अरण्यकाण्ड, सर्ग 57
प्रवेशितायां सीतायां लङ्कां प्रति पितामहः । तदा प्रोवाच देवेन्द्रं परितुष्टं शतक्रतुम् ॥ १ ॥
भावार्थ
जब सीताका लङ्कामें प्रवेश हो गया, तब पितामह ब्रह्माजीने संतुष्ट हुए देवराज इन्द्रसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय रक्षसामहिताय च। लङ्कां प्रवेशिता सीता रावणेन दुरात्मना ॥ २ ॥
भावार्थ
‘देवराज ! तीनों लोकोंके हित और राक्षसोंके विनाशके लिये दुरात्मा रावणने सीताको लङ्कामें पहुँचा दिया ॥ २ ॥
पतिव्रता महाभागा नित्यं चैव सुखैधिता। अपश्यन्ती च भर्तारं पश्यन्ती राक्षसीजनम् ॥ ३ ॥ राक्षसीभिः परिवृता भर्तृदर्शनलालसा ।
भावार्थ
‘पतिव्रता महाभागा जानकी सदा सुखमें ही पली हैं । इस समय वे अपने पतिके दर्शनसे वञ्चित हो गयी हैं और राक्षसियोंसे घिरी रहनेके कारण सदा उन्हींको अपने सामने देखती हैं । उनके हृदयमें अपने पतिके दर्शनकी तीव्र लालसा बनी हुई है ॥ ३½ ॥
निविष्टा हि पुरी लङ्का तीरे नदनदीपतेः ॥ ४ ॥ कथं ज्ञास्यति तां रामस्तत्रस्थां तामनिन्दिताम् । दुःखं संचिन्तयन्ती सा बहुशः परिदुर्लभा ॥ ५ ॥ प्राणयात्रामकुर्वाणा प्राणांस्त्यक्ष्यत्यसंशयम् । स भूयः संशयो जातः सीतायाः प्राणसंक्षये ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘लङ्कापुरी समुद्रके तटपर बसी हुई है । वहाँ रहती हुई सती-साध्वी सीताका पता श्रीरामचन्द्रजीको कैसे लगेगा ॥ ‘सीता दुःखके साथ नाना प्रकारकी चिन्ताओंमें डूबी रहती हैं । पतिके लिये इस समय वे अत्यन्त दुर्लभ हो गयी हैं । प्राणयात्रा ( भोजन ) नहीं करती हैं; अतः ऐसी दशामें निःसंदेह वे अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगी । सीताके प्राणोंका क्षय हो जानेपर हमारे उद्देश्यकी सिद्धिमें पुनः पूर्ववत् संदेह उपस्थित हो जायगा ॥ ५-६ ॥
स त्वं शीघ्रमितो गत्वा सीतां पश्य शुभाननाम् । प्रविश्य नगरीं लङ्कां प्रयच्छ हविरुत्तमम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘अतः तुम शीघ्र ही यहाँसे जाकर लङ्कापुरीमें प्रवेश करके सुमुखी सीतासे मिलो और उन्हें उत्तम हविष्य प्रदान करो’ ॥ ७ ॥
एवमुक्तोऽथ देवेन्द्रः पुरीं रावणपालिताम् । आगच्छन्निद्रया सार्धं भगवान् पाकशासनः ॥ ८ ॥
भावार्थ
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर पाकशासन भगवान् इन्द्र निद्राको साथ लेकर रावणद्वारा पालित लङ्कापुरीमें आये ॥८॥
निद्रां चोवाच गच्छ त्वं राक्षसान् सम्प्रमोहय । सा तथोक्ता मघवता देवी परमहर्षिता ॥ ९ ॥ देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं प्रामोहयत राक्षसान् ।
भावार्थ
वहाँ आकर इन्द्रने निद्रासे कहा—‘तुम राक्षसोंको मोहित करो ।’ इन्द्रसे ऐसी आज्ञा पाकर देवी निद्रा बहुत प्रसन्न हुई । देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उन्होंने राक्षसोंको मोह ( निद्रा ) में डाल दिया ॥ ९½ ॥
एतस्मिन्नन्तरे देवः सहस्राक्षः शचीपतिः ॥ १० ॥ आसाद वनस्थां तां वचनं चेदमब्रवीत् ।
भावार्थ
इसी बीचमें सहस्र नेत्रधारी शचीपति देवराज इन्द्र अशोकवाटिकामें बैठी हुई सीताके पास गये और इस प्रकार बोले—॥ १०½ ॥
देवराजोऽस्मि भद्रं ते इह चागतोऽस्मि शुचिस्मिते ॥ ११ ॥ अहं त्वां कार्यसिद्ध्यर्थं राघवस्य महात्मनः । साहाय्यं कल्पयिष्यामि मा शुचो जनकात्मजे ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘पवित्र मुसकानवाली देवि ! आपका भला हो । मैं देवराज इन्द्र यहाँ आपके पास आया हूँ । जनककिशोरी ! मैं आपके उद्धारकार्यकी सिद्धिके लिये महात्मा श्रीरघुनाथजीकी सहायता करूँगा, अतः आप शोक न करें ॥ ११-१२ ॥
मत्प्रसादात् समुद्रं स तरिष्यति बलैः सह । मयैवेह च राक्षस्यो मायया मोहिताः शुभे ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘वे मेरे प्रसादसे बड़ी भारी सेनाके साथ समुद्रको पार करेंगे । शुभे ! मैंने ही यहाँ इन राक्षसियोंको अपनी मायासे मोहित किया है ॥ १३ ॥
तस्मादन्नमिदं सीते हविष्यान्नमहं स्वयम् । स त्वां संगृह्य वैदेहि आगतः सह निद्रया ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनी सीते ! इसलिये मैं स्वयं ही यह भोजन—यह हविष्यान्न लेकर निद्राके साथ तुम्हारे पास आया हूँ ॥ १४ ॥
एतदत्स्यसि भद्रस्तान्न त्वां बाधिष्यते शुभे । क्षुधा तृषा च रम्भोरु वर्षाणामयुतैरपि ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘शुभे ! रम्भोरु ! यदि मेरे हाथसे इस हविष्यको लेकर खा लोगी तो तुम्हें हजारों वर्षोंतक भूख और प्यास नहीं सतायेगी’ ॥ १५ ॥
एवमुक्ता तु देवेन्द्रमुवाच परिशङ्किता । कथं जानामि देवेन्द्रं त्वामिहस्थं शचीपतिम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
देवराजके ऐसा कहनेपर शङ्कित हुई सीताने उनसे कहा— ‘मुझे कैसे विश्वास हो कि आप शचीपति देवराज इन्द्र ही यहाँ पधारे हैं ? ॥ १६ ॥
देवलिङ्गानि दृष्टानि रामलक्ष्मणसंनिधौ । तानि दर्शय देवेन्द्र यदि त्वं देवराट् स्वयम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘देवेन्द्र ! मैंने श्रीराम और लक्ष्मणके समीप देवताओंके लक्षण अपनी आँखों देखे हैं । यदि आप साक्षात् देवराज हैं तो उन लक्षणोंको दिखाइये’ ॥ १७ ॥
सीताया वचनं श्रुत्वा तथा चक्रे शचीपतिः । पृथिवीं नास्पृशत् पद्भ्यामनिमेषेक्षणानि च ॥ १८ ॥ अरजोऽम्बरधारी च नम्लानकुसुमस्तथा । तं ज्ञात्वा लक्षणैः सीता वासवं परिहर्षिता ॥ १९ ॥
भावार्थ
सीताकी यह बात सुनकर शचीपति इन्द्रने वैसा ही किया। उन्होंने अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श नहीं किया—आकाशमें निराधार खड़े रहे। उनकी आँखोंकी पलकें नहीं गिरती थीं । उन्होंने जो वस्त्र धारण किया था, उसपर धूलका स्पर्श नहीं होता था । उनके कण्ठमें जो पुष्पमाला थी, उसके पुष्प कुम्हलाते नहीं थे। देवोचित लक्षणोंसे इन्द्रको पहचानकर सीता बहुत प्रसन्न हुईं ॥ १८-१९ ॥
उवाच वाक्यं रुदती भगवन् राघवं प्रति । सह भ्रात्रा महाबाहुर्दिष्ट्या मे श्रुतिमागतः ॥ २० ॥
भावार्थ
वे भगवान् श्रीरामके लिये रोती हुई बोलीं—‘भगवन् ! सौभाग्यकी बात है कि आज भाईसहित महाबाहु श्रीरामका नाम मेरे कानोंमें पड़ा है ॥ २०॥
यथा मे श्वशुरो राजा यथा च मिथिलाधिपः । तथा त्वामद्य पश्यामि सनाथो मे पतिस्त्वया॥ २१ ॥
भावार्थ
‘मेरे लिये जैसे मेरे श्वशुर महाराज दशरथ तथा पिता मिथिलानरेश जनक हैं, उसी रूपमें मैं आज आपको देखती हूँ । मेरे पति आपके द्वारा सनाथ हैं ॥ २१॥
तवाज्ञया च देवेन्द्र पयोभूतमिदं हविः । अशिष्यामि त्वया दत्तं रघूणां कुलवर्धनम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘देवेन्द्र ! आपकी आज्ञासे मैं यह पायसरूप हविष्य ( दूधकी बनी हुई खीर ), जिसे आपने दिया है, खाऊँगी । यह रघुकुलकी वृद्धि करनेवाला हो’ ॥ २२ ॥
इन्द्रहस्ताद् गृहीत्वा तत् पायसं सा शुचिस्मिता । न्यवेदयत भर्त्रे सा लक्ष्मणाय च मैथिली ॥ २३ ॥
भावार्थ
इन्द्रके हाथसे उस खीरको लेकर उन पवित्र मुसकानवाली मैथिलीने मन-ही-मन पहले उसे अपने स्वामी श्रीराम और देवर लक्ष्मणको निवेदन किया और इस प्रकार कहा—॥ २३ ॥
यदि जीवति मे भर्ता सह भ्रात्रा महाबलः । इदमस्तु तयोर्भक्त्या तदाद्दनात् पायसं स्वयम् ॥ २४॥
भावार्थ
‘यदि मेरे महाबली स्वामी अपने भाईके साथ जीवित हैं तो यह भक्तिभावसे उन दोनोंके लिये समर्पित है ।’ इतना कहनेके पश्चात् उन्होंने स्वयं उस खीरको खाया ॥ २४ ॥
इतीव तत् प्राश्य हविर्वरानना जहौ क्षुधादुःखसमुद्भवं च तम् । इन्द्रात् प्रवृत्तिमुपलभ्य जानकी काकुत्स्थयोः प्रीतमना बभूव ॥ २५ ॥
भावार्थ
इस प्रकार उस हविष्यको खाकर सुन्दर मुखवाली जानकीने भूख-प्यासके कष्टको त्याग दिया और इन्द्रके मुखसे श्रीराम तथा लक्ष्मणका समाचार पाकर वे जनकनन्दिनी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं ॥ २५ ॥
स चापि शक्रस्त्रिदिवालयं तदा प्रीतो ययौ राघवकार्यसिद्धये । आमन्त्र्य सीतां स ततो महात्मा जगाम निद्रासहितः स्वमालयम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
तब निद्रासहित महात्मा देवराज इन्द्र भी प्रसन्न हो सीतासे विदा लेकर श्रीरामचन्द्रजीके कार्यकी सिद्धिके लिये अपने निवासस्थान देवलोकको चले गये ॥ २६ ॥
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