अयोध्याकाण्ड, सर्ग 103
तां श्रुत्वा करुणां वाचं पितुर्मरणसंहिताम् । राघवो भरतेनोक्तां बभूव गतचेतनः ॥ १ ॥
भावार्थ
भरतकी कही हुई पिताकी मृत्युसे सम्बन्ध रखनेवाली करुणाजनक बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी दुःखके कारण अचेत हो गये ॥ १ ॥
तं तु वज्रमिवोत्सृष्टमाहवे दानवारिणा । वाग्वज्रं भरतेनोक्तममनोज्ञं परंतपः ॥ २ ॥ प्रगृह्य रामो बाहू वै पुष्पिताग्र इव द्रुमः । वने परशुना कृत्तस्तथा भुवि पपात ह ॥ ३ ॥ तथा हि पतितं रामं जगत्यां जगतीपतिम् । कूलघातपरिश्रान्तं प्रसुप्तमिव कुञ्जरम् ॥ ४ ॥ भ्रातरस्ते महेष्वासं सर्वतः शोककर्शितम् । रुदन्तः सह वैदेह्या सिषिचुः सलिलेन वै ॥ ५ ॥
भावार्थ
भरतके मुखसे निकला हुआ वह वचन वज्र-सा लगा, मानो दानवशत्रु इन्द्रने युद्धस्थलमें वज्रका प्रहार-सा कर दिया हो। मनको प्रिय न लगनेवाले उस वाग्-वज्रको सुनकर शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम दोनों भुजाओंको ऊपर उठाकर जिसकी डालियाँ खिली हुई हों, वनमें कुल्हाड़ीसे कटे हुए उस वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े ( भरतके दर्शनसे श्रीरामको हर्ष हुआ था, पिताकी मृत्युके संवादसे दुःख; अतः उन्हें खिले और कटे हुए पेड़की उपमा दी गयी है )॥ पृथ्वीपति श्रीराम इस प्रकार पृथ्वीपर गिरकर नदीके तटको दाँतोंसे विदीर्ण करनेके परिश्रमसे थककर सोये हुए हाथीके समान प्रतीत होते थे । शोकके कारण दुर्बल हुए उन महाधनुर्धर श्रीरामको सब ओरसे घेरकर सीतासहित रोते हुए वे तीनों भाई आँसुओंके जलसे भिगोने लगे ॥ ४-५ ॥
स तु संज्ञां पुनर्लब्ध्वा नेत्राभ्यामश्रुमुत्सृजन् । उपाक्रामत काकुत्स्थः कृपणं बहु भाषितुम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
थोड़ी देर बाद पुनः होशमें आनेपर नेत्रोंसे अश्रुवर्षा करते हुए ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने अत्यन्त दीन वाणीमें विलाप आरम्भ किया ॥ ६ ॥
स रामः स्वर्गतं श्रुत्वा पितरं पृथिवीपतिम् । उवाच भरतं वाक्यं धर्मात्मा धर्मसंहितम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
पृथ्वीपति महाराज दशरथको स्वर्गगामी हुआ सुनकर धर्मात्मा श्रीरामने भरतसे यह धर्मयुक्त बात कही—॥ ७ ॥
किं करिष्याम्ययोध्यायां तāते दिष्टां गतिं गते । कस्तां राजवराद्धीनामयोध्यां पालयिष्यति ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘भैया ! जब पिताजी परलोकवासी हो गये, तब अयोध्यामें चलकर अब मैं क्या करूँगा ? उन राजशिरोमणि पितासे हीन हुई उस अयोध्याका अब कौन पालन करेगा ?॥ ८ ॥
किं नु तस्य मया कार्यं दुर्जातेन महात्मनः । यो मृतो मम शोकेन समया न च संस्कृतः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘हाय ! जो पिताजी मेरे ही शोकसे मृत्युको प्राप्त हुए, उन्हींका मैं दाहसंस्कारतक न कर सका। मुझ-जैसे व्यर्थ जन्म लेनेवाले पुत्रसे उन महात्मा पिताका कौन-सा कार्य सिद्ध हुआ ?॥ ९ ॥
अहो भरत सिद्धार्थो येन राजा त्वयानघ । शत्रुघ्नेन च सर्वेषु प्रेतकृत्येषु सत्कृतः ॥ १० ॥ निष्प्रधानामनेकाग्रां नरेन्द्रेण विना कृताम् । निवृत्तवनवासोऽपि नायोध्यां गन्तुमुत्सहे ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘निष्पाप भरत ! तुम्हीं कृतार्थ हो, तुम्हारा अहोभाग्य है, जिससे तुमने और शत्रुघ्नने सभी प्रेतकार्योंं ( पारलौकिक कृत्यों ) में संस्कार-कर्मके द्वारा महाराजका पूजन किया है ॥ ‘महाराज दशरथसे हीन हुई अयोध्या अब प्रधान शासकसे रहित हो अस्वस्थ एवं आकुल हो उठी है; अतः वनवाससे लौटनेपर भी मेरे मनमें अयोध्या जानेका उत्साह नहीं रह गया है ॥ ११ ॥
समाप्तवनवासं मामयोध्यायां परंतप । कोऽनुशासिष्यति पुनस्ताते लोकान्तरं गते ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘परंतप भरत ! वनवासकी अवधि समाप्त करके यदि मैं अयोध्यामें जाऊँ तो फिर कौन मुझे कर्तव्यका उपदेश देगा; क्योंकि पिताजी तो परलोकवासी हो गये ॥ १२ ॥
पुरा प्रेक्ष्य सुवृत्तं मां पिता यान्याह सान्त्वयन् । वाक्यानि तानि श्रोष्यामि कुतः कर्ण सुखान्यहम् ॥ १३॥
भावार्थ
‘पहले जब मैं उनकी किसी आज्ञाका पालन करता था, तब वे मेरे सद्व्यवहारको देखकर मेरा उत्साह बढ़ानेके लिये जो-जो बातें कहा करते थे, कानोंको सुख पहुँचानेवाली उन बातोंको अब मैं किसके मुखसे सुनूँगा’॥ १३ ॥
एवमुक्त्वाथ भरतं भार्यामभ्येत्य राघवः । उवाच शोकसंतप्तः पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
भरतसे ऐसा कहकर शोकसंतप्त श्रीरामचन्द्रजी पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली अपनी पत्नीके पास आकर बोले—॥ १४ ॥
सीते मृतस्ते श्वशुरः पितृहीनोऽसि लक्ष्मण । भरतो दुःखमाचष्टे स्वर्गतिं पृथिवीपतेः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘सीते ! तुम्हारे श्वशुर चल बसे । लक्ष्मण ! तुम पितृहीन हो गये । भरत पृथ्वीपति महाराज दशरथके स्वर्गवासका दुःखदायी समाचार सुना रहे हैं’॥ १५ ॥
ततो बहुगुणं तेषां वाष्पं नेत्रेष्वजायत । तथा ब्रुवति काकुत्स्थे कुमाराणां यशस्विनाम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर उन सभी यशस्वी कुमारोंके नेत्रोंमें बहुत अधिक आँसू उमड़ आये ॥ १६ ॥
ततस्ते भ्रातरः सर्वे भृशमाश्वास्य दुःखितम् । अब्रुवञ्जगतीभर्तुः क्रियतामुदकं पितुः ॥ १७ ॥
भावार्थ
तदनन्तर सभी भाइयोंने दुखी हुए श्रीरामचन्द्रजीको सान्त्वना देते हुए कहा—‘भैया ! अब पृथ्वीपति पिताजीके लिये जलाञ्जलि दान कीजिये’॥ १७ ॥
सा सीता स्वर्गतं श्रुत्वा श्वशुरं तं महानृपम् । नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां न शशाकेक्षितुं प्रियम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
अपने श्वशुर महाराज दशरथके स्वर्गवासका समाचार सुनकर सीताके नेत्रोंमें आँसू भर आये । वे अपने प्रियतम श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख न सकीं ॥ १८ ॥
सान्त्वयित्वा तु तां रामो रुदतीं जनकात्मजाम् । उवाच लक्ष्मणं तत्र दुःखितो दुःखितं वचः ॥ १९ ॥ आनयेङ्गुदिपिण्याकं चीरमाहर चोत्तरम् । जलक्रियार्थं तातस्य गमिष्यामि महात्मनः ॥ २० ॥
भावार्थ
तदनन्तर रोती हुई जनककुमारीको सान्त्वना देकर दुःखमग्न श्रीरामने अत्यन्त दुखी हुए लक्ष्मणसे कहा—॥ ‘भाई ! तुम इङ्गुदीका पिसा हुआ फल और चीर एवं उत्तरीय ले आओ । मैं महात्मा पिताको जलदान देनेके लिये चलूँगा ॥ २० ॥
सीता पुरस्ताद् व्रजतु त्वमेनामभितो व्रज । अहं पश्चाद् गमिष्यामि गतिर्ह्येषा सुदारुणा ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘सीता आगे-आगे चलें । इनके पीछे तुम चलो और तुम्हारे पीछे मैं चलूँगा । शोकके समयकी यही परिपाटी है, जो अत्यन्त दारुण होती है’ ॥ २१ ॥
ततो नित्यानुगस्तेषां विदितात्मा महामतिः । मृदुर्दान्तश्च कान्तश्च रामे च दृढभक्तिमान् ॥ २२ ॥ सुमन्त्रस्तैर्नृपसुतैः सार्धमाश्वास्य राघवम् । अवतारयदालम्ब्य नदीं मन्दाकिनीं शिवाम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् उनके कुलके परम्परागत सेवक, आत्मज्ञानी, परम बुद्धिमान्, कोमल स्वभाववाले, जितेन्द्रिय, तेजस्वी और श्रीरामके सुदृढ़ भक्त सुमन्त्र समस्त राजकुमारोंके साथ श्रीरामको धैर्य बँधाकर उन्हें हाथका सहारा दे कल्याणमयी मन्दाकिनीके तटपर ले गये ॥ २२-२३ ॥
ते सुतीर्थां ततः कृच्छ्रादुपगम्य यशस्विनः । नदीं मन्दाकिनीं रम्यां सदा पुष्पितकाननाम् ॥ २४ ॥ शीघ्रस्रोतसमासाद्य तीर्थं शिवमकर्दमम् । सिषिचुस्तूदकं राज्ञे तत एतद् भवत्विति ॥ २५ ॥
भावार्थ
वे यशस्वी राजकुमार सदा पुष्पित काननसे सुशोभित, शीघ्र गतिसे प्रवाहित होनेवाली और उत्तम घाटवाली रमणीय नदी मन्दाकिनीके तटपर कठिनाईसे पहुँचे तथा उसके पङ्क-रहित, कल्याणप्रद, तीर्थभूत जलको लेकर उन्होंने राजाके लिये जल दिया । उस समय वे बोले—‘पिताजी ! यह जल आपकी सेवामें उपस्थित हो’ ॥ २४-२५ ॥
प्रगृह्य तु महीपालो जलापूरितमञ्जलिम् । दिशं याम्यामभिमुखो रुदन् वचनमब्रवीत् ॥ २६ ॥ पतत् ते राजशार्दूल विमलं तोयमक्षयम् । पितृलोकगतस्याद्य मद्दत्तमुपतिष्ठतु ॥ २७ ॥ ततो मन्दाकिनीतीरं प्रत्युत्तीर्य स राघवः । पितुश्चकार तेजस्वी निर्वापं भ्रातृभिः सह ॥ २८ ॥
भावार्थ
पृथ्वीपालक श्रीरामने जलसे भरी हुई अञ्जलि ले दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके रोते हुए इस प्रकार कहा—‘मेरे पूज्य पिता राजशिरोमणि महाराज दशरथ ! आज मेरा दिया हुआ यह निर्मल जल पितृलोकमें गये हुए आपको अक्षयरूपसे प्राप्त हो’॥ इसके बाद मन्दाकिनीके जलसे निकलकर किनारेपर आकर तेजस्वी श्रीरघुनाथजीने अपने भाइयोंके साथ मिलकर पिताके लिये पिण्डदान किया ॥ २८ ॥
ऐङ्गुदं बदरैर्मिश्रं पिण्याकं दर्भसंस्तरे ॥ । न्यस्य रामः सुदुःखार्तो रुदन् वचनमब्रवीत् ॥ २९ ॥
भावार्थ
उन्होंने इङ्गुदीके गूदेमें बेर मिलाकर उसका पिण्ड तैयार किया और बिछे हुए कुशोंपर उसे रखकर अत्यन्त दुःखसे आर्त हो रोते हुए यह बात कही—॥ २९ ॥
इदं भुङ्क्ष्व महाराज प्रीतो यदशना वयम् । यदन्नः पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवताः ॥ ३० ॥ ततस्तेनैव मार्गेण प्रत्युत्तीर्य सरित्तटात् । आरुरोह नरव्याघ्रो रम्यसानुं महीधरम् ॥ ३१ ॥ ततः पर्णकुटीद्वारमासाद्य जगतीपतिः । परिजग्राह पाणिभ्यामुभौ भरतलक्ष्मणौ ॥ ३२ ॥ तेषां तु रुदतां शब्दात् प्रतिशब्दोऽभवद् गिरौ । भ्रातॄणां सह वैदेह्या सिंहानां नर्दतामिव ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘महाराज ! प्रसन्नतापूर्वक यह भोजन स्वीकार कीजिये; क्योंकि आजकल यही हमलोगोंका आहार है । मनुष्य स्वयं जो अन्न खाता है, वही उसके देवता भी ग्रहण करते हैं’ ॥ इसके बाद उसी मार्गसे मन्दाकिनीतटके ऊपर आकर पृथ्वीपालक पुरुषसिंह श्रीराम सुन्दर शिखरवाले चित्रकूट पर्वतपर चढ़े और पर्णकुटीके द्वारपर आकर भरत और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको दोनों हाथोंसे पकड़कर रोने लगे ॥ सीतासहित रोते हुए उन चारों भाइयोंके रुदन-शब्दसे उस पर्वतपर गरजते हुए सिंहोंके दहाड़नेके समान प्रतिध्वनि होने लगी ॥ ३३ ॥
महाबलानां रुदतां कुर्वतामुदकं पितुः । विज्ञाय तुमुलं शब्दं त्रस्ता भरतसैनिकाः ॥ ३४ ॥ अब्रुवंश्चापि रामेण भरतः संगतो ध्रुवम् । तेषामेव महाञ्शब्दः शोचतां पितरं मृतम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
पिताको जलाञ्जलि देकर रोते हुए उन महाबली भाइयोंके रोदनका तुमुल नाद सुनकर भरतके सैनिक किसी भयकी आशङ्कासे डर गये । फिर उसे पहचानकर वे एक-दूसरेसे बोले–‘निश्चय ही भरत श्रीरामचन्द्रजीसे मिले हैं । अपने परलोकवासी पिताके लिये शोक करनेवाले उन चारों भाइयोंके रोनेका ही यह महान् शब्द है’ ॥ ३४-३५ ॥
अथ वाहान् परित्यज्य तं सर्वेऽभिमुखाः स्वनम् । अप्येकमनसो जग्मुर्यथास्थानं प्रधाविताः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
यों कहकर उन सबने अपनी सवारियोंको तो वहीं छोड़ दिया और जिस स्थानसे वह आवाज आ रही थी, उसी ओर मुँह किये एकचित्त होकर वे दौड़ पड़े ॥ ३६ ॥
हयैरन्ये गजैरन्ये रथैरन्ये स्वलंकृतैः । सुकुमारास्तथैवान्ये पद्भिरेव नरा ययुः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
उनसे भिन्न जो सुकुमार मनुष्य थे, उनमेंसे कुछ लोग घोड़ोंसे, कुछ हाथियोंसे और कुछ सजे-सजाये रथोंसे ही आगे बढ़े । कितने ही मनुष्य पैदल ही चल दिये ॥ ३७ ॥
अचिरप्रोषितं रामं चिरविप्रोषितं यथा । द्रष्टुकामो जनः सर्वो जगाम सहसाश्रमम् ॥ ३८ ॥
भावार्थ
यद्यपि श्रीरामचन्द्रजीको परदेशमें आये अभी थोड़े ही दिन हुए थे, तथापि लोगोंको ऐसा जान पड़ता था कि मानो वे दीर्घकालसे परदेशमें रह रहे हैं; अतः सब लोग उनके दर्शनकी इच्छासे सहसा आश्रमकी ओर चल दिये ॥ ३८ ॥
भ्रातॄणां त्वरितास्ते तु द्रष्टुकामाः समागमम् । ययुर्बहुविधैर्यानैः खुरनेमिसमाकुलैः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
वे लोग चारों भाइयोंका मिलन देखनेकी इच्छासे खुरों एवं पहियोंसे युक्त नाना प्रकारकी सवारियोंद्वारा बड़ी उतावलीके साथ चले ॥ ३९ ॥
सा भूमिर्बहुभिर्यानै रथनेमिसमाहता । मुमोच तुमुलं शब्दं द्यौरिवाभ्रसमागमे ॥ ४० ॥
भावार्थ
अनेक प्रकारकी सवारियों तथा रथकी पहियोंसे आक्रान्त हुई वह भूमि भयंकर शब्द करने लगी; ठीक उसी तरह जैसे मेघोंकी घटा घिर आनेपर आकाशमें गड़गड़ाहट होने लगती है ॥ ४० ॥
तेन वित्रासिता नागाः करेणुपरिवारिताः । आवासयन्तो गन्धेन जग्मुरन्यद्वनं ततः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
उस तुमुलनादसे भयभीत हुए हाथी हथिनियोंसे घिरकर मदकी गन्धसे उस स्थानको सुवासित करते हुए वहाँसे दूसरे वनमें भाग गये ॥ ४१ ॥
वराहवृकसिंहाश्च महिषाः सृमरास्तथा । व्याघ्रगोकर्णगवया वित्रेसुः पृषतैः सह ॥ ४२ ॥
भावार्थ
वराह, भेड़िये, सिंह, भैंसे, स्मर ( मृगविशेष ), व्याघ्र, गोकर्ण ( मृगविशेष ) और गवय ( नीलगाय ), चितकबरे हरिणोंसहित संत्रस्त हो उठे ॥ ४२ ॥
रथाह्वहंसानत्यूहाः प्लवाः कारण्डवाः परे । तथा पुंस्कोकिलाः क्रौञ्चा विसंज्ञा भेजिरे दिशः ॥ ४३ ॥
भावार्थ
चकवाक, हंस, जलकुक्कुट, वक, कारण्डव, नरकोकिल और क्रौञ्च पक्षी होश-हवाश खोकर विभिन्न दिशाओंमें उड़ गये ॥ ४३ ॥
तेन शब्देन वित्रस्तैराकाशं पक्षिभिर्वृतम् । मनुष्यैरावृता भूमिरुभयं प्रबभौ तदा ॥ ४४ ॥
भावार्थ
उस शब्दसे डरे हुए पक्षी आकाशमें छा गये और नीचेकी भूमि मनुष्योंसे भर गयी । इस प्रकार उन दोनोंकी समानरूपसे शोभा होने लगी ॥ ४४ ॥
ततस्तं पुरुषव्याघ्रं यशस्विनमकल्मषम् । आसीनं स्थण्डिले रामं ददर्श सहसा जनः ॥ ४५ ॥
भावार्थ
लोगोंने सहसा पहुँचकर देखा—यशस्वी, पापरहित, पुरुषसिंह श्रीराम वेदीपर बैठे हैं ॥ ४५ ॥
विगर्हमाणः कैकेयीं मन्थरासहितामपि । अभिगम्य जनो रामं बाष्पपूर्णमुखोऽभवत् ॥ ४६ ॥ तान् नरान् बाष्पपूर्णाक्षान् समीक्ष्याथ सुदुःखितान् । पर्यष्वजत धर्मज्ञः पितृवन्मातृवच्च सः ॥ ४७ ॥
भावार्थ
श्रीरामके पास जानेपर सबके मुख आँसुओंसे भीग गये और सब लोग मन्थरासहित कैकेयीकी निन्दा करने लगे ॥ उन सब लोगोंके नेत्र आँसुओंसे भरे हुए थे और वे सब-के-सब अत्यन्त दुखी हो रहे थे । धर्मज्ञ श्रीरामने उन्हें देखकर पिता-माताकी भाँति हृदयसे लगाया ॥ ४७ ॥
स तत्र कांश्चित् परिषस्वजे नरान् नराश्च केचित्तु तमभ्यवादयन् । चकार सर्वान् सवयस्यबान्धवान् यथार्हमासाद्य तदा नृपात्मजः ॥ ४८ ॥
भावार्थ
श्रीरामने कुछ मनुष्योंको वहाँ छातीसे लगाया तथा कुछ लोगोंने पहुँचकर वहाँ उनके चरणोंमें प्रणाम किया । राजकुमार श्रीरामने उस समय वहाँ आये हुए सभी मित्रों और बन्धु-बान्धवोंका यथायोग्य सम्मान किया ॥ ४८ ॥
ततः स तेषां रुदतां महात्मनां भुवं च खं चानुविनादयन् स्वनः । गुहा गिरीणां च दिशश्च संततं मृदङ्गघोषप्रतिमो विशुश्रुवे ॥ ४९ ॥
भावार्थ
उस समय वहाँ रोते हुए उन महात्माओंका वह रोदन-शब्द पृथ्वी, आकाश, पर्वतोंकी गुफा और सम्पूर्ण दिशाओंको निरन्तर प्रतिध्वनित करता हुआ मृदङ्गकी ध्वनिके समान सुनायी पड़ता था ॥ ४९ ॥
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