारी करनेमें होना चाहिये ॥ ५ ॥
यस्या मदभिषेकार्थे मानसं परितप्यते । माता नः सा यथा न स्यात् सविशङ्का तथा कुरु ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘मेरे अभिषेकके कारण जिसके चित्तमें संताप हो रहा है, उस हमारी माता कैकेयीको जिससे किसी तरहकी शङ्का न रह जाय, वही काम करो ॥ ६ ॥
तस्याः शङ्कामयं दुःखं मुहूर्तमपि नोत्सहे । मनसि प्रतिसंजातं सौमित्रेऽहमुपेक्षितुम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! उसके मनमें संदेहके कारण दुःख उत्पन्न हो, इस बातको मैं दो घड़ीके लिये भी नहीं सह सकता और न इसकी उपेक्षा ही कर सकता हूँ ॥ ७ ॥
न बुद्धिपूर्वं नाबुद्धं स्मरामीह कदाचन । मातॄणां वा पितुर्वाहं कृतमल्पं च विप्रियम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘मैंने यहाँ कभी जान-बूझकर या अनजानमें माताओंका अथवा पिताजीका कोई छोटा-सा भी अपराध किया हो, ऐसा याद नहीं आता ॥ ८ ॥
सत्यः सत्याभिसंधश्च नित्यं सत्यपराक्रमः । परलोकभयाद् भीतो निर्भयोऽस्तु पिता मम ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘पिताजी सदा सत्यवादी और सत्यपराक्रमी रहे हैं। वे परलोकके भयसे सदा डरते रहते हैं; इसलिये मुझे वही काम करना चाहिये, जिससे मेरे पिताजीका पारलौकिक भय दूर हो जाय ॥ ९ ॥
तस्यापि हि भवेदस्मिन् कर्मण्यप्रतिसंहते । सत्यं नेति मनस्तापस्तस्य तापस्तपेच्च माम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘यदि इस अभिषेकसम्बन्धी कार्यको रोक नहीं दिया गया तो पिताजीको भी मन-ही-मन यह सोचकर संताप होगा कि मेरी बात सच्ची नहीं हुई और उनका वह मनस्ताप मुझे सदा संतप्त करता रहेगा ॥ १० ॥
अभिषेकविधानं तु तस्मात् संहृत्य लक्ष्मण । अन्वगेवाहमिच्छामि वनं गन्तुमितः पुरः ॥ ११ ॥ मम प्रव्राजनादद्य कृतकृत्या नृपात्मजा । सुतं भरतमव्यग्रमभिषेचयतां ततः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! इन्हीं सब कारणोंसे मैं अपने अभिषेकका कार्य रोककर शीघ्र ही इस नगरसे वनको चला जाना चाहता हूँ ॥ ‘आज मेरे चले जानेसे कृतकृत्य हुई राजकुमारी कैकेयी अपने पुत्र भरतका निर्भय एवं निश्चिन्त होकर अभिषेक करावे ॥ १२ ॥
मयि चीराजिनधरे जटामण्डलधारिणि । गतेऽरण्यं च कैकेय्या भविष्यति मनःसुखम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘मैं वल्कल और मृगचर्म धारण करके सिरपर जटाजूट बाँधे जब वनको चला जाऊँगा, तभी कैकेयीके मनको सुख प्राप्त होगा ॥ १३ ॥
बुद्धिः प्रणीता येनेयं मनश्च सुसमाहितम् । तं तु नार्हामि संक्लेष्टुं प्रव्रजिष्यामि मा चिरम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘जिस विधाताने कैकेयीको ऐसी बुद्धि प्रदान की है तथा जिसकी प्रेरणासे उसका मन मुझे वन भेजनेमें अत्यन्त दृढ़ हो गया है, उसे विफलमनोरथ करके कष्ट देना मेरे लिये उचित नहीं है ॥ १४ ॥
कृतान्त एव सौमित्रे द्रष्टव्यो मत्प्रवासने । राज्यस्य च वितीर्णस्य पुनरेव निवर्तने ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘सुमित्राकुमार ! मेरे इस प्रवासमें तथा पिताद्वारा दिये हुए राज्यके फिर हाथसे निकल जानेमें दैवको ही कारण समझना चाहिये ॥ १५ ॥
कैकेय्याः प्रतिपत्तिर्हि कथं स्यान्मम वेदने । यदि तस्या न भावोऽयं कृतान्तविहितो भवेत् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘मेरी समझसे कैकेयीका यह विपरीत मनोभाव दैवका ही विधान है । यदि ऐसा न होता तो वह मुझे वनमें भेजकर पीड़ा देनेका विचार क्यों करती ॥ १६ ॥
जानासि हि यथा सौम्य न मातृषु ममान्तरम् । भूतपूर्वं विशेषो वा तस्या मयि सुतेऽपि वा ॥ १७ ॥ सोऽभिषेकनिवृत्त्यर्थैः प्रवासार्थैश्च दुर्वचैः । उग्रैर्वाक्यैरहं तस्या नान्यद् दैवात् समर्थये ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! तुम तो जानते ही हो कि मेरे मनमें पहले भी कभी माताओंके प्रति भेदभाव नहीं हुआ और कैकेयी भी पहले मुझमें या अपने पुत्रमें कोई अन्तर नहीं समझती थी ॥ ‘मेरे अभिषेकको रोकने और मुझे वनमें भेजनेके लिये उसने राजाको प्रेरित करनेके निमित्त जिन भयंकर और कटुवचनों-का प्रयोग किया है, उन्हें साधारण मनुष्योंके लिये भी मुँहसे निकालना कठिन है । उसकी ऐसी चेष्टामें मैं दैवके सिवा दूसरे किसी कारणका समर्थन नहीं करता ॥ १८ ॥
कथं प्रकृतिसम्पन्ना राजपुत्री तथागुणा । ब्रूयात् सा प्राकृतेव स्त्री मत्पीडार्थं भर्तृसंनिधौ ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘यदि ऐसी बात न होती तो वैसे उत्तम स्वभाव और श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त राजकुमारी कैकेयी एक साधारण स्त्रीकी भाँति अपने पतिके समीप मुझे पीड़ा देनेवाली बात कैसे कहती —मुझे कष्ट देनेके लिये रामको वनमें भेजनेका प्रस्ताव कैसे उपस्थित करती ॥ १९ ॥
यदचिन्त्यं तु तद् दैवं भूतेष्वपि न हन्यते । व्यक्तं मयि च तस्यां च पतितो हि विपर्ययः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘जिसके विषयमें कभी कुछ सोचा न गया हो, वही दैवका विधान है । प्राणियोंमें अथवा उनके अधिष्ठाता देवताओंमें भी कोई ऐसा नहीं है, जो उस दैवके विधानको मेट सके; अतः निश्चय ही उसीकी प्रेरणासे मुझमें और कैकेयीमें यह भारी उलट-फेर हुआ है ( मेरे हाथमें आया हुआ राज्य चला गया और कैकेयीकी बुद्धि बदल गयी ) ॥ २० ॥
कश्च दैवेन सौमित्रे योद्धुमुत्सहते पुमान् । यस्य नु ग्रहणं किंचित् कर्मणोऽन्यन्न दृश्यते ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘सुमित्रानन्दन ! कर्मोंके सुख-दुःखादिरूप फल प्राप्त होनेपर ही जिसका ज्ञान होता है, कर्मफलसे अन्यत्र कहीं भी जिसका पता नहीं चलता, उस दैवके साथ कौन पुरुष युद्ध कर सकता है ? ॥ २१ ॥
सुखदुःखे भयक्रोधौ लाभालाभौ भवाभवौ । यस्य किंचित् तथाभूतं ननु दैवस्य कर्म तत् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘सुख-दुःख, भय-क्रोध ( क्षोभ ), लाभ-हानि, उत्पत्ति और विनाश तथा इस प्रकारके और भी जितने परिणाम प्राप्त होते हैं, जिनका कोई कारण समझमें नहीं आता, वे सब दैवके ही कर्म हैं ॥ २२ ॥
ऋषयोऽप्युग्रतपसो दैवेनाभिप्रचोदिताः । उत्सृज्य नियमांस्तीव्रान् भ्रश्यन्ते काममन्युभिः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘उग्र तपस्वी ऋषि भी दैवसे प्रेरित होकर अपने तीव्र नियमोंको छोड़ बैठते और काम-क्रोधके द्वारा विवश हो मर्यादासे भ्रष्ट हो जाते हैं ॥ २३ ॥
असंकल्पितमेवेह यदकस्मात् प्रवर्तते । निवर्त्यारब्धमारम्भैर्ननु दैवस्य कर्म तत् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘जो बात बिना सोचे-विचारे अकस्मात् सिरपर आ पड़ती है और प्रयत्नोंद्वारा आरम्भ किये हुए कार्यको रोककर एक नया ही काण्ड उपस्थित कर देती है, अवश्य वह दैवका ही विधान है ॥ २४ ॥
पतया तत्त्वया बुद्ध्या संस्तभ्यात्मानमात्मना । व्याहतेऽप्यभिषेके मे परितापो न विद्यते ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘इस तात्त्विक बुद्धिके द्वारा स्वयं ही मनको स्थिर कर लेनेके कारण मुझे अपने अभिषेकमें विघ्न पड़ जानेपर भी दुःख या संताप नहीं हो रहा है ॥ २५ ॥
तस्मादपरितापः संस्त्वमप्यनुविधाय माम् । प्रतिसंहारय क्षिप्रमाभिषेचनिकीं क्रियाम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘इसी प्रकार तुम भी मेरे विचारका अनुसरण करके संतापशून्य हो राज्याभिषेकके इस आयोजनको शीघ्र बंद करा दो ॥ २६ ॥
एभिरेव घटैः सर्वैरभिषेचनसम्भृतैः । मम लक्ष्मण तापस्ये व्रतस्नानं भविष्यति ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! राज्याभिषेकके लिये सँजोकर रखे गये इन्हीं सब कलशोंद्वारा मेरा तापस-व्रतके संकल्पके लिये आवश्यक स्नान होगा ॥ २७ ॥
अथवा किं मयैतेन राज्यद्रव्यमयेन तु । उद्धृतं मे स्वयं तोयं व्रतादेशं करिष्यति ॥ २८ ॥ मा च लक्ष्मण संतापं कार्षीर्लक्ष्म्या विपर्यये । राज्यं वा वनवासो वा वनवासो महोदयः ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘अथवा राज्याभिषेकसम्बन्धी मङ्गल द्रव्यमय इस कलशजलकी मुझे क्या आवश्यकता है ? स्वयं मेरे द्वारा अपने हाथसे निकाला हुआ जल ही मेरे व्रतादेशका साधक होगा ॥ ‘लक्ष्मण ! लक्ष्मीके इस उलट-फेरके विषयमें तुम कोई चिन्ता न करो । मेरे लिये राज्य अथवा वनवास दोनों समान हैं, बल्कि विशेष विचार करनेपर वनवास ही महान् अभ्युदय-कारी प्रतीत होता है ॥ २९ ॥
न लक्ष्मणास्मिन् मम राज्यविघ्ने माता यवीयस्यभिशङ्कितव्या । दैवाभिपन्ना न पिता कथंचि- ज्ज्ञानासि दैवं हि तथाप्रभावम् ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! मेरे राज्याभिषेकमें जो विघ्न आया है, इसमें मेरी सबसे छोटी माता कारण है, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह दैवके अधीन थी । इसी प्रकार पिताजी भी किसी तरह इसमें कारण नहीं हैं । तुम तो दैव और उसके अद्भुत प्रभावको जानते ही हो, वही कारण है’ ॥ ३० ॥
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