अरण्यकाण्ड, सर्ग 67
तं तथा शोकसंतप्तं विलपन्तमनाथवत् । मोहेन महता युक्तं परिद्यूनमचेतसम् ॥ १ ॥ ततः सौमित्रिराश्वस्य मुहूर्तादिव लक्ष्मणः । रामं सम्बोधयामास चरणौ चाभिपीडयन् ॥ २ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजी शोकसे संतप्त हो अनाथकी तरह विलाप करने लगे । वे महान् मोहसे युक्त और अत्यन्त दुर्बल हो गये । उनका चित्त स्वस्थ नहीं था । उन्हें इस अवस्थामें देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने दो घड़ीतक आश्वासन दिया; फिर वे उनका पैर दबाते हुए उन्हें समझाने लगे—॥ १-२ ॥
महता तपसा चापि महता चापि कर्मणा । राज्ञा दशरथेनासील्लब्धोऽमृतमिवामरैः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘भैया ! हमारे पिता महाराज दशरथने बड़ी तपस्या और महान् कर्मका अनुष्ठान करके आपको पुत्ररूपमें प्राप्त किया, जैसे देवताओंने महान् प्रयाससे अमृत पा लिया था ॥ ३ ॥
तव चैव गुणैर्बद्धस्त्वद्वियोगान्महीपतिः । राजा देवत्वमापन्नो भरतस्य यथा श्रुतम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘आपने भरतके मुँहसे जैसा सुना था, उसके अनुसार भूपाल महाराज दशरथ आपके ही गुणोंसे बँधे हुए थे और आपका ही वियोग होनेसे देवलोकको प्राप्त हुए ॥ ४ ॥
यदि दुःखमिदं प्राप्तं काकुत्स्थ न सहिष्यसे । प्राकृतश्चाल्पसत्त्वश्च इतरः कः सहिष्यति ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘ककुत्स्थकुलभूषण ! यदि अपने ऊपर आये हुए इस दुःखको आप ही धैर्यपूर्वक नहीं सहेंगे तो दूसरा कौन साधारण पुरुष, जिसकी शक्ति बहुत थोड़ी है, सह सकेगा ? ॥ ५ ॥
आश्वसिहि नरश्रेष्ठ प्राणिनः कस्य नापदः । संस्पृशन्त्यग्निवद् राजन् क्षणेन व्यपयान्ति च ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! आप धैर्य धारण करें । संसारमें किस प्राणीपर आपत्तियाँ नहीं आतीं । राजन् ! आपत्तियाँ अग्निकी भाँति एक क्षणमें स्पर्श करती और दूसरे ही क्षणमें दूर हो जाती हैं ॥ ६ ॥
दुःखितो हि भवाँल्लोकांस्तेजसा यदि धक्ष्यते । आर्ताः प्रजा नरव्याघ्र क्व नु यास्यन्ति निर्वृतिम् ॥७॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! यदि आप दुखी होकर अपने तेजसे समस्त लोकोंको दग्ध कर डालेंगे तो पीड़ित हुई प्रजा किसकी शरणमें जाकर सुख और शान्ति पायेगी ॥ ७ ॥
लोकस्वभाव एवैष ययातिर्नहुषात्मजः । गतः शक्रेण सालोक्यमनयस्तं समस्पृशत् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘यह लोकका स्वभाव ही है कि यहाँ सबपर दुःख-शोक आता-जाता रहता है । नहुषपुत्र ययाति इन्द्रके समान लोक ( देवेन्द्रपद ) को प्राप्त हुए थे; किंतु वहाँ भी अन्याय-मूलक दुःख उनका स्पर्श किये बिना न रहा ॥ ८ ॥
महर्षिर्यो वसिष्ठस्तु यः पितुर्नः पुरोहितः । अह्ना पुत्रशतं जज्ञे तथैवास्य पुनर्हतम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘हमारे पिताके पुरोहित जो महर्षि वसिष्ठजी हैं, उन्हें एक ही दिनमें सौ पुत्र प्राप्त हुए और फिर एक ही दिन वे सबके-सब विश्वामित्रके हाथसे मारे गये ॥ ९ ॥
या चेयं जगतो माता सर्वलोकनमस्कृता । अस्याश्च चलनं भूमेर्दृश्यते कोसलेश्वर ॥ १० ॥
भावार्थ
‘कोसलेश्वर ! यह जो विश्ववन्दिता जगन्माता पृथ्वी है, इसका भी हिलना-डुलना देखा जाता है ॥ १० ॥
यौ धर्मौ जगतो नेत्रौ यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् । आदित्यचन्द्रौ ग्रहणमभ्युपेतौ महाबलौ ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘जो धर्मके प्रवर्तक और संसारके नेत्र हैं, जिनके आधारपर ही सारा जगत् टिका हुआ है, वे महाबली सूर्य और चन्द्रमा भी राहुके द्वारा ग्रहणको प्राप्त होते हैं ॥ ११ ॥
सुमहान्त्यपि भूतानि देवाश्च पुरुषर्षभ । न दैवस्य प्रमुञ्चन्ति सर्वभूतानि देहिनः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘पुरुषप्रवर ! बड़े-बड़े भूत और देवता भी दैव ( प्रारब्ध कर्म ) की अधीनतासे मुक्त नहीं हो पाते हैं; फिर समस्त देहधारी प्राणियोंके लिये तो कहना ही क्या है ॥ १२ ॥
शक्रादिष्वपि देवेषु वर्तमानौ नयानयौ । श्रूयेते नरशार्दूल न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! इन्द्र आदि देवताओंको भी नीति और अनीतिके कारण सुख और दुःखकी प्राप्ति होती सुनी जाती है; इसलिये आपको शोक नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥
मृतायामपि वैदेह्यां नष्टायामपि राघव । शोचितुं नार्हसे वीर यथान्यः प्राकृतस्तथा ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘वीर रघुनन्दन ! विदेहराजकुमारी सीता यदि मर जायँ या नष्ट हो जायँ तो भी आपको दूसरे गँवार मनुष्योंकी तरह शोक-चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ १४ ॥
त्वद्विधा नहि शोचन्ति सततं सर्वदर्शनाः । सुमहत्स्वपि कृच्छ्रेषु रामानिर्विण्णदर्शनाः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! आप-जैसे सर्वज्ञ पुरुष बड़ी-से-बड़ी विपत्ति आनेपर भी कभी शोक नहीं करते हैं । वे निर्वेद ( खेद ) रहित हो अपनी विचारशक्तिको नष्ट नहीं होने देते ॥ १५ ॥
तत्त्वतो हि नरश्रेष्ठ बुद्ध्या समनुचिन्तय । बुद्ध्या युक्ता महाप्राज्ञा विजानन्ति शुभाशुभे ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! आप बुद्धिके द्वारा तात्त्विक विचार कीजिये– क्या करना चाहिये और क्या नहीं; क्या उचित है और क्या अनुचित—इसका निश्चय कीजिये; क्योंकि बुद्धियुक्त महाज्ञानी पुरुष ही शुभ और अशुभ ( कर्तव्य-अकर्तव्य एवं उचित-अनुचित ) को अच्छी तरह जानते हैं ॥ १६ ॥
अदृष्टगुणदोषाणामध्रुवाणां तु कर्मणाम् । नान्तरेण क्रियां तेषां फलमिष्टं च वर्तते ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘जिनके गुण-दोष देखे या जाने नहीं गये हैं तथा जो अध्रुव हैं—फल देकर नष्ट हो जानेवाले हैं, ऐसे कर्मोंका शुभाशुभ फल उन्हें आचरणमें लाये बिना नहीं प्राप्त होता है ॥१७॥
मामेवं हि पुरा वीर त्वमेव बहुशोकवान् । अनुशिष्याद्धि को नु त्वामपि साक्षाद् बृहस्पतिः ॥१८॥
भावार्थ
‘वीर ! पहले आप ही अनेक बार इस तरहकी बातें कहकर मुझे समझा चुके हैं, आपको कौन सिखा सकता है । साक्षात् बृहस्पति भी आपको उपदेश देनेकी शक्ति नहीं रखते हैं ॥ १८ ॥
बुद्धिश्च ते महाप्राज्ञ देवैरपि दुरन्वया । शोकेनाभिप्रसुप्तं ते ज्ञानं सम्बोधयाम्यहम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘महाप्राज्ञ ! देवताओंके लिये भी आपकी बुद्धिका पता पाना कठिन है । इस समय शोकके कारण आपका ज्ञान सोया-खोया-सा जान पड़ता है । इसलिये मैं उसे जगा रहा हूँ ॥ १९ ॥
दिव्यं च मानुषं चैवमात्मनश्च पराक्रमम् । इक्ष्वाकुवृषभावेक्ष्य यतस्व द्विषतां वधे ॥ २० ॥
भावार्थ
‘इक्ष्वाकुकुलशिरोमणे ! अपने देवोचित तथा मानवोचित पराक्रमको देखकर उसका अवसरके अनुरूप उपयोग करते हुए आप शत्रुओंके वधका प्रयत्न कीजिये ॥ २० ॥
किं ते सर्वविनाशेन कृतेन पुरुषर्षभ । तमेव तु रिपुं पापं विज्ञायोद्धर्तुमर्हसि ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘पुरुषप्रवर ! समस्त संसारका विनाश करनेसे आपको क्या लाभ होगा ? उस पापी शत्रुका पता लगाकर उसीको उखाड़ फेंकनेका प्रयत्न करना चाहिये’ ॥ २१ ॥
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