अरण्यकाण्ड, सर्ग 5
हत्वा तु तं भीमबलं विराधं राक्षसं वने । ततः सीतां परिष्वज्य समाश्वास्य च वीर्यवान् ॥ १ ॥ अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं दीप्ततेजसम् । कष्टं वनमिदं दुर्गं न च स्मो वनगोचराः ॥ २ ॥ अभिगच्छामहे शीघ्रं शरभङ्गं तपोधनम् । आश्रमं शरभङ्गस्य राघवोऽभिजगाम ह ॥ ३ ॥
भावार्थ
वनमें उस भयंकर बलशाली राक्षस विराधका वध करके पराक्रमी श्रीरामने सीताको हृदयसे लगाकर सान्त्वना दी और उद्दीप्त तेजवाले भाई लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा—‘सुमित्रानन्दन ! यह दुर्गम वन बड़ा कष्टप्रद है । हमलोग इसके पहले कभी ऐसे वनोंमें नहीं रहे हैं ( अतः यहाँके कष्टोंका न तो अनुभव है और न अभ्यास ही है )। अच्छा ! हमलोग अब शीघ्र ही तपोधन शरभङ्गजीके पास चलें’—ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर गये ॥ १–३ ॥
तस्य देवप्रभावस्य तपसा भावितात्मनः । समीपे शरभङ्गस्य ददर्श महदद्भुतम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
देवताओंके तुल्य प्रभावशाली तथा तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरणवाले ( अथवा तपके द्वारा परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करनेवाले ) शरभङ्ग मुनिके समीप जानेपर श्रीरामने एक बड़ा अद्भुत दृश्य देखा ॥ ४ ॥
विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्रभम् । रथप्रवरमारूढमाकाशे विबुधानुगम् ॥ ५ ॥ असंस्पृशन्तं वसुधां ददर्श विबुधेश्वरम् । सम्प्रभाभरणं देवं विरजोऽम्बरधारिणम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
वहाँ उन्होंने आकाशमें एक श्रेष्ठ रथपर बैठे हुए देवताओंके स्वामी इन्द्रदेवका दर्शन किया, जो पृथ्वीका स्पर्श नहीं कर रहे थे । उनकी अङ्गकान्ति सूर्य और अग्निके समान प्रकाशित होती थी । वे अपने तेजस्वी शरीरसे देदीप्यमान हो रहे थे । उनके पीछे और भी बहुत-से देवता थे । उनके दीप्तिमान् आभूषण चमक रहे थे तथा उन्होंने निर्मल वस्त्र धारण कर रखा था ॥ ५-६ ॥
तद्विधैरेव बहुभिः पूज्यमानं महात्मभिः । हरितैर्वाजिभिर्युक्तमन्तरिक्षगतं रथम् ॥ ७ ॥ ददर्शादूरतस्तस्य तरुणादित्यसंनिभम् ।
भावार्थ
उन्हींके समान वेशभूषावाले दूसरे बहुत-से महात्मा इन्द्रदेवकी पूजा ( स्तुति-प्रशंसा ) कर रहे थे । उनका रथ आकाशमें खड़ा था और उसमें हरे रंगके घोड़े जुते हुए थे । श्रीरामने निकटसे उस रथको देखा । वह नवोदित सूर्यके समान प्रकाशित होता था ॥ ७½ ॥
पाण्डुराभ्रघनप्रख्यं चन्द्रमण्डलसंनिभम् ॥ ८ ॥ अपश्यद् विमलं छत्रं चित्रमाल्योपशोभितम् ।
भावार्थ
उन्होंने यह भी देखा कि इन्द्रके मस्तकके ऊपर श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल तथा चन्द्रमण्डलके समान कान्तिमान् निर्मल छत्र तना हुआ है, जो विचित्र फूलोंकी मालाओंसे सुशोभित है ॥ ८½ ॥
चामरव्यजने चाग्र्ये रुक्मदण्डे महाधने ॥ ९ ॥ गृहीते वरनारीभ्यां धूयमाने च मूर्धनि ।
भावार्थ
श्रीरामने सुवर्णमय डंडेवाले दो श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य चँवर और व्यजन भी देखे, जिन्हें दो सुन्दरियाँ लेकर देवराजके मस्तकपर हवा कर रही थीं ॥ ९½ ॥
गन्धर्वामरसिद्धाश्च बहवः परमर्षयः ॥ १० ॥ अन्तरिक्षगतं देवं गीर्भिरग्र्याभिरीडयन् । सह सम्भाषमाणे तु शरभङ्गेन वासवे ॥ ११ ॥ दृष्ट्वा शतक्रतुं तत्र रामो लक्ष्मणमब्रवीत् । रामोऽथ रथमुद्दिश्य भ्रातुर्दर्शयताद्भुतम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
उस समय बहुत-से गन्धर्व, देवता, सिद्ध और महर्षिगण उत्तम वचनोंद्वारा अन्तरिक्षमें विराजमान देवेन्द्रकी स्तुति करते थे और देवराज इन्द्र शरभङ्ग मुनिके साथ वार्तालाप कर रहे थे । वहाँ इस प्रकार शतक्रतु इन्द्रका दर्शन करके श्रीरामने उनके अद्भुत रथकी ओर अँगुलीसे संकेत करते हुए उसे भाईको दिखाया और लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा—॥ १०–१२ ॥
अर्चिष्मन्तं श्रिया जुष्टमद्भुतं पश्य लक्ष्मण । प्रतपन्तमिवादित्यमन्तरिक्षगतं रथम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! आकाशमें वह अद्भुत रथ तो देखो, उससे तेजकी लपटें निकल रही हैं । वह सूर्यके समान तप रहा है। शोभा मानो मूर्तिमती होकर उसकी सेवा करती है ॥ १३ ॥
ये हयाः पुरुहूतस्य पुरा शक्रस्य नः श्रुताः । अन्तरिक्षगता दिव्यास्त इमे हरयो ध्रुवम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘हमलोगोंने पहले देवराज इन्द्रके जिन दिव्य घोड़ोंके विषयमें जैसा सुन रखा है, निश्चय ही आकाशमें ये वैसे ही दिव्य अश्व विराजमान हैं ॥ १४ ॥
इमे च पुरुषव्याघ्र ये तिष्ठन्त्यभितो दिशम् । शतं शतं कुण्डलिनो युवानः खड्गपाणयः ॥ १५ ॥ विस्तीर्णविपुलोरस्काः परिघायतबाहवः । शोणांशुवसनाः सर्वे व्याघ्रा इव दुरासदाः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! इस रथके दोनों ओर जो ये हाथोंमें खड्ग लिये कुण्डलधारी सौ-सौ युवक खड़े हैं, इनके वक्षःस्थल विशाल एवं विस्तृत हैं, भुजाएँ परिघोंके समान सुदृढ़ एवं बड़ी-बड़ी हैं। ये सब-के-सब लाल वस्त्र धारण किये हुए हैं और व्याघ्रोंके समान दुर्जय प्रतीत होते हैं ॥ १५-१६ ॥
उरोदेशेषु सर्वेषां हारा ज्वलनसंनिभाः । रूपं बिभ्रति सौमित्रे पञ्चविंशतिवार्षिकम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘सुमित्रानन्दन ! इन सबके हृदयदेशोंमें अग्निके समान तेजसे जगमगाते हुए हार शोभा पाते हैं। ये नवयुवक पचीस वर्षोंकी अवस्थाका रूप धारण करते हैं ॥ १७ ॥
एतद्धि किल देवानां वयो भवति नित्यदा । यथेमे पुरुषव्याघ्रा दृश्यन्ते प्रियदर्शनाः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘कहते हैं, देवताओंकी सदा ऐसी ही अवस्था रहती है, जैसे ये पुरुषप्रवर दिखायी देते हैं । इनका दर्शन कितना प्यारा लगता है ॥ १८ ॥
इहैव सह वैदेह्या मुहूर्तं तिष्ठ लक्ष्मण । यावज्जानाम्यहं व्यक्तं क एष द्युतिमान् रथे ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! जबतक कि मैं स्पष्ट रूपसे यह पता न लगा लूँ कि रथपर बैठे हुए ये तेजस्वी पुरुष कौन हैं ? तबतक तुम विदेहनन्दिनी सीताके साथ एक मुहूर्ततक यहीं ठहरो’ ॥ १९ ॥
तमेवमुक्त्वा सौमित्रिमिहैव स्थीयतामिति । अभिचक्राम काकुत्स्थः शरभङ्गाश्रमं प्रति ॥ २० ॥
भावार्थ
इस प्रकार सुमित्राकुमारको वहीं ठहरनेका आदेश देकर श्रीरामचन्द्रजी टहलते हुए शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर गये ॥ २० ॥
ततः समभिगच्छन्तं प्रेक्ष्य रामं शचीपतिः । शरभङ्गमनुज्ञाप्य विबुधानिदमब्रवीत् ॥ २१ ॥
भावार्थ
. श्रीरामको आते देख शचीपति इन्द्रने शरभङ्ग मुनिसे विदा ले देवताओंसे इस प्रकार कहा–॥ २१ ॥
इहोपयात्यसौ रामो यावन्मां नाभिभाषते । निष्ठां नयत तावत् तु ततो माद्रष्टुमर्हति ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजी यहाँ आ रहे हैं। वे जबतक मुझसे कोई बात न करें, उसके पहले ही तुमलोग मुझे यहाँसे दूसरे स्थानमें ले चलो । इस समय श्रीरामसे मेरी मुलाकात नहीं होनी चाहिये ॥ २२ ॥
जितवन्तं कृतार्थं हि तदाहमचिरादिमम् । कर्म ह्यनेन कर्तव्यं महदन्यैः सुदुष्करम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘इन्हें वह महान् कर्म करना है, जिसका सम्पादन करना दूसरोंके लिये बहुत कठिन है । जब ये रावणपर विजय पाकर अपना कर्तव्य पूर्ण करके कृतार्थ हो जायँगे, तब मैं शीघ्र ही आकर इनका दर्शन करूँगा’ ॥ २३ ॥
अथ वज्री तमामन्य्य मानयित्वा च तापसम् । रथेन हयुक्तेन ययौ दिवमरिंदमः ॥ २४ ॥
भावार्थ
यह कहकर वज्रधारी शत्रुदमन इन्द्रने तपस्वी शरभङ्गका सत्कार किया और उनसे पूछकर अनुमति ले वे घोड़े जुते हुए रथके द्वारा स्वर्गलोकको चल दिये ॥ २४ ॥
प्रयाते तु सहस्राक्षे राघवः सपरिच्छदः । अग्निहोत्रमुपासीनं शरभङ्गमुपागमत् ॥ २५ ॥
भावार्थ
सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके चले जानेपर श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी और भाईके साथ शरभङ्ग मुनिके पास गये । उस समय वे अग्निके समीप बैठकर अग्निहोत्र कर रहे थे ॥२५॥
तस्य पादौ च संगृह्य रामः सीता च लक्ष्मणः । निषेदुस्तदनुज्ञाता लब्धवासा निमन्त्रिताः ॥ २६ ॥ ततः शक्रोपयानं तु पर्यपृच्छत राघवः । शरभङ्गश्च तत् सर्वं राघवाय न्यवेदयत् ॥ २७ ॥
भावार्थ
श्रीराम, सीता और लक्ष्मणने मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी आज्ञासे वहाँ बैठ गये । शरभङ्गजीने उन्हें आतिथ्यके लिये निमन्त्रण दे ठहरनेके लिये स्थान दिया ॥ तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे इन्द्रके आनेका कारण पूछा । तब शरभङ्ग मुनिने श्रीरघुनाथजीसे सब बातें निवेदन करते हुए कहा—॥ २७ ॥
मामेष वरदो राम ब्रह्मलोकं निनीषति । जितमुग्रेण तपसा दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! ये वर देनेवाले इन्द्र मुझे ब्रह्मलोकमें ले जाना चाहते हैं । मैंने अपनी उग्र तपस्यासे उस लोकपर विजय पायी है । जिनकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, उन पुरुषोंके लिये वह अत्यन्त दुर्लभ है ॥ २८ ॥
अहं ज्ञात्वा नरव्याघ्र वर्तमानमदूरतः । ब्रह्मलोकं न गच्छामि त्वामदृष्ट्वा प्रियातिथिम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! परंतु जब मुझे मालूम हो गया कि आप इस आश्रमके निकट आ गये हैं, तब मैंने निश्चय किया कि आप-जैसे प्रिय अतिथिका दर्शन किये बिना मैं ब्रह्मलोकको नहीं जाऊँगा ॥ २९ ॥
त्वयाहं पुरुषव्याघ्र धार्मिकेण महात्मना । समागम्य गमिष्यामि त्रिदिवं चावरं परम् ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! आप धर्मपरायण महात्मा पुरुषसे मिलकर ही मैं स्वर्गलोक तथा उससे ऊपरके ब्रह्मलोकको जाऊँगा ॥३०॥
अक्षया नरशार्दूल जिता लोका मया शुभाः । ब्राह्मबाश्च नाकपृष्ठाश्च प्रतिगृह्णीष्व मामकान् ।३१।
भावार्थ
‘पुरुषशिरोमणे ! मैंने ब्रह्मलोक और स्वर्गलोक आदि जिन अक्षय शुभ लोकोंपर विजय पायी है, मेरे उन सभी लोकोंको आप ग्रहण करें’ ॥ ३१ ॥
एवमुक्तो नरव्याघ्रः सर्वशास्त्रविशारदः । ऋषिणा शरभङ्गेन राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
शरभङ्ग मुनिके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता नरश्रेष्ठ श्रीरघुनाथजीने यह बात कही–॥ ३२ ॥
अहमेवाहरिष्यामि सर्वाॅल्लोकान् महामुने । आवासं त्वहमिच्छामि प्रदिष्टमिह कानने ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘महामुने ! मैं ही आपको उन सब लोकोंकी प्राप्ति कराऊँगा । इस समय तो मैं इस वनमें आपके बताये हुए स्थानपर निवासमात्र करना चाहता हूँ’ ॥ ३३ ॥
राघवेणैवमुक्तस्तु शक्रतुल्यबलेन वै । शरभङ्गो महाप्राज्ञः पुनरेवाब्रवीद् वचः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
इन्द्रके समान बलशाली श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर महाज्ञानी शरभङ्ग मुनि फिर बोले—॥ ३४ ॥
इह राम महातेजाः सुतीक्ष्णो नाम धार्मिकः । वसत्यरण्ये नियतः स ते श्रेयो विधास्यति ॥ ३५ ॥ सुतीक्ष्णमभिगच्छ त्वं शुचौ देशे तपस्विनम् । रमणीये वनोद्देशे स ते वासं विधास्यति ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! इस वनमें थोड़ी ही दूरपर महातेजस्वी धर्मात्मा सुतीक्ष्ण मुनि नियमपूर्वक निवास करते हैं । वे ही आपका कल्याण ( आपके लिये स्थान आदिका प्रबन्ध ) करेंगे ॥ ‘आप इस रमणीय वनप्रान्तके उस पवित्र स्थानमें तपस्वी सुतीक्ष्ण मुनिके पास चले जाइये । वे आपके निवासस्थानकी व्यवस्था करेंगे ॥ ३६ ॥
इमां मन्दाकिनीं राम प्रतिस्रोतामनुव्रज । नदीं पुष्पोडुपवहां ततस्तत्र गमिष्यसि ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! आप फूलके समान छोटी-छोटी डोंगियोंसे पार होने योग्य अथवा पुष्पमयी नौकाको बहानेवाली इस मन्दाकिनी नदीके स्रोतके विपरीत दिशामें इसीके किनारे-किनारे चले जाइये । इससे वहाँ पहुँच जाइयेगा ॥ ३७ ॥
एष पन्था नरव्याघ्र मुहूर्तं पश्य तात माम् । यावज्जहामि गात्राणि जीर्णां त्वचमिवोरगः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! यही वह मार्ग है, परंतु तात ! दो घड़ी यहीं ठहरिये और जबतक पुरानी केंचुलका त्याग करनेवाले सर्पकी भाँति मैं अपने इन जराजीर्ण अङ्गोंका त्याग न कर दूँ, तबतक मेरी ही ओर देखिये’ ॥ ३८ ॥
ततोऽग्निं स समाधाय हुत्वा चाज्येन मन्त्रवत् । शरभङ्गो महातेजाः प्रविवेश हुताशनम् ॥ ३९ ॥ तस्य रोमाणि केशांश्च तदा वह्निर्महात्मनः । जीर्णां त्वचं तदस्थीनि यच्च मांसं च शोणितम् ॥४०॥ स च पावकसंकाशः कुमारः समपद्यत । उत्थायाग्निचयात् तस्माच्छरभङ्गो व्यरोचत ॥ ४१ ॥
भावार्थ
यों कहकर महातेजस्वी शरभङ्ग मुनिने विधिवत् अग्निकी स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया और मन्त्रोच्चारणपूर्वक घीकी आहुति देकर वे स्वयं भी उस अग्निमें प्रविष्ट हो गये॥ उस समय अग्निने उन महात्माके रोम, केश, जीर्ण त्वचा, हड्डी, मांस और रक्त सबको जलाकर भस्म कर दिया॥ वे शरभङ्ग मुनि अग्नितुल्य तेजस्वी कुमारके रूपमें प्रकट हो गये और उस अग्निराशिसे ऊपर उठकर बड़ी शोभा पाने लगे ॥ ४१ ॥
स लोकानाहिताग्नीनामृषीणां च महात्मनाम् । देवानां च व्यतिक्रम्य ब्रह्मलोकं व्यरोहत ॥ ४२ ॥
भावार्थ
वे अग्निहोत्री पुरुषों, महात्मा मुनियों और देवताओंके भी लोकोंको लाँघकर ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे ॥ ४२ ॥
स पुण्यकर्मा भुवने द्विजर्षभः पितामहं सानुचरं ददर्श ह। पितामहश्चापि समीक्ष्य तं द्विजं ननन्द सुस्वागतमित्युवाच ह ॥ ४३ ॥
भावार्थ
पुण्यकर्म करनेवाले द्विजश्रेष्ठ शरभङ्गने ब्रह्मलोकमें पार्षदों-सहित पितामह ब्रह्माजीका दर्शन किया । ब्रह्माजी भी उन ब्रह्मर्षिको देखकर बड़े प्रसन्न हुए और बोले—‘महामुने ! तुम्हारा शुभ स्वागत है’ ॥ ४३ ॥
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