अयोध्याकाण्ड, सर्ग 102
रामस्य वचनं श्रुत्वा भरतः प्रत्युवाच ह । किं मे धर्मोद् विहीनस्य राजधर्मः करिष्यति ॥ १ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजीकी बात सुनकर भरतने इस प्रकार उत्तर दिया—‘भैया ! मैं राज्यका अधिकारी न होनेके कारण उस राजधर्मके अधिकारसे रहित हूँ, अतः मेरे लिये यह राजधर्मका उपदेश किस काम आयगा ? ॥ १ ॥
शाश्वतोऽयं सदा धर्मः स्थितोऽस्मासु नरर्षभ । ज्येष्ठे पुत्रे स्थिते राजा न कनीयान् भवेन्नृपः ॥ २ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! हमारे यहाँ सदासे ही इस शाश्वत धर्मका पालन होता आया है कि ज्येष्ठ पुत्रके रहते हुए छोटा पुत्र राजा नहीं हो सकता ॥ २ ॥
स समृद्धां मया सार्धमयोध्यां गच्छ राघव । अभिषेचय चात्मानं कुलस्यास्य भवाय नः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘अतः रघुनन्दन ! आप मेरे साथ समृद्धिशालिनी अयोध्यापुरीको चलिये और हमारे कुलके अभ्युदयके लिये राजाके पदपर अपना अभिषेक कराइये ॥ ३ ॥
राजानं मानुषं प्राहुर्देवत्वे सम्मतो मम । यस्य धर्मार्थसहितं वृत्तमाहुरमानुषम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘यद्यपि सब लोग राजाको मनुष्य कहते हैं, तथापि मेरी रायमें वह देवत्वपर प्रतिष्ठित है; क्योंकि उसके धर्म और अर्थयुक्त आचारको साधारण मनुष्यके लिये असम्भावित बताया गया है ॥ ४ ॥
केकयस्थे च मयि तु त्वयि चारण्यमाश्रिते । धीमान् स्वर्गं गतो राजा यायजूकः सतां मतः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘जब मैं केकयदेशमें था और आप वनमें चले आये थे, तब अश्वमेध आदि यज्ञोंके कर्ता और सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित बुद्धिमान् महाराज दशरथ स्वर्गलोकको चले गये ॥ ५ ॥
निष्क्रान्तमात्रे भवति सहसीते सलक्ष्मणे । दुःखशोकाभिभूतस्तु राजा त्रिदिवमभ्यगात् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘सीता और लक्ष्मणके साथ आपके राज्यसे निकलते ही दुःख-शोकसे पीड़ित हुए महाराज स्वर्गलोकको चल दिये ॥ ६ ॥
उत्तिष्ठ पुरुषव्याघ्र क्रियतामुदकं पितुः । अहं चायं च शत्रुघ्नः पूर्वमेव कृतोदकौ ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! उठिये और पिताको जलाञ्जलि दान कीजिये । मैं और यह शत्रुघ्न—दोनों पहले ही उनके लिये जलाञ्जलि दे चुके हैं ॥ ७ ॥
प्रियेण किल दत्तं हि पितृलोकेषु राघव । अक्षयं भवतीत्याहुर्भवांश्चैव पितुः प्रियः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! कहते हैं, प्रिय पुत्रका दिया हुआ जल आदि पितृलोकमें अक्षय होता है और आप पिताके परम प्रिय पुत्र हैं ॥ ८ ॥
त्वामेव शोचंस्तव दर्शनेप्सु- स्त्वय्येव सक्तामनिवर्त्यं बुद्धिम् । त्वया विहीनस्तव शोकरुग्ण- स्त्वां संस्मरन्नेव गतः पिता ते ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘आपके पिता आपसे विलग होते ही शोकके कारण रुग्ण हो गये और आपके ही शोकमें मग्न हो, आपको ही देखनेकी इच्छा रखकर, आपमें ही लगी हुई बुद्धिको आपकी ओरसे न हटाकर, आपका ही स्मरण करते हुए स्वर्गको चले गये’ ॥ ९ ॥
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