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अरण्यकाण्ड, सर्ग 70

कृत्वैवमुदकं तस्मै प्रस्थितौ राघवौ तदा । अवेक्षन्तौ वने सीतां जग्मतुः पश्चिमां दिशम् ॥ १ ॥

भावार्थ

इस प्रकार जटायुके लिये जलाञ्जलि दान करके वे दोनों रघुवंशी बन्धु उस समय वहाँसे प्रस्थित हुए और वनमें सीताकी खोज करते हुए पश्चिम दिशा ( नैर्ऋत्य कोण ) की ओर गये ॥ १ ॥

तां दिशं दक्षिणां गत्वा शरचापासिधारिणौ । अत्रिप्रहतमैक्ष्वाकौ पन्थानं प्रतिपेदतुः ॥ २ ॥

भावार्थ

धनुष, बाण और खड्ग धारण किये वे दोनों इक्ष्वाकुवंशी वीर उस दक्षिण-पश्चिम दिशाकी ओर आगे बढ़ते हुए एक ऐसे मार्गपर जा पहुँचे, जिसपर लोगोंका आना-जाना नहीं होता था ॥ २ ॥

गुल्मैर्वृक्षैश्च बहुभिर्लताभिश्च प्रवेष्टितम् । आवृतं सर्वतो दुर्गं गहनं घोरदर्शनम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

वह मार्ग बहुत-से वृक्षों, झाड़ियों और लता-बेलोंद्वारा सब ओरसे घिरा हुआ था । वह बहुत ही दुर्गम, गहन और देखनेमें भयंकर था ॥ ३ ॥

व्यतिक्रम्य तु वेगेन गृहीत्वा दक्षिणां दिशम् । सुभीमं तन्महारण्यं व्यतिपातौ महाबलौ ॥ ४ ॥

भावार्थ

उसे वेगपूर्वक लाँघकर वे दोनों महाबली राजकुमार दक्षिण दिशाका आश्रय ले उस अत्यन्त भयानक और विशाल वनसे आगे निकल गये ॥ ४ ॥

ततः परं जनस्थानात् त्रिकोशं गम्य राघवौ । क्रौञ्चारण्यं विविशतुर्गहनं तौ महौजसौ ॥ ५ ॥

भावार्थ

तदनन्तर जनस्थानसे तीन कोस दूर जाकर वे महाबली श्रीराम और लक्ष्मण क्रौञ्चारण्य नामसे प्रसिद्ध गहन वनके भीतर गये ॥ ५ ॥

नानामेघघनप्रख्यं प्रहृष्टमिव सर्वतः । नानावर्णैः शुभैः पुष्पैर्मृगपक्षिगणैर्युतम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

वह वन अनेक मेघोंके समूहकी भाँति श्याम प्रतीत होता था । विविध रंगके सुन्दर फूलोंसे सुशोभित होनेके कारण वह सब ओरसे हर्षोत्फुल्ल-सा जान पड़ता था । उसके भीतर बहुत-से पशु-पक्षी निवास करते थे ॥ ६ ॥

दिदृक्षमाणौ वैदेहीं तद् वनं तौ विचिक्यतुः । तत्र तत्रावतिष्ठन्तौ सीताहरणदुःखितौ ॥ ७ ॥

भावार्थ

सीताका पता लगानेकी इच्छासे वे दोनों उस वनमें उनकी खोज करने लगे । जहाँ-तहाँ थक जानेपर वे विश्रामके लिये ठहर जाते थे । विदेहनन्दिनीके अपहरणसे उन्हें बड़ा दुःख हो रहा था ॥ ७ ॥

ततः पूर्वेण तौ गत्वा त्रिकोशं भ्रातरौ तदा । क्रौञ्चारण्यमतिक्रम्य मतङ्गाश्रममन्तरे ॥ ८ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् वे दोनों भाई तीन कोस पूर्व जाकर क्रौञ्चा-रण्यको पार करके मतङ्ग मुनिके आश्रमके पास गये ॥८॥

दृष्ट्वा तु तद् वनं घोरं बहुभीममृगद्विजम् । नानावृक्षसमाकीर्णं सर्वं गहनपादपम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

वह वन बड़ा भयंकर था । उसमें बहुत-से भयानक पशु और पक्षी निवास करते थे । अनेक प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त वह सारा वन गहन वृक्षावलियोंसे भरा था ॥ ९ ॥

ददृशाते गिरौ तत्र दरीं दशरथात्मजौ । पातालसमगम्भीरां तमसा नित्यसंवृताम् ॥ १० ॥

भावार्थ

वहाँ पहुँचकर उन दशरथराजकुमारोंने वहाँके पर्वतपर एक गुफा देखी, जो पातालके समान गहरी थी । वह सदा अन्धकारसे आवृत रहती थी ॥ १० ॥

आसाद्य च नरव्याघ्रौ दर्यास्तस्याविदूरतः । ददर्शतुर्महारूपां राक्षसीं विकृताननाम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

उसके समीप जाकर उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंने एक विशालकाय राक्षसी देखी, जिसका मुख बड़ा विकराल था ॥ ११ ॥

भयदामल्पसत्त्वानां बीभत्सां रौद्रदर्शनाम् । लम्बोदरीं तीक्ष्णदंष्ट्रां करालीं परुषत्वचम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

वह छोटे-छोटे जन्तुओंको भय देनेवाली तथा देखनेमें बड़ी भयंकर थी । उसकी सूरत देखकर घृणा होती थी । उसके लंबे पेट, तीखी दाढ़ें और कठोर त्वचा थी । वह बड़ी विकराल दिखायी देती थी ॥ १२ ॥

भक्षयन्तीं मृगान् भीमान् विकटां मुक्तमूर्धजाम् । अवैक्षतां तु तौ तत्र भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १३ ॥

भावार्थ

भयानक पशुओंको भी पकड़कर खा जाती थी । उसका आकार विकट था और बाल खुले हुए थे । उस कन्दराके समीप दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणने उसे देखा ॥ १३ ॥

सा समासाद्य तौ वीरौ व्रजन्तं भ्रातुरग्रतः । एहि रंस्यावहेत्युक्त्वा समालम्भत लक्ष्मणम् ॥ १४ ॥

भावार्थ

वह राक्षसी उन दोनों वीरोंके पास आयी और अपने भाईके आगे-आगे चलते हुए लक्ष्मणकी ओर देखकर बोली— ‘आओ हम दोनों रमण करें ।’ ऐसा कहकर उसने लक्ष्मणका हाथ पकड़ लिया ॥ १४ ॥

उवाच चैनं वचनं सौमित्रिमुपगुह्य च । अहं त्वयोमुखी नाम लाभस्ते त्वमसि प्रियः ॥ १५ ॥

भावार्थ

इतना ही नहीं, उसने सुमित्राकुमारको अपनी भुजाओंमें कस लिया और इस प्रकार कहा—‘मेरा नाम अयोमुखी है । मैं तुम्हें भार्यारूपसे मिल गयी तो समझ लो, बहुत बड़ा लाभ हुआ और तुम मेरे प्यारे पति हो ॥ १५ ॥

नाथ पर्वतदुर्गेषु नदीनां पुलिनेषु च । आयुश्चिरमिदं वीर त्वं मया सह रंस्यसे ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘प्राणनाथ ! वीर ! यह दीर्घकालतक स्थिर रहनेवाली आयु पाकर तुम पर्वतकी दुर्गम कन्दराओंमें तथा नदियोंके तटोंपर मेरे साथ सदा रमण करोगे’ ॥ १६ ॥

एवमुक्तस्तु कुपितः खड्गमुद्धृत्य लक्ष्मणः । कर्णनासस्तनं तस्या निचकर्तारिसूदनः ॥ १७ ॥

भावार्थ

राक्षसीके ऐसा कहनेपर शत्रुसूदन लक्ष्मण क्रोधसे जल उठे । उन्होंने तलवार निकालकर उसके कान, नाक और स्तन काट डाले ॥ १७ ॥

कर्णनासे निकृत्ते तु विस्वरं विननाद सा। यथागतं प्रदुद्राव राक्षसी घोरदर्शना ॥ १८ ॥

भावार्थ

नाक और कानके कट जानेपर वह भयंकर राक्षसी जोर-जोरसे चिल्लाने लगी और जहाँसे आयी थी; उधर ही भाग गयी ॥ १८ ॥

तस्यां गतायां गहनं व्रजन्तौ वनमोजसा । आसेदतुरमित्रघ्नौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १९ ॥

भावार्थ

उसके चले जानेपर वे दोनों भाई शक्तिशाली श्रीराम और लक्ष्मण बड़े वेगसे चलकर एक गहन वनमें जा पहुँचे ॥ १९ ॥

लक्ष्मणस्तु महातेजाः सत्त्ववाञ्छीलवाञ्छुचिः । अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं भ्रातरं दीप्ततेजसम् ॥ २० ॥

भावार्थ

उस समय महातेजस्वी, धैर्यवान्, सुशील एवं पवित्र आचार-विचारवाले लक्ष्मणने हाथ जोड़कर अपने तेजस्वी भ्राता श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—॥ २० ॥

स्पन्दते मे दृढं बाहुरुद्विग्नमिव मे मनः । प्रायशश्चाप्यनिष्टानि निमित्तान्युपलक्षये ॥ २१ ॥ तस्मात् सज्जीभवार्य त्वं कुरुष्व वचनं मम । ममैव हि निमित्तानि सद्यः शंसन्ति सम्भ्रमम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘आर्य ! मेरी बायीं बाँह जोर-जोरसे फड़क रही है और मन उद्विग्न-सा हो रहा है । मुझे बार-बार बुरे शकुन दिखायी देते हैं, इसलिये आप भयका सामना करनेके लिये तैयार हो जाइये । मेरी बात मानिये । ये जो बुरे शकुन हैं, वे केवल मुझे ही तत्काल प्राप्त होनेवाले भयकी सूचना देते हैं ॥२१-२२॥

एष वञ्जुलको नाम पक्षी परमदारुणः । आवयोर्विजयं युद्धे शंसन्निव विनर्दति ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘( इसके साथ एक शुभ शकुन भी हो रहा है ) यह जो वञ्जुल नामक अत्यन्त दारुण पक्षी है, यह युद्धमें हम दोनोंकी विजय सूचित करता हुआ-सा जोर-जोरसे बोल रहा है’ ॥ २३ ॥

तयोरन्वेषतोरेवं सर्वं तद् वनमोजसा । संजज्ञे विपुलः शब्दः प्रभञ्जन्निव तद् वनम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

इस प्रकार बलपूर्वक उस सारे वनमें वे दोनों भाई जब सीताकी खोज कर रहे थे, उसी समय वहाँ बड़े जोरका शब्द हुआ, जो उस वनका विध्वंस करता हुआ-सा प्रतीत होता था ॥ २४ ॥

संवेष्टितमिवात्यर्थं गहनं मातरिश्वना । वनस्य तस्य शब्दोऽभूद् वनमापूरयन्निव ॥ २५ ॥

भावार्थ

उस वनमें जोर-जोरसे आँधी चलने लगी । वह सारा वन उसकी लपेटमें आ गया । वनमें उस शब्दकी जो प्रतिध्वनि उठी, उससे वह सारा वनप्रान्त गूँज उठा ॥२५॥

तं शब्दं काङ्क्षमाणस्तु रामः खड्गी सहानुजः । ददर्श सुमहाकायं राक्षसं विपुलोरसम् ॥ २६ ॥

भावार्थ

भाईके साथ तलवार हाथमें लिये भगवान् श्रीराम उस शब्दका पता लगाना ही चाहते थे कि एक चौड़ी छातीवाले विशालकाय राक्षसपर उनकी दृष्टि पड़ी ॥ २६ ॥

आसेदतुश्च तद्रक्षस्तावुभौ प्रमुखे स्थितम् । विवृद्धमशिरोग्रीवं कबन्धमुदरेमुखम् ॥ २७ ॥

भावार्थ

उन दोनों भाइयोंने उस राक्षसको अपने सामने खड़ा पाया । वह देखनेमें बहुत बड़ा था; किंतु उसके न मस्तक था न गला । कबन्ध ( धड़मात्र ) ही उसका स्वरूप था और उसके पेटमें ही मुँह बना हुआ था ॥ २७ ॥

रोमभिर्निशितैस्तीक्ष्णैर्महागिरिमिवोच्छ्रितम् । नीलमेघनिभं रौद्रं मेघस्तनितनिःस्वनम् ॥ २८ ॥

भावार्थ

उसके सारे शरीरमें पैने और तीखे रोयें थे । वह महान् पर्वतके समान ऊँचा था । उसकी आकृति बड़ी भयंकर थी । वह नील मेघके समान काला था और मेघके समान ही गम्भीर स्वरमें गर्जना करता था ॥ २८ ॥

अग्निज्वालानिकाशेन ललाटस्थेन दीप्यता । महापक्ष्मेण पिङ्गेन विपुलेनायतेन च ॥ २९ ॥ एकेनोरसि घोरेण नयनेन सुदर्शिना । महादंष्ट्रोपपन्नं तं लेलिहानं महामुखम् ॥ ३० ॥

भावार्थ

उसकी छातीमें ही ललाट था और ललाटमें एक ही लंबी-चौड़ी तथा आगकी ज्वालाके समान दहकती हुई भयंकर आँख थी, जो अच्छी तरह देख सकती थी । उसकी पलक बहुत बड़ी थी और वह आँख भूरे रंगकी थी । उस राक्षसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं तथा वह अपनी लपलपाती हुई जीभसे अपने विशाल मुखको बारंबार चाट रहा था ॥ २९-३० ॥

भक्षयन्तं महाघोरानृक्षसिंहमृगद्विजान् । घोरौ भुजौ विकुर्वाणमुभौ योजनमायतौ ॥ ३१ ॥ कराभ्यां विविधान् गृह्य ऋक्षान् पक्षिगणान् मृगान् । आकर्षन्तं विकर्षन्तमनेकान् मृगयूथपान् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

अत्यन्त भयंकर रीछ, सिंह, हिंसक पशु और पक्षी—ये ही उसके भोजन थे । वह अपनी एक-एक योजन लंबी दोनों भयानक भुजाओंको दूरतक फैला देता और उन दोनों हाथोंसे नाना प्रकारके अनेकों भालू, पक्षी, पशु तथा मृगोंके यूथपतियोंको पकड़कर खींच लेता था । उनमेंसे जो उसे भोजनके लिये अभीष्ट नहीं होते, उन जन्तुओंको वह उन्हीं हाथोंसे पीछे ढकेल देता था ॥ ३१-३२ ॥

स्थितमावृत्य पन्थानं तयोर्भ्रात्रोः प्रपन्नयोः। अथ तं समतिक्रम्य कोशमात्रं ददर्शतुः ॥ ३३ ॥ महान्तं दारुणं भीमं कबन्धं भुजसंवृतम् । कबन्धमिव संस्थानादतिघोरप्रदर्शनम् ॥ ३४ ॥

भावार्थ

दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जब उसके निकट पहुँचे, तब वह उनका रास्ता रोककर खड़ा हो गया। तब वे दोनों भाई उससे दूर हट गये और बड़े गौरसे उसे देखने लगे। उस समय वह एक कोस लंबा जान पड़ा। उस राक्षसकी आकृति केवल कबन्ध ( धड़ ) के ही रूपमें थी, इसलिये वह कबन्ध कहलाता था। वह विशाल, हिंसापरायण, भयंकर तथा दो बड़ी-बड़ी भुजाओंसे युक्त था और देखनेमें अत्यन्त घोर प्रतीत होता था ॥ ३३-३४ ॥

स महाबाहुरत्यर्थं प्रसार्य विपुलौ भुजौ। जग्राह सहितावेव राघवौ पीडयन् बलात् ॥ ३५ ॥

भावार्थ

उस महाबाहु राक्षसने अपनी दोनों विशाल भुजाओंको फैलाकर उन दोनों रघुवंशी राजकुमारोंको बलपूर्वक पीड़ा देते हुए एक साथ ही पकड़ लिया ॥ ३५ ॥

खड्गिनौ दृढधन्वानौ तिग्मतेजौ महाभुजौ। भ्रातरौ विवशं प्राप्तौ कृष्यमाणौ महाबलौ ॥ ३६ ॥

भावार्थ

दोनोंके हाथोंमें तलवारें थीं, दोनोंके पास मजबूत धनुष थे और वे दोनों भाई प्रचण्ड तेजस्वी, विशाल भुजाओंसे युक्त तथा महान् बलवान् थे तो भी उस राक्षसके द्वारा खींचे जानेपर विवशताका अनुभव करने लगे ॥ ३६ ॥

तत्र धैर्याच्च शूरस्तु राघवो नैव विव्यथे। बाल्यादनाश्रयाच्चैव लक्ष्मणस्त्वभिविव्यथे ॥ ३७ ॥

भावार्थ

उस समय वहाँ शूरवीर रघुनन्दन श्रीराम तो धैर्यके कारण व्यथित नहीं हुए, परंतु बालबुद्धि होने तथा धैर्यका आश्रय न लेनेके कारण लक्ष्मणके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ ३७ ॥

उवाच च विषण्णः सन् राघवं राघवानुजः। पश्य मां विवशं वीर राक्षसस्य वशंगतम् ॥ ३८ ॥

भावार्थ

तब श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मण विषादग्रस्त हो श्रीरघुनाथजीसे बोले—‘वीरवर ! देखिये, मैं राक्षसके वशमें पड़कर विवश हो गया हूँ ॥ ३८ ॥

मयैकेन तु निर्युक्तः परिमुच्यस्व राघव। मां हि भूतबलिं दत्त्वा पलायस्व यथासुखम् ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! एकमात्र मुझे ही इस राक्षसको भेंट देकर आप स्वयं इसके बाहुबन्धनसे मुक्त हो जाइये । इस भूतको मेरी ही बलि देकर आप सुखपूर्वक यहाँसे निकल भागिये ॥ ३९ ॥

अधिगन्तासि वैदेहीमचिरेणेति मे मतिः। प्रतिलभ्य च काकुत्स्थ पितृपैतामहीं महीम् ॥ ४० ॥ तत्र मां राम राज्यस्थः स्मर्तुमर्हसि सर्वदा।

भावार्थ

‘मेरा विश्वास है कि आप शीघ्र ही विदेहराजकुमारीको प्राप्त कर लेंगे । ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ! वनवाससे लौटनेपर पिता-पितामहोंकी भूमिको अपने अधिकारमें लेकर जब आप राज-सिंहासनपर विराजमान होइयेगा, तब वहाँ सदा मेरा भी स्मरण करते रहियेगा’ ॥ ४०½ ॥

लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु रामः सौमित्रिमब्रवीत् ॥ ४१ ॥ मा स्म त्रासं वृथा वीर नहि त्वादृग् विषीदति ।

भावार्थ

लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर श्रीरामने उन सुमित्राकुमारसे कहा—‘वीर ! तुम भयभीत न होओ । तुम्हारे-जैसे शूरवीर इस तरह विषाद नहीं करते हैं’ ॥ ४१½ ॥

एतस्मिन्नन्तरे क्रूरो भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ४२ ॥ तावुवाच महाबाहुः कबन्धो दानवोत्तमः ।

भावार्थ

इसी बीचमें क्रूर हृदयवाले दानवशिरोमणि महाबाहु कबन्धने उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे कहा—॥४२½॥

कौ युवां वृषभस्कन्धौ महाखड्गधनुर्धरौ ॥ ४३ ॥ घोरं देशमिमं प्राप्तौ दैवेन मम चाक्षुषौ । वदतं कार्यमिह वां किमर्थं चागतौ युवाम् ॥ ४४ ॥

भावार्थ

‘तुम दोनों कौन हो ? तुम्हारे कंधे बैलके समान ऊँचे हैं । तुमने बड़ी-बड़ी तलवारें और धनुष धारण कर रखे हैं । इस भयंकर देशमें तुम दोनों किसलिये आये हो ? यहाँ तुम्हारा क्या कार्य है ? बताओ । भाग्यसे ही तुम दोनों मेरी आँखोंके सामने पड़ गये ॥ ४३-४४ ॥

इमं देशमनुप्राप्तौ क्षुधार्तस्येह तिष्ठतः । सबाणचापखड्गौ च तीक्ष्णशृङ्गाविवर्षभौ ॥ ४५ ॥ मां तूर्णमनुसम्प्राप्तौ दुर्लभं जीवितं हि वाम् ।

भावार्थ

‘मैं यहाँ भूखसे पीड़ित होकर खड़ा था और तुम स्वयं धनुष-बाण और खड्ग लिये तीखे सींगवाले दो बैलोंके समान तुरंत ही इस स्थानपर मेरे निकट आ पहुँचे । अतः अब तुम दोनोंका जीवित रहना कठिन है’ ॥ ४५½ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कबन्धस्य दुरात्मनः ॥ ४६ ॥ उवाच लक्ष्मणं रामो मुखेन परिशुष्यता । कृच्छ्रात् कृच्छ्रतरं प्राप्य दारुणं सत्यविक्रम ॥ ४७ ॥ व्यसनं जीवितान्ताय प्राप्तमप्राप्य तां प्रियाम् ।

भावार्थ

दुरात्मा कबन्धकी ये बातें सुनकर श्रीरामने सूखे मुखवाले लक्ष्मणसे कहा—‘सत्यपराक्रमी वीर ! कठिन से-कठिन असह्य दुःखको पाकर हम दुखी थे ही, तबतक पुनः प्रियतमा सीताके प्राप्त होनेसे पहले ही हम दोनोंपर यह महान् संकट आ गया, जो जीवनका अन्त कर देनेवाला है ॥४६-४७½॥

कालस्य सुमहद् वीर्यं सर्वभूतेषु लक्ष्मण ॥ ४८ ॥ त्वां च मां च नरव्याघ्र व्यसनैः पश्य मोहितौ । नहि भारोऽस्ति दैवस्य सर्वभूतेषु लक्ष्मण ॥ ४९ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ! कालका महान् बल सभी प्राणियोंपर अपना प्रभाव डालता है । देखो न, तुम और मैं दोनों ही कालके दिये हुए अनेकानेक संकटोंसे मोहित हो रहे हैं । सुमित्रानन्दन ! दैव अथवा कालके लिये सम्पूर्ण प्राणियोंपर शासन करना भाररूप ( कठिन ) नहीं है ॥ ४८-४९ ॥

शूराश्च बलवन्तश्च कृतास्त्राश्च रणाजिरे । कालाभिपन्नाः सीदन्ति यथा वालुकसेतवः ॥ ५० ॥

भावार्थ

‘जैसे बालूके बने हुए पुल पानीके आघातसे ढह जाते हैं, उसी प्रकार बड़े-बड़े शूरवीर, बलवान् और अस्त्रवेत्ता पुरुष भी समराङ्गणमें कालके वशीभूत हो कष्टमें पड़ जाते हैं’ ॥ ५० ॥

इति ब्रुवाणो दृढसत्यविक्रमो महायशा दाशरथिः प्रतापवान् । अवेक्ष्य सौमित्रिमुदग्रविक्रमः स्थिरां तदा स्वां मतिमात्मनाकरोत् ॥ ५१ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर सुदृढ़ एवं सत्यपराक्रमवाले महान् बल-विक्रमसे सम्पन्न महायशस्वी प्रतापशाली दशरथनन्दन श्रीरामने सुमित्राकुमारकी ओर देखकर उस समय स्वयं ही अपनी बुद्धिको सुस्थिर कर लिया ॥ ५१ ॥

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