अयोध्याकाण्ड, सर्ग 101
तं तु रामः समाज्ञाय भ्रातरं गुरुवत्सलम्। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥ १ ॥
भावार्थ
लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीने अपने गुरुभक्त भाई भरतको अच्छी तरह समझाकर अथवा उन्हें अपनेमें अनुरक्त जानकर उनसे इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—॥ १ ॥
किमेतदिच्छेयमहं श्रोतुं प्रब्याहृतं त्वया। यस्मात् त्वमागतो देशमिमं चीरजटाजिनी ॥ २ ॥ यन्निमित्तमिमं देशं कृष्णाजिनजटाधरः। हित्वा राज्यं प्रविष्टस्त्वं तत् सर्वं वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘भाई ! तुम राज्य छोड़कर वल्कल, कृष्णमृगचर्म और जटा धारण करके जो इस देशमें आये हो, इसका क्या कारण है ? जिस निमित्तसे इस वनमें तुम्हारा प्रवेश हुआ है, यह मैं तुम्हारे मुँहसे सुनना चाहता हूँ। तुम्हें सब कुछ साफ-साफ बताना चाहिये’ ॥ २–३ ॥
इत्युक्तः केकयीपुत्रः काकुत्स्थेन महात्मना। प्रगृह्य बलवद् भूयः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ४ ॥
भावार्थ
ककुत्स्थवंशी महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछनेपर भरतने बलपूर्वक आन्तरिक शोकको दबा पुनः हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा —॥ ४ ॥
आर्य तातः परित्यज्य कृत्वा कर्म सुदुष्करम्। गतः स्वर्गं महाबाहुः पुत्रशोकाभिपीडितः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘आर्य ! हमारे महाबाहु पिता अत्यन्त दुष्कर कर्म करके पुत्रशोकसे पीड़ित हो हमें छोड़कर स्वर्गलोकको चले गये ॥ ५ ॥
स्त्रिया नियुक्तः कैकेय्या मम मात्रा परंतप। चकार सा महत्पापमिदमात्मयशोहरम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनन्दन ! अपनी स्त्री एवं मेरी माता कैकेयीकी प्रेरणासे ही विवश हो पिताजीने ऐसा कठोर कार्य किया था। मेरी माँने अपने सुयशको नष्ट करनेवाला यह बड़ा भारी पाप किया है ॥ ६ ॥
सा राज्यफलमप्राप्य विधवा शोककर्शिता। पतिष्यति महाघोरे नरके जननी मम ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘अतः वह राज्यरूपी फल न पाकर विधवा हो गयी। अब मेरी माता शोकसे दुर्बल हो महाघोर नरकमें पड़ेगी ॥ ७ ॥
तस्य मे दासभूतस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि। अभिषिञ्चस्व चाद्यैव राज्येन मघवानिव ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘अब आप अपने दासस्वरूप मुझ भरतपर कृपा कीजिये और इन्द्रकी भाँति आज ही राज्य ग्रहण करनेके लिये अपना अभिषेक कराइये ॥ ८ ॥
इमाः प्रकृतयः सर्वा विधवा मातरश्च याः। त्वत्सकाशमनुप्राप्ताः प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘ये सारी प्रकृतियाँ ( प्रजा आदि ) और सभी विधवा माताएँ आपके पास आयी हैं। आप इन सबपर कृपा करें ॥ ९ ॥
तथानुपूर्व्या युक्तश्च युक्तं चात्मनि मानद । राज्यं प्राप्नुहि धर्मेण सकामान् सुहृदः कुरु ॥ १० ॥
भावार्थ
‘दूसरोंको मान देनेवाले रघुवीर ! आप ज्येष्ठ होनेके नाते राज्य-प्राप्तिके क्रमिक अधिकारसे युक्त हैं, न्यायतः आपको ही राज्य मिलना उचित है; अतः आप धर्मानुसार राज्य ग्रहण करें और अपने सुहृदोंको सफलमनोरथ बनावें ॥ १० ॥
भवत्वविधवा भूमिः समग्रा पतिना त्वया । शशिना विमलेनेव शारदी रजनी यथा ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘आप-जैसे पतिसे युक्त हो यह सारी वसुधा वैधव्यरहित हो जाय और निर्मल चन्द्रमासे सनाथ हुई शरत्कालकी रात्रिके समान शोभा पाने लगे ॥ ११ ॥
एभिश्च सचिवैः सार्धं शिरसा याचितो मया । भ्रातुः शिष्यस्य दासस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘मैं इन समस्त सचिवोंके साथ आपके चरणोंमें मस्तक रखकर यह याचना करता हूँ कि आप राज्य ग्रहण करें। मैं आपका भाई, शिष्य और दास हूँ । आप मुझपर कृपा करें ॥ १२ ॥
तदिदं शाश्वतं पित्र्यं सर्वं सचिवमण्डलम् । पूजितं पुरुषव्याघ्र नातिक्रमितुमर्हसि ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! यह सारा मन्त्रिमण्डल अपने यहाँ कुलपरम्परासे चला आ रहा है । ये सभी सचिव पिताजीके समयमें भी थे । हम सदासे इनका सम्मान करते आये हैं, अतः आप इनकी प्रार्थना न ठुकरायें’ ॥ १३ ॥
एवमुक्त्वा महाबाहुः सबाष्पः कैकयीसुतः । रामस्य शिरसा पादौ जग्राह भरतः पुनः ॥ १४ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर कैकेयीपुत्र महाबाहु भरतने नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए पुनः श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंसे माथा टेक दिया ॥ १४ ॥
तं मत्तमिव मातङ्गं निःश्वसन्तं पुनः पुनः । भ्रातरं भरतं रामः परिष्वज्येदमब्रवीत् ॥ १५ ॥
भावार्थ
उस समय वे मतवाले हाथीके समान बारंबार लंबी साँस खींचने लगे, तब श्रीरामने भाई भरतको उठाकर हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा--॥ १५ ॥
कुलीनः सत्त्वसम्पन्नस्तेजस्वी चरितव्रतः । राज्यहेतोः कथं पापमाचरेन्मद्विधो जनः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘भाई ! तुम्हीं बताओ । उत्तम कुलमें उत्पन्न, सत्त्वगुणसम्पन्न, तेजस्वी और श्रेष्ठ व्रतोंका पालन करनेवाला मेरे-जैसा मनुष्य राज्यके लिये पिताकी आज्ञाका उल्लङ्घनरूप पाप कैसे कर सकता है ? ॥ १६ ॥
न दोषं त्वयि पश्यामि सूक्ष्ममप्यरिसूदन । न चापि जननीं बाल्यात् त्वं विगर्हितुमर्हसि ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘शत्रुसूदन ! मैं तुम्हारे अंदर थोड़ा-सा भी दोष नहीं देखता । अज्ञानवश तुम्हें अपनी माताकी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये ॥ १७ ॥
कामकारो महाप्राज्ञ गुरूणां सर्वदानघ । उपपन्नेषु दारेषु पुत्रेषु च विधीयते ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘निष्पाप महाप्राज्ञ ! गुरुजनोंका अपनी अभीष्ट स्त्रियों और प्रिय पुत्रोंपर सदा पूर्ण अधिकार होता है । वे उन्हें चाहे जैसी आज्ञा दे सकते हैं ॥ १८ ॥
वयमस्य यथा लोके संख्याताः सौम्य साधुभिः । भार्याः पुत्राश्च शिष्याश्च त्वमपि ज्ञातुमर्हसि ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! माताओंसहित हम भी इस लोकमें श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा महाराजके स्त्री-पुत्र और शिष्य कहे गये हैं, अतः हमें भी उनको सब तरहकी आज्ञा देनेका अधिकार था । इस बातको तुम भी समझने योग्य हो ॥ १९ ॥
वने वा चीरवसनं सौम्य कृष्णाजिनाम्बरम् । राज्ये वापि महाराजो मां वासयितुमीश्वरः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! महाराज मुझे वल्कल वस्त्र और मृगचर्म धारण कराकर वनमें ठहरावें अथवा राज्यपर बिठावें—इन दोनों बातोंके लिये वे सर्वथा समर्थ थे ॥ २० ॥
यावत् पितरि धर्मज्ञ गौरवं लोकसत्कृते । तावद् धर्मकृतां श्रेष्ठ जनन्यामपि गौरवम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘धर्मज्ञ ! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भरत ! मनुष्यकी विश्व-वन्द्य पितामें जितनी गौरव-बुद्धि होती है, उतनी ही मातामें भी होनी चाहिये ॥ २१ ॥
एताभ्यां धर्मशीलाभ्यां वनं गच्छेति राघव । मातापितृभ्यामुक्तोऽहं कथमन्यत् समाचरे ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! इन धर्मशील माता और पिता दोनोंने जब मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दे दी है, तब मैं उनकी आज्ञाके विपरीत दूसरा कोई बर्ताव कैसे कर सकता हूँ?॥२२॥
त्वया राज्यमयोध्यायां प्राप्तव्यं लोकसत्कृतम् । वस्तव्यं दण्डकारण्ये मया वल्कलवाससा ॥ २३ ॥ एवमुक्त्वा महाराजो विभागं लोकसंनिधौ । व्यादिश्य च महाराजो दिवं दशरथो गतः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘तुम्हें अयोध्यामें रहकर समस्त जगत्के लिये आदरणीय राज्य प्राप्त करना चाहिये और मुझे वल्कल वस्त्र धारण करके दण्डकारण्यमें रहना चाहिये ॥ ‘क्योंकि महाराज दशरथ बहुत लोगोंके सामने हम दोनोंके लिये इस प्रकार पृथक्-पृथक् दो आज्ञाएँ देकर स्वर्गको सिधारे हैं ॥ २४ ॥
स च प्रमाणं धर्मात्मा राजा लोकगुरुस्तव । पित्रा दत्तं यथाभागमुपभोक्तुं त्वमर्हसि ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘इस विषयमें लोकगुरु धर्मात्मा राजा ही तुम्हारे लिये प्रमाणभूत हैं—उन्हींकी आज्ञा तुम्हें माननी चाहिये और पिताने तुम्हारे हिस्सेमें जो कुछ दिया है, उसीका तुम्हें यथावत् रूपसे उपभोग करना चाहिये ॥ २५ ॥
चतुर्दश समाः सौम्य दण्डकारण्यमाश्रितः । उपभोक्ष्ये त्वहं दत्तं भागं पित्रा महात्मना ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! चौदह वर्षोंतक दण्डकारण्यमें रहनेके बाद ही महात्मा पिताके दिये हुए राज्य-भागका मैं उपभोग करूँगा ॥ २६ ॥
यदब्रवीन्मां नरलोकसत्कृतः पिता महात्मा विबुधाधिपोपमः । तदेव मन्ये परमात्मनो हितं न सर्वलोकेश्वरभावमव्ययम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘मनुष्यलोकमें सम्मानित और देवराज इन्द्रके तुल्य तेजस्वी मेरे महात्मा पिताने मुझे जो वनवासकी आज्ञा दी है, उसीको मैं अपने लिये परम हितकारी समझता हूँ। उनकी आज्ञाके विरुद्ध सर्वलोकेश्वर ब्रह्माका अविनाशी पद भी मेरे लिये श्रेयस्कर नहीं है’ ॥ २७ ॥
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