अरण्यकाण्ड, सर्ग 55
संदिश्य राक्षसान् घोरान् रावणोऽष्टौ महाबलान् । आत्मानं बुद्धिवैकल्यात् कृतकृत्यममन्यत ॥ १ ॥
भावार्थ
इस प्रकार आठ महाबली भयंकर राक्षसोंको जनस्थानमें जानेकी आज्ञा दे रावणने विपरीत बुद्धिके कारण अपनेको कृतकृत्य माना ॥ १ ॥
स चिन्तयानो वैदेहीं कामबाणैः प्रपीडितः । प्रविवेश गृहं रम्यं सीतां द्रष्टुमभित्वरन् ॥ २ ॥
भावार्थ
वह विदेहकुमारी सीताका स्मरण करके काम-बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो रहा था; अतः उन्हें देखनेके लिये उसने बड़ी उतावलीके साथ अपने रमणीय अन्तःपुरमें प्रवेश किया ॥ २ ॥
स प्रविश्य तु तद्वेश्म रावणो राक्षसाधिपः । अपश्यद् राक्षसीमध्ये सीतां दुःखपरायणाम् ॥ ३ ॥ अश्रुपूर्णमुखीं दीनां शोकभारावपीडिताम् । वायुवेगैरिवाक्रान्तां मज्जन्तीं नावमर्णवे ॥ ४ ॥ मृगयूथपरिभ्रष्टां मृगीं श्वभिरिवावृताम् ।
भावार्थ
उस भवनमें प्रवेश करके राक्षसोंके राजा रावणने देखा कि सीता राक्षसियोंके बीचमें बैठकर दुःखमें डूबी हुई हैं । उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही है और वे शोकके दुस्सह भारसे अत्यन्त पीड़ित एवं दीन हो वायुके वेगसे आक्रान्त हो समुद्रमें डूबती हुई नौकाके समान जान पड़ती हैं । मृगोंके यूथसे बिछुड़कर कुत्तोंसे घिरी हुई अकेली हरिणीके समान दिखायी देती हैं ॥ ३-४½ ॥
अधोगतमुखीं सीतां तामभ्येत्य निशाचरः ॥ ५ ॥ तां तु शोकवशाद् दीनामवशां राक्षसाधिपः । स बलाद् दर्शयामास गृहं देवगृहोपमम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
शोकवश दीन और विवश हो नीचे मुँह किये बैठी हुई सीताके पास पहुँचकर राक्षसोंके राजा निशाचर रावणने उन्हें जबर्दस्ती अपने देवगृहके समान सुन्दर भवनका दर्शन कराया ॥ ५–६ ॥
हर्म्यप्रासादसम्बाधं स्त्रीसहस्रनिषेवितम् । नानापक्षिगणैर्जुष्टं नानारत्नसमन्वितम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
वह ऊँचे-ऊँचे महलों और सातमंजिले मकानोंसे भरा हुआ था। उसमें सहस्रों स्त्रियाँ निवास करती थीं। झुंड-के-झुंड नाना जातिके पक्षी वहाँ कलरव करते थे। नाना प्रकारके रत्न उस अन्तःपुरकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ७ ॥
दान्तकैस्तापनीयैश्च स्फाटिकै राजतैस्तथा । वज्रवैदूर्यचित्रैश्च स्तम्भैर्दृष्टिमनोरमैः ॥ ८ ॥
भावार्थ
उसमें बहुत-से मनोहर खंभे लगे थे, जो हाथीदाँत, पक्के सोने, स्फटिकमणि, चाँदी, हीरा और वैदूर्यमणि ( नीलम ) से जटित होनेके कारण बड़े विचित्र दिखायी देते थे ॥ ८ ॥
दिव्यदुन्दुभिनिर्घोषं तप्तकाञ्चनभूषणम् । सोपानं काञ्चनं चित्रमारुरोह तया सह ॥ ९ ॥
भावार्थ
उस महलमें दिव्य दुन्दुभियोंका मधुर घोष होता रहता था । उस अन्तःपुरको तपाये हुए सुवर्णके आभूषणोंसे सजाया गया था । रावण सीताको साथ लेकर सोनेकी बनी हुई विचित्र सीढ़ीपर चढ़ा ॥ ९ ॥
दान्तका राजताश्चैव गवाक्षाः प्रियदर्शनाः । हेमजालावृताश्चासंस्तत्र प्रासादपङ्क्तयः ॥ १० ॥
भावार्थ
वहाँ हाथीदाँत और चाँदीकी बनी हुई खिड़कियाँ थीं, जो बड़ी सुहावनी दिखायी देती थीं । सोनेकी जालियोंसे ढकी हुई प्रासादमालाएँ भी दृष्टिगोचर होती थीं ॥ १० ॥
सुधामणिविचित्राणि भूमिभागानि सर्वशः । दशग्रीवः स्वभवने प्रादर्शयत मैथिलीम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
उस महलमें जो भूभाग ( फर्श ) थे, वे सुर्खी-चूनाके पक्के बनाये गये थे और उनमें मणियाँ जड़ी गयी थीं, जिनसे वे सब-के-सब विचित्र दिखायी देते थे । दशग्रीवने अपने महलकी वे सारी वस्तुएँ मैथिलीको दिखायीं ॥ ११ ॥
दीर्घिकाः पुष्करिण्यश्च नानापुष्पसमावृताः । रावणो दर्शयामास सीतां शोकपरायणाम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
रावणने बहुत-सी बावड़ियाँ और भाँति-भाँतिके फूलोंसे आच्छादित बहुत-सी पोखरियाँ भी सीताको दिखायीं । सीता वह सब देखकर शोकमें डूब गयीं ॥ १२ ॥
दर्शयित्वा तु वैदेहीं कृत्स्नं तद्भवनोत्तमम् । उवाच वाक्यं पापात्मा सीतां लोभितुमिच्छया ॥ १३ ॥
भावार्थ
वह पापात्मा निशाचर विदेहनन्दिनी सीताको अपना सारा सुन्दर भवन दिखाकर उन्हें लुभानेकी इच्छासे इस प्रकार बोला—॥ १३ ॥
दश राक्षसकोट्यश्च द्वाविंशतिरथापराः । वर्जयित्वा जरावृद्धान् बालांश्च रजनीचरान् ॥ १४ ॥ तेषां प्रभुरहं सीते सर्वेषां भीमकर्मणाम् । सहस्रमेकमेकस्य मम कार्यपुरःसरम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘सीते ! मेरे अधीन बत्तीस करोड़ राक्षस हैं । यह संख्या बूढ़े और बालक निशाचरोंको छोड़कर बतायी गयी है । भयंकर कर्म करनेवाले इन सभी राक्षसोंका मैं ही स्वामी हूँ । अकेले मेरी सेवामें एक हजार राक्षस रहते हैं ॥ १४–१५ ॥
यदिदं राज्यतन्त्रं मे त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । जीवितं च विशालाक्षि त्वं मे प्राणैर्गरीयसी ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘विशाललोचने ! मेरा यह सारा राज्य और जीवन तुमपर ही अवलम्बित है ( अथवा यह सब कुछ तुम्हारे चरणोंमें समर्पित है ) । तुम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हो ॥ १६ ॥
बह्वीनामुत्तमस्त्रीणां मम योऽसौ परिग्रहः । तासां त्वमीश्वरी सीते मम भार्या भव प्रिये ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘सीते ! मेरा अन्तःपुर मेरी बहुत-सी सुन्दरी भार्याओंसे भरा हुआ है, तुम उन सबकी स्वामिनी बनो— प्रिये ! मेरी भार्या बन जाओ ॥ १७ ॥
साधु किं तेऽन्यथाबुद्ध्या रोचयस्व वचो मम । भजस्व माभितप्तस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘मेरे इस हितकर वचनको मान लो—इसे पसंद करो; इससे विपरीत विचारको मनमें लानेसे तुम्हें क्या लाभ होगा ? मुझे अङ्गीकार करो । मैं पीड़ित हूँ, मुझपर कृपा करो ॥ १८ ॥
परिक्षिप्ता समुद्रेण लङ्केयं शतयोजना । नेयं धर्षयितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘समुद्रसे घिरी हुई इस लङ्काके राज्यका विस्तार सौ योजन है । इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी इसे ध्वस्त नहीं कर सकते ॥ १९ ॥
न देवेषु न यक्षेषु न गन्धर्वेषु नर्षिषु । अहं पश्यामि लोकेषु यो मे वीर्यसमो भवेत् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों तथा ऋषियोंमें भी मैं किसीको ऐसा नहीं देखता, जो पराक्रममें मेरी समानता कर सके ॥ २० ॥
राज्यभ्रष्टेन दीनेन तापसेन पदातिना । किं करिष्यसि रामेण मानुषेणाल्पतेजसा ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘राम तो राज्यसे भ्रष्ट, दीन, तपस्वी, पैदल चलनेवाले और मनुष्य होनेके कारण अल्प तेजवाले हैं, उन्हें लेकर क्या करोगी ? ॥ २१ ॥
भजस्व सीते मामेव भर्ताहं सदृशस्तव । यौवनं ह्यध्रुवं भीरु रमस्वेह मया सह ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘सीते ! मुझको ही अपनाओ । मैं तुम्हारे योग्य पति हूँ । भीरु ! जवानी सदा रहनेवाली नहीं है, अतः यहाँ रहकर मेरे साथ रमण करो ॥ २२ ॥
दर्शने मा कृथा बुद्धिं राघवस्य वरानने । कास्य शक्तिरिहागन्तुमपि सीते मनोरथैः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘वरानने ! सीते ! अब तुम रामके दर्शनका विचार छोड़ दो । इस राममें इतनी शक्ति कहाँ है कि यहाँतक आनेका मनोरथ भी कर सके ॥ २३ ॥
न शक्यो वायुराकाशे पाशैर्बद्धुं महाजवः । दीप्यमानस्य वाप्यग्नेर्ग्रहीतुं विमलाः शिखाः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘आकाशमें महान् वेगसे बहनेवाली वायुको रस्सियोंमें नहीं बाँधा जा सकता अथवा प्रज्वलित अग्निकी निर्मल ज्वालाओंको हाथोंसे नहीं पकड़ा जा सकता ॥ २४ ॥
त्रयाणामपि लोकानां न तं पश्यामि शोभने । विक्रमेण नयेद् यस्त्वां मद्बाहुपरिपालिताम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘शोभने ! मैं तीनों लोकोंमें किसी ऐसे वीरको नहीं देखता, जो मेरी भुजाओंसे सुरक्षित तुमको पराक्रम करके यहाँसे ले जा सके ॥ २५ ॥
लङ्कायाः सुमहद्राज्यमिदं त्वमनुपालय । त्वत्प्रेष्या मद्विधाश्चैव देवाश्चापि चराचरम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘लङ्काके इस विशाल राज्यका तुम्हीं पालन करो । मुझ-जैसे राक्षस, देवता तथा सम्पूर्ण चराचर जगत् तुम्हारे सेवक बनकर रहेंगे ॥ २६ ॥
अभिषेकजलक्लिन्ना तुष्टा च रमयस्व च । दुष्कृतं यत्पुरा कर्म वनवासेन तद्गतम् ॥ २७ ॥ यच्च ते सुकृतं कर्म तस्येह फलमाप्नुहि ।
भावार्थ
‘स्नानके जलसे आर्द्र (अथवा लङ्काके राज्यपर अपना अभिषेक कराकर उसके जलसे आर्द्र) होकर संतुष्ट हो तुम अपने-आपको क्रीड़ाविनोदमें लगाओ । तुम्हारा पहलेका जो दुष्कर्म था, वह वनवासका कष्ट देकर समाप्त हो गया । अब जो तुम्हारा पुण्यकर्म शेष है, उसका फल यहाँ भोगो ॥ २७½ ॥
इह सर्वाणि माल्यानि दिव्यगन्धानि मैथिलि ॥ २८ ॥ भूषणानि च मुख्यानि तानि सेव मया सह ।
भावार्थ
‘मिथिलेशकुमारी ! तुम मेरे साथ यहाँ रहकर सब प्रकारके पुष्पहार, दिव्य गन्ध और श्रेष्ठ आभूषण आदिका सेवन करो ॥ २८½ ॥
पुष्पकं नाम सुश्रोणि भ्रातुर्वैश्रवणस्य मे ॥ २९ ॥ विमानं सूर्यसंकाशं तरसा निर्जितं रणे । विशालं रमणीयं च तद्विमानं मनोजवम् ॥ ३० ॥ तत्र सीते मया सार्धं विहरस्व यथासुखम् ।
भावार्थ
‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली सुन्दरी ! वह सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाला पुष्पकविमान मेरे भाई कुबेरका था । उसे मैंने बलपूर्वक जीता है । यह अत्यन्त रमणीय, विशाल तथा मनके समान वेगसे चलनेवाला है । सीते ! तुम उसके ऊपर मेरे साथ बैठकर सुखपूर्वक विहार करो ॥ २९-३०½ ॥
वदनं पद्मसंकाशं विमलं चारुदर्शनम् ॥ ३१ ॥ शोकार्तं तु वरारोहे न भ्राजति वरानने ।
भावार्थ
‘वरारोहे सुमुखि ! तुम्हारा यह कमलके समान सुन्दर निर्मल और मनोहर दिखायी देनेवाला मुख शोकसे पीडित होनेके कारण शोभा नहीं पा रहा है’ ॥ ३१½ ॥
एवं वदति तस्मिन् सा वस्त्रान्तेन वराङ्गना ॥ ३२ ॥ पिधायेन्दुनिभं सीता मन्दमश्रूण्यवर्तयत् ।
भावार्थ
जब रावण ऐसी बातें कहने लगा, तब परम सुन्दरी सीता देवी चन्द्रमाके समान मनोहर अपने मुखको आँचलसे ढककर धीरे-धीरे आँसू बहाने लगीं ॥ ३२½ ॥
ध्यायन्तीं तामिवास्वस्थां सीतां चिन्ताहतप्रभाम् ३३ उवाच वचनं वीरो रावणो रजनीचरः ।
भावार्थ
सीता शोकसे अस्वस्थ-सी हो रही थीं, चिन्तासे उनकी कान्ति नष्ट-सी हो गयी थी और वे भगवान् रामका ध्यान करने लगी थीं । उस अवस्थामें उनसे वह वीर निशाचर रावण इस प्रकार बोला—॥ ३३½ ॥
अलं व्रीडेन वैदेहि धर्मलोपकृतेन ते ॥ ३४ ॥ आर्षोऽयं देवि निष्पन्दो यस्त्वामभिभविष्यति ।
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनि ! अपने पतिके त्याग और परपुरुषके अङ्गीकारसे जो धर्मलोपकी आशङ्का होती है, उसके कारण तुम्हें यहाँ लज्जा नहीं होनी चाहिये, इस तरहकी लाज व्यर्थ है । देवि ! तुम्हारे साथ जो मेरा स्नेह सम्बन्ध होगा, यह-आर्ष धर्मशास्त्रोंद्वारा समर्थित है ॥ ३४½ ॥
एतौ पादौ मया स्निग्धौ शिरोभिः परिपीडितौ ॥ ३५॥ प्रसादं कुरु मे क्षिप्रं वश्यो दासोऽहमस्मि ते।
भावार्थ
‘तुम्हारे इन कोमल एवं चिकने चरणोंपर मैं अपने ये दसों मस्तक रख रहा हूँ। अब शीघ्र मुझपर कृपा करो। मैं सदा तुम्हारे अधीन रहनेवाला दास हूँ ॥ ३५½ ॥
इमाः शून्या मया वाचः शुष्यमाणेन भाषिताः॥३६॥ न चापि रावणः कांचिन्मूर्ध्ना स्त्रीं प्रणमेत ह।
भावार्थ
‘मैंने कामाग्निसे संतप्त होकर ये बातें कही हैं। ये शून्य ( निष्फल ) न हों, ऐसी कृपा करो; क्योंकि रावण किसी स्त्रीको सिर झुकाकर प्रणाम नहीं करता, ( केवल ) तुम्हारे सामने इसका मस्तक झुका है’ ॥ ३६½ ॥
एवमुक्त्वा दशग्रीवो मैथिलीं जनकात्मजाम्। कृतान्तवशमापन्नो ममेयमिति मन्यते ॥ ३७॥
भावार्थ
मिथिलेशकुमारी जानकीसे ऐसा कहकर कालके वशीभूत हुआ रावण मन-ही-मन मानने लगा कि ‘यह अब मेरे अधीन हो गयी’ ॥ ३७ ॥
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