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अरण्यकाण्ड, सर्ग 4

ह्रियमाणौ तु काकुत्स्थौ दृष्ट्वा सीता रघूत्तमौ । उच्चैः स्वरेण चुक्रोश प्रगृह्य सुमहाभुजौ ॥ १ ॥ एष दाशरथी रामः सत्यवाञ्छीलवाञ्शुचिः । रक्षसा रौद्ररूपेण ह्रियते सहलक्ष्मणः ॥ २ ॥

भावार्थ

रघुकुलके श्रेष्ठ वीर ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मणको राक्षस लिये जा रहा है—यह देखकर सीता अपनी दोनों बाहें ऊपर उठाकर जोर-जोरसे रोने-चिल्लाने लगीं—॥ ‘हाय ! इन सत्यवादी, शीलवान् और शुद्ध आचार-विचारवाले दशरथनन्दन श्रीराम और लक्ष्मणको यह रौद्ररूपधारी राक्षस लिये जा रहा है ॥ २ ॥

मामृक्षा भक्षयिष्यन्ति शार्दूलद्वीपिनस्तथा । मां हरोत्सृज काकुत्स्थौ नमस्ते राक्षसोत्तम ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘राक्षसशिरोमणे ! तुम्हें नमस्कार है । इस वनमें रीछ, व्याघ्र और चीते मुझे खा जायँगे, इसलिये तुम मुझे ही ले चलो, किंतु इन दोनों ककुत्स्थवंशी वीरोंको छोड़ दो’ ॥३॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा वैदेह्या रामलक्ष्मणौ । वेगं प्रचक्रतुर्वीरौ वधे तस्य दुरात्मनः ॥ ४ ॥

भावार्थ

विदेहनन्दिनी सीताकी यह बात सुनकर वे दोनों वीर श्रीराम और लक्ष्मण उस दुरात्मा राक्षसका वध करनेमें शीघ्रता करने लगे ॥ ४ ॥

तस्य रौद्रस्य सौमित्रिः सव्यं बाहुं बभञ्ज ह । रामस्तु दक्षिणं बाहुं तरसा तस्य रक्षसः ॥ ५ ॥

भावार्थ

सुमित्राकुमार लक्ष्मणने उस राक्षसकी बायीं और श्रीरामने उसकी दाहिनी बाँह बड़े वेगसे तोड़ डाली ॥ ५ ॥

स भग्नबाहुः संविग्नः पपाताशु विमूर्च्छितः । धरण्यां मेघसंकाशो वज्रभिन्न इवाचलः ॥ ६ ॥

भावार्थ

भुजाओंके टूट जानेपर वह मेघके समान काला राक्षस व्याकुल हो गया और शीघ्र ही मूर्च्छित होकर वज्रके द्वारा टूटे हुए पर्वतशिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ६ ॥

मुष्टिभिर्बाहुभिः पद्भिः सूदयन्तौ तु राक्षसम् । उद्यम्योद्यम्य चाप्येनं स्थण्डिले निष्पिपेषतुः ॥ ७ ॥

भावार्थ

तब श्रीराम और लक्ष्मण विराधको भुजाओं, मुक्कों और लातोंसे मारने लगे तथा उसे उठा-उठाकर पटकने और पृथ्वीपर रगड़ने लगे ॥ ७ ॥

स विद्धो बहुभिर्बाणैः खड्गाभ्यां च परिक्षतः । निष्पिष्टो बहुधा भूमौ न ममार स राक्षसः ॥ ८ ॥

भावार्थ

बहुसंख्यक बाणोंसे घायल और तलवारोंसे क्षत-विक्षत होनेपर तथा पृथ्वीपर बार-बार रगड़ा जानेपर भी वह राक्षस मरा नहीं ॥ ८ ॥

तं प्रेक्ष्य रामः सुभृशमवध्यमचलोपमम् । भयेष्वभयदः श्रीमानिदं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥

भावार्थ

अवध्य तथा पर्वतके समान अचल विराधको बारंबार देखकर भयके अवसरोंपर अभय देनेवाले श्रीमान् रामने लक्ष्मणसे यह बात कही—॥ ९ ॥

तपसा पुरुषव्याघ्र राक्षसोऽयं न शक्यते । शस्त्रेण युधि निर्जेतुं राक्षसं निखनावहे ॥ १० ॥

भावार्थ

‘पुरुषसिंह ! यह राक्षस तपस्यासे ( वर पाकर ) अवध्य हो गया है । इसे शस्त्रके द्वारा युद्धमें नहीं जीता जा सकता । इसलिये हमलोग निशाचर विराधको पराजित करनेके लिये अब गड्ढा खोदकर गाड़ दें ॥ १० ॥

कुञ्जरस्येव रौद्रस्य राक्षसस्यास्य लक्ष्मण । वनेऽस्मिन् सुमहच्छ्वभ्रं खन्यतां रौद्रवर्चसः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! हाथीके समान भयंकर तथा रौद्र तेजवाले इस राक्षसके लिये इस वनमें बहुत बड़ा गड्ढा खोदो’ ॥११॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामः प्रदरः खन्यतामिति । तस्थौ विराधमाक्रम्य कण्ठे पादेन वीर्यवान् ॥ १२ ॥

भावार्थ

इस प्रकार लक्ष्मणको गड्ढा खोदनेकी आज्ञा देकर पराक्रमी श्रीराम अपने एक पैरसे विराधका गला दबाकर खड़े हो गये ॥ १२ ॥

तच्छ्रुत्वा राघवेणोक्तं राक्षसः प्रश्रितं वचः । इदं प्रोवाच काकुत्स्थं विराधः पुरुषर्षभम् ॥ १३ ॥ हतोऽहं पुरुषव्याघ्र शक्रतुल्यबलेन वै । मया तु पूर्वं त्वं मोहान्न ज्ञातः पुरुषर्षभ ॥ १४ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीकी कही हुई यह बात सुनकर राक्षस विराधने पुरुषप्रवर श्रीरामसे यह विनययुक्त बात कही—॥ ‘पुरुषसिंह ! नरश्रेष्ठ ! आपका बल देवराज इन्द्रके समान है । मैं आपके हाथसे मारा गया । मोहवश पहले मैं आपको पहचान न सका ॥ १४ ॥

कौसल्या सुप्रजास्तात रामस्त्वं विदितो मया । वैदेही च महाभागा लक्ष्मणश्च महायशाः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘तात ! आपके द्वारा माता कौसल्या उत्तम संतानवाली हुई हैं । मैं यह जान गया कि आप ही श्रीरामचन्द्रजी हैं । यह महाभागा विदेहनन्दिनी सीता हैं और ये आपके छोटे भाई महायशस्वी लक्ष्मण हैं ॥ १५ ॥

अभिशापादहं घोरां प्रविष्टो राक्षसीं तनुम् । तुम्बुरुर्नाम गन्धर्वः शप्तो वैश्रवणेन हि ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘मुझे शापके कारण इस भयंकर राक्षसशरीरमें आना पड़ा था । मैं तुम्बुरु नामक गन्धर्व हूँ । कुबेरने मुझे राक्षस होनेका शाप दिया था ॥ १६ ॥

प्रसाद्यमानश्च मया सोऽब्रवीन्मां महायशाः । यदा दाशरथी रामस्त्वां वधिष्यति संयुगे ॥ १७ ॥ तदा प्रकृतिमापन्नो भवान् स्वर्गं गमिष्यति ।

भावार्थ

‘जब मैंने उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा की, तब वे महायशस्वी कुबेर मुझसे इस प्रकार बोले—‘गन्धर्व ! जब दशरथनन्दन श्रीराम युद्धमें तुम्हारा वध करेंगे, तब तुम अपने पहले स्वरूपको प्राप्त होकर स्वर्गलोकको जाओगे ॥ १७½ ॥

अनुपस्थीयमानो मां स क्रुद्धो व्याजहार ह ॥ १८ ॥ इति वैश्रवणो राजा रम्भासक्तमुवाच ह ।

भावार्थ

‘मैं रम्भा नामक अप्सरामें आसक्त था, इसलिये एक दिन ठीक समयसे उनकी सेवामें उपस्थित न हो सका । इसीलिये कुपित हो राजा वैश्रवण ( कुबेर ) ने मुझे पूर्वोक्त शाप देकर उससे छूटनेकी अवधि बतायी थी ॥ १८½ ॥

तव प्रसादान्मुक्तोऽहमभिशापात् सुदारुणात् ॥ १९ ॥ भुवनं स्वं गमिष्यामि स्वस्ति वोऽस्तु परंतप ।

भावार्थ

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुवीर ! आज आपकी कृपासे मुझे उस भयंकर शापसे छुटकारा मिल गया । आपका कल्याण हो, अब मैं अपने लोकको जाऊँगा ॥ १९½ ॥

इतो वसति धर्मात्मा शरभङ्गः प्रतापवान् ॥ २० ॥ अध्यर्धयोजने तात महर्षिः सूर्यसंनिभः । तं क्षिप्रमभिगच्छ त्वं स ते श्रेयोऽभिधास्यति ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘तात ! यहाँसे डेढ़ योजनकी दूरीपर सूर्यके समान तेजस्वी प्रतापी और धर्मात्मा महामुनि शरभङ्ग निवास करते हैं । उनके पास आप शीघ्र चले जाइये, वे आपके कल्याणकी बात बतायेंगे ॥ २०-२१ ॥

अवटे चापि मां राम निक्षिप्य कुशली व्रज । रक्षसां गतसत्त्वानामेष धर्मः सनातनः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! आप मेरे शरीरको गड्ढेमें गाड़कर कुशलपूर्वक चले जाइये । मरे हुए राक्षसोंके शरीरको गडढेमें गाड़ना ( कब्र खोदकर उसमें दफना देना ) यह उनके लिये सनातन ( परम्पराप्राप्त ) धर्म है ॥ २२ ॥

अवटे ये निधीयन्ते तेषां लोकाः सनातनाः । एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थं विराधः शरपीडितः ॥ २३ ॥ बभूव स्वर्गसम्प्राप्तो न्यस्तदेहो महाबलः ।

भावार्थ

‘जो राक्षस गडढेमें गाड़ दिये जाते हैं, उन्हें सनातन लोकोंकी प्राप्ति होती है ।’ श्रीरामसे ऐसा कहकर बाणोंसे पीड़ित हुआ महाबली विराध ( जब उसका शरीर गडढेमें डाला गया, तब ) उस शरीरको छोड़कर स्वर्गलोकको चला गया ॥ २३½ ॥

तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं लक्ष्मणं व्यादिदेश ह ॥ २४ ॥ कुञ्जरस्येव रौद्रस्य राक्षसस्यास्य लक्ष्मण । वनेऽस्मिन्सुमहाञ्छ्वभ्रः खन्यतां रौद्रकर्मणः ॥ २५ ॥

भावार्थ

( वह किस तरह गडढेमें डाला गया ?—यह बात अब बतायी जाती है—) उसकी बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने लक्ष्मणको आज्ञा दी—‘लक्ष्मण ! भयंकर कर्म करनेवाले तथा हाथीके समान भयानक इस राक्षसके लिये इस वनमें बहुत बड़ा गड्ढा खोदो’ ॥ २४-२५ ॥

इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामः प्रदरः खन्यतामिति । तस्थौ विराधमाक्रम्य कण्ठे पादेन वीर्यवान् ॥ २६ ॥

भावार्थ

इस प्रकार लक्ष्मणको गड्ढा खोदनेका आदेश दे पराक्रमी श्रीराम एक पैरसे विराधका गला दबाकर खड़े हो गये ॥ २६ ॥

ततः खनित्रमादाय लक्ष्मणः श्वभ्रमुत्तमम् । अखनत् पार्श्वतस्तस्य विराधस्य महात्मनः ॥ २७ ॥

भावार्थ

तब लक्ष्मणने फावड़ा लेकर उस विशालकाय विराधके पास ही एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदकर तैयार किया ॥ २७ ॥

तं मुक्तकण्ठमुत्क्षिप्य शङ्कुकर्णं महास्वनम् । विराधं प्राक्षिपच्छ्वभ्रे नदन्तं भैरवस्वनम् ॥ २८ ॥

भावार्थ

तब श्रीरामने उसके गलेको छोड़ दिया और लक्ष्मणने खूँटे-जैसे कानवाले उस विराधको उठाकर उस गड्ढेमें डाल दिया, उस समय वह बड़ी भयानक आवाजमें जोर-जोरसे गर्जना कर रहा था ॥ २८ ॥

तमाहवे दारुणमाशुविक्रमौ स्थिरावुभौ संयति रामलक्ष्मणौ । मुदान्वितौ चिक्षिपतुर्भयावहं नदन्तमुत्क्षिप्य बलेन राक्षसम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

युद्धमें स्थिर रहकर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणने रणभूमिमें क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले उस भयंकर राक्षस विराधको बलपूर्वक उठाकर गड्ढेमें फेंक दिया । उस समय वह जोर-जोरसे चिल्ला रहा था । उसे गड्ढेमें डालकर वे दोनों बन्धु बड़े प्रसन्न हुए ॥ २९ ॥

अवध्यतां प्रेक्ष्य महासुरस्य तौ शितेन शस्त्रेण तदा नरर्षभौ । समर्थ्य चात्यर्थविशारदावुभौ बिले विराधस्य वधं प्रचक्रतुः ॥ ३० ॥

भावार्थ

महान् असुर विराधका तीखे शस्त्रसे वध होनेवाला नहीं है, यह देखकर अत्यन्त कुशल दोनों भाई नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मणने उस समय गड्ढा खोदकर उस गड्ढेमें उसे डाल दिया और उसे मिट्टीसे पाटकर उस राक्षसका वध कर डाला ॥ ३० ॥

स्वयं विराधेन हि मृत्युमात्मनः प्रसह्य रामेण यथार्थमीप्सितः । निवेदितः काननचारिणा स्वयं न मे वधः शस्त्रकृतो भवेदिति ॥ ३१ ॥

भावार्थ

वास्तवमें श्रीरामके हाथसे ही हठपूर्वक मरना उसे अभीष्ट था । उस अपनी मनोवाञ्छित मृत्युकी प्राप्तिके उद्देश्यसे स्वयं वनचारी विराधने ही श्रीरामको यह बता दिया था कि शस्त्रद्वारा मेरा वध नहीं हो सकता ॥ ३१ ॥

तदेव रामेण निशम्य भाषितं कृता मतिस्तस्य बिलप्रवेशने । बिलं च तेनातिबलेन रक्षसा प्रवेश्यमानेन वनं विनादितम् ॥ ३२ ॥ प्रहृष्टरूपाविव रामलक्ष्मणौ विराधमुर्व्यां प्रदरे निपात्य तम् । ननन्दतुर्वीतभयौ महावने शिलाभिरन्तर्दधतुश्च राक्षसम् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

उसकी कही हुई उसी बातको सुनकर श्रीरामने उसे गड्ढेमें गाड़ देनेका विचार किया था । जब वह गड्ढेमें डाला जाने लगा, उस समय उस अत्यन्त बलवान् राक्षसने अपनी चिल्लाहटसे सारे वनप्रान्तको गुँजा दिया ॥ राक्षस विराधको पृथ्वीके अंदर गड्ढेमें गिराकर श्रीराम और लक्ष्मणने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसे ऊपरसे बहुतेरे पत्थर डालकर पाट दिया । फिर वे निर्भय हो उस महान् वनमें सानन्द विचरने लगे ॥ ३३ ॥

ततस्तु तौ काञ्चनचित्रकार्मुकौ निहत्य रक्षः परिगृह्य मैथिलीम् । विजह्रतुस्तौ मुदितौ महावने दिवि स्थितौ चन्द्रदिवाकराविव ॥ ३४ ॥

भावार्थ

इस प्रकार उस राक्षसका वध करके मिथिलेशकुमारी सीताको साथ ले सोनेके विचित्र धनुषोंसे सुशोभित हो वे दोनों भाई आकाशमें स्थित हुए चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति उस महान् वनमें आनन्दमग्न हो विचरण करने लगे ॥ ३४ ॥

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