अरण्यकाण्ड, सर्ग 69
रामः प्रेक्ष्य तु तं गृध्रं भुवि रौद्रेण पातितम्। सौमित्रिं मित्रसम्पन्नमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
भयंकर राक्षस रावणने जिसे पृथ्वीपर मार गिराया था, उस गृध्रराज जटायुकी ओर दृष्टि डालकर भगवान् श्रीराम मित्रोचित गुणसे सम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे बोले—॥१॥
ममायं नूनमर्थेषु यतमानो विहंगमः। राक्षसेन हतः संख्ये प्राणांस्त्यजति मत्कृते ॥ २ ॥
भावार्थ
‘भाई ! यह पक्षी अवश्य मेरा ही कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रयत्नशील था, किंतु उस राक्षसके द्वारा युद्धमें मारा गया । यह मेरे ही लिये अपने प्राणोंका परित्याग कर रहा है ॥ २ ॥
अतिखिन्नः शरीरेऽस्मिन् प्राणो लक्ष्मण विद्यते। तथा स्वरविहीनोऽयं विक्लवं समुदीक्षते ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! इस शरीरके भीतर इसके प्राणोंको बड़ी वेदना हो रही है, इसीलिये इसकी आवाज बंद होती जा रही है तथा यह अत्यन्त व्याकुल होकर देख रहा है’ ॥ ३ ॥
जटायो यदि शक्नोषि वाक्यं व्याहरितुं पुनः। सीतामाख्याहि भद्रं ते वधमाख्याहि चात्मनः ॥ ४ ॥
भावार्थ
( लक्ष्मणसे ऐसा कहकर श्रीराम उस पक्षीसे बोले—) ‘जटायो ! यदि आप पुनः बोल सकते हों तो आपका भला हो, बताइये, सीताकी क्या अवस्था है ? और आपका वध किस प्रकार हुआ ? ॥ ४ ॥
किंनिमित्तो जहारार्यां रावणस्तस्य किं मया। अपराधं तु यं दृष्ट्वा रावणेन हृता प्रिया ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘जिस अपराधको देखकर रावणने मेरी प्रिय भार्याका अपहरण किया है, उसका वह अपराध क्या है ? और मैंने उसे कब किया ? किस निमित्तको लेकर रावणने आर्या सीताका हरण किया है ? ॥ ५ ॥
कथं तच्चन्द्रसंकाशं मुखमासीन्मनोहरम्। सीतया कानि चोक्तानि तस्मिन् काले द्विजोत्तम ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘पक्षिप्रवर ! सीताका चन्द्रमाके समान मनोहर मुख कैसा हो गया था ? तथा उस समय सीताने क्या-क्या बातें कही थीं ? ॥ ६ ॥
कथंवीर्यः कथंरूपः किंकर्मा स च राक्षसः। क चास्य भवनं तात ब्रूहि मे परिपृच्छतः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘तात ! उस राक्षसका बल-पराक्रम तथा रूप कैसा है ? वह क्या काम करता है ? और उसका घर कहाँ है ? मैं जो कुछ पूछ रहा हूँ, वह सब बताइये’ ॥ ७ ॥
तमुद्वीक्ष्य स धर्मात्मा विलपन्तमनाथवत्। वाचा विक्लवया राममिदं वचनमब्रवीत् ॥ ८ ॥
भावार्थ
इस तरह अनाथकी भाँति विलाप करते हुए श्रीरामकी ओर देखकर धर्मात्मा जटायुने लड़खड़ाती जबानसे यों कहना आरम्भ किया—॥ ८ ॥
सा हृता राक्षसेन्द्रेण रावणेन दुरात्मना। मायामास्थाय विपुलां वातदुर्दिनसंकुलाम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! दुरात्मा राक्षसराज रावणने विपुल मायाका आश्रय ले आँधी-पानीकी सृष्टि करके (घबराहटकी अवस्थामें) सीताका हरण किया था ॥ ९ ॥
परिक्रान्तस्य मे तात पक्षौ छित्त्वा निशाचरः। सीतामादाय वैदेहीं प्रयातो दक्षिणामुखः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘तात ! जब मैं उससे लड़ता लड़ता थक गया, उस अवस्थामें मेरे दोनों पंख काटकर वह निशाचर विदेहनन्दिनी सीताको साथ लिये यहाँसे दक्षिण दिशाकी ओर गया था ॥१०॥
उपरुध्यन्ति मे प्राणा दृष्टिर्भ्रमति राघव। पश्यामि वृक्षान् सौवर्णानुशीरकृतमूर्धजान् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! अब मेरे प्राणोंकी गति बंद हो रही है, दृष्टि घूम रही है और समस्त वृक्ष मुझे सुनहरे रंगके दिखायी देते हैं । ऐसा जान पड़ता है कि उन वृक्षोंपर खशके केश जमे हुए हैं ॥ ११ ॥
येन याति मुहूर्तेन सीतामादाय रावणः । विप्रणष्टं धनं क्षिप्रं तत्स्वामी प्रतिपद्यते ॥ १२ ॥ विन्दो नाम मुहूर्तोऽसौ न च काकुत्स्थ सोऽबुधत् । त्वत्प्रियां जानकीं हृत्वा रावणो राक्षसेश्वरः । झषवद् बडिशं गृह्य क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘रावण सीताको जिस मुहूर्तमें ले गया है, उसमें खोया हुआ धन शीघ्र ही उसके स्वामीको मिल जाता है । काकुत्स्थ ! वह ‘विन्द’ नामक मुहूर्त था, किंतु उस राक्षसको इसका पता नहीं था । जैसे मछली मौतके लिये ही बंसी पकड़ लेती है, उसी प्रकार वह भी सीताको ले जाकर शीघ्र ही नष्ट हो जायगा ॥ १२-१३ ॥
न च त्वया व्यथा कार्या जनकस्य सुतां प्रति । वैदेह्या रंस्यसे क्षिप्रं हत्वा तं रणमूर्धनि ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘अतः अब तुम जनकनन्दिनीके लिये अपने मनमें खेद न करो । संग्रामके मुहानेपर उस निशाचरका वध करके तुम शीघ्र ही पुनः विदेहराजकुमारीके साथ विहार करोगे’ ॥१४॥
असम्मूढस्य गृध्रस्य रामं प्रत्यनुभाषतः । आस्यात् सुस्राव रुधिरं म्रियमाणस्य सामिषम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
गृध्रराज जटायु यद्यपि मर रहे थे तो भी उनके मनपर मोह या भ्रम नहीं छाया था ( उनके होश-हवास ठीक थे ) । वे श्रीरामचन्द्रजीको उनकी बातका उत्तर दे ही रहे थे कि उनके मुखसे मांसयुक्त रुधिर निकलने लगा ॥ १५ ॥
पुत्रो विश्रवसः साक्षाद् भ्राता वैश्रवणस्य च । इत्युक्त्वा दुर्लभान् प्राणान् मुमोच पतगेश्वरः ॥ १६ ॥
भावार्थ
वे बोले—‘रावण विश्रवाका पुत्र और कुबेरका सगा भाई है’ इतना कहकर उन पक्षिराजने दुर्लभ प्राणोंका परित्याग कर दिया ॥ १६ ॥
ब्रूहि ब्रूहीति रामस्य ब्रुवाणस्य कृताञ्जलेः । त्यक्त्वा शरीरं गृध्रस्य प्राणा जग्मुर्विहायसम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़े कह रहे थे, ‘कहिये, कहिये, कुछ और कहिये !’ किंतु उस समय गृध्रराजके प्राण उनका शरीर छोड़कर आकाशमें चले गये ॥ १७ ॥
स निक्षिप्य शिरो भूमौ प्रसार्य चरणौ तथा । विक्षिप्य च शरीरं स्वं पपात धरणीतले ॥ १८ ॥
भावार्थ
उन्होंने अपना मस्तक भूमिपर डाल दिया, दोनों पैर फैला दिये और अपने शरीरको भी पृथ्वीपर ही डालते हुए वे घराशायी हो गये ॥ १८ ॥
तं गृध्रं प्रेक्ष्य ताम्राक्षं गतासुमचलोपमम् । रामः सुबहुभिर्दुःखैर्दीनः सौमित्रिमब्रवीत् ॥ १९ ॥
भावार्थ
गृध्रराज जटायुकी आँखें लाल दिखायी देती थीं । प्राण निकल जानेसे वे पर्वतके समान अविचल हो गये । उन्हें इस अवस्थामें देखकर बहुत-से दुःखोंसे दुखी हुए श्रीरामचन्द्रजीने सुमित्राकुमारसे कहा—॥ १९ ॥
बहूनि रक्षसां वासे वर्षाणि वसता सुखम् । अनेन दण्डकारण्ये विशीर्णमिह पक्षिणा ॥ २० ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! राक्षसोंके निवासस्थान इस दण्डकारण्यमें बहुत वर्षोंतक सुखपूर्वक रहकर इन पक्षिराजने यहीं अपने शरीरका त्याग किया है ॥ २० ॥
अनेकवार्षिको यस्तु चिरकालसमुत्थितः । सोऽयमद्य हतः शेते कालो हि दुरतिक्रमः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘इनकी अवस्था बहुत वर्षोंकी थी । इन्होंने सुदीर्घ कालतक अपना अभ्युदय देखा है; किंतु आज इस वृद्धा-वस्थामें उस राक्षसके द्वारा मारे जाकर ये पृथ्वीपर सो रहे हैं; क्योंकि कालका उल्लङ्घन करना सबके ही लिये कठिन है ॥२१॥
पश्य लक्ष्मण गृध्रोऽयमुपकारी हतश्च मे । सीतामभ्यवपन्नो हि रावणेन बलीयसा ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! देखो, ये, जटायु मेरे बड़े उपकारी थे, किंतु आज मारे गये । सीताकी रक्षाके लिये युद्धमें प्रवृत्त होनेपर अत्यन्त बलवान् रावणके हाथसे इनका वध हुआ है ॥२२॥
गृध्रराज्यं परित्यज्य पितृपैतामहं महत् । मम हेतोरयं प्राणान् मुमोच पतगेश्वरः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘बाप-दादोंके द्वारा प्राप्त हुए गीधोंके विशाल राज्यका त्याग करके इन पक्षिराजने मेरे ही लिये अपने प्राणोंकी आहुति दी है ॥ २३ ॥
सर्वत्र खलु दृश्यन्ते साधवो धर्मचारिणः । शूराः शरण्याः सौमित्रे तिर्यग्योनिगतेष्वपि ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘शूर, शरणागतरक्षक, धर्मपरायण श्रेष्ठ पुरुष सभी जगह देखे जाते हैं । पशु-पक्षीकी योनियोंमें भी उनका अभाव नहीं है ॥ २४ ॥
सीताहरणजं दुःखं न मे सौम्य तथागतम् । यथा विनाशो गृध्रस्य मत्कृते च परंतप ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! शत्रुओंको संताप देनेवाले लक्ष्मण ! इस समय मुझे सीताके हरणका उतना दुःख नहीं है, जितना कि मेरे लिये प्राणत्याग करनेवाले जटायुकी मृत्युसे हो रहा है ॥२५॥
राजा दशरथः श्रीमान् यथा मम महायशाः । पूजनीयश्च मान्यश्च तथायं पतगेश्वरः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘महायशस्वी श्रीमान् राजा दशरथ जैसे मेरे माननीय और पूज्य थे, वैसे ही ये पक्षिराज जटायु भी हैं ॥ २६ ॥
सौमित्रे हर काष्ठानि निर्मथिष्यामि पावकम् । गृध्रराजं दिधक्ष्यामि मत्कृते निधनं गतम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘सुमित्रानन्दन ! तुम सूखे काष्ठ ले आओ, मैं मथकर आग निकालूँगा और मेरे लिये मृत्युको प्राप्त हुए इन गृध्र-राजका दाह-संस्कार करूँगा ॥ २७ ॥
नाथं पतगलोकस्य चितिमारोपयाम्यहम् । इमं धक्ष्यामि सौमित्रे हतं रौद्रेण रक्षसा ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘सुमित्राकुमार ! उस भयंकर राक्षसके द्वारा मारे गये इन पक्षिराजको मैं चितापर चढ़ाऊँगा और इनका दाहसंस्कार करूँगा’ ॥ २८ ॥
या गतिर्यज्ञशीलानामाहिताग्नेश्च या गतिः । अपरावर्तिनां या च या च भूमिप्रदायिनाम् ॥ २९ ॥ मया त्वं समनुज्ञातो गच्छ लोकाननुत्तमान् । गृध्रराज महासत्त्व संस्कृतश्च मया व्रज ॥ ३० ॥
भावार्थ
( फिर वे जटायुको सम्बोधित करके बोले—) ‘महान् बलशाली गृध्रराज ! यज्ञ करनेवाले, अग्निहोत्री, युद्धमें पीठ न दिखानेवाले और भूमिदान करनेवाले पुरुषोंको जिस गतिकी—जिन उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होती है, मेरी आज्ञासे उन्हीं सर्वोत्तम लोकोंमें तुम भी जाओ । मेरे द्वारा दाह-संस्कार किये जानेपर तुम्हारी सद्गति हो’ ॥ २९-३० ॥
एवमुक्त्वा चितां दीप्तामारोप्य पतगेश्वरम् । ददाह रामो धर्मात्मा स्वबन्धुमिव दुःखितः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजीने दुःखित हो पक्षिराजके शरीरको चितापर रक्खा और उसमें आग लगाकर अपने बन्धुकी भाँति उनका दाह-संस्कार किया ॥ ३१ ॥
रामोऽथ सहसौमित्रिर्वनं गत्वा स वीर्यवान् । स्थूलान् हत्वा महारोहीननुतस्तार तं द्विजम् ॥ ३२ ॥ रोहिमांसानि चोद्धृत्य पेशीकृत्वा महायशाः । शकुनाय ददौ रामो रम्ये हरितशाद्वले ॥ ३३ ॥
भावार्थ
तदनन्तर लक्ष्मणसहित पराक्रमी श्रीराम वनमें जाकर मोटे-मोटे महारोही ( कन्दमूल विशेष ) काट लाये और उन्हें जटायुके लिये अर्पित करनेके उद्देश्यसे उन्होंने पृथ्वीपर कुश बिछाये । महायशस्वी श्रीरामने रोहीके गूदे निकालकर उनका पिण्ड बनाया और उन सुन्दर हरित कुशाओंपर जटायुको पिण्डदान किया ॥ ३२-३३ ॥
यत् तत् प्रेतस्य मर्त्यस्य कथयन्ति द्विजातयः । तत् स्वर्गगमनं पित्र्यं तस्य रामो जजाप ह ॥ ३४ ॥
भावार्थ
ब्राह्मणलोग परलोकवासी मनुष्यको स्वर्गकी प्राप्ति करानेके उद्देश्यसे जिन पितृसम्बन्धी मन्त्रोंका जप आवश्यक बतलाते हैं, उन सबका भगवान् श्रीरामने जप किया ॥३४॥
ततो गोदावरीं गत्वा नदीं नरवरात्मजौ । उदकं चक्रतुस्तस्मै गृध्रराजाय तावुभौ ॥ ३५ ॥
भावार्थ
तदनन्तर उन दोनों राजकुमारोंने गोदावरी नदीके तटपर जाकर उन गृध्रराजके लिये जलाञ्जलि दी ॥ ३५ ॥
शास्त्रदृष्टेन विधिना जलं गृध्राय राघवौ । स्नात्वा तौ गृध्रराजाय उदकं चक्रतुस्तदा ॥ ३६ ॥
भावार्थ
रघुकुलके उन दोनों महापुरुषोंने गोदावरीमें नहाकर शास्त्रीय विधिसे उन गृध्रराजके लिये उस समय जलाञ्जलिका दान किया ॥ ३६ ॥
स गृध्रराजः कृतवान् यशस्करं सुदुष्करं कर्म रणे निपातितः । महर्षिकल्पेन च संस्कृतस्तदा जगाम पुण्यां गतिमात्मनः शुभाम् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
महर्षितुल्य श्रीरामके द्वारा दाहसंस्कार होनेके कारण गृध्रराज जटायुको आत्माका कल्याण करनेवाली परम पवित्र गति प्राप्त हुई । उन्होंने रणभूमिमें अत्यन्त दुष्कर और यशोवर्धक पराक्रम प्रकट किया था । परंतु अन्तमें रावणने उन्हें मार गिराया ॥ ३७ ॥
कृतोदकौ तावपि पक्षिसत्तमे स्थिरां च बुद्धिं प्रणिधाय जग्मतुः । प्रवेश्य सीताधिगमे ततो मनो वनं सुरेन्द्राविव विष्णुवासवौ ॥ ३८ ॥
भावार्थ
तर्पण करनेके पश्चात् वे दोनों भाई पक्षिराज जटायुमें पितृतुल्य सुस्थिरभाव रखकर सीताकी खोजके कार्यमें मन लगा देवेश्वर विष्णु और इन्द्रकी भाँति वनमें आगे बढ़े ॥३८॥
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