Ramayana.com

अरण्यकाण्ड, सर्ग 52

सा तु ताराधिपमुखी रावणेन निरीक्ष्य तम्। गृध्रराजं विनिहतं विललाप सुदुःखिता ॥ १ ॥ निमित्तं लक्षणं स्वप्नं शकुनिस्वरदर्शनम्। अवश्यं सुखदुःखेषु नराणां परिदृश्यते ॥ २ ॥

भावार्थ

रावणके द्वारा मारे गये गृध्रराजकी ओर देखकर चन्द्रमुखी सीता अत्यन्त दुखी होकर विलाप करने लगीं—॥ ‘मनुष्योंको सुख-दुःखकी प्राप्तिके सूचक लक्षण, स्वप्न, पक्षियोंके स्वर तथा उनके दायें-बायें दर्शन आदि शुभाशुभ निमित्त अवश्य दिखायी देते हैं ॥ २ ॥

न नूनं राम जानासि महद्व्यसनमात्मनः । धावन्ति नूनं काकुत्स्थ मदर्थं मृगपक्षिणः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ! मेरे अपहरणकी सूचना देनेके लिये निश्चय ही ये मृग और पक्षी अशुभसूचक मार्गसे दौड़ रहे हैं, परंतु उनके द्वारा सूचित होनेपर भी अपने इस महान् संकटको अवश्य ही आप नहीं जानते हैं ( क्योंकि जाननेपर आप इसकी उपेक्षा नहीं कर सकते थे ) ॥ ३ ॥

अयं हि कृपया राम मां भ्रातुमिह संगतः । शेते विनिहतो भूमौ ममाभाग्याद् विहंगमः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘हा राम ! मेरा कैसा अभाग्य है कि जो कृपा करके मुझे बचानेके लिये यहाँ आये थे, वे पक्षिप्रवर जटायु इस निशाचरद्वारा मारे जाकर पृथ्वीपर पड़े हैं ॥ ४ ॥

त्राहि मामद्य काकुत्स्थ लक्ष्मणेति वराङ्गना । सुसंत्रस्ता समाक्रन्दच्छृण्वतां तु यथान्तिके ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘हे राम ! हे लक्ष्मण ! अब आप ही दोनों मेरी रक्षा करें ।’ यों कहकर अत्यन्त डरी हुई सुन्दरी सीता इस प्रकार क्रन्दन करने लगीं, जिससे निकटवर्ती देवता और मनुष्य सुन सकें ॥ ५ ॥

तां क्लिष्टमाल्याभरणां विलपन्तीमनाथवत् । अभ्यधावत वैदेहीं रावणो राक्षसाधिपः ॥ ६ ॥

भावार्थ

उनके पुष्पहार और आभूषण मसलकर छिन्न-भिन्न हो गये थे । वे अनाथकी भाँति विलाप कर रही थीं । उसी अवस्थामें राक्षसराज रावण उन विदेहकुमारी सीताकी ओर दौड़ा ॥ ६ ॥

तां लतामिव वेष्टन्तीमालिङ्गन्तीं महाद्रुमान् । मुञ्च मुञ्चेति बहुशः प्राप तां राक्षसाधिपः ॥ ७ ॥

भावार्थ

वे लिपटी हुई लताकी भाँति बड़े-बड़े वृक्षोंसे लिपट जार्ती और बारंबार कहतीं—‘मुझे इस संकटसे छुड़ाओ, छुड़ाओ ।’ इतनेहीमें वह निशाचरराज उनके पास जा पहुँचा ॥ ७ ॥

क्रोशन्तीं राम रामेति रामेण रहितां वने । जीवितान्ताय केशेषु जग्राहान्तकसंनिभः ॥ ८ ॥ प्रधर्षितायां वैदेह्यां बभूव सचराचरम् । जगत् सर्वममर्यादं तमसान्धेन संवृतम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

वनमें श्रीरामसे रहित होकर सीताको राम-रामकी रट लगाती देख उस कालके समान विकराल राक्षसने अपने ही विनाशके लिये उनके केश पकड़ लिये । सीताका इस प्रकार तिरस्कार होनेपर समस्त चराचर जगत् मर्यादारहित तथा अन्धकारसे आच्छन्न-सा हो गया ॥ ८–९ ॥

न वाति मारुतस्तत्र निष्प्रभोऽभूद् दिवाकरः । दृष्ट्वा सीतां परामृष्टां देवो दिव्येन चक्षुषा ॥ १० ॥ कृतं कार्यमिति श्रीमान् व्याजहार पितामहः । प्रहृष्टा व्यथिताश्चासन् सर्वे ते परमर्षयः ॥ ११ ॥ दृष्ट्वा सीतां परामृष्टां दण्डकारण्यवासिनः । रावणस्य विनाशं च प्राप्तं बुद्ध्वा यदृच्छया ॥ १२ ॥

भावार्थ

वहाँ वायुकी गति रुक गयी और सूर्यकी भी प्रभा फीकी पड़ गयी । श्रीमान् पितामह ब्रह्माजी दिव्य दृष्टिसे विदेहनन्दिनीका वह राक्षसके द्वारा केशाकर्षणरूप अपमान देखकर बोले—‘बस अब कार्य सिद्ध हो गया’ ॥ सीताके केशोंका खींचा जाना देखकर दण्डकारण्यमें निवास करनेवाले वे सब महर्षि मन-ही-मन व्यथित हो उठे । साथ ही अकस्मात् रावणका विनाश निकट आया जान उनको बड़ा हर्ष हुआ ॥११–१२ ॥

स तु तां राम रामेति रुदतीं लक्ष्मणेति च । जगामादाय चाकाशं रावणो राक्षसेश्वरः ॥ १३ ॥

भावार्थ

बेचारी सीता ‘हा राम ! हा राम’ कहकर रो रही थीं । लक्ष्मणको भी पुकार रही थीं । उसी अवस्थामें राक्षसोंका राजा रावण उन्हें लेकर आकाशमार्गसे चल दिया ॥ १३ ॥

तप्ताभरणवर्णाङ्गी पीतकौशेयवासिनी । रराज राजपुत्री तु विद्युत्सौदामनी यथा ॥ १४ ॥

भावार्थ

तपाये हुए सोनेके आभूषणोंसे उनका सारा अङ्ग विभूषित था । वे पीले रंगकी रेशमी साड़ी पहने हुए थीं । अतः उस समय राजकुमारी सीता सुदाम पर्वतसे प्रकट हुई विद्युत्के समान प्रकाशित हो रही थीं ॥ १४ ॥

उद्धूतेन च वस्त्रेण तस्याः पीतेन रावणः । अधिकं परिबभ्राज गिरिर्दीप्त इवाग्निना ॥ १५ ॥

भावार्थ

उनके फहराते हुए पीले वस्त्रसे उपलक्षित रावण दावानलसे उद्भासित होनेवाले पर्वतके समान अधिक शोभा पाने लगा ॥ १५ ॥

तस्याः परमकल्याण्यास्ताम्राणि सुरभीणि च । पद्मपत्राणि वैदेह्या अभ्यकीर्यन्त रावणम् ॥ १६ ॥

भावार्थ

उन परम कल्याणी विदेहकुमारीके अङ्गोंमें जो कमलपुष्प थे, उनके किंचित् अरुण और सुगन्धित दल बिखर-बिखरकर रावणपर गिरने लगे ॥ १६ ॥

तस्याः कौशेयमुद्धूतमाकाशे कनकप्रभम् । बभौ चादित्यरागेण ताम्रमभ्रमिवातपे ॥ १७ ॥

भावार्थ

आकाशमें उड़ता हुआ उनका सुवर्णके समान कान्तिमान् रेशमी पीताम्बर संध्याकालमें सूर्यकी किरणोंसे रँगे हुए ताम्रवर्णके मेघखण्डकी भाँति शोभा पाता था ॥ १७ ॥

तस्यास्तद् विमलं वक्त्रमाकाशे रावणाङ्कगम् । न रराज विना रामं विनालमिव पङ्कजम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

आकाशमें रावणके अङ्कमें स्थित सीताका निर्मल मुख श्रीरामके बिना नालरहित कमलकी भाँति शोभित नहीं होता था ॥ १८ ॥

बभूव जलदं नीलं भित्त्वा चन्द्र इवोदितः । सुललाटं सुकेशान्तं पद्मगर्भाभमव्रणम् ॥ १९ ॥ शुक्लैः सुविमलैर्दन्तैः प्रभावद्भिरलंकृतम् । तस्याः सुनयनं वक्त्रमाकाशे रावणाङ्कगम् ॥ २० ॥ रुदितं व्यपमृष्टास्रं चन्द्रवत्प्रियदर्शनम् । सुनासं चारुताम्रोष्ठमाकाशे हाटकप्रभम् ॥ २१ ॥ राक्षसेन्द्रसमाधूतं तस्यास्तद् वदनं शुभम् । शुशुभे न विना रामं दिवा चन्द्र इवोदितः ॥ २२ ॥

भावार्थ

सुन्दर ललाट और मनोहर केशोंसे, युक्त कमलके भीतरी भागके समान कान्तिमान्, चेचक आदिके दागसे रहित, श्वेत, निर्मल और दीप्तिमान् दाँतोंसे अलंकृत तथा सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित सीताका मुख आकाशमें रावणके अङ्कमें ऐसा जान पड़ता था मानो मेघोंकी काली घटाका भेदन करके चन्द्रमा उदित हुआ हो ॥ चन्द्रमाके समान प्यारा दिखायी देनेवाला सीताका वह सुन्दर मुख तुरंतका रोया हुआ था । उसके आँसू पोंछ दिये गये थे । उसकी सुघड़ नासिका तथा ताँबे-जैसे लाल-लाल मनोहर ओठ थे । आकाशमें वह अपनी सुनहरी प्रभा बिखेर रहा था तथा राक्षसराजके वेगपूर्वक चलनेसे उसमें कम्पन हो रहा था । इस प्रकार वह मनोहर मुख भी श्रीरामके बिना उस समय दिनमें उगे हुए चन्द्रमाके समान शोभाहीन प्रतीत होता था ॥ २१-२२ ॥

सा हेमवर्णा नीलाङ्गं मैथिली राक्षसाधिपम् । शुशुभे काञ्चनी काञ्ची नीलं गजमिवाश्रिता ॥ २३ ॥

भावार्थ

मिथिलेशकुमारी सीताका श्रीअङ्ग सुवर्णके समान दीतिमान् था और राक्षसराज रावणका शरीर बिल्कुल काला था । उसकी गोदमें वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो काले हाथीको सोनेकी करधनी पहना दी गयी हो ॥२३॥

सा पद्मपीता हेमाभा रावणं जनकात्मजा । विद्युद् घनमिवाविश्य शुशुभे तप्तभूषणा ॥ २४ ॥

भावार्थ

कमलके केसरकी भाँति पीली एवं सुनहरी कान्तिवाली जनककुमारी सीता तपे हुए सोनेके आभूषण धारण किये रावणकी पीठपर वैसी ही शोभा पा रही थीं, जैसे मेघमालाका आश्रय लेकर बिजली चमक रही हो ॥ २४ ॥

तस्या भूषणघोषेण वैदेह्या राक्षसेश्वरः । बभूव विमलो नीलः सघोष इव तोयदः ॥ २५ ॥

भावार्थ

विदेहनन्दिनीके आभूषणोंकी झनकारसे राक्षसराज रावण गर्जना करते हुए निर्मल नील मेघके समान प्रतीत होता था ॥ २५ ॥

उत्तमाङ्गच्युता तस्याः पुष्पवृष्टिः समन्ततः । सीताया ह्रियमाणायाः पपात धरणीतले ॥ २६ ॥

भावार्थ

हरकर ले जायी जाती हुई सीताके सिरसे उनके केशोंमें गुँथे हुए फूल बिखरकर सब ओर पृथ्वीपर गिर रहे थे ॥ २६ ॥

सा तु रावणवेगेन पुष्पवृष्टिः समन्ततः । समाधूता दशग्रीवं पुनरेवाभ्यवर्तत ॥ २७ ॥

भावार्थ

चारों ओर होनेवाली वह फूलोंकी वर्षा रावणके वेगसे उठी हुई वायुके द्वारा प्रेरित हो फिर उस दशाननपर ही आकर पड़ती थी ॥ २७ ॥

अभ्यवर्तत पुष्पाणां धारा वैश्रवणानुजम् । नक्षत्रमाला विमला मेरुं नगमिवोन्नतम् ॥ २८ ॥ चरणान्नूपुरं भ्रष्टं वैदेह्या रत्नभूषितम् । विद्युन्मण्डलसंकाशं पपात धरणीतले ॥ २९ ॥

भावार्थ

कुबेरके छोटे भाई रावणके ऊपर जब वह फूलोंकी धारा गिरती थी, उस समय ऊँचे मेरुपर्वतपर उतरनेवाली निर्मल नक्षत्रमालाकी भाँति शोभा पाती थी ॥ विदेहनन्दिनीका रत्नजटित नूपुर उनके एक चरणसे खिसककर विद्युन्मण्डलके समान पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २९ ॥

तरुप्रवालरक्ता सा नीलाङ्गं राक्षसेश्वरम् । प्रशोभयत वैदेही गजं कक्ष्येव काञ्चनी ॥ ३० ॥

भावार्थ

वृक्षोंके नूतन पल्लवोंके समान किंचित् अरुण वर्णवाली सीता उस काले-कलूटे राक्षसराजको उसी प्रकार सुशोभित कर रही थीं, जैसे हाथीको कसनेवाला सुनहरा रस्सा उसकी शोभा बढ़ाता हो ॥ ३० ॥

तां महोल्कामिवाकाशे दीप्यमानां स्वतेजसा । जहाराकाशमाविश्य सीतां वैश्रवणानुजः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

आकाशमें अपने तेजसे बहुत बड़ी उल्काके समान प्रकाशित होनेवाली सीताको रावण आकाशमार्गका ही आश्रय ले हर ले गया ॥ ३१ ॥

तस्यास्तान्यग्निवर्णानि भूषणानि महीतले । सघोषाण्यवशीर्यन्त क्षीणास्तारा इवाम्बरात् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

जानकीके शरीरपर अग्निके समान प्रकाशमान् आभूषण थे । वे उस समय खन खनकी आवाज करते हुए एक-एक करके गिरने लगे, मानो आकाशसे ताराएँ टूट-टूटकर पृथ्वीपर गिर रही हों ॥ ३२ ॥

तस्याः स्तनान्तराद् भ्रष्टो हारस्ताराधिपद्युतिः । वैदेह्या निपतन् भाति गङ्गेव गगनच्युता ॥ ३३ ॥

भावार्थ

उन विदेहनन्दिनी सीताके स्तनोंके बीचसे खिसककर गिरता हुआ चन्द्रमाके समान उज्ज्वल हार गगनमण्डलसे उतरती हुई गङ्गाके समान प्रतीत हुआ ॥ ३३ ॥

उत्पातवाताभिरता नानाद्विजगणायुताः । मा भैरिति विधूताग्रा व्याजह्रुरिव पादपाः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

रावणके वेगसे उत्पन्न हुई उत्पातसूचक वायुके झकोरोंसे हिलते हुए वृक्षोंपर नाना प्रकारके पक्षी कोलाहल कर रहे थे । उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो वे वृक्ष अपने सिरोंको हिला-हिलाकर संकेत करते हुए सीतासे कह रहे हैं कि ‘तुम डरो मत’ ॥ ३४ ॥

नलिन्यो ध्वस्तकमलास्त्रस्तमीनजलेचराः । सखीमिव गतोत्साहां शोचन्तीव स्म मैथिलीम् ॥ ३५ ॥

भावार्थ

जिनके कमल सूख गये थे और मत्स्य आदि जलचर जीव डर गये थे, वे पुष्करिणियाँ उत्साहहीन हुई मिथिलेशकुमारी सीताको मानो अपनी सखी मानकर उनके लिये शोक कर रही थीं ॥ ३५ ॥

समन्ताद्भिसम्पत्य सिंहव्याघ्रमृगद्विजाः । अन्वधावंस्तदा रोषात् सीताच्छायानुगामिनः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

उस सीताहरणके समय रावणपर रोष-सा करके सिंह, व्याघ्र, मृग और पक्षी सब ओरसे सीताकी परछाहींका अनुसरण करते हुए दौड़ रहे थे ॥ ३६ ॥

जलप्रपातास्रमुखाः शृङ्गैरुच्छ्रितबाहुभिः । सीतायां ह्रियमाणायां विक्रोशन्तीव पर्वताः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

जब सीता हरी जाने लगी, उस समय वहाँके पर्वत झरनोंके रूपमें आँसू बहाते हुए, ऊँचे शिखरोंके रूपमें अपनी भुजाएँ ऊपर उठाकर मानो जोर-जोरसे चीत्कार कर रहे थे ॥ ३७ ॥

ह्रियमाणां तु वैदेहीं दृष्ट्वा दीनो दिवाकरः । प्रविध्वस्तप्रभः श्रीमानासीत् पाण्डुरमण्डलः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

सीताका हरण होता देख श्रीमान् सूर्यदेव दुखी हो गये । उनकी प्रभा नष्ट-सी हो गयी तथा उनका मण्डल पीला पड़ गया ॥ ३८ ॥

नास्ति धर्मः कुतः सत्यं नार्जवं नानृशंसता । यत्र रामस्य वैदेहीं सीतां हरति रावणः ॥ ३९ ॥ इति भूतानि सर्वाणि गणशः पर्यदेवयन् । वित्रस्तका दीनमुखा रुरुदुर्मृगपोतकाः ॥ ४० ॥

भावार्थ

हाय ! हाय ! जब श्रीरामचन्द्रजीकी धर्मपत्नी विदेहनन्दिनी सीताको रावण हरकर लिये जा रहा है, तब यही कहना पड़ता है कि ‘संसारमें धर्म नहीं है, सत्य भी कहाँ है ? सरलता और दयाका भी सर्वथा लोप हो गया है ।’ इस प्रकार वहाँ झुंड-के-झुंड एकत्र हो सब प्राणी विलाप कर रहे थे । मृगोंके बच्चे भयभीत हो दीनमुखसे रो रहे थे ॥ ३९-४० ॥

उद्वीक्ष्योद्वीक्ष्य नयनैर्भयादिव विलक्षणैः । सुप्रवेपितगात्राश्च बभूवुर्वनदेवताः ॥ ४१ ॥ विक्रोशन्तीं दृढं सीतां दृष्ट्वा दुःखं तथा गताम् । तां तु लक्ष्मण रामेति क्रोशन्तीं मधुरस्वराम् ॥ ४२ ॥ अवेक्षमाणां बहुशो वैदेहीं धरणीतलम् । स तामाकुलकेशान्तां विप्रमृष्टविशेषकाम् । जहारात्मविनाशाय दशग्रीवो मनस्विनीम् ॥ ४३ ॥

भावार्थ

श्रीरामको जोर-जोरसे पुकारती और वैसे भारी दुःखमें पड़ी हुई सीताको अपनी विलक्षण आँखोंसे बारंबार देख-देखकर भयके मारे वनदेवताओंके अङ्ग थरथर काँपने लगे ॥ ४१॥ ॥ विदेहनन्दिनी मधुर स्वरमें ‘हा राम, हा लक्ष्मण’ की पुकार करती हुई बारंबार भूतलकी ओर देख रही थीं । उनके केश खुलकर सब ओर फैल गये थे और ललाटकी बेंदी मिट गयी थी । वैसी अवस्थामें दशग्रीव रावण अपने ही विनाशके लिये मनस्विनी सीताको लिये जा रहा था ॥ ४२-४३ ॥

ततस्तु सा चारुदती शुचिस्मिता विनाकृता बन्धुजनेन मैथिली । अपश्यती राघवलक्ष्मणावुभौ विवर्णवक्त्रा भयभारपीडिता ॥ ४४ ॥

भावार्थ

उस समय मनोहर दाँत और पवित्र मुसकानवाली मिथिलेशकुमारी सीता, जो अपने बन्धुजनोंसे बिछुड़ गयी थीं, दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको न देखकर भयके भारसे व्यथित हो उठीं । उनके मुखमण्डलकी कान्ति फीकी पड़ गयी ॥ ४४ ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें