अयोध्याकाण्ड, सर्ग 23
इति ब्रुवति रामे तु लक्ष्मणोऽवाक्शिरा इव । ध्यात्वा मध्यं जगामाशु सहसा दैन्यहर्षयोः ॥ १ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजी जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय लक्ष्मण सिर झुकाये कुछ सोचते रहे; फिर सहसा शीघ्रतापूर्वक वे दुःख और हर्षके बीचकी स्थितिमें आ गये ( श्रीरामके राज्याभिषेकमें विघ्न पड़नेके कारण उन्हें दुःख हुआ और उनकी धर्ममें दृढ़ता देखकर प्रसन्नता हुई ) ॥ १ ॥
तदा तु बद्ध्वा भ्रुकुटीं भ्रुवोर्मध्ये नरर्षभः । निशश्वास महासर्पो बिलस्थ इव रोषितः ॥ २ ॥
भावार्थ
नरश्रेष्ठ लक्ष्मणने उस समय ललाटमें भौंहोंको चढ़ाकर लंबी साँस खींचना आरम्भ किया, मानो बिलमें बैठा हुआ महान् सर्प रोषमें भरकर फुंकार मार रहा हो ॥ २ ॥
तस्य दुष्प्रतिवीक्ष्यं तद् भ्रुकुटीसहितं तदा । बभौ क्रुद्धस्य सिंहस्य मुखस्य सदृशं मुखम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
तनी हुई भौंहोंके साथ उस समय उनका मुख कुपित हुए सिंहके मुखके समान जान पड़ता था, उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था ॥ ३ ॥
अग्रहस्तं विधुन्वंस्तु हस्ती हस्तमिवात्मनः । तिर्यगूर्ध्वं शरीरे च पातयित्वा शिरोधराम् ॥ ४ ॥ अग्राक्ष्णा वीक्षमाणस्तु तिर्यग्भ्रातरमब्रवीत् ।
भावार्थ
जैसे हाथी अपनी सूँड हिलाया करता है, उसी प्रकार वे अपने दाहिने हाथको हिलाते और गर्दनको शरीरमें ऊपर-नीचे और अगल-बगल सब ओर घुमाते हुए नेत्रोंके अग्रभागसे टेढ़ी नजरोंद्वारा अपने भाई श्रीरामको देखकर उनसे बोले—॥ ४½ ॥
अस्थाने सम्भ्रमो यस्य जातो वै सुमहानयम् ॥ ५ ॥ धर्मदोषप्रसङ्गेन लोकस्यानतिशङ्कया । कथं ह्येतदसम्भ्रान्तस्त्वद्विधो वक्तुमर्हति ॥ ६ ॥ यथा ह्येवमशौण्डीरं शौण्डीरः क्षत्रियर्षभः । किं नाम कृपणं दैवमशक्तमभिशंससि ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘भैया ! आप समझते हैं कि यदि पिताकी इस आज्ञाका पालन करनेके लिये मैं वनको न जाऊँ तो धर्मके विरोध-का प्रसङ्ग उपस्थित होता है, इसके सिवा लोगोंके मनमें यह बड़ी भारी शङ्का उठ खड़ी होगी कि जो पिताकी आज्ञाका उल्लङ्घन करता है, वह यदि राजा ही हो जाय तो हमारा धर्मपूर्वक पालन कैसे करेगा ? साथ ही आप यह भी सोचते हैं कि यदि मैं पिताकी इस आज्ञाका पालन नहीं करूँ तो दूसरे लोग भी नहीं करेंगे। इस प्रकार धर्मकी अवहेलना होनेसे जगत्के विनाशका भय उपस्थित होगा । इन सब दोषों और शङ्काओंका निराकरण करनेके लिये आपके मनमें वनगमनके प्रति जो यह बड़ा भारी सम्भ्रम ( उतावलापन ) आ गया है, यह सर्वथा अनुचित एवं भ्रममूलक ही है; क्योंकि आप असमर्थ ‘दैव’ नामक तुच्छ वस्तुको प्रबल बता रहे हैं । दैवका निराकरण करनेमें समर्थ आप-जैसा क्षत्रियशिरोमणि वीर यदि भ्रममें नहीं पड़ गया होता तो ऐसी बात कैसे कह सकता था ? अतः असमर्थ पुरुषोंद्वारा ही अपनाये जाने योग्य और पौरुष-के निकट कुछ भी करनेमें असमर्थ ‘दैव’ की आप साधारण मनुष्यके समान इतनी स्तुति या प्रशंसा क्यों कर रहे हैं ? ॥ ५—७ ॥
पापयोस्ते कथं नाम तयोः शङ्का न विद्यते । सन्ति धर्मोपधासक्ता धर्मात्मन् किं न बुध्यसे ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘धर्मात्मन् ! आपको उन दोनों पापियोंपर संदेह क्यों नहीं होता ? संसारमें कितने ही ऐसे पापासक्त मनुष्य हैं, जो दूसरोंको ठगनेके लिये धर्मका ढोंग बनाये रहते हैं, क्या आप उन्हें नहीं जानते हैं ? ॥ ८ ॥
तयोः सुचरितं स्वार्थं शाठ्यात् परिजिहीर्षतोः । यदि नैवं व्यवसितं स्याद्धि प्रागेव राघव । तयोः प्रागेव दत्तश्च स्याद् वरः प्रकृतश्च सः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! वे दोनों अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये शठतावश धर्मके बहाने आप-जैसे सच्चरित्र पुरुषका परित्याग करना चाहते हैं । यदि उनका ऐसा विचार न होता तो जो कार्य आज हुआ है, वह पहले ही हो गया होता । यदि वरदानवाली बात सच्ची होती तो आपके अभिषेकका कार्य प्रारम्भ होनेसे पहले ही इस तरहका वर दे दिया गया होता ॥ ९ ॥
लोकविद्विष्टमारब्धं त्वदन्यस्याभिषेचनम् । नोत्सहे सहितुं वीर तत्र मे क्षन्तुमर्हसि ॥ १० ॥
भावार्थ
( गुणवान् ज्येष्ठ पुत्रके रहते हुए छोटेका अभिषेक करना ) यह लोकविरुद्ध कार्य है, जिसका आज आरम्भ किया गया है । आपके सिवा दूसरे किसीका राज्याभिषेक हो, यह मुझसे सहन नहीं होनेका । इसके लिये आप मुझे क्षमा करेंगे ॥ १० ॥
येनैवमागता द्वैधं तव बुद्धिर्महामते । सोऽपि धर्मो मम द्वेष्यो यत्प्रसङ्गाद् विमुह्यसि ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘महामते ! पिताके जिस वचनको मानकर आप मोहमें पड़े हुए हैं और जिसके कारण आपकी बुद्धिमें दुविधा उत्पन्न हो गयी है, मैं उसे धर्म माननेका पक्षपाती नहीं हूँ; ऐसे धर्म का तो मैं घोर विरोध करता हूँ ॥ ११ ॥
कथं त्वं कर्मणा शक्तः कैकेयीवशवर्तिनः । करिष्यसि पितुर्वाक्यमधर्मिष्ठं विगर्हितम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘आप अपने पराक्रमसे सब कुछ करनेमें समर्थ होकर भी कैकेयीके वशमें रहनेवाले पिताके अधर्मपूर्ण एवं निन्दित वचनका पालन कैसे करेंगे ? ॥ १२ ॥
यदयं किल्बिषाद् भेदः कृतोऽप्येवं न गृह्यते । जायते तत्र मे दुःखं धर्मसङ्गश्च गर्हितः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘वरदानकी झूठी कल्पनाका पाप करके आपके अभिषेकमें रोड़ा अटकाया गया है, फिर भी आप इस रूपमें नहीं ग्रहण करते हैं । इसके लिये मेरे मनमें बड़ा दुःख होता है । ऐसे कपटपूर्ण धर्मके प्रति होनेवाली आसक्ति निन्दित है ॥१३ ॥
तवायं धर्मसंयोगो लोकस्यास्य विगर्हितः । मनसापि कथं कामं कुर्यात् त्वां कामवृत्तयोः । तयोस्त्वहितयोर्नित्यं शत्र्वोः पित्रभिधानयोः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘ऐसे पाखण्डपूर्ण धर्मके पालनमें जो आपकी प्रवृत्ति हो रही है, वह यहाँके जनसमुदायकी दृष्टिमें निन्दित है । आपके सिवा दूसरा कोई पुरुष सदा पुत्रका अहित करनेवाले, पिता-माता नामधारी उन कामाचारी शत्रुओंके मनोरथको मनसे भी कैसे पूर्ण कर सकता है ( इसकी पूर्तिका विचार भी मनमें कैसे ला सकता है ? ) ॥ १४ ॥
यद्यपि प्रतिपत्तिस्ते दैवी चापि तयोर्मतम् । तथाप्युपेक्षणीयं ते न मे तदपि रोचते ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘माता-पिताके इस विचारको कि—‘आपका राज्याभिषेक न हो‘ जो आप दैवकी प्रेरणाका फल मानते हैं, यह भी मुझे अच्छा नहीं लगता । यद्यपि वह आपका मत है, तथापि आपको उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिये ॥ १५ ॥
विक्लवो वीर्यहीनो यः स दैवमनुवर्तते । वीराः सम्भावितात्मानो न दैवं पर्युपासते ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘जो कायर है, जिसमें पराक्रमका नाम नहीं है, वही दैवका भरोसा करता है । सारा संसार जिन्हें आदरकी दृष्टिसे देखता है, वे शक्तिशाली वीर पुरुष दैवकी उपासना नहीं करते हैं ॥ १६ ॥
दैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम् । न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘जो अपने पुरुषार्थसे दैवको दबानेमें समर्थ है, वह पुरुष दैवके द्वारा अपने कार्यमें बाधा पड़नेपर खेद नहीं करता— शिथिल होकर नहीं बैठता ॥ १७ ॥
द्रक्ष्यन्ति त्वद्य दैवस्य पौरुषं पुरुषस्य च । दैवमानुषयोरद्य व्यक्ता व्यक्तिर्भविष्यति ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘आज संसारके लोग देखेंगे कि दैवकी शक्ति बड़ी है या पुरुषका पुरुषार्थ । आज दैव और मनुष्यमें कौन बलवान् है और कौन दुर्बल—इसका स्पष्ट निर्णय हो जायगा ॥ १८ ॥
अद्य मे पौरुषहतं दैवं द्रक्ष्यन्ति वै जनाः । यैर्दैवादाहतं तेऽद्य दृष्टं राज्याभिषेचनम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘जिन लोगोंने दैवके बलसे आज आपके राज्याभिषेकको नष्ट हुआ देखा है, वे ही आज मेरे पुरुषार्थसे अवश्य ही दैवका भी विनाश देख लेंगे ॥ १९ ॥
अत्यङ्कुशमिवोद्दामं गजं मदजलोद्धतम् । प्रधावितमहं दैवं पौरुषेण निवर्तये ॥ २० ॥
भावार्थ
‘जो अङ्कुशकी परवा नहीं करता और रस्से या साँकलको भी तोड़ देता है, मदकी धारा बहानेवाले उस मत्त गजराजकी भाँति वेगपूर्वक दौड़नेवाले दैवको भी आज मैं अपने पुरुषार्थसे पीछे लौटा दूँगा ॥ २० ॥
लोकपालाः समस्तास्ते नाद्य रामाभिषेचनम् । न च कृत्स्नास्त्रयो लोका विहन्युः किं पुनः पिता ॥२१॥
भावार्थ
‘समस्त लोकपाल और तीनों लोकोंके सम्पूर्ण प्राणी आज श्रीरामके राज्याभिषेकको नहीं रोक सकते, फिर केवल पिताजीकी तो बात ही क्या है ? ॥ २१ ॥
यैर्विवासस्तवारण्ये मिथो राजन् समर्थितः । अरण्ये ते विवत्स्यन्ति चतुर्दश समास्तथा ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! जिन लोगोंने आपसमें आपके वनवासका समर्थन किया है, वे स्वयं चौदह वर्षोंतक वनमें जाकर छिपे रहेंगे ॥ २२ ॥
अहं तदाशां धक्ष्यामि पितुस्तस्याश्च या तव । अभिषेकविघातेन पुत्रराज्याय वर्तते ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘मैं पिताकी और जो आपके अभिषेकमें विघ्न डालकर अपने पुत्रको राज्य देनेके प्रयत्नमें लगी हुई है, उस कैकेयीकी भी उस आशाको जलाकर भस्म कर डालूँगा ॥ २३ ॥
मद्बलेन विरुद्धाय न स्याद् दैवबलं तथा । प्रभविष्यति दुःखाय यथोग्रं पौरुषं मम ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘जो मेरे बलके विरोधमें खड़ा होगा, उसे मेरा भयंकर पुरुषार्थ जैसा दुःख देनेमें समर्थ होगा, वैसा दैवबल उसे सुख नहीं पहुँचा सकेगा ॥ २४ ॥
ऊर्ध्वं वर्षसहस्रान्ते प्रजापाल्यमनन्तरम् । आर्यपुत्राः करिष्यन्ति वनवासं गते त्वयि ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘सहस्रों वर्ष बीतनेके पश्चात् जब आप अवस्थाक्रमसे वनमें निवास करनेके लिये जायँगे, उस समय आपके बाद आपके पुत्र प्रजापालनरूप कार्य करेंगे ( अर्थात् उस समय भी दूसरोंको इस राज्यमें दखल देनेका अवसर नहीं प्राप्त होगा ) ॥ २५ ॥
पूर्वराजर्षिवृत्त्या हि वनवासोऽभिधीयते । प्रजा निक्षिप्य पुत्रेषु पुत्रवत् परिपालने ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘पुरातन राजर्षियोंकी आचारपरम्पराके अनुसार प्रजाका पुत्रवत् पालन करनेके निमित्त प्रजावर्गको पुत्रोंके हाथमें सौंपकर वृद्ध राजाका वनमें निवास करना उचित बताया जाता है ॥ २६ ॥
स चेद् राजन्यनेकाग्रे राज्यविभ्रमशङ्कया । नैवमिच्छसि धर्मात्मन् राज्यं राम त्वमात्मनि ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘धर्मात्मा श्रीराम ! हमारे महाराज वानप्रस्थधर्मके पालनमें चित्तको एकाग्र नहीं कर रहे हैं, इसीलिये यदि आप यह समझते हों कि उनकी आज्ञाके विरुद्ध राज्य ग्रहण कर लेनेपर समस्त जनता विद्रोही हो जायगी, अतः राज्य अपने हाथमें नहीं रह सकेगा और इसी शङ्कासे यदि आप अपने ऊपर राज्यका भार नहीं लेना चाहते हैं अथवा वनमें चले जाना चाहते हैं तो इस शङ्काको छोड़ दीजिये ॥ २७ ॥
प्रतिजाने च ते वीर मा भूवं वीरलोकभाक् । राज्यं च तव रक्षेयमहं वेलेव सागरम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘वीर ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि जैसे तटभूमि समुद्रको रोके रहती है, उसी प्रकार मैं आपकी और आपके राज्यकी रक्षा करूँगा । यदि ऐसा न करूँ तो वीरलोकका भागी न होऊँ ॥ २८ ॥
मङ्गलैरभिषिञ्चस्व तत्र त्वं व्यापृतो भव । अहमेको महीपालानलं वारयितुं बलात् ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘इसलिये आप मङ्गलमयी अभिषेक-सामग्रीसे अपना अभिषेक होने दीजिये । इस अभिषेकके कार्यमें आप तत्पर हो जाइये । मैं अकेला ही बलपूर्वक समस्त विरोधी भूपालोंको रोक रखनेमें समर्थ हूँ ॥ २९ ॥
न शोभार्थाविमौ बाहू न धनुर्भूषणाय मे । नासिराबन्धनार्थाय न शराः स्तम्भहेतवः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘ये मेरी दोनों भुजाएँ केवल शोभाके लिये नहीं हैं । मेरे इस धनुषका आभूषण नहीं बनेगा । यह तलवार केवल कमरमें बाँधे रखनेके लिये नहीं है तथा इन बाणोंके खम्भे नहीं बनेंगे ॥ ३० ॥
अमित्रमथनार्थाय सर्वमेतच्चतुष्टयम् । न चाहं कामयेऽत्यर्थं यः स्याच्छत्रुर्मतो मम ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘ये सब चारों वस्तुएँ शत्रुओंका दमन करनेके लिये ही हैं । जिसे मैं अपना शत्रु समझता हूँ, उसे कदापि जीवित रहने देना नहीं चाहता ॥ ३१ ॥
असिना तीक्ष्णधारेण विद्युच्चलितवर्चसा । प्रगृहीतेन वै शत्रुं वज्रिणं वा न कल्पये ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘जिस समय मैं इस तीखी धारवाली तलवारको हाथमें लेता हूँ, यह बिजलीकी तरह चञ्चल प्रभासे चमक उठती है । इसके द्वारा अपने किसी भी शत्रुको, वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, मैं कुछ नहीं समझता ॥ ३२ ॥
खड्गनिष्पेषनिष्पिष्टैर्गहना दुश्चरा च मे । हस्त्यश्वरथिहस्तोरुशिरोभिर्भविता मही ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘आज मेरे खड्गके प्रहारसे पीस डाले गये हाथी, घोड़े और रथियोंके हाथ, जाँघ और मस्तकोंद्वारा पटी हुई यह पृथ्वी ऐसी गहन हो जायगी कि इसपर चलना-फिरना कठिन हो जायगा ॥ ३३ ॥
खड्गधाराहता मेऽद्य दीप्यमाना इवाग्नयः । पतिष्यन्ति द्विषो भूमौ मेघा इव सविद्युतः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘मेरी तलवारकी धारसे कटकर रक्तसे लथपथ हुए शत्रु जलती हुई आगके समान जान पड़ेंगे और बिजलीसहित मेघोंके समान आज पृथ्वीपर गिरेंगे ॥ ३४ ॥
बद्धगोधाङ्गुलित्राणे प्रगृहीतशरासने । कथं पुरुषमानी स्यात् पुरुषाणां मयि स्थिते ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘अपने हाथोंमें गोहके चर्मसे बने हुए दस्तानेको बाँधकर जब हाथमें धनुष ले मैं युद्धके लिये खड़ा हो जाऊँगा, उस समय पुरुषोंमेंसे कोई भी मेरे सामने कैसे अपने पौरुषपर अभिमान कर सकेगा ? ॥ ३५ ॥
बहुभिश्चैकमत्यस्यन्नेकेन च बहूञ्जनान् । विनियोक्ष्याम्यहं बाणान्नृवाजिगजमर्मसु ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘मैं बहुत-से बाणोंद्वारा एकको और एक ही बाणसे बहुत-से योद्धाओंको धराशायी करता हुआ मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके मर्मस्थानोंपर बाण मारूँगा ॥ ३६ ॥
अद्य मेऽस्त्रप्रभावस्य प्रभावः प्रभविष्यति । राज्ञश्चाप्रभुतां कर्तुं प्रभुत्वं च तव प्रभो ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! आज राजा दशरथकी प्रभुताको मिटाने और आपके प्रभुत्वकी स्थापना करनेके लिये अस्त्रबलसे सम्पन्न मुझ लक्ष्मणका प्रभाव प्रकट होगा ॥ ३७ ॥
अद्य चन्दनसारस्य केयूरामोक्षणस्य च । वसूनां च विमोक्षस्य सुहृदां पालनस्य च ॥ ३८ ॥ अनुरूपाविमौ बाहू राम कर्म करिष्यतः । अभिषेचनविघ्नस्य कर्तॄणां ते निवारणे ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! आज मेरी ये दोनों भुजाएँ, जो चन्दनका लेप लगाने, बाजूबंद पहनने, धनका दान करने और सुहृदोंके पालनमें संलग्न रहनेके योग्य हैं, आपके राज्याभिषेकमें विघ्न डालनेवालोंको रोकनेके लिये अपने अनुरूप पराक्रम प्रकट करेंगी ॥ ३८-३९ ॥
ब्रवीहि कोऽद्यैव मया वियुज्यतां तवासुहृत् प्राणयशःसुहृज्जनैः । यथा तवेयं वसुधा वशा भवेत् तथैव मां शाधि तवास्मि किङ्करः ॥४०॥
भावार्थ
‘प्रभो ! बतलाइये, मैं आपके किस शत्रुको अभी प्राण, यश और सुहृज्जनोंसे सदाके लिये बिलग कर दूँ। जिस उपायसे भी यह पृथ्वी आपके अधिकारमें आ जाय, उसके लिये मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपका दास हूँ’ ॥४०॥
विमृज्य बाष्पं परिसान्त्व्य चासकृत् स लक्ष्मणं राघववंशवर्धनः। उवाच पित्रोर्वचने व्यवस्थितं निबोध मामेष हि सौम्य सत्पथः॥ ४१ ॥
भावार्थ
रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले श्रीरामने लक्ष्मणकी ये बातें सुनकर उनके आँसू पोंछे और उन्हें बारंबार सान्त्वना देते हुए कहा—‘सौम्य ! मुझे तो तुम माता-पिताकी आज्ञाके पालनमें ही दृढ़तापूर्वक स्थित समझो । यही सत्पुरुषोंका मार्ग है’ ॥ ४१ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें