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अरण्यकाण्ड, सर्ग 75

तौ कबन्धेन तं मार्गं पम्पाया दर्शितं वने । आतस्थतुर्दिशं गृह्य प्रतीचीं नृवरात्मजौ ॥ १ ॥

भावार्थ

तदनन्तर राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण कबन्धके बताये हुए पम्पासरोवरके मार्गका आश्रय ले पश्चिम दिशाकी ओर चल दिये ॥ १ ॥

तौ शैलेष्वाचितानेकान् क्षौद्रपुष्पफलद्रुमान् । वीक्षन्तौ जग्मतुर्द्रष्टुं सुग्रीवं रामलक्ष्मणौ ॥ २ ॥

भावार्थ

दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण पर्वतोंपर फैले हुए बहुत-से वृक्षोंको, जो फूल, फल और मधुसे सम्पन्न थे, देखते हुए सुग्रीवसे मिलनेके लिये आगे बढ़े ॥ २ ॥

कृत्वा तु शैलपृष्ठे तु तौ वासं रघुनन्दनौ । पम्पायाः पश्चिमं तीरं राघवावुपतस्थतुः ॥ ३ ॥

भावार्थ

रातमें एक पर्वत-शिखरपर निवास करके रघुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले वे दोनों रघुवंशी बन्धु पम्पासरोवरके पश्चिम तटपर जा पहुँचे ॥ ३ ॥

तौ पुष्करिण्याः पम्पायास्तीरमासाद्य पश्चिमम् । अपश्यतां ततस्तत्र शबर्या रम्यमाश्रमम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

पम्पानामक पुष्करिणीके पश्चिम तटपर पहुँचकर उन दोनों भाइयोंने वहाँ शबरीका रमणीय आश्रम देखा ॥ ४ ॥

तौ तमाश्रममासाद्य द्रुमैर्बहुभिरावृतम् । सुरम्यमभिवीक्षन्तौ शबरीमभ्युपेयतुः ॥ ५ ॥

भावार्थ

उसकी शोभा निहारते हुए वे दोनों भाई बहुसंख्यक वृक्षोंसे घिरे हुए उस सुरम्य आश्रमपर जाकर शबरीसे मिले ॥ ५ ॥

तौ दृष्ट्वा तु तदा सिद्धा समुत्थाय कृताञ्जलिः । पादौ जग्राह रामस्य लक्ष्मणस्य च धीमतः ॥ ६ ॥

भावार्थ

शबरी सिद्ध तपस्विनी थी । उन दोनों भाइयोंको आश्रमपर आया देख वह हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी तथा उसने बुद्धिमान् श्रीराम और लक्ष्मणके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ६ ॥

पाद्यमाचमनीयं च सर्वं प्रादाद् यथाविधि । तामुवाच ततो रामः श्रमणीं धर्मसंस्थिताम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

फिर पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय आदि सब सामग्री समर्पित की और विधिवत् उनका सत्कार किया । तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी उस धर्मपरायणा तपस्विनीसे बोले—॥ ७ ॥

कच्चित्ते निर्जिता विघ्नाः कच्चित्ते वर्धते तपः । कच्चित्ते नियतः कोप आहारश्च तपोधने ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘तपोधने ! क्या तुमने सारे विघ्नोंपर विजय पा ली ? क्या तुम्हारी तपस्या बढ़ रही है ? क्या तुमने क्रोध और आहारको काबूमें कर लिया है ? ॥ ८ ॥

कच्चित्ते नियमाः प्राप्ताः कच्चित्ते मनसः सुखम् । कच्चित्ते गुरुशुश्रूषा सफला चारुभाषिणि ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘तुमने जिन नियमोंको स्वीकार किया है, वे निभ तो जाते हैं न ? तुम्हारे मनमें सुख और शान्ति है न ? चारुभाषिणि ! तुमने जो गुरुजनोंकी सेवा की है, वह पूर्णरूपसे सफल हो गयी है न ?’ ॥ ९ ॥

रामेण तापसी पृष्टा सा सिद्धा सिद्धसम्मता । शशंस शबरी वृद्धा रामाय प्रत्यवस्थिता ॥ १० ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछनेपर वह सिद्ध तपस्विनी बूढ़ी शबरी, जो सिद्धोंके द्वारा सम्मानित थी, उनके सामने खड़ी होकर बोली—॥ १० ॥

अद्य प्राप्ता तपःसिद्धिस्तव संदर्शनान्मया । अद्य मे सफलं जन्म गुरवश्च सुपूजिताः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! आज आपका दर्शन मिलनेसे ही मुझे अपनी तपस्यामें सिद्धि प्राप्त हुई है । आज मेरा जन्म सफल हुआ और गुरुजनोंकी उत्तम पूजा भी सार्थक हो गयी ॥११॥

अद्य मे सफलं तप्तं स्वर्गश्चैव भविष्यति । त्वयि देववरे राम पूजिते पुरुषर्षभ ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘पुरुषप्रवर श्रीराम ! आप देवेश्वरका वहाँ सत्कार हुआ, इससे मेरी तपस्या सफल हो गयी और अब मुझे आपके दिव्य धामकी प्राप्ति भी होगी ही ॥ १२ ॥

तवाहं चक्षुषा सौम्य पूता सौम्येन मानद । गमिष्याम्यक्षयाँल्लोकान्स्वत्प्रसादादरिंदम ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! मानद ! आपकी सौम्य दृष्टि पड़नेसे मैं परम पवित्र हो गयी । शत्रुदमन ! आपके प्रसादसे ही अब मैं अक्षय लोकोंमें जाऊँगी ॥ १३ ॥

चित्रकूटं त्वयि प्राप्ते विमानैरतुलप्रभैः । इतस्ते दिवमारूढा यानहं पर्यचारिषम् ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘जब आप चित्रकूट पर्वतपर पधारे थे, उसी समय मेरे गुरुजन, जिनकी मैं सदा सेवा किया करती थी, अतुल कान्तिमान् विमानपर बैठकर यहाँसे दिव्यलोकको चले गये ॥ १४ ॥

तैश्चाहमुक्ता धर्मज्ञैर्महाभागैर्महर्षिभिः । आगमिष्यति ते रामः सुपुण्यमिममाश्रमम् ॥ १५ ॥ स ते प्रतिग्रहीतव्यः सौमित्रिसहितोऽतिथिः । तं च दृष्ट्वा वराँल्लोकानक्षयांस्त्वं गमिष्यसि ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘उन धर्मज्ञ महाभाग महर्षियोंने जाते समय मुझसे कहा था कि तेरे इस परम पवित्र आश्रमपर श्रीरामचन्द्रजी पधारेंगे और लक्ष्मणके साथ तेरे अतिथि होंगे । तुम उनका यथावत् सत्कार करना । उनका दर्शन करके तू श्रेष्ठ एवं अक्षय लोकोंमें जायगी ॥ १५-१६ ॥

एवमुक्ता महाभागैस्तदाहं पुरुषर्षभ । मया तु संचितं वन्यं विविधं पुरुषर्षभ ॥ १७ ॥ तवार्थे पुरुषव्याघ्र पम्पायास्तीरसम्भवम् ।

भावार्थ

‘पुरुषप्रवर ! उन महाभाग महात्माओंने मुझसे उस समय ऐसी बात कही थी । अतः पुरुषसिंह ! मैंने आपके लिये पम्पातटपर उत्पन्न होनेवाले नाना प्रकारके जंगली फल-मूलोंका संचय किया है’ ॥ १७½ ॥

एवमुक्तः स धर्मात्मा शबर्या शबरीमिदम् ॥ १८ ॥ राघवः प्राह विज्ञाने तां नित्यमबहिष्कृताम् ।

भावार्थ

शबरी ( जातिसे वर्णबाह्य होनेपर भी ) विज्ञानमें बहिष्कृत नहीं थी—उसे परमात्माके तत्त्वका नित्य ज्ञान प्राप्त था । उसकी पूर्वोक्त बातें सुनकर धर्मात्मा श्रीरामने उससे कहा—॥ १८½ ॥

दनोः सकाशात् तत्त्वेन प्रभावं ते महात्मनाम् ॥ १९ ॥ श्रुतं प्रत्यक्षमिच्छामि संद्रष्टुं यदि मन्यसे । एतत्तु वचनं श्रुत्वा रामवक्त्रविनिःसृतम् ॥ २० ॥ शबरी दर्शयामास तावुभौ तद्वनं महत् ।

भावार्थ

‘तपोधने ! मैंने कबन्धके मुखसे तुम्हारे महात्मा गुरुजनोंका यथार्थ प्रभाव सुना है । यदि तुम स्वीकार करो तो मैं उनके उस प्रभावको प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ’ ॥ श्रीरामके मुखसे निकले हुए इस वचनको सुनकर शबरीने उन दोनों भाइयोंको उस महान् वनका दर्शन कराते हुए कहा—॥ २०½ ॥

पश्य मेघघनप्रख्यं मृगपक्षिसमाकुलम् ॥ २१ ॥ मतङ्गवनमित्येव विश्रुतं रघुनन्दन ।

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! मेघोंकी घटाके समान श्याम और नाना प्रकारके पशु-पक्षियोंसे भरे हुए इस वनकी ओर दृष्टिपात कीजिये । यह मतंगवनके नामसे ही विख्यात है ॥ २१½ ॥

इह ते भावितात्मानो गुरवो मे महाद्युते । जुहवांचक्रिरे नीडं मन्त्रवन्मन्त्रपूजितम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘महातेजस्वी श्रीराम ! यहीं वे मेरे भावितात्मा ( शुद्ध अन्तःकरणवाले एवं परमात्मचिन्तनपरायण ) गुरुजन निवास करते थे। इसी स्थानपर उन्होंने गायत्रीमन्त्रके जपसे विशुद्ध हुए अपने देहरूपी पञ्जरको मन्त्रोच्चारणपूर्वक अग्निमें होम दिया था ॥ २२ ॥

इयं प्रत्यक्स्थली वेदी यत्र ते मे सुसत्कृताः। पुष्पोपहारं कुर्वन्ति श्रमादुद्वेपिभिः करैः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘यह प्रत्यक्स्थली नामवाली वेदी है, जहाँ मेरे द्वारा भलीभाँति पूजित हुए वे महर्षि वृद्धावस्थाके कारण श्रमसे काँपते हुए हाथोंद्वारा देवताओंको फूलोंकी बलि चढ़ाया करते थे ॥ २३ ॥

तेषां तपःप्रभावेण पश्याद्यापि रघूत्तम। द्योतयन्ती दिशः सर्वाः श्रिया वेद्यतुलप्रभा ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘रघुवंशशिरोमणे ! देखिये, उनकी तपस्याके प्रभावसे आज भी यह वेदी अपने तेजके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रही है। इस समय भी इसकी प्रभा अतुलनीय है ॥ २४ ॥

अशक्नुवद्भिस्तैर्गन्तुमुपवासश्रमालसैः । चिन्तितेनागतान् पश्य समेतान् सप्त सागरान् ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘उपवास करनेसे दुर्बल होनेके कारण जब वे चलने-फिरनेमें असमर्थ हो गये, तब उनके चिन्तनमात्रसे वहाँ सात समुद्रोंका जल प्रकट हो गया । वह सप्तसागर तीर्थ आज भी मौजूद है। उसमें सातों समुद्रोंके जल मिले हुए हैं, उसे चलकर देखिये ॥ २५ ॥

कृताभिषेकैस्तैर्न्यस्ता वल्कलाः पादपेष्विह । अद्यापि न विशुष्यन्ति प्रदेशे रघुनन्दन ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! उसमें स्नान करके उन्होंने वृक्षोंपर जो वल्कल वस्त्र फैला दिये थे, वे इस प्रदेशमें अबतक सूखे नहीं हैं ॥ २६ ॥

देवकार्याणि कुर्वद्भिर्यानीमानि कृतानि वै । पुष्पैः कुवलयैः सार्धं म्लानत्वं न तु यान्ति वै ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘देवताओंकी पूजा करते हुए मेरे गुरुजनोंने कमलोंके साथ अन्य फूलोंकी जो मालाएँ बनायी थीं, वे आज भी मुरझायी नहीं हैं ॥ २७ ॥

कृत्स्नं वनमिदं दृष्टं श्रोतव्यं च श्रुतं त्वया । तदिच्छाम्यभ्यनुज्ञाता त्यक्ष्याम्येतत् कलेवरम् ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘भगवन् ! आपने सारा वन देख लिया और यहाँके सम्बन्धमें जो बातें सुनने योग्य थीं, वे भी सुन लीं । अब मैं आपकी आज्ञा लेकर इस देहका परित्याग करना चाहती हूँ ॥ २८ ॥

तेषामिच्छाम्यहं गन्तुं समीपं भावितात्मनाम् । मुनीनामाश्रमो येषामहं च परिचारिणी ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘जिनका यह आश्रम है और जिनके चरणोंकी मैं दासी रही हूँ, उन्हीं पवित्रात्मा महर्षियोंके समीप अब मैं जाना चाहती हूँ’ ॥ २९ ॥

धर्मिष्ठं तु वचः श्रुत्वा राघवः सहलक्ष्मणः । प्रहर्षमतुलं लेभे आश्चर्यमिति चाब्रवीत् ॥ ३० ॥

भावार्थ

शबरीके धर्मयुक्त वचन सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरामको अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई । उनके मुँहसे निकल पड़ा, ‘आश्चर्य है !’ ॥ ३० ॥

तामुवाच ततो रामः शबरीं संशितव्रताम् । अर्चितोऽहं त्वया भद्रे गच्छ कामं यथासुखम् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

तदनन्तर श्रीरामने कठोर व्रतका पालन करनेवाली शबरीसे कहा—‘भद्रे ! तुमने मेरा बड़ा सत्कार किया। अब तुम अपनी इच्छाके अनुसार आनन्दपूर्वक अभीष्ट लोककी यात्रा करो’ ॥ ३१ ॥

इत्येवमुक्ता जटिला चीरकृष्णाजिनाम्बरा । अनुज्ञाता तु रामेण हुत्वाऽऽत्मानं हुताशने ॥ ३२ ॥ ज्वलत्पावकसंकाशा स्वर्गमेव जगाम ह । दिव्याभरणसंयुक्ता दिव्यमाल्यानुलेपना ॥ ३३ ॥ दिव्याम्बरधरा तत्र बभूव प्रियदर्शना । विराजयन्ती तं देशं विद्युत्सौदामनी यथा ॥ ३४ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर मस्तकपर जटा और शरीरपर चीर एवं काला मृगचर्म धारण करनेवाली शबरीने अपनेको आगमें होमकर प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी शरीर प्राप्त किया। वह दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण, दिव्य फूलोंकी माला और दिव्य अनुलेपन धारण किये बड़ी मनोहर दिखायी देने लगी तथा सुदाम पर्वतपर प्रकट होनेवाली बिजलीके समान उस प्रदेशको प्रकाशित करती हुई स्वर्ग (साकेत) लोकको ही चली गयी ॥ ३२–३४॥

यत्र ते सुकृतात्मानो विहरन्ति महर्षयः । तत् पुण्यं शबरी स्थानं जगामात्मसमाधिना ॥ ३५ ॥

भावार्थ

उसने अपने चित्तको एकाग्र करके उस पुण्यधामकी यात्रा की, जहाँ उसके वे गुरुजन पुण्यात्मा महर्षि विहार करते थे ॥ ३५ ॥

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