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अरण्यकाण्ड, सर्ग 50

तं शब्दमवसुप्तस्तु जटायुरथ शुश्रुवे । निरैक्षद् रावणं क्षिप्रं वैदेहीं च ददर्श सः ॥ १ ॥

भावार्थ

जटायु उस समय सो रहे थे । उसी अवस्थामें उन्होंने सीताकी वह करुण पुकार सुनी । सुनते ही तुरंत आँख खोलकर उन्होंने विदेहनन्दिनी सीता तथा रावणको देखा ॥ १ ॥

ततः पर्वतशृङ्गाभस्तीक्ष्णतुण्डः खगोत्तमः । वनस्पतिगतः श्रीमान् व्याजहार शुभां गिरम् ॥ २ ॥

भावार्थ

पक्षियोंमें श्रेष्ठ श्रीमान् जटायुका शरीर पर्वत-शिखरके समान ऊँचा था और उनकी चोंच बड़ी ही तीखी थी । वे पेड़पर बैठे ही-बैठे रावणको लक्ष्य करके यह शुभ वचन बोले—॥ २ ॥

दशग्रीव स्थितो धर्मे पुराणे सत्यसंश्रयः । भ्रातस्त्वं निन्दितं कर्म कर्तुं नार्हसि साम्प्रतम् ॥ ३ ॥ जटायुर्नाम नाम्नाहं गृध्रराजो महाबलः ।

भावार्थ

‘दशमुख रावण ! मैं प्राचीन ( सनातन ) धर्ममें स्थित, सत्यप्रतिज्ञ और महाबलवान् गृध्रराज हूँ । मेरा नाम जटायु है । भैया ! इस समय मेरे सामने तुम्हें ऐसा निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये ॥ ३½ ॥

राजा सर्वस्य लोकस्य महेन्द्रवरुणोपमः ॥ ४ ॥ लोकानां च हिते युक्तो रामो दशरथात्मजः ।

भावार्थ

‘दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, इन्द्र और वरुणके समान पराक्रमी तथा सब लोगोंके हितमें संलग्न रहनेवाले हैं ॥ ४½ ॥

तस्यैषा लोकनाथस्य धर्मपत्नी यशस्विनी ॥ ५ ॥ सीता नाम वरारोहा यां त्वं हर्तुमिहेच्छसि ।

भावार्थ

‘ये उन्हीं जगदीश्वर श्रीरामकी यशस्विनी धर्मपत्नी हैं । इन सुन्दर शरीरवाली देवीका नाम सीता है, जिन्हें तुम हरकर ले जाना चाहते हो ॥ ५½ ॥

कथं राजा स्थितो धर्मे परदारान् परामृशेत् ॥ ६ ॥ रक्षणीया विशेषेण राजदारा महाबल । निवर्तय गतिं नीचां परदाराभिमर्शनात् ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘अपने धर्ममें स्थित रहनेवाला कोई भी राजा भला परायी स्त्रीका स्पर्श कैसे कर सकता है ? महाबली रावण ! राजाओंकी स्त्रियोंकी तो सभीको विशेषरूपसे रक्षा करनी चाहिये । परायी स्त्रीके स्पर्शसे जो नीच गति प्राप्त होनेवाली है, उसे अपने आपसे दूर हटा दो ॥ ६–७ ॥

न तत् समाचरेद् धीरो यत् परोऽस्य विगर्हयेत् । यथाऽऽत्मनस्तथान्येषां दारा रक्ष्या विमर्शनात् ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘धीर ( बुद्धिमान् ) वह कर्म न करे जिसकी दूसरे लोग निन्दा करें । जैसे पराये पुरुषोंके स्पर्शसे अपनी स्त्रीकी रक्षा की जाती है, उसी प्रकार दूसरोंकी स्त्रियोंकी भी रक्षा करनी चाहिये ॥ ८ ॥

अर्थं वा यदि वा कामं शिष्टाः शास्त्रेष्वनागतम् । व्यवस्यन्त्यनु राजानं धर्मं पौलस्त्यनन्दन ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘पुलस्त्यकुलनन्दन ! जिनकी शास्त्रोंमें चर्चा नहीं है ऐसे धर्म, अर्थ अथवा कामका भी श्रेष्ठ पुरुष केवल राजाकी देखादेखी आचरण करने लगते हैं ( अतः राजाको अनुचित या अशास्त्रीय कर्ममें प्रवृत्त नहीं होना चाहिये ) ॥ ९ ॥

राजा धर्मश्च कामश्च द्रव्याणां चोत्तमो निधिः। धर्मः शुभं वा पापं वा राजमूलं प्रवर्तते ॥ १० ॥

भावार्थ

‘राजा धर्म और कामका प्रवर्तक तथा द्रव्योंकी उत्तम निधि है, अतः धर्म, सदाचार अथवा पाप—इनकी प्रवृत्तिका मूल कारण राजा ही है ॥ १० ॥

पापस्वभावश्चपलः कथं त्वं रक्षसां वर। ऐश्वर्यमभिसम्प्राप्तो विमानमिव दुष्कृती ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘राक्षसराज ! जब तुम्हारा स्वभाव ऐसा पापपूर्ण है और तुम इतने चपल हो, तब पापीको देवताओंके विमानकी भाँति तुम्हें यह ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हो गया ? ॥ ११ ॥

कामस्वभावो यःसोऽसौ न शक्यस्तं प्रमार्जितुम्। नहि दुष्टात्मनामार्यमावसत्यालये चिरम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘जिसके स्वभावमें कामकी प्रधानता है, उसके उस स्वभावका परिमार्जन नहीं किया जा सकताः क्योंकि दुष्टात्माओंके घरमें दीर्घकालके बाद भी पुण्यका आवास नहीं होता ॥ १२ ॥

विषये वा पुरे वा ते यदा रामो महाबलः। नापराध्यति धर्मात्मा कथं तस्यापराध्यसि ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘जब महाबली धर्मात्मा श्रीराम तुम्हारे राज्य अथवा नगरमें कोई अपराध नहीं करते हैं, तब तुम उनका अपराध कैसे कर रहे हो ? ॥ १३ ॥

यदि शूर्पणखाहेतोर्जनस्थानगतः खरः। अतिवृत्तो हतः पूर्वं रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ १४ ॥ अत्र ब्रूहि यथातत्त्वं को रामस्य व्यतिक्रमः। यस्य त्वं लोकनाथस्य हृत्वा भार्यां गमिष्यसि ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘यदि पहले शूर्पणखाका बदला लेनेके लिये चढ़कर आये हुए अत्याचारी खरका अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामने वध किया तो तुम्हीं ठीक-ठीक बताओ कि इसमें श्रीरामका क्या अपराध है, जिससे तुम उन जगदीश्वरकी पत्नीको हर ले जाना चाहते हो ? ॥ १४–१५ ॥

क्षिप्रं विसृज वैदेहीं मा त्वा घोरेण चक्षुषा। दहेद् दहनभूतेन वृत्रमिन्द्राशनिर्यथा ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘रावण ! अब शीघ्र ही विदेहकुमारी सीताको छोड़ दो, जिससे श्रीरामचन्द्रजी अपनी अग्निके समान भयंकर दृष्टिसे तुम्हें जलाकर भस्म न कर डालें । जैसे इन्द्रका वज्र वृत्रासुरका विनाश कर डाला था, उसी प्रकार श्रीरामकी रोषपूर्ण दृष्टि दग्ध कर डालेगी ॥ १६ ॥

सर्पमाशीविषं बद्ध्वा वस्त्रान्ते नावबुध्यसे। ग्रीवायां प्रतिमुक्तं च कालपाशं न पश्यसि ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘तुमने अपने कपड़ेमें विषधर सर्पको बाँध लिया है, फिर भी इस बातको समझ नहीं पाते हो । तुमने अपने गलेमें मौतकी फाँसी डाल ली है, फिर भी यह तुम्हें सूझ नहीं रहा है ॥ १७ ॥

स भारः सौम्य भर्तव्यो यो नरं नावसादयेत्। तदन्नमपि भोक्तव्यं जीर्यते यदनामयम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! पुरुषको उतना ही बोझ उठाना चाहिये, जो उसे शिथिल न कर दे और वही अन्न भोजन करना चाहिये, जो पेटमें जाकर पच जाय, रोग न पैदा करे ॥ १८ ॥

यत् कृत्वा न भवेद् धर्मो न कीर्तिर्न यशो ध्रुवम्। शरीरस्य भवेत् खेदः कस्तत् कर्म समाचरेत् ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘जो कार्य करनेसे न तो धर्म होता हो, न कीर्ति [बढ़ती हो और न अक्षय यश ही प्राप्त होता हो, उल्टे शरीरको खेद हो रहा हो, उस कर्मका अनुष्ठान कौन करेगा ? ॥१९॥

षष्टिवर्षसहस्राणि जातस्य मम रावण। पितृपैतामहं राज्यं यथावदनुतिष्ठतः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘रावण ! बाप-दादोंसे प्राप्त इस पक्षियोंके राज्यका विधिवत् पालन करते हुए मुझे जन्मसे लेकर अबतक साठ हजार वर्ष बीत गये ॥ २० ॥

वृद्धोऽहं त्वं युवा धन्वी सरथः कवची शरी। न चाप्यादाय कुशली वैदेहीं मे गमिष्यसि ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ और तुम नवयुवक हो । ( मेरे पास कोई युद्धका साधन नहीं है, किंतु ) तुम्हारे पास धनुष, कवच, बाण तथा रथ सब कुछ है, फिर भी तुम सीताको लेकर कुशलपूर्वक नहीं जा सकोगे ॥ २१ ॥

न शक्तस्त्वं बलाद्धर्तुं वैदेहीं मम पश्यतः। हेतुभिर्न्यायसंयुक्तैर्ध्रुवां वेदश्रुतीमिव ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘मेरे देखते-देखते तुम विदेहनन्दिनी सीताका बलपूर्वक अपहरण नहीं कर सकते; ठीक उसी तरह जैसे कोई न्यायसङ्गत हेतुओंसे सत्य सिद्ध हुई वैदिक श्रुतिको अपनी युक्तियोंके बलपर पलट नहीं सकता ॥ २२ ॥

युध्यस्व यदि शूरोऽसि मुहूर्तं तिष्ठ रावण। शयिष्यसे हतो भूमौ यथा पूर्वं खरस्तथा ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘रावण ! यदि शूरवीर हो तो युद्ध करो । मेरे सामने दो घड़ी ठहर जाओ; फिर जैसे पहले खर मारा गया था, उसी प्रकार तुम भी मेरेद्वारा मारे जाकर सदाके लिये सो जाओगे ॥ २३ ॥

असकृत्संयुगे येन निहता दैत्यदानवाः। न चिराच्चीरवासास्त्वां रामो युधि वधिष्यति ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘जिन्होंने युद्धमें अनेक बार दैत्यों और दानवोंका वध किया है, वे चीरवस्त्रधारी भगवान् श्रीराम तुम्हारा भी शीघ्र ही युद्धभूमिमें विनाश करेंगे ॥ २४ ॥

किं नु शक्यं मया कर्तुं गतौ दूरं नृपात्मजौ। क्षिप्रं त्वं नश्यसे नीच तयोर्भीतो न संशयः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘इस समय मैं क्या कर सकता हूँ, वे दोनों राजकुमार बहुत दूर चले गये हैं । नीच ! ( यदि मैं उन्हें बुलाने जाऊँ तो ) तुम उन दोनोंसे भयभीत होकर शीघ्र ही भाग जाओगे ( आँखोंसे ओझल हो जाओगे ), इसमें संशय नहीं है ॥ २५ ॥

नहि मे जीवमानस्य नयिष्यसि शुभामिमाम् । सीतां कमलपत्राक्षीं रामस्य महिर्षीं प्रियाम् ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘कमलके समान नेत्रोंवाली ये शुभलक्षणा सीता श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी पटरानी हैं । इन्हें मेरे जीते-जी तुम नहीं ले जाने पाओगे ॥ २६ ॥

अवश्यं तु मया कार्यं प्रियं तस्य महात्मनः । जीवितेनापि रामस्य तथा दशरथस्य च ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘मुझे अपने प्राण देकर भी महात्मा श्रीराम तथा राजा दशरथका प्रिय कार्य अवश्य करना होगा ॥ २७ ॥

तिष्ठ तिष्ठ दशग्रीव मुहूर्तं पश्य रावण । वृन्तादिव फलं त्वां तु पातयेयं रथोत्तमात् । युद्धातिथ्यं प्रदास्यामि यथाप्राणं निशाचर ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘दशमुख रावण ! ठहरो, ठहरो ! केवल दो घड़ी रुक जाओ; फिर देखो, जैसे डंठलसे फल गिरता है, उसी प्रकार तुम्हें इस उत्तम रथसे नीचे गिराये देता हूँ । निशाचर ! अपनी शक्तिके अनुसार युद्धमें मैं तुम्हारा पूरा आतिथ्य-सत्कार करूँगा—तुम्हें भलीभाँति भेंट-पूजा दूँगा’ ॥ २८ ॥

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