अरण्यकाण्ड, सर्ग 66
तप्यमानं तदा रामं सीताहरणकर्शितम् । लोकानामभवे युक्तं सांवर्तकमिवानलम् ॥ १ ॥ वीक्षमाणं धनुः सज्यं निःश्वसन्तं पुनः पुनः । दग्धुकामं जगत् सर्वं युगान्ते च यथा हरम् ॥ २ ॥ अदृष्टपूर्वं संक्रुद्धं दृष्ट्वा रामं स लक्ष्मणः । अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं मुखेन परिशुष्यता ॥ ३ ॥
भावार्थ
सीताहरणके शोकसे पीड़ित हुए श्रीराम जब उस समय संतप्त हो प्रलयकालिक अग्निके समान समस्त लोकोंका संहार करनेको उद्यत हो गये और धनुषकी डोरी चढ़ाकर बारंबार उसकी ओर देखने लगे तथा लंबी साँस खींचने लगे, साथ ही कल्पान्तकालमें रुद्रदेवकी भाँति समस्त संसारको दग्ध कर देनेकी इच्छा करने लगे, तब जिन्हें इस रूपमें पहले कभी देखा नहीं गया था, उन अत्यन्त कुपित हुए श्रीरामकी ओर देखकर लक्ष्मण हाथ जोड़ सूखे हुए मुँहसे इस प्रकार बोले—॥ १-३ ॥
पुरा भूत्वा मृदुर्दान्तः सर्वभूतहिते रतः । न क्रोधवशमापन्नः प्रकृतिं हातुमर्हसि ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘आर्य ! आप पहले कोमल स्वभावसे युक्त, जितेन्द्रिय और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहे हैं । अब क्रोधके वशीभूत होकर अपनी प्रकृति ( स्वभाव ) का परित्याग न करें ॥ ४ ॥
चन्द्रे लक्ष्मीः प्रभा सूर्ये गतिर्वायौ भुवि क्षमा । एतच्च नियतं नित्यं त्वयि चानुत्तमं यशः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘चन्द्रमामें शोभा, सूर्यमें प्रभा, वायुमें गति और पृथ्वीमें क्षमा जैसे नित्य विराजमान रहती है, उसी प्रकार आपमें सर्वोत्तम यश सदा प्रकाशित होता है ॥ ५ ॥
एकस्य नापराधेन लोकान् हन्तुं त्वमर्हसि । ननु जानामि कस्यायं भग्नः सांग्रामिको रथः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘आप किसी एकके अपराधसे समस्त लोकोंका संहार न करें । मैं यह जाननेकी चेष्टा करता हूँ कि यह टूटा हुआ युद्धोपयोगी रथ किसका है ॥ ६ ॥
केन वा कस्य वा हेतोः सयुगः सपरिच्छदः । खुरनेमिक्षतश्चायं सिक्तो रुधिरबिन्दुभिः॥ ७ ॥ देशो निर्वृत्तसंग्रामः सुघोरः पार्थिवात्मज । एकस्य तु विमर्दोऽयं न द्वयोर्वदतां वर ॥ ८ ॥ नहि वृत्तं हि पश्यामि बलस्य महतः पदम् । नैकस्य तु कृते लोकान् विनाशयितुमर्हसि ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘अथवा किसने किस उद्देश्यसे जूए तथा अन्य उपकरणोंसहित इस रथको तोड़ा है ? इसका भी पता लगाना है। राजकुमार ! यह स्थान घोड़ोंकी खुरों और थके पहियोंसे खुदा हुआ है; साथ ही खूनकी बूँदोंसे सिंच उठा है । इससे सिद्ध होता है कि यहाँ बड़ा भयंकर संग्राम हुआ था, परंतु यह संग्राम-चिह्न किसी एक ही रथीका है, दोका नहीं । वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीराम ! मैं यहाँ किसी विशाल सेनाका पदचिह्न नहीं देख रहा हूँ; अतः किसी एकहीके अपराधके कारण आपको समस्त लोकोंका विनाश नहीं करना चाहिये ॥ ७-९ ॥
युक्तदण्डा हि मृदवः प्रशान्ता वसुधाधिपाः । सदा त्वं सर्वभूतानां शरण्यः परमा गतिः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘क्योंकि राजालोग अपराधके अनुसार ही उचित दण्ड देनेवाले, कोमल स्वभाववाले और शान्त होते हैं । आप तो सदा ही समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले तथा उनकी परम गति हैं ॥ १० ॥
को नु दारप्रणाशं ते साधु मन्येत राघव । सरितः सागराः शैला देवगन्धर्वदानवाः ॥ ११ ॥ नालं ते विप्रियं कर्तुं दीक्षितस्येव साधवः । ये कोई भी आपके प्रतिकूल आचरण नहीं कर सकते ॥ ११½ ॥ येन राजन् हृता सीता तमन्वेषितुमर्हसि ॥ १२ ॥ मद्द्वितीयो धनुष्पाणिः सहायैः परमर्षिभिः ।
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! आपकी स्त्रीका विनाश या अपहरण कौन अच्छा समझेगा ? जैसे यज्ञमें दीक्षित हुए पुरुषका साधुस्वभाववाले ऋत्विज कभी अप्रिय नहीं कर सकते, उसी प्रकार सरिताएँ, समुद्र, पर्वत, देवता, गन्धर्व और दानव— ‘राजन् ! जिसने सीताका अपहरण किया है, उसीका अन्वेषण करना चाहिये । आप मेरे साथ धनुष हाथमें लेकर बड़े-बड़े ऋषियोंकी सहायतासे उसका पता लगावें ॥ १२½ ॥
समुद्रं वा विचेष्यामः पर्वतांश्च वनानि च ॥ १३ ॥ गुहाश्च विविधा घोराः पद्मिन्यो विविधास्तथा । देवगन्धर्वलोकांश्च विचेष्यामः समाहिताः ॥ १४ ॥ यावन्नाधिगमिष्यामस्तव भार्यापहारिणम् । न चेत् साम्ना प्रदास्यन्ति पत्नीं ते त्रिदशेश्वराः । कोसलेन्द्र ततः पश्चात् प्राप्तकालं करिष्यसि ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘हम सब लोग एकाग्रचित्त हो समुद्रमें खोजेंगे, पर्वतों और वनोंमें ढूँढ़ेंगे, नाना प्रकारकी भयंकर गुफाओं और भाँति-भाँतिके सरोवरोंको छान डालेंगे तथा देवताओं और गन्धर्वोंके लोकोंमें भी तलाश करेंगे । जबतक आपकी पत्नीका अपहरण करनेवाले दुरात्माका पता नहीं लगा लेंगे, तबतक हम अपना यह प्रयत्न जारी रखेंगे । कोसलनरेश ! यदि हमारे शान्तिपूर्ण बर्तावसे देवेश्वरगण आपकी पत्नीका पता नहीं देंगे तो उस अवसरके अनुरूप कार्य आप कीजियेगा ॥ १३–१५ ॥
शीलेन साम्ना विनयेन सीतां नयेन न प्राप्स्यसि चेन्नरेन्द्र । ततः समुत्सादय हेमपुङ्खै- र्महेन्द्रवज्रप्रतिमैः शरौघैः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘नरेन्द्र ! यदि अच्छे शील-स्वभाव, सामनीति, विनय और न्यायके अनुसार प्रयत्न करनेपर भी आपको सीताका पता न मिले, तब आप सुवर्णमय पंखवाले महेन्द्रके वज्रतुल्य बाणसमूहोंसे समस्त लोकोंका संहार कर डालें’ ॥ १६ ॥
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