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अरण्यकाण्ड, सर्ग 76

दिवं तु तस्यां यातायां शबर्यां स्वेन तेजसा । लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा चिन्तयामास राघवः ॥ १ ॥ चिन्तयित्वा तु धर्मात्मा प्रभावं तं महात्मनाम् । हितकारिणमेकाग्रं लक्ष्मणं राघवोऽब्रवीत् ॥ २ ॥

भावार्थ

अपने तेजसे प्रकाशित होनेवाली शबरीके दिव्यलोकमें चले जानेपर भाई लक्ष्मणसहित धर्मात्मा श्रीरघुनाथजीने उन महात्मा महर्षियोंके प्रभावका चिन्तन किया । चिन्तन करके अपने हितमें संलग्न रहनेवाले एकाग्रचित्त लक्ष्मणसे श्रीरामने इस प्रकार कहा—॥ १-२ ॥

दृष्टो मयाऽऽश्रमः सौम्य बह्वाश्चर्यः कृतात्मनाम् । विश्वस्तमृगशार्दूलो नानाविहगसेवितः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! मैंने उन पुण्यात्मा महर्षियोंका यह पवित्र आश्रम देखा । यहाँ बहुत-सी आश्चर्यजनक बातें हैं । हरिण और बाघ एक दूसरेपर विश्वास करते हैं । नाना प्रकारके पक्षी इस आश्रमका सेवन करते हैं ॥ ३ ॥

सप्तानां च समुद्राणां तेषां तीर्थेषु लक्ष्मण । उपस्पृष्टं च विधिवत् पितरश्चापि तर्पिताः ॥ ४ ॥ प्रणष्टमशुभं यन्नः कल्याणं समुपस्थितम् । तेन त्वेतत् प्रहृष्टं मे मनो लक्ष्मण सम्प्रति ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! यहाँ जो सातों समुद्रोंके जलसे भरे हुए तीर्थ हैं, उनमें हमने विधिपूर्वक स्नान तथा पितरोंका तर्पण किये हैं । इससे हमारा सारा अशुभ नष्ट हो गया और अब हमारे कल्याणका समय उपस्थित हुआ है । सुमित्राकुमार ! इससे इस समय मेरे मनमें अधिक प्रसन्नता हो रही है ॥४-५॥

हृदये मे नरव्याघ्र शुभमाविर्भविष्यति । तदागच्छ गमिष्यावः पम्पां तां प्रियदर्शनाम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ ! अब मेरे हृदयमें कोई शुभ संकल्प उठनेवाला है । इसलिये आओ, अब हम दोनों परम सुन्दर पम्पासरोवरके तटपर चलें ॥ ६ ॥

ऋष्यमूको गिरिर्यत्र नातिदूरे प्रकाशते । यस्मिन् वसति धर्मात्मा सुग्रीवोऽशुमतः सुतः॥ ७ ॥

भावार्थ

‘वहाँसे थोड़ी ही दूरपर वह ऋष्यमूक पर्वत शोभा पाता है, जिसपर सूर्यपुत्र धर्मात्मा सुग्रीव निवास करते हैं ॥ ७ ॥

नित्यं वालिभयात् त्रस्तश्चतुर्भिः सह वानरैः । अहं त्वरे च तं द्रष्टुं सुग्रीवं वानरर्षभम् ॥ ८ ॥ तदधीनं हि मे कार्यं सीतायाः परिमार्गणम् ।

भावार्थ

‘वालीके भयसे सदा डरे रहनेके कारण वे चार वानरोंके साथ उस पर्वतपर रहते हैं । मैं वानरश्रेष्ठ सुग्रीवसे मिलनेके लिये उतावला हो रहा हूँ; क्योंकि सीताके अन्वेषणका कार्य उन्हींके अधीन है’ ॥ ८½ ॥

इति ब्रुवाणं तं वीरं सौमित्रिरिदमब्रवीत् ॥ ९ ॥ गच्छावस्त्वरितं तत्र ममापि त्वरते मनः ।

भावार्थ

इस प्रकारकी बात कहते हुए वीर श्रीरामसे सुमित्राकुमार लक्ष्मणने यों कहा—‘भैया ! हम दोनोंको शीघ्र ही वहाँ चलना चाहिये । मेरा मन भी चलनेके लिये उतावला हो रहा है’ ॥ ९½ ॥

आश्रमात्तु ततस्तस्मात्रिष्कम्य स विशाम्पतिः ॥ १० ॥ आजगाम ततः पम्पां लक्ष्मणेन सह प्रभुः । समीक्षमाणः पुष्पाढ्यं सर्वतो विपुलद्रुमम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

तदनन्तर प्रजापालक भगवान् श्रीराम लक्ष्मणके साथ उस आश्रमसे निकलकर सब ओर फूलोंसे लदे हुए नाना प्रकारके वृक्षोंकी शोभा निहारते हुए पम्पासरोवरके तटपर आये ॥ १०-११ ॥

कोयष्टिभिश्चार्जुनकैः शतपत्रैश्च कीरकैः । एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्नादितं तद् वनं महत् ॥ १२ ॥

भावार्थ

वह विशाल वन टिट्टिभों, मोरों, कठफोड़वों, तोतों तथा अन्य बहुत-से पक्षियोंके कलरवोंसे गूँज रहा था ॥ १२ ॥

स रामो विविधान् वृक्षान् सरांसि विविधानि च । पश्यन् कामाभिसंतप्तो जगाम परमं ह्रदम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

श्रीरामके मनमें सीताजीसे मिलनेकी तीव्र लालसा जाग उठी थी, इससे संतप्त हो वे नाना प्रकारके वृक्षों और भाँति-भाँतिके सरोवरोंकी शोभा देखते हुए उस उत्तम जलाशयके पास गये ॥ १३ ॥

स तामासाद्य वै रामो दूरात् पानीयवाहिनीम् । मतङ्गसरसं नाम ह्रदं समवगाहत ॥ १४ ॥

भावार्थ

पम्पानामसे प्रसिद्ध वह सरोवर पीनेयोग्य स्वच्छ जल बहानेवाला था । श्रीराम दूर देशसे चलकर उसके तटपर आये । आकर उन्होंने मतंगसरस नामक कुण्डमें स्नान किया ॥ १४ ॥

तत्र जग्मतुरव्यग्रौ राघवौ हि समाहितौ । स तु शोकसमाविष्टो रामो दशरथात्मजः ॥ १५ ॥ विवेश नलिनीं रम्यां पङ्कजैश्च समावृताम् ।

भावार्थ

वे दोनों रघुवंशी वीर वहाँ शान्त और एकाग्रचित्त होकर पहुँचे थे । सीताके शोकसे व्याकुल हुए दशरथनन्दन श्रीरामने उस रमणीय पुष्करिणी पम्पामें प्रवेश किया, जो कमलोंसे व्याप्त थी ॥ १५½ ॥

तिलकाशोकपुंनागबकुलोद्दालकाशिनीम् ॥ १६ ॥ रम्योपवनसम्बाधां पद्मसम्पीडितोदकाम् । स्फटिकोपमतोयां तां श्लक्ष्णवालुकसंतताम् ॥ १७ ॥ मत्स्यकच्छपसम्बाधां तीरस्थद्रुमशोभिताम् । सखीभिरिव संयुक्तां लताभिरनुवेष्टिताम् ॥ १८ ॥ किंनरोरगगन्धर्वयक्षराक्षससेवितम् । नानाद्रुमलताकीर्णां शीतवारिनिधिं शुभाम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

उसके तटपर तिलक, अशोक, नागकेसर, वकुल तथा लिसोड़ेके वृक्ष उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । भाँति-भाँतिके रमणीय उपवनोंसे वह घिरी हुई थी । उसका जल कमलपुष्पोंसे आच्छादित था और स्फटिक मणिके समान स्वच्छ दिखायी देता था । जलके नीचे स्वच्छ बालुका फैली हुई थी । मत्स्य और कच्छप उसमें भरे हुए थे । तटवर्ती वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते थे । सब ओर लताओंद्वारा आवेष्टित होनेके कारण वह सखियोंसे संयुक्त-सी प्रतीत होती थी । किन्नर, नाग, गन्धर्व, यक्ष और राक्षस उसका सेवन करते थे । भाँति-भाँतिके वृक्ष और लताओंसे व्याप्त हुई पम्पा शीतल जलकी सुन्दर निधि प्रतीत होती थी ॥ १६—१९ ॥

पद्मसौगन्धिकैस्ताम्रां शुक्लां कुमुदमण्डलैः । नीलां कुवलयोद्घाटैर्बहुवर्णां कुथामिव ॥ २० ॥

भावार्थ

अरुण कमलोंसे वह ताम्रवर्णकी, कुमुद-कुसुमोंके समूहसे शुक्ल वर्णकी तथा नील कमलोंके समुदायसे नीलवर्णकी दिखायी देनेके कारण बहुरंगे कालीनके समान शोभा पाती थी ॥ २० ॥

अरविन्दोत्पलवतीं पद्मसौगन्धिकायुताम् । पुष्पिताम्रवणोपेतां बर्हिणोद्घुष्टनादिताम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

उस पुष्करिणीमें अरविन्द और उत्पल खिले थे । पद्म और सौगन्धिक जातिके पुष्प शोभा पाते थे । मौर लगी हुई अमराइयोंसे वह घिरी हुई थी तथा मयूरोंके केकानाद वहाँ गूँज रहे थे ॥ २१ ॥

स तां दृष्ट्वा ततः पम्पां रामः सौमित्रिणा सह । विललाप च तेजस्वी रामो दशरथात्मजः ॥ २२ ॥

भावार्थ

सुमित्राकुमार लक्ष्मणसहित श्रीरामने जब उस मनोहर पम्पाको देखा, तब उनके हृदयमें सीताकी वियोग-व्यथा उद्दीप्त हो उठी; अतः वे तेजस्वी दशरथनन्दन श्रीराम वहाँ विलाप करने लगे ॥ २२ ॥

तिलकैर्बीजपूरैश्च वटैः शुक्लद्रुमैस्तथा । पुष्पितैः करवीरैश्च पुंनागैश्च सुपुष्पितैः ॥ २३ ॥ मालतीकुन्दगुल्मैश्च भण्डीरैर्निचुलैस्तथा । अशोकैः सप्तपर्णैश्च कतकैरतिमुक्तकैः ॥ २४ ॥ अन्यैश्च विविधैर्वृक्षैः प्रमदामिव शोभिताम् । अस्यास्तीरे तु पूर्वोक्तः पर्वतो धातुमण्डितः ॥ २५ ॥ ऋष्यमूक इति ख्यातश्चित्रपुष्पितपादपः ।

भावार्थ

तिलक, बिजौरा, वट, लोध, खिले हुए करवीर, पुष्पित नागकेसर, मालती, कुन्द, झाड़ी, भंडीर ( बरगद ), वञ्जुल, अशोक, छितवन, कतक, माधवी लता तथा अन्य नाना प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित हुई पम्पा भाँति-भाँतिकी वस्त्रभूषाओंसे सजी हुई युवतीके समान जान पड़ती थी । उसीके तटपर विविध धातुओंसे मण्डित पूर्वोक्त ऋष्यमूक नामसे विख्यात पर्वत सुशोभित था । उसके ऊपर फूलोंसे भरे हुए विचित्र वृक्ष शोभा दे रहे थे ॥ २३–२५½ ॥

हरिर्ऋक्षरजोनाम्नः पुत्रस्तस्य महात्मनः ॥ २६ ॥ अध्यास्ते तु महावीर्यः सुग्रीव इति विश्रुतः ।

भावार्थ

ऋक्षरजा नामक महात्मा वानरके पुत्र कपिश्रेष्ठ महापराक्रमी सुग्रीव वहीं निवास करते थे ॥ २६½ ॥

सुग्रीवमभिगच्छ त्वं वानरेन्द्रं नरर्षभ ॥ २७ ॥ इत्युवाच पुनर्वाक्यं लक्ष्मणं सत्यविक्रमः । कथं मया विना सीतां शक्यं लक्ष्मण जीवितुम् ॥ २८ ॥

भावार्थ

उस समय सत्यपराक्रमी श्रीरामने पुनः लक्ष्मणसे कहा— ‘नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ! तुम वानरराज सुग्रीवके पास चलो, मैं सीताके बिना कैसे जीवित रह सकता हूँ’ ॥ २७-२८ ॥

इत्येवमुक्त्वा मदनाभिपीडितः स लक्ष्मणं वाक्यमनन्यचेतनः । विवेश पम्पां नलिनीमनोरमां तमुत्तमं शोकमुदीरयाणः ॥ २९ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर सीताके दर्शनकी कामनासे पीड़ित तथा उनके प्रति अनन्य अनुराग रखनेवाले श्रीराम उस महान् शोकको प्रकट करते हुए उस मनोरम पुष्करिणी पम्पामें उतरे ॥ २९ ॥

क्रमेण गत्वा प्रविलोकयन् वनं ददर्श पम्पां शुभदर्शकाननाम् । अनेकनानाविधपक्षिसंकुलां विवेश रामः सह लक्ष्मणेन ॥ ३० ॥

भावार्थ

वनकी शोभा देखते हुए क्रमशः वहाँ जाकर लक्ष्मणसहित श्रीरामने पम्पाको देखा । उसके समीपवर्ती कानन बड़े सुन्दर और दर्शनीय थे । अनेक प्रकारके झुंड-के-झुंड पक्षी वहाँ सब ओर भरे हुए थे । भाईसहित श्रीरघुनाथजीने पम्पाके जलमें प्रवेश किया ॥ ३० ॥

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