Ramayana.com

अरण्यकाण्ड, सर्ग 56

सा तथोक्ता तु वैदेही निर्भया शोककर्शिता। तृणमन्तरतः कृत्वा रावणं प्रत्यभाषत ॥ १ ॥

भावार्थ

रावणके ऐसा कहनेपर शोकसे कष्ट पाती हुई विदेहराजकुमारी सीता बीचमें तिनकेकी ओट करके उस निशाचरसे निर्भय होकर बोलीं—॥ १ ॥

राजा दशरथो नाम धर्मसेतुरिवाचलः। सत्यसंधः परिज्ञातो यस्य पुत्रः स राघवः ॥ २ ॥ रामो नाम स धर्मात्मा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः। दीर्घबाहुर्विशालाक्षो दैवतं स पतिर्मम ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘महाराज दशरथ धर्मके अचल सेतुके समान थे। वे अपनी सत्यप्रतिज्ञताके लिये सर्वत्र विख्यात थे। उनके पुत्र जो रघुकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे भी अपने धर्मात्मापनके लिये तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हैं, उनकी भुजाएँ लंबी और आँखें बड़ी-बड़ी हैं। वे ही मेरे आराध्य देवता और पति हैं ॥ २-३ ॥

इक्ष्वाकूणां कुले जातः सिंहस्कन्धो महाद्युतिः। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा यस्ते प्राणान् वधिष्यति॥ ४ ॥

भावार्थ

‘उनका जन्म इक्ष्वाकुकुलमें हुआ है। उनके कंधे सिंहके समान और तेज महान् है। वे अपने भाई लक्ष्मणके साथ आकर तेरे प्राणोंका विनाश कर डालेंगे ॥ ४ ॥

प्रत्यक्षं यद्यहं तस्य त्वया वै धर्षिता बलात्। शयिता त्वं हतः संख्ये जनस्थाने यथा खरः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘यदि तू उनके सामने बलपूर्वक मेरा अपहरण करता तो अपने भाई खरकी तरह जनस्थानके युद्धस्थलमें ही मारा जाकर सदाके लिये सो जाता ॥ ५ ॥

य एते राक्षसाः प्रोक्ता घोररूपा महाबलाः। राघवे निर्विषाः सर्वे सुपर्णे पन्नगा यथा ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘तूने जो इन घोर रूपधारी महाबली राक्षसोंकी चर्चा की है, श्रीरामके पास जाते ही इन सबका विष उतर जायगा; ठीक उसी तरह जैसे गरुड़के पास सारे सर्प विषके प्रभावसे रहित हो जाते हैं ॥ ६ ॥

तस्य ज्याविप्रमुक्तास्ते शराः काञ्चनभूषणाः। शरीरं विधमिष्यन्ति गङ्गाकूलमिवोर्मयः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘जैसे बढ़ी हुई गङ्गाकी लहरें अपने कगारोंको काट गिराती हैं, उसी प्रकार श्रीरामके धनुषकी डोरीसे छूटे हुए सुवर्णभूषित बाण तेरे शरीरको छिन्न-भिन्न कर डालेंगे ॥ ६ ॥

असुरैर्वा सुरैर्वा त्वं यद्यवध्योऽसि रावण। उत्पाद्य सुमहद् वैरं जीवंस्तस्य न मोक्ष्यसे ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘रावण ! तू असुरों अथवा देवताओंसे यदि अवध्य है तो सम्भव है, वे तुझे न मार सकें; किंतु भगवान् श्रीरामके साथ यह महान् वैर ठानकर तू किसी तरह जीवित नहीं छूट सकेगा ॥ ८ ॥

स ते जीवितशेषस्य राघवोऽन्तकरो बली। पशोर्यूपगतस्येव जीवितं तव दुर्लभम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘श्रीरघुनाथजी बड़े बलवान् हैं। वे तेरे शेष जीवनका अन्त कर डालेंगे। यूपमें बँधे हुए पशुकी भाँति तेरा जीवन दुर्लभ हो जायगा ॥ ९ ॥

यदि पश्येत् स रामस्त्वां रोषदीप्तेन चक्षुषा। रक्षस्त्वमद्य निर्दग्धो यथा रुद्रेण मन्मथः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘राक्षस ! यदि श्रीरामचन्द्रजी अपनी रोषभरी दृष्टिसे तुझे देख लें तो तू अभी उसी तरह जलकर खाक हो जायगा जैसे भगवान् शङ्करने कामदेवको भस्म किया था ॥१०॥

यश्चन्द्रं नभसो भूमौ पातयेन्नाशयेत वा । सागरं शोषयेद् वापि स सीतां मोचयेदिह ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘जो चन्द्रमाको आकाशसे पृथ्वीपर गिराने या नष्ट करनेकी शक्ति रखते हैं अथवा जो समुद्रको भी सुखा सकते हैं, वे भगवान् श्रीराम यहाँ पहुँचकर सीताको भी छुड़ा सकते हैं ॥ ११ ॥

गतासुस्त्वं गतश्रीको गतसत्त्वो गतेन्द्रियः । लङ्का वैधव्यसंयुक्ता त्वन्कृतेन भविष्यति ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘तू समझ ले कि तेरे प्राण अब चले गये । तेरी राज्यलक्ष्मी नष्ट हो गयी। तेरे बल और इन्द्रियोंका भी नाश हो गया तथा तेरे ही पापके कारण तेरी यह लङ्का भी अब विधवा हो जायगी ॥ १२ ॥

न ते पापमिदं कर्म सुखोदर्कं भविष्यति । याहं नीता विनाभावं पतिपार्श्वात् त्वया बलात् ॥१३॥

भावार्थ

‘तेरा यह पापकर्म तुझे भविष्यमें सुख नहीं भोगने देगा; क्योंकि तूने मुझे बलपूर्वक पतिके पाससे दूर हटाया है ॥ १३ ॥

स हि देवरसंयुक्तो मम भर्ता महाद्युतिः । निर्भयो वीर्यमाश्रित्य शून्ये वसति दण्डके ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘मेरे स्वामी महान् तेजस्वी हैं और मेरे देवरके साथ अपने ही पराक्रमका भरोसा करके सूने दण्डकारण्यमें निर्भयतापूर्वक निवास करते हैं ॥ १४ ॥

स ते वीर्यं बलं दर्पमुत्सेकं च तथाविधम् । अपनेष्यति गात्रेभ्यः शरवर्षेण संयुगे ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘वे युद्धमें बाणोंकी वर्षा करके तेरे शरीरसे बल, पराक्रम, घमंड तथा ऐसे उच्छृङ्खल आचरणको भी निकाल बाहर करेंगे ॥ १५ ॥

यदा विनाशो भूतानां दृश्यते कालचोदितः । तदा कार्ये प्रमाद्यन्ति नराः कालवशं गताः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘जब कालकी प्रेरणासे प्राणियोंका विनाश निकट आता है. उस समय मृत्युके अधीन हुए जीव प्रत्येक कार्यमें प्रमाद करने लगते हैं ॥ १६ ॥

मां प्रधृष्य स ते कालः प्राप्तोऽयं राक्षसाधम । आत्मनो राक्षसानां च वधायान्तःपुरस्य च ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘अधम निशाचर ! मेरा अपहरण करनेके कारण तेरे लिये भी वही काल आ पहुँचा है । तेरे अपने लिये, सारे राक्षसोंके लिये तथा इस अन्तःपुरके लिये भी विनाशकी घड़ी निकट आ गयी है ॥ १७ ॥

न शक्या यज्ञमध्यस्था वेदिः स्रुग्भाण्डमण्डिता । द्विजातिमन्त्रसम्पूता चण्डालेनावमर्दितुम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘यज्ञशालाके बीचकी वेदीपर, जो द्विजातियोंके मन्त्रद्वारा पवित्र की गयी होती है तथा जिसे स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञपात्र सुशोभित करते हैं, चाण्डाल अपना पैर नहीं रख सकता ॥ १८ ॥

तथाहं धर्मनित्यस्य धर्मपत्नी दृढव्रता । त्वया स्प्रष्टुं न शक्याहं राक्षसाधम पापिना ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘उसी प्रकार मैं नित्य धर्मपरायण भगवान् श्रीरामकी धर्मपत्नी हूँ तथा दृढ़तापूर्वक पातिव्रत्यधर्मका पालन करती हूँ ( अतः यज्ञवेदीके समान हूँ ) और राक्षसाधम ! तू महापापी है ( अतः चाण्डालके तुल्य है ); इसलिये मेरा स्पर्श नहीं कर सकता ॥ १९ ॥

क्रीडन्ती राजहंसेन पद्मषण्डेषु नित्यशः । हंसी सा तृणमध्यस्थं कथं द्रक्ष्येत मद्गुकम् ॥ २० ॥

भावार्थ

‘जो सदा कमलके समूहोंमें राजहंसके साथ क्रीड़ा करती है, वह हंसी तृणोंमें रहनेवाले जलकाककी ओर कैसे दृष्टिपात करेगी ॥ २० ॥

इदं शरीरं निःसंज्ञं बन्ध वा घातयस्व वा । नेदं शरीरं रक्ष्यं मे जीवितं वापि राक्षस ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘राक्षस ! तू इस संज्ञाशून्य जड़ शरीरको बाँधकर रख ले या काट डाल । मैं स्वयं ही इस शरीर और जीवनको नहीं रखना चाहती ॥ २१ ॥

न तु शक्यमपकोशं पृथिव्यां दातुमात्मनः । एवमुक्त्वा तु वैदेही क्रोधात् सुपरुषं वचः ॥ २२ ॥ रावणं जानकी तत्र पुनर्नोवाच किंचन ।

भावार्थ

‘मैं इस भूतलपर अपने लिये निन्दा या कलङ्क देनेवाला कोई कार्य नहीं कर सकती ।’ रावणसे क्रोधपूर्वक यह अत्यन्त कठोर वचन कहकर विदेहकुमारी जानकी चुप हो गयीं; वे वहाँ फिर कुछ नहीं बोलीं ॥ २२½ ॥

सीताया वचनं श्रुत्वा परुषं रोमहर्षणम् ॥ २३ ॥ प्रत्युवाच ततः सीतां भयसंदर्शनं वचः ।

भावार्थ

सीताका वह कठोर वचन रोंगटे खड़े कर देनेवाला था । उसे सुनकर रावणने उनसे भय दिखानेवाली बात कही—॥ २३½ ॥

शृणु मैथिलि मद्वाक्यं मासान् द्वादश भामिनि ॥ २४ ॥ कालेनानेन नाभ्येषि यदि मां चारुहासिनि । ततस्त्वां प्रातराशार्थं सूदाश्छेत्स्यन्ति लेशशः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘मनोहर हास्यवाली भामिनि ! मिथिलेशकुमारी ! मेरी बात सुन लो । मैं तुम्हें बारह महीनेका समय देता हूँ । इतने समयमें यदि तुम स्वेच्छापूर्वक मेरे पास नहीं आओगी तो मेरे रसोइये सवेरेका कलेवा तैयार करनेके लिये तुम्हारे शरीरके टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे‘ ॥ २४-२५ ॥

इत्युक्त्वा परुषं वाक्यं रावणः शत्रुरावणः । राक्षसीश्च ततः क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत् ॥ २६ ॥

भावार्थ

सीतासे ऐसी कठोर बात कहकर शत्रुओंको रुलानेवाला रावण कुपित हो राक्षसियोंसे इस प्रकार बोला—॥ २६ ॥

शीघ्रमेव हि राक्षस्यो विरूपा घोरदर्शनाः । दर्पमस्यापनेष्यन्तु मांसशोणितभोजनाः ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘अपने विकराल रूपके कारण भयङ्कर दिखायी देनेवाली तथा रक्त-मांसका आहार करनेवाली राक्षसियो ! तुमलोग शीघ्र ही इस सीताका अहंकार दूर करो‘ ॥ २७ ॥

वचनादेव तास्तस्य सुघोरा घोरदर्शनाः । कृतप्राञ्जलयो भूत्वा मैथिलीं पर्यवारयन् ॥ २८ ॥

भावार्थ

रावणके इतना कहते ही वे भयंकर दिखायी देनेवाली अत्यन्त घोर राक्षसियाँ हाथ जोड़े मैथिलीको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं ॥ २८ ॥

स ताः प्रोवाच राजासौ रावणो घोरदर्शनाः । प्रचल्य चरणोत्कर्षैर्दारयन्निव मेदिनीम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

तब राजा रावण अपने पैरोंके घमाकेसे पृथ्वीको विदीर्ण करता हुआ-सा दो-चार पग चलकर उन भयानक राक्षसियोंसे बोला—॥ २९ ॥

अशोकवनिकामध्ये मैथिली नीयतामिति । तत्रेयं रक्ष्यतां गूढं युष्माभिः परिवारिता ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘निशाचरियो ! तुमलोग मिथिलेशकुमारी सीताको अशोकवाटिकामें ले जाओ और चारों ओरसे घेरकर वहाँ गूढ भावसे इसकी रक्षा करती रहो ॥ ३० ॥

तत्रैनां तर्जनघोरैः पुनः सान्त्वैश्च मैथिलीम् । आनयध्वं वशं सर्वा वन्यां गजवधूमिव ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘वहाँ पहले तो भयंकर गर्जन-तर्जन करके इसे डराना; फिर मीठे-मीठे वचनोंसे समझा-बुझाकर जंगलकी हथिनीकी भाँति इस मिथिलेशकुमारीको तुम सब लोग वशमें लानेकी चेष्टा करना‘ ॥ ३१ ॥

इति प्रतिसमादिष्टा राक्षस्यो रावणेन ताः । अशोकवनिकां जग्मुर्मैथिलीं परिगृह्य तु ॥ ३२ ॥

भावार्थ

रावणके इस प्रकार आदेश देनेपर वे राक्षसियाँ मैथिलीको साथ लेकर अशोकवाटिकामें चली गयीं ॥ ३२ ॥

सर्वकामफलैर्वृक्षैर्नानापुष्पफलैर्वृताम् । सर्वकालमदैश्चापि द्विजैः समुपसेविताम् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

वह वाटिका समस्त कामनाओंको फलरूपमें प्रदान करनेवाले कल्पवृक्षों तथा भाँति-भाँतिके फल-फूलवाले दूसरे-दूसरे वृक्षोंसे भी भरी थी तथा हर समय मदमत्त रहनेवाले पक्षी उसमें निवास करते थे ॥ ३३ ॥

सा तु शोकपरीताङ्गी मैथिली जनकात्मजा । राक्षसीवशमापन्ना व्याघ्रीणां हरिणी यथा ॥ ३४ ॥

भावार्थ

परंतु वहाँ जानेपर मिथिलेशकुमारी जानकीके अङ्ग-अङ्गमें शोक व्याप्त हो गया। राक्षसियोंके वशमें पड़कर उनकी दशा बाघिनोंके बीचमें घिरी हुई हरिणीके समान हो गयी थी ॥ ३४ ॥

शोकेन महता ग्रस्ता मैथिली जनकात्मजा । न शर्म लभते भीरुः पाशबद्धा मृगी यथा ॥ ३५ ॥

भावार्थ

महान् शोकसे ग्रस्त हुईं मिथिलेशनन्दिनी जानकी जालमें फँसी हुई मृगीके समान भयभीत हो क्षणभरके लिये भी चैन नहीं पाती थीं ॥ ३५ ॥

न विन्दते तत्र तु शर्म मैथिली विरूपनेत्राभिरतीव तर्जिता । पतिं स्मरन्ती दयितं च देवरं विचेतनाभूद् भयशोकपीडिता ॥ ३६ ॥

भावार्थ

विकराल रूप और नेत्रोंवाली राक्षसियोंकी अत्यन्त डाँट-फटकार सुननेके कारण मिथिलेशकुमारी सीताको वहाँ शान्ति नहीं मिली। वे भय और शोकसे पीड़ित हो प्रियतम पति और देवरका स्मरण करती हुई अचेत-सी हो गयीं ॥ ३६ ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें