अरण्यकाण्ड, सर्ग 73
पवमुक्तौ तु तौ वीरौ कबन्धेन नरेश्वरौ । गिरिप्रदरमासाद्य पावकं विससर्जतुः ॥ १ ॥
भावार्थ
कबन्धके ऐसा कहनेपर उन दोनों वीर नरेश्वर श्रीराम और लक्ष्मणने उसके शरीरको एक पर्वतके गड्ढेमें डालकर उसमें आग लगा दी ॥ १ ॥
लक्ष्मणस्तु महोल्काभिर्ज्वलिताभिः समन्ततः । चितामादीपयामास सा प्रजज्वाल सर्वतः ॥ २ ॥
भावार्थ
लक्ष्मणने जलती हुई बड़ी-बड़ी लुकारियोंके द्वारा चारों ओरसे उसकी चितामें आग लगायी; फिर तो वह सब ओरसे प्रज्वलित हो उठी ॥ २॥
तच्छरीरं कबन्धस्य घृतपिण्डोपमं महत् । मेदसा पच्यमानस्य मन्दं दहत पावकः ॥ ३ ॥
भावार्थ
चितामें जलते हुए कबन्धका विशाल शरीर चर्बियोंसे भरा होनेके कारण घीके लोंदेके समान प्रतीत होता था । चिताकी आग उसे धीरे-धीरे जलाने लगी ॥ ३ ॥
स विधूय चितामाशु विधूमोऽग्निरिवोत्थितः । अरजे वाससी बिभ्रन्माल्यं दिव्यं महाबलः ॥ ४ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वह महाबली कबन्ध तुरंत ही चिताको हिलाकर दो निर्मल वस्त्र और दिव्य पुष्पोंका हार धारण किये धूमरहित अग्निके समान उठ खड़ा हुआ ॥ ४ ॥
ततश्चिताया वेगेन भास्वरो विरजाम्बरः । उत्पपाताशु संहृष्टः सर्वप्रत्यङ्गभूषणः ॥ ५ ॥ विमाने भास्वरे तिष्ठन् हंसयुक्ते यशस्करे । प्रभया च महातेजा दिशो दश विराजयन् ॥ ६ ॥ सोऽन्तरिक्षगतो वाक्यं कबन्धो राममब्रवीत् ।
भावार्थ
फिर वेगपूर्वक चितासे ऊपरको उठा और शीघ्र ही एक तेजस्वी विमानपर जा बैठा । निर्मल वस्त्रोंसे विभूषित हो वह बड़ा तेजस्वी दिखायी देता था । उसके मनमें हर्ष भरा हुआ था तथा समस्त अङ्ग-प्रत्यङ्गमें दिव्य आभूषण शोभा दे रहे थे । हंसोंसे जुते हुए उस यशस्वी विमानपर बैठा हुआ महान् तेजस्वी कबन्ध अपनी प्रभासे दसों दिशाओंको प्रकाशित करने लगा और अन्तरिक्षमें स्थित हो श्रीरामसे इस प्रकार बोला–॥ ५-६½ ॥
शृणु राघव तत्त्वेन यथा सीतामवाप्स्यसि ॥ ७ ॥ राम षड् युक्तयो लोके याभिः सर्वं विमृश्यते । परिमृष्टो दशान्तेन दशाभागेन सेव्यते ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! आप जिस प्रकार सीताको पा सकेंगे, वह ठीक-ठीक बता रहा हूँ, सुनिये । श्रीराम ! लोकमें छः युक्तियाँ हैं, जिनसे राजाओंद्वारा सब कुछ प्राप्त किया जाता है ( उन युक्तियों तथा उपायोंके नाम हैं–संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय ) । जो मनुष्य दुर्दशासे ग्रस्त होता है, वह दूसरे किसी दुर्दशाग्रस्त पुरुषसे ही सेवा या सहायता प्राप्त करता है ( यह नीति है ) ॥ ७-८ ॥
दशाभागगतो हीनस्त्वं हि राम सलक्ष्मणः । यत्कृते व्यसनं प्राप्तं त्वया दारप्रधर्षणम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! लक्ष्मणसहित आप बुरी दशाके शिकार हो रहे हैं; इसीलिये आपलोग राज्यसे वञ्चित हैं तथा उस बुरी दशाके कारण ही आपको अपनी भार्याके अपहरणका महान् दुःख प्राप्त हुआ है ॥ ९ ॥
तदवश्यं त्वया कार्यः स सुहृत् सुहृदां वर। अकृत्वा नहि ते सिद्धिमहं पश्यामि चिन्तयन्॥ १० ॥
भावार्थ
‘अतः सुहृदोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! आप अवश्य ही उस पुरुषको अपना सुहृद् बनाइये, जो आपकी ही भाँति दुर्दशामें पड़ा हुआ हो ( इस प्रकार आप सुहृद्का आश्रय लेकर समाश्रय नीतिको अपनाइये )। मैं बहुत सोचनेपर भी ऐसा किये बिना आपकी सफलता नहीं देखता हूँ ॥ १० ॥
श्रूयतां राम वक्ष्यामि सुग्रीवो नाम वानरः। भ्रात्रा निरस्तः क्रुद्धेन वालिना शक्रसूनुना ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! सुनिये, मैं ऐसे पुरुषका परिचय दे रहा हूँ, उनका नाम है सुग्रीव । वे जातिके वानर हैं। उन्हें उनके भाई इन्द्रकुमार वालीने कुपित होकर घरसे निकाल दिया है ॥ ११ ॥
ऋष्यमूके गिरिवरे पम्पापर्यन्तशोभिते। निवसत्यात्मवान् वीरश्चतुर्भिः सह वानरैः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘वे मनस्वी वीर सुग्रीव इस समय चार वानरोंके साथ उस गिरिवर ऋष्यमूकपर निवास करते हैं, जो पम्पासरोवर-तक फैला हुआ है ॥ १२ ॥
वानरेन्द्रो महावीर्यस्तेजोवानमितप्रभः। सत्यसंधो विनीतश्च धृतिमान् मतिमान् महान् ॥१३॥ दक्षः प्रगल्भो द्युतिमान् महाबलपराक्रमः।
भावार्थ
‘वे वानरोंके राजा महापराक्रमी सुग्रीव तेजस्वी, अत्यन्त कान्तिमान्, सत्यप्रतिज्ञ, विनयशील, धैर्यवान्, बुद्धिमान्, महापुरुष, कार्यदक्ष, निर्भीक, दीप्तिमान् तथा महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न हैं ॥ १३½ ॥
भ्रात्रा विवासितो वीर राज्यहेतोर्महात्मना ॥ १४ ॥ स ते सहायो मित्रं च सीतायाः परिमार्गणे। भविष्यति हि ते राम मा च शोके मनः कृथाः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘वीर श्रीराम ! उनके महामना भाई वालीने सारे राज्यको अपने अधिकारमें कर लेनेके लिये उन्हें राज्यसे बाहर निकाल दिया है; अतः वे सीताकी खोजके लिये आपके सहायक और मित्र होंगे। इसलिये आप अपने मनको शोकमें न डालिये ॥ १४-१५ ॥
भवितव्यं हि तच्चापि न तच्छक्यमिहान्यथा। कर्तुमिक्ष्वाकुशार्दूल कालो हि दुरतिक्रमः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘इक्ष्वाकुवंशी वीरोंमें श्रेष्ठ श्रीराम ! जो होनहार है, उसे कोई भी पलट नहीं सकता। कालका विधान सभीके लिये दुर्लङ्घ्य होता है ( अतः आपपर जो कुछ भी बीत रहा है, इसे काल या प्रारब्धका विधान समझकर आपको धैर्य धारण करना चाहिये। ) ॥ १६ ॥
गच्छ शीघ्रमितो वीर सुग्रीवं तं महाबलम्। वयस्यं तं कुरु क्षिप्रमितो गत्वाद्य राघव ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘वीर रघुनाथजी ! आप यहाँसे शीघ्र ही महाबली सुग्रीवके पास जाइये और जाकर तुरंत उन्हें अपना मित्र बना लीजिये ॥ १७ ॥
अद्रोहाय समागम्य दीप्यमाने विभावसौ। न च ते सोऽवमन्तव्यः सुग्रीवो वानराधिपः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘प्रज्वलित अग्निको साक्षी बनाकर परस्पर द्रोह न करनेके लिये मैत्री स्थापित कीजिये और ऐसा करनेके बाद आपको कभी उन वानरराज सुग्रीवका अपमान नहीं करना चाहिये ॥ १८ ॥
कृतज्ञः कामरूपी च सहायार्थी च वीर्यवान्। शक्तौ ह्याद्य युवां कर्तुं कार्यं तस्य चिकीर्षितम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, पराक्रमी और कृतज्ञ हैं तथा इस समय स्वयं ही अपने लिये एक सहायक ढूँढ़ रहे हैं। उनका जो अभीष्ट कार्य है उसे सिद्ध करनेमें आप दोनों भाई समर्थ हैं ॥ १९ ॥
कृतार्थो वाकृतार्थो वा तव कृत्यं करिष्यति। स ऋक्षरजसः पुत्रः पम्पामटति शङ्कितः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘सुग्रीवका मनोरथ पूर्ण हो या न हो, वे आपका कार्य अवश्य सिद्ध करेंगे। वे ऋक्षराजके क्षेत्रज पुत्र हैं और वालीसे शङ्कित रहकर पम्पासरोवरके तटपर भ्रमण करते हैं ॥२०॥
भास्करस्यौरसः पुत्रो वालिना कृतकिल्बिषः। संनिधायायुधं क्षिप्रमृष्यमूकालयं कपिम् ॥ २१ ॥ कुरु राघव सत्येन वयस्यं वनचारिणम्।
भावार्थ
‘उन्हें सूर्यदेवका औरस पुत्र कहा गया है। उन्होंने वालीका अपराध किया है ( इसीलिये वे उससे डरते हैं )। रघुनन्दन ! अग्निके समीप हथियार रखकर शीघ्र ही सत्यकी शपथ खाकर ऋष्यमूकनिवासी वनचारी वानर सुग्रीवको आप अपना मित्र बना लीजिये ॥ २१½ ॥
स हि स्थानानि कार्त्स्न्येन सर्वाणि कपिकुञ्जरः॥ २२ ॥ नरमांसाशिनां लोके नैपुण्यादधिगच्छति।
भावार्थ
‘कपिश्रेष्ठ सुग्रीव संसारमें नरमांसभक्षी राक्षसोंके जितने स्थान हैं, उन सबको पूर्णरूपसे निपुणतापूर्वक जानते हैं ॥२२½॥
न तस्याविदितं लोके किंचिदस्ति हि राघव ॥ २३ ॥ यावत् सूर्यः प्रतपति सहस्रांशुः परंतप।
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! शत्रुदमन ! सहस्रों किरणोंवाले सूर्यदेव जहाँतक तपते हैं, वहाँतक संसारमें कोई ऐसा स्थान या वस्तु नहीं है, जो सुग्रीवके लिये अज्ञात हो ॥ २३½ ॥
स नदीर्विपुलाञ्शैलान् गिरिदुर्गाणि कन्दरान्॥ २४ ॥ अन्विष्य वानरैः सार्धं पत्नीं तेऽधिगमिष्यति ।
भावार्थ
‘वे वानरोंके साथ रहकर समस्त नदियों, बड़े-बड़े पर्वतों, पहाड़ी दुर्गम स्थानों और कन्दराओंमें भी खोज कराकर आपकी पत्नीका पता लगा लेंगे ॥ २४½ ॥
वानरांश्च महाकायान् प्रेषयिष्यति राघव ॥ २५ ॥ दिशो विचेतुं तां सीतां त्वद्वियोगेन शोचतीम् । अन्वेष्यति वरारोहां मैथिलीं रावणालये ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘राघव ! वे आपके वियोगमें शोक करती हुई सीताकी खोजके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें विशालकाय वानरोंको भेजेंगे, तथा रावणके घरसे भी सुन्दर अङ्गोंवाली मिथिलेशकुमारीको ढूँढ़ निकालेंगे ॥ २५-२६ ॥
स मेरुशृङ्गाग्रगतामनिन्दितां प्रविश्य पातालतलेऽपि वाश्रिताम् । प्लवङ्गमानामृषभस्तव प्रियां निहत्य रक्षांसि पुनः प्रदास्यति ॥२७॥
भावार्थ
‘आपकी प्रिया सती-साध्वी सीता मेरुशिखरके अग्रभागपर पहुँचायी गयी हों या पातालमें प्रवेश करके रक्खी गयी हों, वानरशिरोमणि सुग्रीव समस्त राक्षसोंका वध करके उन्हें पुनः आपके पास ला देंगे’ ॥ २७ ॥
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