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अरण्यकाण्ड, सर्ग 74

दर्शयित्वा तु रामाय सीतायाः परिमार्गणे । वाक्यमर्थवदर्थज्ञः कबन्धः पुनरब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

श्रीरामको सीताकी खोजका उपाय दिखाकर अर्थवेत्ता कबन्धने उनसे पुनः यह प्रयोजनयुक्त बात कही—॥ १ ॥

एष राम शिवः पन्था यत्रैते पुष्पिता द्रुमाः । प्रतीचीं दिशमाश्रित्य प्रकाशन्ते मनोरमाः ॥ २ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! यहाँसे पश्चिम दिशाका आश्रय लेकर जहाँ ये फूलोंसे भरे हुए मनोरम वृक्ष शोभा पा रहे हैं, यही आपके जाने लायक सुखद मार्ग है ॥ २ ॥

जम्बूप्रियालपनसा न्यग्रोधप्लक्षतिन्दुकाः । अश्वत्थाः कर्णिकाराश्च चूताश्चान्ये च पादपाः ॥ ३ ॥ धन्वना नागवृक्षाश्च तिलका नक्तमालकाः । नीलाशोकाः कदम्बाश्च करवीराश्च पुष्पिताः ॥ ४ ॥ अग्निमुख्या अशोकाश्च सुरक्ताः पारिभद्रकाः । तानारुह्याथवा भूमौ पातयित्वा च तान् बलात् ॥ ५ ॥ फलान्यमृतकल्पानि भक्षयित्वा गमिष्यथः ।

भावार्थ

‘जामुन, प्रियाल (चिरौंजी), कटहल, बड़, पाकड़, तेंदू, पीपल, कनेर, आम तथा अन्य वृक्ष, धव, नागकेसर, तिलक, नक्तमाल, नील, अशोक, कदम्ब, खिले हुए करवीर, भिलावा, अशोक, लाल चन्दन तथा मन्दार—ये वृक्ष मार्गमें पड़ेंगे । आप दोनों भाई इनकी डालियोंको बलपूर्वक भूमिपर झुकाकर अथवा इन वृक्षोंपर चढ़कर इनके अमृततुल्य मधुर फलोंका आहार करते हुए यात्रा कीजियेगा ॥ ३—५½ ॥

तदतिक्रम्य काकुत्स्थ वनं पुष्पितपादपम् ॥ ६ ॥ नन्दनप्रतिमं त्वान्यत् कुरवस्तूत्तरा इव । सर्वकालफला यत्र पादपा मधुरस्रवाः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘काकुत्स्थ ! खिले हुए वृक्षोंसे सुशोभित उस वनको लाँघकर आपलोग एक दूसरे वनमें प्रवेश कीजियेगा, जो नन्दनवनके समान मनोहर है । उस वनके वृक्ष उत्तर कुरुवर्षके वृक्षोंकी भाँति मधुकी धारा बहानेवाले हैं तथा उनमें सभी ऋतुओंमें सदा फल लगे रहते हैं ॥ ६-७ ॥

सर्वे च ऋतवस्तत्र वने चैत्ररथे यथा । फलभारनतास्तत्र महाविटपधारिणः ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘चैत्ररथ वनकी भाँति उस मनोहर काननमें सभी ऋतुएँ निवास करती हैं । वहाँके वृक्ष बड़ी-बड़ी शाखा धारण करनेवाले तथा फलोंके भारसे झुके हुए हैं ॥ ८ ॥

शोभन्ते सर्वतस्तत्र मेघपर्वतसंनिभाः । तानारुह्याथवा भूमौ पातयित्वाथवा सुखम् ॥ ९ ॥ फलान्यमृतकल्पानि लक्ष्मणस्ते प्रदास्यति ।

भावार्थ

‘वे वहाँ सब ओर मेघों और पर्वतोंके समान शोभा पाते हैं । लक्ष्मण उन वृक्षोंपर चढ़कर अथवा सुखपूर्वक उन्हें पृथ्वीपर झुकाकर उनके अमृततुल्य मधुर फल आपको देंगे ॥ ९½ ॥

चङ्क्रमन्तौ वराञ्शैलाञ्शैलाच्छैलं वनाद् वनम् ॥ १० ॥ ततः पुष्करिणीं वीरौ पम्पां नाम गमिष्यथः ।

भावार्थ

‘इस प्रकार सुन्दर पर्वतोंपर भ्रमण करते हुए आप दोनों भाई एक पहाड़से दूसरे पहाड़पर तथा एक वनसे दूसरे वनमें पहुँचेंगे और इस तरह अनेक पर्वतों तथा वनोंको लाँघते हुए आप दोनों वीर पम्पा नामक पुष्करिणीके तटपर पहुँच जायेंगे ॥ १०½ ॥

अशर्करामविभ्रंशां समतीर्थामशैवलाम् ॥ ११ ॥ राम संजातवालूकां कमलोत्पलशोभिताम् ।

भावार्थ

‘श्रीराम ! वहाँ कंकड़का नाम नहीं है । उसके तटपर पैर फिसलने लायक कीचड़ आदि नहीं है । उसके घाटकी भूमि सब ओरसे बराबर है—ऊँची-नीची या ऊबड़-खाबड़ नहीं है । उस पुष्करिणीमें सेवारका सर्वथा अभाव है । उसके भीतरकी भूमि बालुकापूर्ण है । कमल और उत्पल उस सरोवरकी शोभा बढ़ाते हैं ॥ ११½ ॥

तत्र हंसाः प्लवाः क्रौञ्चाः कुरराश्चैव राघव ॥ १२ ॥ वल्गुस्वरा निकूजन्ति पम्पासलिलगोचराः । नोद्विजन्ते नरान् दृष्ट्वा वधस्याकोविदाः शुभाः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! वहाँ पम्पाके जलमें विचरनेवाले हंस, कारण्डव, क्रौञ्च और कुरर सदा मधुर स्वरमें कूजते रहते हैं । वे मनुष्योंको देखकर उद्विग्न नहीं होते हैं । क्योंकि किसी मनुष्यके द्वारा किसी पक्षीका वध भी हो सकता है, ऐसे भयका उन्हें अनुभव नहीं है । ये सभी पक्षी बड़े सुन्दर हैं ॥ १२-१३ ॥

घृतपिण्डोपमान् स्थूलां स्तान् द्विजान् भक्षयिष्यथः । रोहितान् वक्रतुण्डांश्च नलमीनांश्च राघव ॥ १४ ॥ पम्पायामिषुभिर्मत्स्यांस्तत्र राम वरान् हतान् । निस्त्वक्पक्षानयस्तप्तानकृशानैककण्टकान् ॥ १५ ॥ तव भक्तथा समायुक्तो लक्ष्मणः सम्प्रदास्यति ।

भावार्थ

‘बाणोंके अग्रभागसे जिनके छिलके छुड़ा दिये गये हैं, अतएव जिनमें एक भी काँटा नहीं रह गया है, जो घीके लोंदेके समान चिकने तथा आर्द्र हैं—सूखे नहीं हैं, जिन्हें लोहमय बाणोंके अग्रभागमें गूँथकर आगमें सेका और पकाया गया है, ऐसे फल-मूलके ढेर वहाँ भक्ष्य पदार्थके रूपमें उपलब्ध होंगे । आपके प्रति भक्तिभावसे सम्पन्न लक्ष्मण आपको वे भक्ष्य पदार्थ अर्पित करेंगे । आप दोनों भाई उन पदार्थोंको लेकर उस सरोवरके मोटे-मोटे सुप्रसिद्ध जलचर पक्षियों तथा श्रेष्ठ रोहित ( रोहू ), वक्रतुण्ड और नलमीन आदि मत्स्योंको थोड़ा-थोड़ा करके खिलाइयेगा ( इससे आपका मनोरञ्जन होगा ) ॥ १४-१५½ ॥

भृशं तान् खादतो मत्स्यान् पम्पायाः पुष्पसंचये ॥ १६ ॥ पद्मगन्धि शिवं वारि सुखशीतमनामयम् । उद्धृत्य स तदाक्लिष्टं रूप्यस्फटिकसंनिभम् ॥ १७ ॥ अथ पुष्करपर्णेन लक्ष्मणः पाययिष्यति ।

भावार्थ

‘जिस समय आप पम्पासरोवरकी पुष्पराशिके समीप मछलियोंको भोजन करानेकी क्रीड़ामें अत्यन्त संलग्न होंगे, उस समय लक्ष्मण उस सरोवरका कमलकी गन्धसे सुवासित, कल्याणकारी, सुखद, शीतल, रोगनाशक, क्लेशहारी तथा चाँदी और स्फटिकमणिके समान स्वच्छ जल कमलके पत्ते-में निकालकर लायेंगे और आपको पिलायेंगे ॥ १६–१७½ ॥

स्थूलान् गिरिगुहाशय्यान् वानरान् वनचारिणः ॥ १८ ॥ सायाह्ने विचरन् राम दर्शयिष्यति लक्ष्मणः ।

भावार्थ

‘श्रीराम ! सायंकालमें आपके साथ विचरते हुए लक्ष्मण आपको उन मोटे-मोटे वनचारी वानरोंका दर्शन करायेंगे, जो पर्वतोंकी गुफाओंमें सोते और रहते हैं ॥ १८½ ॥

अपां लोभादुपावृत्तान् वृषभानिव नर्दतः ॥ १९ ॥ स्थूलान् पीतांश्च पम्पायां द्रक्ष्यसि त्वं नरोत्तम ।

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ ! वे वानर पानी पीनेके लोभसे पम्पाके तटपर आकर साँड़ोंके समान गर्जते हैं । उनके शरीर मोटे और रंग पीले होते हैं । आप उन सबको वहाँ देखेंगे ॥ १९½ ॥

सायाह्ने विचरन् राम विटपी माल्यधारिणः ॥ २० ॥ शिवोदकं च पम्पायां दृष्ट्वा शोकं विहास्यसि ।

भावार्थ

‘श्रीराम ! सायंकालमें चलते समय आप बड़ी-बड़ी शाखावाले, पुष्पधारी वृक्षों तथा पम्पाके शीतल जलका दर्शन करके अपना शोक त्याग देंगे ॥ २०½ ॥

सुमनोभिश्चितास्तत्र तिलका नक्तमालकाः ॥ २१ ॥ उत्पलानि च फुल्लानि पङ्कजानि च राघव ।

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! वहाँ फूलोंसे भरे हुए तिलक और नक्तमाल-के वृक्ष शोभा पाते हैं तथा जलके भीतर उत्पल और कमल फूले दिखायी देते हैं ॥ २१½ ॥

न तानि कश्चिन्माल्यानि तत्रारोपयिता नरः ॥ २२ ॥ न च वै म्लानतां यान्ति न च शीर्यन्ति राघव ।

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! कोई भी मनुष्य वहाँ उन फूलोंको उतारकर धारण नहीं करता है । ( क्योंकि वहाँतक किसीकी पहुँच ही नहीं हो पाती है ) पम्पासरोवरके फूल न तो मुरझाते हैं और न झरते ही हैं ॥ २२½ ॥

मतङ्गशिष्यास्तत्रासन्नृषयः सुसमाहिताः ॥ २३ ॥ तेषां भाराभितप्तानां वन्यमाहरतां गुरोः । ये प्रपेतुर्महीं तूर्णं शरीरात् स्वेदबिन्दवः ॥ २४ ॥ तानि माल्यानि जातानि मुनीनां तपसा तदा । स्वेदबिन्दुसमुत्थानि न विनश्यन्ति राघव ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘कहते हैं, वहाँ पहले मतंग मुनिके शिष्य ऋषिगण निवास करते थे, जिनका चित्त सदा एकाग्र एवं शान्त रहता था । वे अपने गुरु मतंग मुनिके लिये जब जंगली फल-मूल ले आते और उनके भारसे थक जाते, तब उनके शरीरसे पृथ्वीपर पसीनोंकी जो बूँदें गिरती थीं, वे ही उन मुनियोंकी तपस्याके प्रभावसे तत्काल फूलके रूपमें परिणत हो जाती थीं। राघव ! पसीनोंकी बूँदोंसे उत्पन्न होनेके कारण वे फूल नष्ट नहीं होते हैं ॥ २३-२५ ॥

तेषां गतानामद्यापि दृश्यते परिचारिणी । श्रमणी शबरी नाम काकुत्स्थ चिरजीविनी ॥ २६ ॥ त्वां तु धर्मे स्थिता नित्यं सर्वभूतनमस्कृतम् । दृष्ट्वा देवोपमं राम स्वर्गलोकं गमिष्यति ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘वे सब के-सब ऋषि तो अब चले गये; किंतु उनकी सेवामें रहनेवाली तपस्विनी शबरी आज भी वहाँ दिखायी देती है । काकुत्स्थ ! शबरी चिरजीवनी होकर सदा धर्मके अनुष्ठानमें लगी रहती है । श्रीराम ! आप समस्त प्राणियोंके लिये नित्य वन्दनीय और देवताके तुल्य हैं । आपका दर्शन करके शबरी स्वर्गलोक (साकेतधाम) को चली जायगी॥२६-२७॥

ततस्तद्राम पम्पायास्तीरमाश्रित्य पश्चिमम् । आश्रमस्थानमतुलं गुह्यं काकुत्स्थ पश्यसि ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ! तदनन्तर आप पम्पाके पश्चिम तटपर जाकर एक अनुपम आश्रम देखेंगे, जो ( सर्व-साधारणकी पहुँचके बाहर होनेके कारण ) गुप्त है ॥ २८ ॥

न तत्राक्रमितुं नागाः शक्नुवन्ति तदाश्रमे । ऋषेस्तस्य मतङ्गस्य विधानात् तच काननम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘उस आश्रमपर तथा उस वनमें मतंग मुनिके प्रभावसे हाथी कभी आक्रमण नहीं कर सकते ॥ २९ ॥

मतङ्गवनमित्येव विश्रुतं रघुनन्दन । तस्मिन् नन्दनसंकाशे देवारण्योपमे वने ॥ ३० ॥ नानाविहगसंकीर्णे रंस्यसे राम निर्वृतः ।

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! वहाँका जंगल मतंगवनके नामसे प्रसिद्ध है । उस नन्दनतुल्य मनोहर और देववनके समान सुन्दर वनमें नाना प्रकारके पक्षी भरे रहते हैं । श्रीराम ! आप वहाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ सानन्द विचरण करेंगे ॥ ३०½ ॥

ऋष्यमूकस्तु पम्पायाः पुरस्तात् पुष्पितद्रुमः ॥ ३१ ॥ सुदुःखारोहणश्चैव शिशुनागाभिरक्षितः । उदारो ब्रह्मणा चैव पूर्वकालेऽभिनिर्मितः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘पम्पासरोवरके पूर्वभागमें ऋष्यमूक पर्वत है, जहाँके वृक्ष फूलोंसे सुशोभित दिखायी देते हैं । उसके ऊपर चढ़नेमें बड़ी कठिनाई होती है, क्योंकि वह छोटे-छोटे सर्पों अथवा हाथियोंके बच्चोंद्वारा सब ओरसे सुरक्षित है । ऋष्यमूक पर्वत उदार ( अभीष्ट फलको देनेवाला ) है । पूर्वकालमें साक्षात् ब्रह्माजीने उसका निर्माण किया और उसे औदार्य आदि गुणोंसे सम्पन्न बनाया ॥ ३१-३२ ॥

शयानः पुरुषो राम तस्य शैलस्य मूर्धनि । यत् स्वप्नं लभते वित्तं तत् प्रबुद्धोऽधिगच्छति॥३३॥ यस्त्वेनं विषमाचारः पापकर्माधिरोहति । तत्रैव प्रहरन्त्येनं सुप्तमादाय राक्षसाः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! उस पर्वतके शिखरपर सोया हुआ पुरुष सपनेमें जिस सम्पत्तिको पाता है उसे जागनेपर भी प्राप्त कर लेता है । जो पापकर्मी तथा विषम बर्ताव करनेवाला पुरुष उस पर्वतपर चढ़ता है, उसे इस पर्वतशिखरपर ही सो जानेपर राक्षस लोग उठाकर उसके ऊपर प्रहार करते हैं ॥ ३३-३४ ॥

तत्रापि शिशुनागानामाक्रन्दः श्रूयते महान् । क्रीडतां राम पम्पायां मतङ्गाश्रमवासिनाम् ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! मतंग मुनिके आश्रमके आस-पासके वनमें रहने और पम्पासरोवरमें क्रीडा करनेवाले छोटे-छोटे हाथियोंके चिग्घाड़नेका महान् शब्द उस पर्वतपर भी सुनायी देता है ॥ ३५ ॥

सक्ता रुधिरधाराभिः संहत्य परमद्विपाः । प्रचरन्ति पृथक्कीर्णा मेघवर्णास्तरस्विनः ॥ ३६ ॥ ते तत्र पीत्वा पानीयं विमलं चारु शोभनम् । अत्यन्तसुखसंस्पर्शं सर्वगन्धसमन्वितम् ॥ ३७ ॥ निर्वृत्ताः संविगाहन्ते वनानि वनगोचराः ।

भावार्थ

‘जिनके गण्डस्थलोंपर कुछ लाल रंगकी मदकी धाराएँ बहती हैं, वे वेगशाली और मेघके समान काले बड़े-बड़े गजराज झुंड-के-झुंड एक साथ होकर दूसरी जातिवाले हाथियोंसे पृथक् हो वहाँ विचरते रहते हैं । वनमें विचरनेवाले वे हाथी जब पम्पासरोवरका निर्मल, मनोहर, सुन्दर, छूनेमें अत्यन्त सुखद तथा सब प्रकारकी सुगन्धसे सुवासित जल पीकर लौटते हैं, तब उन वनोंमें प्रवेश करते हैं॥३६-३७½॥

ऋक्षांश्च द्वीपिनश्चैव नीलकोमलकप्रभान् ॥ ३८ ॥ रुरून् पेतानजयान् दृष्ट्वा शोकं प्रहास्यसि ।

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! वहाँ रीछों, बाघों और नील कोमल कान्तिवाले मनुष्योंको देखकर भागनेवाले तथा दौड़ लगानेमें किसीसे पराजित न होनेवाले मृगोंको देखकर आप अपना सारा शोक भूल जायँगे ॥ ३८½ ॥

राम तस्य तु शैलस्य महती शोभते गुहा ॥ ३९ ॥ शिलापिधाना काकुत्स्थ दुःखं चास्याः प्रवेशनम् ।

भावार्थ

‘श्रीराम ! उस पर्वतके ऊपर एक बहुत बड़ी गुफा शोभा पाती है, जिसका द्वार पत्थरसे ढका है । उसके भीतर प्रवेश करनेमें बड़ा कष्ट होता है ॥ ३९½ ॥

तस्या गुहायाः प्राग्द्वारे महाञ्शीतोदको ह्रदः ॥ ४० ॥ बहुमूलफलो रम्यो नानानगसमाकुलः ।

भावार्थ

‘उस गुफाके पूर्वद्वारपर शीतल जलसे भरा हुआ एक बहुत बड़ा कुण्ड है । उसके आसपास बहुत-से फल और मूल सुलभ हैं तथा वह रमणीय ह्रद नाना प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त है ॥ ४०½ ॥

तस्यां वसति धर्मात्मा सुग्रीवः सह वानरैः ॥ ४१ ॥ कदाचिच्छिखरे तस्य पर्वतस्यापि तिष्ठति ।

भावार्थ

‘धर्मात्मा सुग्रीव वानरोंके साथ उसी गुफामें निवास करते हैं । वे कभी-कभी उस पर्वतके शिखरपर भी रहते हैं’॥४१½॥

कबन्धस्त्वनुशास्यैवं तावुभौ रामलक्ष्मणौ ॥ ४२ ॥ स्रग्वी भास्करवर्णाभः खे व्यरोचत वीर्यवान् ।

भावार्थ

इस प्रकार श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको सब बातें बताकर सूर्यके समान तेजस्वी और पराक्रमी कबन्ध दिव्य पुष्पोंकी माला धारण किये आकाशमें प्रकाशित होने लगा ॥ ४२½ ॥

तं तु खस्थं महाभागं तावुभौ रामलक्ष्मणौ ॥ ४३ ॥ प्रस्थितौ त्वं व्रजस्वेति वाक्यमूचतुरन्तिके ।

भावार्थ

उस समय वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण वहाँसे प्रस्थान करनेके लिये उद्यत हो आकाशमें खड़े हुए महाभाग कबन्धसे उसके निकट खड़े होकर बोले—‘अब तुम परम धामको जाओ’ ॥ ४३½ ॥

गम्यतां कार्यसिद्ध्यर्थमिति तावब्रवीत् स च ॥ ४४ ॥ सुप्रीतौ तावनुज्ञाप्य कबन्धः प्रस्थितस्तदा ॥ ४५ ॥

भावार्थ

कबन्धने भी उन दोनों भाइयोंसे कहा—‘आपलोग भी अपने कार्यकी सिद्धिके लिये यात्रा करें ।’ ऐसा कहकर परम प्रसन्न हुए उन दोनों बन्धुओंसे आज्ञा ले कबन्धने तत्काल प्रस्थान किया ॥ ४४-४५ ॥

स तत् कबन्धः प्रतिपद्य रूपं वृतः श्रिया भास्वरसर्वदेहः । निदर्शयन् राममवेक्ष्य खस्थः सख्यं कुरुष्वेति तदाभ्युवाच ॥ ४६ ॥

भावार्थ

कबन्ध अपने पहले रूपको पाकर अद्भुत शोभासे सम्पन्न हो गया । उसका सारा शरीर सूर्य-तुल्य प्रभासे प्रकाशित हो उठा । वह रामकी ओर देखकर उन्हें पम्पासरोवरका मार्ग दिखाता हुआ आकाशमें ही स्थित होकर बोला—‘आप सुग्रीवके साथ मित्रता अवश्य करें’ ॥ ४६ ॥

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