अरण्यकाण्ड, सर्ग 71
तौ तु तत्र स्थितौ दृष्ट्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । बाहुपाशपरिक्षिप्तौ कबन्धो वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
अपने बाहुपाशसे घिरकर वहाँ खड़े हुए उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणकी ओर देखकर कबन्धने कहा—॥ १ ॥
तिष्ठतः किं नु मां दृष्ट्वा क्षुधार्तं क्षत्रियर्षभौ । आहारार्थं तु संदिष्टौ दैवेन हतचेतनौ ॥ २ ॥
भावार्थ
‘क्षत्रियशिरोमणि राजकुमारो ! मुझे भूखसे पीड़ित देखकर भी खड़े क्यों हो ? ( मेरे मुँहमें चले आओ ) क्योंकि दैवने मेरे भोजनके लिये ही तुम्हें यहाँ भेजा है । इसीलिये तुम दोनोंकी बुद्धि मारी गयी है’ ॥ २ ॥
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणो वाक्यं प्राप्तकालं हितं तदा । उवाचार्तिसमापन्नो विक्रमे कृतनिश्चयः ॥ ३ ॥ त्वां च मां च पुरा तूर्णमादत्ते राक्षसाधमः । तस्मादसिभ्यामस्याशु बाहू छिन्दावहे गुरू ॥ ४ ॥
भावार्थ
यह सुनकर पीड़ित हुए लक्ष्मणने उस समय पराक्रमका ही निश्चय करके यह समयोचित एवं हितकर बात कही—॥ ‘भैया ! यह नीच राक्षस मुझको और आपको तुरंत मुँहमें ले ले, इसके पहले ही हमलोग अपनी तलवारोंसे इसकी बड़ी-बड़ी बाँहें शीघ्र ही काट डालें ॥ ४ ॥
भीषणोऽयं महाकायो राक्षसो भुजविक्रमः । लोकं ह्यतिजितं कृत्वा ह्यावां हन्तुमिहेच्छति ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘यह महाकाय राक्षस बड़ा भीषण है । इसकी भुजाओंमें ही इसका सारा बल और पराक्रम निहित है । यह समस्त संसारको सर्वथा पराजित-सा करके अब हमलोगोंको भी यहाँ मार डालना चाहता है ॥ ५ ॥
निश्चेष्टानां वधो राजन् कुत्सितो जगतीपतेः । क्रतुमध्योपनीतानां पशूनामिव राघव ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! रघुनन्दन ! यज्ञमें लाये गये पशुओंके समान निश्चेष्ट प्राणियोंका वध राजाके लिये निन्दित बताया गया है ( इसलिये हमें इसके प्राण नहीं लेने चाहिये, केवल भुजाओंका ही उच्छेद कर देना चाहिये )’॥ ६ ॥
एतत् संजल्पितं श्रुत्वा तयोः क्रुद्धस्तु राक्षसः । विदार्यास्यं ततो रौद्रं तौ भक्षयितुमारभत् ॥ ७ ॥
भावार्थ
उन दोनोंकी यह बातचीत सुनकर उस राक्षसको बड़ा क्रोध हुआ और वह अपना भयंकर मुख फैलाकर उन्हें खा जानेको उद्यत हो गया ॥ ७ ॥
ततस्तौ देशकालज्ञौ खड्गाभ्यामेव राघवौ । अच्छिन्दतां सुसंहृष्टौ बाहू तस्यांसदेशतः ॥ ८ ॥
भावार्थ
इतनेमें ही देश-काल ( अवसर ) का ज्ञान रखनेवाले उन दोनों रघुवंशी राजकुमारोंने अत्यन्त हर्षमें भरकर तलवारोंसे ही उसकी दोनों भुजाएँ कंधोंसे काट गिरायीं ॥८॥
दक्षिणो दक्षिणं बाहुमसक्तमसिना ततः । चिच्छेद रामो वेगेन सव्यं वीरस्तु लक्ष्मणः ॥ ९ ॥ स पपात महाबाहुश्छिन्नबाहुर्महास्वनः । खं च गां च दिशश्चैव नादयञ्जलदो यथा ॥ १० ॥
भावार्थ
भगवान् श्रीराम उसके दाहिने भागमें खड़े थे । उन्होंने अपनी तलवारसे उसकी दाहिनी बाँह बिना किसी रुकावटके वेगपूर्वक काट डाली तथा वाम भागमें खड़े वीर लक्ष्मणने उसकी बायीं भुजाको तलवारसे उड़ा दिया ॥ भुजाएँ कट जानेपर वह महाबाहु राक्षस मेघके समान गम्भीर गर्जना करके पृथ्वी, आकाश तथा दिशाओंको गुँजाता हुआ धरतीपर गिर पड़ा ॥ १० ॥
स निकृत्तौ भुजौ दृष्ट्वा शोणितौघपरिप्लुतः । दीनः पप्रच्छ तौ वीरौ कौ युवामिति दानवः ॥ ११ ॥
भावार्थ
अपनी भुजाओंको कटी हुई देख खूनसे लथपथ हुए उस दानवने दीन वाणीमें पूछा—‘वीरो ! तुम दोनों कौन हो ?’ ॥ ११ ॥
इति तस्य ब्रुवाणस्य लक्ष्मणः शुभलक्षणः । शशंस तस्य काकुत्स्थं कबन्धस्य महाबलः ॥ १२ ॥
भावार्थ
कबन्धके इस प्रकार पूछनेपर शुभ लक्षणोंवाले महाबली लक्ष्मणने उसे श्रीरामचन्द्रजीका परिचय देना आरम्भ किया—॥ १२ ॥
अयमिक्ष्वाकुदायादो रामो नाम जनैः श्रुतः । तस्यैवावरजं विद्धि भ्रातरं मां च लक्ष्मणम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘ये इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथके पुत्र हैं और लोगोंमें श्रीराम नामसे विख्यात हैं । मुझे इन्हींका छोटा भाई समझो । मेरा नाम लक्ष्मण है ॥ १३ ॥
मात्रा प्रतिहते राज्ये रामः प्रव्राजितो वनम् । मया सह चरत्येष भार्यया च महद् वनम् ॥ १४ ॥ अस्य देवप्रभावस्य वसतो विजने वने । रक्षसापहृता भार्या यामिच्छन्ताविहागतौ ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘माता कैकेयीके द्वारा जब इनका राज्याभिषेक रोक दिया गया, तब ये पिताकी आज्ञासे वनमें चले आये और मेरे तथा अपनी पत्नीके साथ इस विशाल वनमें विचरण करने लगे । इस निर्जन वनमें रहते हुए इन देवतुल्य प्रभावशाली श्रीरघुनाथजीकी पत्नीको किसी राक्षसने हर लिया है । उन्हींका पता लगानेकी इच्छासे हमलोग यहाँ आये हैं ॥ १४-१५ ॥
त्वं तु को वा किमर्थं वा कबन्धसदृशो वने । आस्येनोरसि दीप्तेन भग्नजङ्घो विचेष्टसे ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘तुम कौन हो ? और कबन्धके समान रूप धारण करके क्यों इस वनमें पड़े हो ? छातीके नीचे चमकता हुआ मुँह और टूटी हुई जंघा ( पिण्डली ) लिये तुम किस कारण इधर-उधर लुढ़कते फिरते हो ?’ ॥ १६ ॥
एवमुक्तः कबन्धस्तु लक्ष्मणेनोत्तरं वचः । उवाच वचनं प्रीतस्तदिन्द्रवचनं स्मरन् ॥ १७ ॥
भावार्थ
लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर कबन्धको इन्द्रकी कही हुई बातका स्मरण हो आया । अतः उसने बड़ी प्रसन्नताके साथ लक्ष्मणको उनकी बातका उत्तर दिया—॥ १७ ॥
स्वागतं वां नरव्याघ्रौ दिष्ट्या पश्यामि वामहम् । दिष्ट्या चेमौ निकृत्तौ मे युवाभ्यां बाहुबन्धनौ ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह वीरो ! आप दोनोंका स्वागत है । बड़े भाग्यसे मुझे आपलोगोंका दर्शन मिला है । ये मेरी दोनों भुजाएँ मेरे लिये भारी बन्धन थीं । सौभाग्यकी बात है कि आपलोगोंने इन्हें काट डाला ॥ १८ ॥
विरूपं यच्च मे रूपं प्राप्तं ह्यविनयाद् यथा । तन्मे शृणु नरव्याघ्र तत्त्वतः शंसतस्तव ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ श्रीराम ! मुझे जो ऐसा कुरूप रूप प्राप्त हुआ है, यह मेरी ही उद्दण्डताका फल है । यह सब कैसे हुआ, वह प्रसङ्ग आपको मैं ठीक-ठीक बता रहा हूँ । आप मुझसे सुनें’ ॥ १९ ॥
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