अरण्यकाण्ड, सर्ग 51
इत्युक्तः क्रोधताम्राक्षस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः । राक्षसेन्द्रोऽभिदुद्राव पतगेन्द्रममर्षणः ॥ १ ॥
भावार्थ
जटायुके ऐसा कहनेपर राक्षसराज रावण क्रोधसे आँखें लाल किये अमर्षमें भरकर उन पक्षिराजकी ओर दौड़ा । उस समय उसके कानोंमें तपाये हुए सोनेके कुण्डल झलमला रहे थे ॥ १ ॥
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोस्तस्मिन् महामृधे । बभूव वातोद्धुतयोर्मेघयोर्गगने यथा ॥ २ ॥
भावार्थ
उस महासमरमें उन दोनोंका एक दूसरेपर भयंकर प्रहार होने लगा, मानो आकाशमें वायुसे उड़ाये गये दो मेघखण्ड आपसमें टकरा गये हों ॥ २ ॥
तद् बभूवाद्भुतं युद्धं गृध्रराक्षसयोस्तदा । सपक्षयोर्माल्यवतोर्महापर्वतयोरिव ॥ ३ ॥
भावार्थ
उस समय गृध्र और राक्षसमें वह बड़ा अद्भुत युद्ध होने लगा, मानो दो पंखधारी माल्यवान् पर्वत एक दूसरेसे भिड़ गये हों ॥ ३ ॥
ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभिः । अभ्यवर्षन्महाघोरैर्गृध्रराजं महाबलम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
रावणने महाबली गृध्रराज जटायुपर नालीक, नाराच तथा तीखे अग्रभागवाले विकर्णी नामक महाभयंकर अस्त्रोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ४ ॥
स तानि शरजालानि गृध्रः पत्ररथेश्वरः । जटायुः प्रतिजग्राह रावणास्त्राणि संयुगे ॥ ५ ॥
भावार्थ
पक्षिराज गृध्रजातीय जटायुने युद्धमें रावणके उन बाणसमूहों तथा अन्य अस्त्रोंका आघात सह लिया ॥ ५ ॥
तस्य तीक्ष्णनखाभ्यां तु चरणाभ्यां महाबलः । चकार बहुधा गात्रे व्रणान् पतगसत्तमः ॥ ६ ॥
भावार्थ
साथ ही उन महाबली पक्षिशिरोमणिने अपने तीखे नखोंवाले पंजोंसे मार-मारकर रावणके शरीरमें बहुत-से घाव कर दिये ॥ ६ ॥
अथ क्रोधाद् दशग्रीवो जग्राह दश मार्गणान् । मृत्युदण्डनिभान् घोराञ्शत्रोर्निधनकाङ्क्षया ॥ ७ ॥
भावार्थ
तब दशग्रीवने क्रोधमें भरकर अपने शत्रुको मार डालनेकी इच्छासे दस बाण हाथमें लिये, जो कालदण्डके समान भयंकर थे ॥ ७ ॥
स तैर्बाणैर्महावीर्यः पूर्णमुक्तैरजिह्मगैः । बिभेद निशितैस्तीक्ष्णैर्गृध्रं घोरैः शिलीमुखैः ॥ ८ ॥
भावार्थ
महापराक्रमी रावणने धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये उन सीधे जानेवाले तीखे, पैने और भयंकर बाणोंद्वारा, जिनके मुखपर शल्य ( काँटे ) लगे हुए थे, गृध्रराजको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ८ ॥
स राक्षसरथे पश्यञ्जानकीं बाष्पलोचनाम् । अचिन्तयित्वा बाणांस्तान् राक्षसं समभिद्रवत् ॥ ९ ॥
भावार्थ
जटायुने देखा, जनकनन्दिनी सीता राक्षसके रथपर बैठी हैं और नेत्रोंसे आँसू बहा रही हैं । उन्हें देखकर गृध्रराज अपने शरीरमें लगते हुए उन बाणोंकी परवा न करके सहसा उस राक्षसपर टूट पड़े ॥ ९ ॥
ततोऽस्य सशरं चापं मुक्तामणिविभूषितम् । चरणाभ्यां महातेजा बभञ्ज पतगोत्तमः ॥ १० ॥
भावार्थ
महातेजस्वी पक्षिराज जटायुने मोती-मणियोंसे विभूषित, बाणसहित रावणके धनुषको अपने दोनों पैरोंसे मारकर तोड़ दिया ॥ १० ॥
ततोऽन्यद् धनुरादाय रावणः क्रोधमूर्छितः । ववर्ष शरवर्षाणि शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ११ ॥
भावार्थ
फिर तो रावण क्रोधसे भर गया और दूसरा धनुष हाथमें लेकर उसने सैकड़ों-हजारों बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ ११ ॥
शरैरावारितस्तस्य संयुगे पतगेश्वरः । कुलायमभिसम्प्राप्तः पक्षिवच्च बभौ तदा ॥ १२ ॥
भावार्थ
उस समय उस युद्धस्थलमें गृध्रराजके चारों ओर बाणोंका जाल-सा तन गया । वे उस समय घोंसलेमें बैठे हुए पक्षीके समान प्रतीत होने लगे ॥ १२ ॥
स तानि शरजालानि पक्षाभ्यां तु विधूय ह । चरणाभ्यां महातेजा बभञ्जास्य महद् धनुः ॥ १३ ॥
भावार्थ
तब महातेजस्वी जटायुने अपने दोनों पंखोंसे ही उन बाणोंको उड़ा दिया और पंजोंकी मारसे पुनः उसके धनुषके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ १३ ॥
तच्चाग्निसदृशं दीप्तं रावणस्य शरावरम् । पक्षाभ्यां च महातेजा व्यधुनोत् पतगेश्वरः ॥ १४ ॥
भावार्थ
रावणका कवच अग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था । महातेजस्वी पक्षिराजने उसे भी पंखोंसे ही मारकर छिन्न-भिन्न कर दिया ॥ १४ ॥
काञ्चनोरश्छदान् दिव्यान् पिशाचवदनान् खरान् । तांश्चास्य जवसम्पन्नाञ्जघान समरे बली ॥ १५ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् उन बलवान् वीरने समराङ्गणमें पिशाचके-से मुखवाले उन वेगशाली गधोंको भी, जिनकी छातीपर सोनेके कवच बँधे हुए थे, मार डाला ॥ १५ ॥
अथ त्रिवेणुसम्पन्नं कामगं पावकार्चिषम् । मणिसोपानचित्राङ्गं बभञ्ज च महारथम् ॥ १६ ॥ पूर्णचन्द्रप्रतीकाशं छत्रं च व्यजनैः सह । पातयामास वेगेन ग्राहिभी राक्षसैः सह ॥ १७ ॥ सारथेश्चास्य वेगेन तुण्डेन च महच्छिरः । पुनर्व्यपहनच्छ्रीमान् पक्षिराजो महाबलः ॥ १८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर अग्निकी भाँति दीप्तिमान्, मणिमय सोपानसे विचित्र अङ्गोंवाले तथा इच्छानुसार चलनेवाले उसके त्रिवेणुसम्पन्न विशाल रथको भी तोड़-फोड़ डाला ॥ इसके बाद पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित छत्र और चँवरको भी उन्हें धारण करनेवाले राक्षसोंके साथ ही वेगपूर्वक मार गिराया । फिर उन महाबली तेजस्वी पक्षिराजने बड़े वेगसे चोंच-मारकर रावणके सारथिका विशाल मस्तक भी धड़से अलग कर दिया ॥ १७-१८ ॥
स भग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । अङ्केनादाय वैदेहीं पपात भुवि रावणः ॥ १९ ॥
भावार्थ
इस प्रकार जब धनुष टूटा, रथ चौपट हुआ, घोड़े मारे गये और सारथि भी कालके गालमें चला गया, तब रावण सीताको गोदमें लिये-लिये पृथ्वीपर गिर पड़ा॥१९॥
दृष्ट्वा निपतितं भूमौ रावणं भग्नवाहनम् । साधु साध्विति भूतानि गृध्रराजमपूजयन् ॥ २० ॥
भावार्थ
रथ टूट जानेसे रावणको धरतीपर पड़ा देख सब प्राणी ‘साधु-साधु’ कहकर गृध्रराजकी प्रशंसा करने लगे ॥ २० ॥
परिश्रान्तं तु तं दृष्ट्वा जरया पक्षियूथपम् । उत्पपात पुनर्हृष्टो मैथिलीं गृह्य रावणः ॥ २१ ॥
भावार्थ
वृद्धावस्थाके कारण पक्षिराजको थका हुआ देख रावणको बड़ा हर्ष हुआ और वह मैथिलीको लिये हुए फिर आकाशमें उड़ चला ॥ २१ ॥
तं प्रहृष्टं निधायाङ्के रावणं जनकात्मजाम् । गच्छन्तं खड्गशेषं च प्रणष्टहतसाधनम् ॥ २२ ॥ गृध्रराजः समुत्पत्य रावणं समभिद्रवत् । समावार्य महातेजा जटायुरिदमब्रवीत् ॥ २३ ॥
भावार्थ
जनककिशोरीको गोदमें लेकर जब रावण प्रसन्नतापूर्वक जाने लगा, उस समय उसके अन्य सब साधन तो नष्ट हो गये थे, किंतु एक तलवार उसके पास शेष रह गयी थी । उसे जाते देख महातेजस्वी गृध्रराज जटायु उड़कर रावणकी ओर दौड़े और उसे रोककर इस प्रकार बोले—॥ २२–२३ ॥
वज्रसंस्पर्शबाणस्य भार्यां रामस्य रावण । अल्पबुद्धे हरस्येनां वधाय खलु रक्षसाम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘मन्दबुद्धि रावण ! जिनके बाणोंका स्पर्श वज्रके समान है, उन श्रीरामकी इन धर्मपत्नी सीताको तुम अवश्य राक्षसोंके वधके लिये ही लिये जा रहे हो ॥ २४ ॥
समित्रबन्धुः सामात्यः सबलः सपरिच्छदः । विषपानं पिबस्येतत् पिपासित इवोदकम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘जैसे प्यासा मनुष्य जल पी रहा हो, उसी प्रकार तुम मित्र, बन्धु, मन्त्री, सेना तथा परिवारसहित यह विषपान कर रहे हो ॥ २५ ॥
अनुबन्धमजानन्तः कर्मणामविचक्षणाः । शीघ्रमेव विनश्यन्ति यथा त्वं विनशिष्यसि ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘अपने कर्मोंका परिणाम न जाननेवाले अज्ञानीजन जैसे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार तुम भी विनाशके गर्तमें गिरोगे ॥ २६ ॥
वद्धस्त्वं कालपाशेन क गतस्तस्य मोक्ष्यसे । वधाय बडिशं गृह्य सामिषं जलजो यथा ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘तुम कालपाशमें बँध गये हो । कहाँ जाकर उससे छुटकारा पाओगे ? जैसे जलमें उत्पन्न होनेवाला मत्स्य मांसयुक्त बंसीको अपने वधके लिये ही निगल जाता है, उसी प्रकार तुम भी अपने मौतके लिये ही सीताका अपहरण करते हो ॥ २७ ॥
नहि जातु दुराधर्षों काकुत्स्थौ तव रावण । धर्षणं चाश्रमस्यास्य क्षमिष्येते तु राघवौ ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘रावण ! ककुत्स्थकुलभूषण रघुकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई दुर्धर्ष वीर हैं । वे तुम्हारे द्वारा अपने आश्रमपर किये गये इस अपमानजनक अपराधको कभी क्षमा नहीं करेंगे ॥ २८ ॥
यथा त्वया कृतं कर्म भीरुणा लोकगर्हितम् । तस्कराचरितो मार्गो नैष वीरनिषेवितः ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘तुम कायर और डरपोक हो । तुमने जो जैसा लोकनिन्दित कर्म किया है, यह चोरोंका मार्ग है । वीर पुरुष ऐसे मार्गका आश्रय नहीं लेते हैं ॥ २९ ॥
युद्ध्यस्व यदि शूरोऽसि मुहूर्तं तिष्ठ रावण । शयिष्यसे हतो भूमौ यथा भ्राता खरस्तथा ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘रावण ! यदि शूरवीर हो तो दो घड़ी और ठहरो और मुझसे युद्ध करो । फिर तो तुम भी उसी प्रकार मरकर पृथ्वीपर सो जाओगे, जैसे तुम्हारा भाई खर सोया था ॥ ३० ॥
परेतकाले पुरुषो यत् कर्म प्रतिपद्यते । विनाशायात्मनोऽधर्म्यं प्रतिपन्नोऽसि कर्म तत् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘विनाशके समय पुरुष जैसा कर्म करता है, तुमने भी अपने विनाशके लिये वैसे ही अधर्मपूर्ण कर्मको अपनाया है ॥ ३१ ॥
पापानुबन्धो वै यस्य कर्मणः को नु तत् पुमान् । कुर्वीत लोकाधिपतिः स्वयंभूर्भगवानपि ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘जिस कर्मको करनेसे कर्ताका पापके फलसे सम्बन्ध होता है, उस कर्मको कौन पुरुष निश्चितरूपसे कर सकता है । लोकपाल इन्द्र तथा भगवान् स्वयम्भू ( ब्रह्मा ) भी वैसा कर्म नहीं कर सकते’ ॥ ३२ ॥
एवमुक्त्वा शुभं वाक्यं जटायुस्तस्य रक्षसः । निपपात भृशं पृष्ठे दशग्रीवस्य वीर्यवान् ॥ ३३ ॥ तं गृहीत्वा नखैस्तीक्ष्णैर्विददार समन्ततः । अधिरूढो गजारोहो यथा स्याद् दुष्टवारणम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
इस प्रकार उत्तम वचन कहकर पराक्रमी जटायु उस राक्षस दशग्रीवकी पीठपर बड़े वेगसे जा बैठे और उसे पकड़कर अपने तीखे नखोंद्वारा चारों ओरसे चीरने लगे । मानो कोई हाथीवान् किसी दुष्टहाथीके ऊपर सवार होकर उसे अङ्कुशसे छेद रहा हो ॥ ३३–३४ ॥
विददार नखैरस्य तुण्डं पृष्ठे समर्पयन् । केशांश्चोत्पाटयामास नखपक्षमुखायुधः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
नख, पाँख और चोंच —ये ही जटायुके हथियार थे । वे नखोंसे खरोंचते थे, पीठपर चोंच मारते थे और बाल पकड़कर उखाड़ लेते थे ॥ ३५ ॥
स तथा गृध्रराजेन क्लिश्यमानो मुहुर्मुहुः । अमर्षस्फुरितोष्ठः सन् प्राकम्पत च राक्षसः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
इस प्रकार जब गृध्रराजने बारंबार क्लेश पहुँचाया, तब राक्षस रावण काँप उठा । क्रोधके मारे उसके ओठ फड़कने लगे ॥ ३६ ॥
सम्परिष्वज्य वैदेहीं वामेनाङ्केन रावणः । तलेनाभिजघानार्तो जटायुं क्रोधमूर्च्छितः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
उस समय क्रोधसे भरे रावणने विदेहनन्दिनी सीताको बायीं गोदमें करके अत्यन्त पीड़ित हो जटायुपर तमाचेका प्रहार किया ॥ ३७ ॥
जटायुस्तमतिक्रम्य तुण्डेनास्य खगाधिपः । वामबाहून् दश तदा व्यपाहरदरिंदमः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
परंतु उस वारको बचाकर शत्रुदमन गृध्रराज जटायुने अपनी चोंचसे मार-मारकर रावणकी दसों बायीं भुजाओंको उखाड़ लिया ॥ ३८ ॥
संछिन्नबाहोः सद्यो वै बाहवः सहसाभवन् । विषज्वालावलीयुक्ता वल्मीकादिव पन्नगाः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
उन बाँहोंके कट जानेपर बाँबीसे प्रकट होनेवाले विषकी ज्वाला-मालाओंसे युक्त सर्पोंकी भाँति तुरंत दूसरी नयी भुजाएँ सहसा उत्पन्न हो गयीं ॥ ३९ ॥
ततः क्रोधाद् दशग्रीवः सीतामुत्सृज्य वीर्यवान् । मुष्टिभ्यां चरणाभ्यां च गृध्रराजमपोथयत् ॥ ४० ॥
भावार्थ
तब पराक्रमी दशाननने सीताको तो छोड़ दिया और गृध्रराजको क्रोधपूर्वक मुक्कों और लातोंसे मारना आरम्भ किया ॥ ४० ॥
ततो मुहूर्तं संग्रामो बभूवातुलवीर्ययोः । राक्षसानां च मुख्यस्य पक्षिणां प्रवरस्य च ॥ ४१ ॥
भावार्थ
उस समय उन दोनों अनुपम पराक्रमी वीर राक्षसराज रावण और पक्षिराज जटायुमें दो घड़ीतक घोर संग्राम होता रहा ॥ ४१ ॥
तस्य व्यायच्छमानस्य रामस्यार्थे स रावणः। पक्षौ पादौ च पार्श्वौ च खड्गमुद्धृत्य सोऽच्छिनत् ॥
भावार्थ
तदनन्तर रावणने तलवार निकाली और श्रीरामचन्द्रजीके लिये पराक्रम करनेवाले जटायुके दोनों पंख, पैर तथा पार्श्वभाग काट डाले ॥ ४२ ॥
स च्छिन्नपक्षः सहसा रक्षसा रौद्रकर्मणा। निपपात महागृध्रो धरण्यामल्पजीवितः ॥ ४३ ॥
भावार्थ
भयंकर कर्म करनेवाले उस राक्षसके द्वारा सहसा पंख काट लिये जानेपर महागृध्र जटायु पृथ्वीपर गिर पड़े। अब वे थोड़ी ही देरके मेहमान थे ॥ ४३ ॥
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ क्षतजार्द्रं जटायुषम्। अभ्यधावत वैदेही स्वबन्धुमिव दुःखिता ॥ ४४ ॥
भावार्थ
अपने बान्धवके समान जटायुको खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़ा देख सीता दुःखसे व्याकुल हो उनकी ओर दौड़ीं ॥ ४४ ॥
तं नीलजीमूतनिकाशकल्पं सपाण्डुरोरस्कमुदारवीर्यम् । ददर्श लङ्काधिपतिः पृथिव्यां जटायुषं शान्तमिवाग्निदावम् ॥ ४५ ॥
भावार्थ
जटायुके शरीरकी कान्ति नीले मेघके समान काली थी। उनकी छातीका रंग श्वेत था। वे बड़े पराक्रमी थे, तो भी उस समय बुझे हुए दावानलके समान पृथ्वीपर पड़ गये । लङ्कापति रावणने उन्हें इस अवस्थामें देखा ॥ ४५ ॥
ततस्तु तं पत्ररथं महीतले निपातितं रावणवेगमर्दितम् । पुनश्च संगृह्य शशिप्रभानना रुरोद सीता जनकात्मजा तदा ॥ ४६ ॥
भावार्थ
तदनन्तर रावणके वेगसे रौंदे जाकर धराशायी हुए जटायुको पकड़कर चन्द्रमुखी जनकनन्दिनी सीता पुनः उस समय वहाँ रोने लगीं ॥ ४६ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें