अरण्यकाण्ड, सर्ग 6
शरभङ्गे दिवं प्राप्ते मुनिसङ्घाः समागताः । अभ्यगच्छन्त काकुत्स्थं रामं ज्वलिततेजसम् ॥ १ ॥
भावार्थ
शरभङ्ग मुनिके ब्रह्मलोक चले जानेपर प्रज्वलित तेजवाले ककुत्स्थवंशी श्रीरामचन्द्रजीके पास बहुत-से मुनियोंके समुदाय पधारे ॥ १ ॥
वैखानसा वालखिल्याः सम्प्रक्षाला मरीचिपाः । अश्मकुट्टाश्च बहवः पत्राहाराश्च तापसाः ॥ २ ॥ दन्तोलूखलिनश्चैव तथैवोन्मज्जकाः परे । गात्रशय्या अशय्याश्च तथैवानवकाशिकाः ॥ ३ ॥ मुनयः सलिलाहारा वायुभक्षास्तथापरे । आकाशनिलयाश्चैव तथा स्थण्डिलशायिनः ॥ ४ ॥ तथोर्ध्ववासिनो दान्तास्तथाऽऽर्द्रपटवाससः । सजपाश्च तपोनिष्ठास्तथा पञ्चतपोऽन्विताः ॥ ५ ॥
भावार्थ
उनमें वैखानस, वालखिल्य, सम्प्रक्षाल, मरीचिप, बहुसंख्यक अश्मकुट्ट, पत्राहार, दन्तोलूखली, उन्मज्जक, गात्रशय्य, अशय्य, अनवकाशिक, सलिलाहार, वायुभक्ष, आकाश-निलय, स्थण्डिलशायी, ऊर्ध्ववासी, दान्त, आर्द्रपटवासा, सजप, तपोनिष्ठ और पञ्चाग्निसेवी—इन सभी श्रेणियोंके तपस्वी मुनि थे ॥ ॥ २–५ ॥
सर्वे ब्राह्मया श्रिया युक्ता दृढयोगसमाहिताः । शरभङ्गाश्रमे राममभिजग्मुश्च तापसाः ॥ ६ ॥ अभिगम्य च धर्मज्ञा रामं धर्मभृतां वरम् । ऊचुः परमधर्मज्ञमृषिसङ्घाः समागताः ॥ ७ ॥ त्वमिक्ष्वाकुकुलस्यास्य पृथिव्याश्च महारथः । प्रधानश्चापि नाथश्च देवानां मघवानिव ॥ ८ ॥
भावार्थ
वे सभी तपस्वी ब्रह्मतेजसे सम्पन्न थे और सुदृढ़ योगके अभ्याससे उन सबका चित्त एकाग्र हो गया था । वे सब-के-सब शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर श्रीरामचन्द्रजीके समीप आये॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ परम धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर वे धर्मके ज्ञाता समागत ऋषिसमुदाय उनसे बोले—॥ ‘रघुनन्दन ! आप इस इक्ष्वाकुवंशके साथ ही समस्त भूमण्डलके भी स्वामी, संरक्षक एवं प्रधान महारथी वीर हैं । जैसे इन्द्र देवताओंके रक्षकहैं, उसी प्रकार आप मनुष्यलोककी रक्षा करनेवाले हैं ॥ ८ ॥
विश्रुतस्त्रिषु लोकेषु यशसा विक्रमेण च । पितृव्रतत्वं सत्यं च त्वयि धर्मश्च पुष्कलः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘आप अपने यश और पराक्रमसे तीनों लोकोंमें विख्यात हैं । आपमें पिताकी आज्ञाके पालनका व्रत, सत्य भाषण तथा सम्पूर्ण धर्म विद्यमान हैं ॥ ९ ॥
त्वामासाद्य महात्मानं धर्मज्ञं धर्मवत्सलम् । अर्थित्वान्नाथ वक्ष्यामस्तच्च नः क्षन्तुमर्हसि ॥ १० ॥
भावार्थ
‘नाथ ! आप महात्मा, धर्मज्ञ और धर्मवत्सल हैं । हम आपके पास प्रार्थी होकर आये हैं; इसीलिये ये स्वार्थकी बात निवेदन करना चाहते हैं । आपको इसके लिये हमें क्षमा करना चाहिये ॥ १० ॥
अधर्मः सुमहान् नाथ भवेत् तस्य तु भूपतेः । यो हरेद् बलिषड्भागं न च रक्षति पुत्रवत् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘स्वामिन् ! जो राजा प्रजासे उसकी आयका छठा भाग करके रूपमें ले ले और पुत्रकी भाँति प्रजाकी रक्षा न करे, उसे महान् अधर्मका भागी होना पड़ता है ॥ ११ ॥
युञ्जानः स्वानिव प्राणान् प्राणैरिष्टान् सुतानिव । नित्ययुक्तः सदा रक्षन् सर्वान् विषयवासिनः ॥ १२ ॥ प्राप्नोति शाश्वतीं राम कीर्तिं स बहुवार्षिकीम् । ब्रह्मणः स्थानमासाद्य तत्र चापि महीयते ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! जो भूपाल प्रजाकी रक्षाके कार्यमें संलग्न हो अपने राज्यमें निवास करनेवाले सब लोगोंको प्राणोंके समान अथवा प्राणोंसे भी अधिक प्रिय पुत्रोंके समान समझकर सदा सावधानीके साथ उनकी रक्षा करता है, वह बहुत वर्षोंतक स्थिर रहनेवाली अक्षय कीर्ति पाता है और अन्तमें ब्रह्मलोकमें जाकर वहाँ भी विशेष सम्मानका भागी होता है ॥ १२-१३॥
यत् करोति परं धर्मं मुनिर्मूलफलाशनः । तत्र राज्ञश्चतुर्भागः प्रजा धर्मेण रक्षतः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘राजाके राज्यमें मुनि फल-मूलका आहार करके जिस उत्तम धर्मका अनुष्ठान करता है, उसका चौथा भाग धर्मके अनुसार प्रजाकी रक्षा करनेवाले उस राजाको प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥
सोऽयं ब्राह्मणभूयिष्ठो वानप्रस्थगणो महान् । त्वन्नाथोऽनाथवद् राम राक्षसैर्हन्यते भृशम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! इस वनमें रहनेवाला वानप्रस्थ महात्माओंका यह महान् समुदाय, जिसमें ब्राह्मणोंकी ही संख्या अधिक है तथा जिसके रक्षक आप ही हैं, राक्षसोंके द्वारा अनाथकी तरह मारा जा रहा है—इस मुनि-समुदायका बहुत अधिक मात्रामें संहार हो रहा है ॥ १५ ॥
पश्य पश्य शरीराणि मुनीनां भावितात्मनाम् । हतानां राक्षसैर्घोरैर्बहूनां बहुधा वने ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘आइये, देखिये, ये भयंकर राक्षसोंद्वारा बारंबार अनेक प्रकारसे मारे गये बहुसंख्यक पवित्रात्मा मुनियोंके शरीर ( शव या कंकाल ) दिखायी देते हैं ॥ १६ ॥
पम्पानदीनिवासानामनुमन्दाकिनीमपि । चित्रकूटालयानां च क्रियते कदनं महत् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘पम्पा सरोवर और उसके निकट बहनेवाली तुङ्गभद्रा नदीके तटपर जिनका निवास है, जो मन्दाकिनीके किनारे रहते हैं तथा जिन्होंने चित्रकूटपर्वतके किनारे अपना निवासस्थान बना लिया है, उन सभी ऋषि-महर्षियोंका राक्षसोंद्वारा महान् संहार किया जा रहा है ॥ १७ ॥
एवं वयं न मृष्यामो विप्रकारं तपस्विनाम् । क्रियमाणं वने घोरं रक्षोभिर्भीमकर्मभिः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘इन भयानक कर्म करनेवाले राक्षसोंने इस वनमें तपस्वी मुनियोंका जो ऐसा भयंकर विनाशकाण्ड मचा रखा है, वह हमलोगोंसे सहा नहीं जाता है ॥ १८ ॥
ततस्त्वां शरणार्थं च शरण्यं समुपस्थिताः । परिपालय नो राम वध्यमानान् निशाचरैः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘अतः इन राक्षसोंसे बचनेके लिये शरण लेनेके उद्देश्यसे हम आपके पास आये हैं । श्रीराम ! आप शरणागतवत्सल हैं, अतः इन निशाचरोंसे मारे जाते हुए हम मुनियोंकी रक्षा कीजिये ॥ १९ ॥
परा त्वत्तो गतिर्वीर पृथिव्यां नोपपद्यते । परिपालय नः सर्वान् राक्षसेभ्यो नृपात्मज ॥ २० ॥
भावार्थ
‘वीर राजकुमार ! इस भूमण्डलमें हमें आपसे बढ़कर दूसरा कोई सहारा नहीं दिखायी देता । आप इन राक्षसोंसे हम सबको बचाइये’ ॥ २० ॥
एतच्छ्रुत्वा तु काकुत्स्थस्तापसानां तपस्विनाम् । इदं प्रोवाच धर्मात्मा सर्वानेव तपस्विनः ॥ २१ ॥
भावार्थ
तपस्यामें लगे रहनेवाले उन तपस्वी मुनियोंकी ये बातें सुनकर ककुत्स्थकुलभूषण धर्मात्मा श्रीरामने उन सबसे कहा—॥ २१ ॥
नैवमर्हथ मां वक्तुमाज्ञाप्योऽहं तपस्विनाम् । केवलेन स्वकार्येण प्रवेष्टव्यं वनं मया ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘मुनिवरो ! आपलोग मुझसे इस प्रकार प्रार्थना न करें । मैं तो तपस्वी महात्माओंका आज्ञापालक हूँ । मुझे केवल अपने ही कार्यसे वनमें तो प्रवेश करना ही है ( इसके साथ ही आपलोगोंकी सेवाका सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हो जायगा ) ॥ २२ ॥
विप्रकारमपाक्रष्टुं राक्षसैर्भवतामिमम् । पितुस्तु निर्देशकरः प्रविष्टोऽहमिदं वनम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘राक्षसोंके द्वारा जो आपको यह कष्ट पहुँच रहा है, इसे दूर करनेके लिये ही मैं पिताके आदेशका पालन करता हुआ इस वनमें आया हूँ ॥ २३ ॥
भवतामर्थसिद्ध्यर्थमागतोऽहं यदृच्छया । तस्य मेऽयं वने वासो भविष्यति महाफलः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘आपलोगोंके प्रयोजनकी सिद्धिके लिये मैं दैवात् यहाँ आ पहुँचा हूँ । आपकी सेवाका अवसर मिलनेसे मेरे लिये यह वनवास महान् फलदायक होगा ॥ २४ ॥
तपस्विनां रणे शत्रून् हन्तुमिच्छामि राक्षसान् । पश्यन्तु वीर्यमृषयः सभ्रातुर्मे तपोधनाः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘तपोधनो ! मैं तपस्वी मुनियोंसे शत्रुता रखनेवाले उन राक्षसोंका युद्धमें संहार करना चाहता हूँ । आप सब महर्षि भाईसहित मेरा पराक्रम देखें’ ॥ २५ ॥
दत्त्वा वरं चापि तपोधनानां धर्मे धृतात्मा सह लक्ष्मणेन । तपोधनैश्चापि सहार्यदत्तः सुतीक्ष्णमेवाभिजगाम वीरः ॥ २६ ॥
भावार्थ
इस प्रकार उन तपोधनोंको वर देकर धर्ममें मन लगानेवाले तथा श्रेष्ठ दान देनेवाले वीर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण तथा तपस्वी महात्माओंके साथ सुतीक्ष्ण मुनिके पास गये ॥ २६ ॥
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