अरण्यकाण्ड, सर्ग 68
पूर्वजोऽप्युक्तमात्रस्तु लक्ष्मणेन सुभाषितम् । सारग्राही महासारं प्रतिजग्राह राघवः ॥ १ ॥
भावार्थ
भगवान् श्रीरामचन्द्रजी सब वस्तुओंका सार ग्रहण करनेवाले हैं । अवस्थामें बड़े होनेपर भी उन्होंने लक्ष्मणके कहे हुए अत्यन्त सारगर्भित उत्तम वचनोंको सुनकर उन्हें स्वीकार किया ॥ १ ॥
स निगृह्य महाबाहुः प्रवृद्धं रोषमात्मनः । अवष्टभ्य धनुश्चित्रं रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ २ ॥
भावार्थ
तदनन्तर महाबाहु श्रीरामने अपने बढ़े हुए रोषको रोका और उस विचित्र धनुषको उतारकर लक्ष्मणसे कहा—॥२॥
किं करिष्यावहे वत्स क्व वा गच्छाव लक्ष्मण । केनोपायेन पश्यावः सीतामिह विचिन्तय ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘वत्स ! अब हमलोग क्या करें ? कहाँ जायँ ? लक्ष्मण ! किस उपायसे हमें सीताका पता लगे ? यहाँ इसका विचार करो’ ॥ ३ ॥
तं तथा परितापार्तं लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत् । इदमेव जनस्थानं त्वमन्वेषितुमर्हसि ॥ ४ ॥
भावार्थ
तब लक्ष्मणने इस प्रकार संतापपीड़ित हुए श्रीरामसे कहा-‘भैया ! आपको इस जनस्थानमें ही सीताकी खोज करनी चाहिये ॥ ४ ॥
राक्षसैर्बहुभिः कीर्णं नानाद्रुमलतायुतम् । सन्तीह गिरिदुर्गाणि निर्दराः कन्दराणि च ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘नाना प्रकारके वृक्ष और लताओंसे युक्त यह सघन वन अनेक राक्षसोंसे भरा हुआ है । इसमें पर्वतके ऊपर बहुत-से दुर्गम स्थान, फटे हुए पत्थर और कन्दराएँ हैं ॥ ५ ॥
गुहाश्च विविधा घोरा नानामृगगणाकुलाः । आवासाः किन्नराणां च गन्धर्वभवनानि च ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘वहाँ भाँति-भाँतिकी भयंकर गुफाएँ हैं, जो नाना प्रकारके मृगगणोंसे भरी रहती हैं । यहाँके पर्वतपर किन्नरोंके आवासस्थान और गन्धर्वोंके भवन भी हैं ॥ ६ ॥
तानि युक्तो मया सार्धं समन्वेषितुमर्हसि । त्वद्विधा बुद्धिसम्पन्ना महात्मानो नरर्षभाः ॥ ७ ॥ आपत्सु न प्रकम्पन्ते वायुवेगैरिवाचलाः ।
भावार्थ
‘मेरे साथ चलकर आप उन सभी स्थानोंमें एकाग्रचित्त हो सीताकी खोज करें । जैसे पर्वत वायुके वेगसे कम्पित नहीं होते हैं, उसी प्रकार आप-जैसे बुद्धिमान् महात्मा नरश्रेष्ठ आपत्तियोंमें विचलित नहीं होते हैं’ ॥ ७½ ॥
इत्युक्तस्तद् वनं सर्वं विचचार सलक्ष्मणः ॥ ८ ॥ क्रुद्धो रामः शरं घोरं संधाय धनुषि क्षुरम् ।
भावार्थ
उनके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी रोषपूर्वक अपने धनुषपर क्षुर नामक भयंकर बाण चढ़ाये वहाँ सारे वनमें विचरण करने लगे ॥ ८½ ॥
ततः पर्वतकूटाभं महाभागं द्विजोत्तमम् ॥ ९ ॥ ददर्श पतितं भूमौ क्षतजार्द्रं जटायुषम् । तं दृष्ट्वा गिरिशृङ्गाभं रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ १० ॥
भावार्थ
थोड़ी ही दूर आगे जानेपर उन्हें पर्वतशिखरके समान विशाल शरीरवाले पक्षिराज महाभाग जटायु दिखायी पड़े, जो खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर पड़े थे । पर्वत-शिखरके समान प्रतीत होनेवाले उन गृध्रराजको देखकर श्रीराम लक्ष्मणसे बोले—॥ ९-१० ॥
अनेन सीता वैदेही भक्षिता नात्र संशयः । गृध्ररूपमिदं व्यक्तं रक्षो भ्रमति काननम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! यह गृध्रके रूपमें अवश्य ही कोई राक्षस जान पड़ता है, जो इस वनमें घूमता रहता है । निःसंदेह इसीने विदेहराजकुमारी सीताको खा लिया होगा ॥ ११ ॥
भक्षयित्वा विशालाक्षीमास्ते सीतां यथासुखम् । एनं वधिष्ये दीप्ताग्रैः शरैर्घोरैरजिह्मगैः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘विशाललोचना सीताको खाकर यह यहाँ सुखपूर्वक बैठा हुआ है। मैं प्रज्वलित अग्रभागवाले तथा सीधे जानेवाले अपने भयंकर बाणोंसे इसका वध करूँगा’ ॥ १२ ॥
इत्युक्त्वाभ्यपतद् द्रष्टुं संधाय धनुषि क्षुरम् । क्रुद्धो रामः समुद्रान्तां चालयन्निव मेदिनीम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए श्रीराम धनुषपर बाण चढ़ाये समुद्रपर्यन्त पृथ्वीको कम्पित करते हुए उसे देखनेके लिये आगे बढ़े ॥ १३ ॥
तं दीनदीनया वाचा सफेनं रुधिरं वमन् । अभ्यभाषत पक्षी स रामं दशरथात्मजम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
इसी समय पक्षी जटायु अपने मुँहसे फेनयुक्त रक्त वमन करते हुए अत्यन्त दीन-वाणीमें दशरथनन्दन श्रीरामसे बोले—॥ १४ ॥
यामोषधीमिवायुष्मन्नन्वेषसि महावने । सा देवी मम च प्राणा रावणेनोभयं हृतम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘आयुष्मन् ! इस महान् वनमें तुम जिसे ओषधिके समान ढूँढ़ रहे हो, उस देवी सीताको तथा मेरे इन प्राणोंको भी रावणने हर लिया ॥ १५ ॥
त्वया विरहिता देवी लक्ष्मणेन च राघव । ह्रियमाणा मया दृष्टा रावणेन बलीयसा ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! तुम्हारे और लक्ष्मणके न रहनेपर महाबली रावण आया और देवी सीताको हरकर ले जाने लगा । उस समय मेरी दृष्टि सीतापर पड़ी ॥ १६ ॥
सीतामभ्यवपन्नोऽहं रावणश्च रणे प्रभो । विध्वंसितरथच्छत्रः पतितो धरणीतले ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! ज्यों ही मेरी दृष्टि पड़ी, मैं सीताकी सहायताके लिये दौड़ पड़ा । रावणके साथ मेरा युद्ध हुआ । मैंने उस युद्धमें रावणके रथ और छत्र आदि सभी साधन नष्ट कर दिये और वह भी घायल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १७ ॥
एतदस्य धनुर्भग्नमेते चास्य शरास्तथा । अयमस्य रणे राम भग्नः सांग्रामिको रथः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! यह रहा उसका टूटा हुआ धनुष, ये हैं उसके खण्डित हुए बाण और यह है उसका युद्धोपयोगी रथ, जो युद्धमें मेरेद्वारा तोड़ डाला गया है ॥ १८ ॥
अयं तु सारथिस्तस्य मत्पक्षनिहतो भुवि । परिश्रान्तस्य मे पक्षौ छित्त्वा खड्गेन रावणः ॥ १९ ॥ सीतामादाय वैदेहीमुत्पपात विहायसम् । रक्षसा निहतं पूर्वं मां न हन्तुं त्वमर्हसि ॥ २० ॥
भावार्थ
‘यह रावणका सारथि है, जिसे मैंने अपने पंखोंसे मार डाला था । जब मैं युद्ध करते-करते थक गया, तब रावणने तलवारसे मेरे दोनों पंख काट डाले और वह विदेहकुमारी सीताको लेकर आकाशमें उड़ गया । मैं उस राक्षसके हाथसे पहले ही मार डाला गया हूँ, अब तुम मुझे न मारो’ ॥ १९-२० ॥
रामस्तस्य तु विज्ञाय सीतासक्तां प्रियां कथाम् । गृध्रराजं परिष्वज्य परित्यज्य महद् धनुः ॥ २१ ॥ निपपातावशो भूमौ रुरोद सहलक्ष्मणः । द्विगुणीकृततापार्तो रामो धीरतरोऽपि सन् ॥ २२ ॥
भावार्थ
सीतासे सम्बन्ध रखनेवाली यह प्रिय वार्ता सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने अपना महान् धनुष फेंक दिया और गृध्रराज जटायुको गलेसे लगाकर वे शोकसे विवश हो पृथ्वीपर गिर पड़े और लक्ष्मणके साथ ही रोने लगे । अत्यन्त धीर होनेपर भी श्रीरामने उस समय दूने दुःखका अनुभव किया ॥२१-२२॥
एकमेकायने कृच्छ्रे निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः । समीक्ष्य दुःखितो रामः सौमित्रिमिदमब्रवीत् ॥ २३ ॥
भावार्थ
असहाय हो एकमात्र ऊर्ध्वश्वासकी संकटपूर्ण अवस्थामें पड़कर बारंबार लंबी साँस खींचते हुए जटायुकी ओर देखकर श्रीरामको बड़ा दुःख हुआ । उन्होंने सुमित्राकुमारसे कहा—॥ २३ ॥
राज्यं भ्रष्टं वने वासः सीता नष्टा मृतो द्विजः । ईदृशीयं ममालक्ष्मीर्दहेदपि हि पावकम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! मेरा राज्य छिन गया, मुझे वनवास मिला ( पिताजीकी मृत्यु हुई ), सीताका अपहरण हुआ और ये मेरे परम सहायक पक्षिराज भी मर गये । ऐसा जो मेरा यह दुर्भाग्य है, यह तो अग्निको भी जलाकर भस्म कर सकता है ॥ २४ ॥
सम्पूर्णमपि चेदद्य प्रतरेयं महोदधिम् । सोऽपि नूनं ममालक्ष्म्या विशुष्येत् सरितां पतिः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘यदि आज मैं भरे हुए महासागरको तैरने लगूँ तो मेरे दुर्भाग्यकी आँचसे वह सरिताओंका स्वामी समुद्र भी निश्चय ही सूख जायगा ॥ २५ ॥
नास्त्यभाग्यतरो लोके मत्तोऽस्मिन् सचराचरे । येनेयं महती प्राप्ता मया व्यसनवागुरा ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘इस चराचर जगत्में मुझसे बढ़कर भाग्यहीन दूसरा कोई नहीं है, जिस अभाग्यके कारण मुझे इस विपत्तिके बड़े भारी जालमें फँसना पड़ा है ॥ २६ ॥
अयं पितुर्वयस्यो मे गृध्रराजो महाबलः । शेते विनिहतो भूमौ मम भाग्यविपर्ययात् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘ये महाबली गृध्रराज जटायु मेरे पिताजीके मित्र थे, किंतु आज मेरे दुर्भाग्यवश मारे जाकर इस समय पृथ्वीपर पड़े हैं’ ॥ २७ ॥
इत्येवमुक्त्वा बहुशो राघवः सहलक्ष्मणः। जटायुषं च पस्पर्श पितृस्नेहं निदर्शयन् ॥ २८ ॥
भावार्थ
इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीने जटायुके शरीरपर हाथ फेरा और पिताके प्रति जैसा स्नेह होना चाहिये, वैसा ही उनके प्रति प्रदर्शित किया ॥ २८ ॥
निकृत्तपक्षं रुधिरावसिक्तं तं गृध्रराजं परिगृह्य राघवः। क मैथिली प्राणसमा गतेति विमुच्य वाचं निपपात भूमौ ॥ २९ ॥
भावार्थ
पङ्ख कट जानेके कारण गृध्रराज जटायु लहू-लुहान हो रहे थे। उसी अवस्थामें उन्हें गलेसे लगाकर श्रीरघुनाथजीने पूछा—‘तात ! मेरी प्राणोंके समान प्रिया मिथिलेशकुमारी सीता कहाँ चली गयी ?’ इतनी ही बात मुँहसे निकालकर वे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २९ ॥
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