अरण्यकाण्ड, सर्ग 30
भित्त्वा तु तां गदां बाणै राघवो धर्मवत्सलः । स्मयमान इदं वाक्यं संरब्धमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
धर्मप्रेमी भगवान् श्रीरामने अपने बाणोंद्वारा खरकी उस गदाको विदीर्ण करके मुसकराते हुए यह रोषसूचक बात कही—॥ १ ॥
एतत् ते बलसर्वस्वं दर्शितं राक्षसाधम । शक्तिहीनतरो मत्तो वृथा त्वमुपगर्जसि ॥ २ ॥
भावार्थ
‘राक्षसाधम ! यही तेरा सारा बल है, जिसे तूने इस गदाके साथ दिखाया है । अब सिद्ध हो गया कि तू मुझसे अत्यन्त शक्तिहीन है, व्यर्थ ही अपने बलकी डींग हाँक रहा था ॥ २ ॥
एषा बाणविनिर्भिन्ना गदा भूमितलं गता । अभिधानप्रगल्भस्य तव प्रत्ययघातिनी ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘मेरे बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर तेरी यह गदा पृथ्वीपर पड़ी हुई है । तेरे मनमें जो यह विश्वास था कि मैं इस गदासे शत्रुका वध कर डालूँगा, इसका खण्डन तेरी इस गदाने ही कर दिया । अब यह स्पष्ट हो गया कि तू केवल बातें बनानेमें ढीठ है ( तुझसे कोई पराक्रम नहीं हो सकता )॥३॥
यत् त्वयोक्तं विनष्टानामिदमश्रुप्रमार्जनम् । राक्षसानां करोमीति मिथ्या तदपि ते वचः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘तूने जो यह कहा था कि मैं तुम्हारा बंध करके तुम्हारे हाथसे मारे गये राक्षसोंका अभी आँसू पोछूँगा, तेरी वह बात भी झूठी हो गयी ॥ ४ ॥
नीचस्य क्षुद्रशीलस्य मिथ्यावृत्तस्य रक्षसः । प्राणानपहरिष्यामि गरुत्मानमृतं यथा ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘तू नीच, क्षुद्रस्वभावसे युक्त और मिथ्याचारी राक्षस है । मैं तेरे प्राणोंको उसी प्रकार हर लूँगा, जैसे गरुड़ने देवताओंके यहाँसे अमृतका अपहरण किया था ॥ ५ ॥
अद्य ते भिन्नकण्ठस्य फेनबुद्बुदभूषितम् । विदारितस्य मद्बाणैर्मही पास्यति शोणितम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘अब मैं अपने बाणोंसे तेरे शरीरको विदीर्ण करके तेरा गला भी काट डालूँगा । फिर यह पृथ्वी फेन और बुद-बुदोंसे युक्त तेरे गरम-गरम रक्तका पान करेगी ॥ ६ ॥
पांसुरूषितसर्वाङ्गः स्रस्तन्यस्तभुजद्वयः । स्वप्स्यसे गां समाश्लिष्य दुर्लभां प्रमदामिव ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘तेरे सारे अङ्ग धूलसे धूसर हो जायँगे, तेरी दोनों भुजाएँ शरीरसे अलग होकर पृथ्वीपर गिर जायँगी और उस दशामें तू दुर्लभ युवतीके समान इस पृथ्वीका आलिङ्गन करके सदाके लिये सो जायगा ॥ ७ ॥
प्रवृद्धनिद्रे शयिते त्वयि राक्षसपांसने । भविष्यन्ति शरण्यानां शरण्या दण्डका इमे ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘तेरे-जैसे राक्षसकुलकलङ्कके सदाके लिये महानिद्रामें सो जानेपर ये दण्डकवनके प्रदेश शरणार्थियोंको शरण देनेवाले हो जायँगे ॥ ८ ॥
जनस्थाने हतस्थाने तव राक्षस मच्छरैः । निर्भया विचरिष्यन्ति सर्वतो मुनयो वने ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘राक्षस ! मेरे बाणोंसे जनस्थानमें बने हुए तेरे निवास-स्थानके नष्ट हो जानेपर मुनिगण इस वनमें सब ओर निर्भय विचर सकेंगे ॥ ९ ॥
अद्य विप्रसरिष्यन्ति राक्षस्यो हतबान्धवाः । बाष्पार्द्रवदना दीना भयादन्यभयावहाः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘जो अबतक दूसरोंको भय देती थीं, वे राक्षसियाँ आज अपने बान्धवजनोंके मारे जानेसे दीन हो आँसुओंसे भीगे मुँह लिये जनस्थानसे स्वयं ही भयके कारण भाग जायँगी ॥ १० ॥
अद्य शोकरसज्ञास्ता भविष्यन्ति निरर्थिकाः । अनुरूपकुलाः पत्न्यो यासां त्वं पतिरीदृशः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘जिनका तुझ-जैसा दुराचारी पति है, वे तदनुरूप कुल-वाली तेरी पत्नियाँ आज तेरे मारे जानेपर काम आदि पुरुषार्थोंसे वञ्चित हो शोकरूपी स्थायी भाववाले करुणरसका अनुभव करनेवाली होंगी ॥ ११ ॥
नृशंसशील क्षुद्रात्मन् नित्यं ब्राह्मणकण्टक । त्वत्कृते शङ्कितैरग्नौ मुनिभिः पात्यते हविः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘क्रूरस्वभाववाले निशाचर ! तेरा हृदय सदा ही क्षुद्र विचारोंसे भरा रहता है। तू ब्राह्मणोंके लिये कण्टकरूप है तेरे ही कारण मुनिलोग शङ्कित रहकर ही अग्निमें हविष्यकी आहुतियाँ डालते हैं’ ॥ १२ ॥
तमेवमभिसंरब्धं ब्रुवाणं राघवं वने । खरो निर्भर्त्सयामास रोषात् खरतरस्वरः ॥ १३ ॥
भावार्थ
वनमें श्रीरामचन्द्रजी जब इस प्रकार रोषपूर्ण बातें कह रहे थे, उस समय क्रोधके कारण खरका भी स्वर अत्यन्त कठोर हो गया और उसने उन्हें फटकारते हुए कहा—॥१३॥
दृढं खल्ववलिप्तोऽसि भयेष्वपि च निर्भयः । वाच्यावाच्यं ततो हि त्वं मृत्युोर्वशयो न बुध्यसे ॥ १४ ॥ कालपाशपरिक्षिप्ता भवन्ति पुरुषा हि ये । कार्याकार्यं न जानन्ति ते निरस्तषडिन्द्रियाः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘अहो ! निश्चय ही तुम बड़े घमंडी हो, भयके अवसरोंपर भी निर्भय बने हुए हो । जान पड़ता है कि तुम मृत्युके अधीन हो गये हो, इस कारणसे ही तुम्हें यह भी पता नहीं है कि कब क्या कहना चाहिये और क्या नहीं कहना चाहिये? ‘जो पुरुष कालके फन्देमें फँस जाते हैं, उनकी छहों इन्द्रियाँ बेकाम हो जाती हैं; इसीलिये उन्हें कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान नहीं रह जाता है’ ॥ १५ ॥
एवमुक्त्वा ततो रामं संरुध्य भ्रुकुटिं ततः । स ददर्श महासालमविदूरे निशाचरः ॥ १६ ॥ रणे प्रहरणस्यार्थे सर्वतो ह्यवलोकयन् । स तमुत्पाटयामास संदष्टदशनच्छदम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर उस निशाचरने एक बार श्रीरामकी ओर भौंहें टेंढ़ी करके देखा और रणभूमिमें उनपर प्रहार करनेके लिये वह चारों ओर दृष्टिपात करने लगा । इतनेमें ही उसे एक विशाल सालूका वृक्ष दिखायी दिया, जो निकट ही था । खरने अपने होठोंको दाँतोंसे दबाकर उस वृक्षको उखाड़ लिया ॥ १६-१७ ॥
तं समुत्क्षिप्य बाहुभ्यां विनर्दित्वा महाबलः । राममुद्दिश्य चिक्षेप हतस्त्वमिति चाब्रवीत् ॥ १८ ॥
भावार्थ
फिर उस महाबली निशाचरने विकट गर्जना करके दोनों हाथोंसे उस वृक्षको उठा लिया और श्रीरामपर दे मारा । साथ ही यह भी कहा—‘लो, अब तुम मारे गये’ ॥१८॥
तमापतन्तं बाणौघैश्छित्त्वा रामः प्रतापवान् । रोषमाहारयत् तीव्रं निहन्तुं समरे खरम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
परमप्रतापी भगवान् श्रीरामने अपने ऊपर आते हुए उस वृक्षको बाण-समूहोंसे काट गिराया और उस समरभूमिमें खरको मार डालनेके लिये अत्यन्त क्रोध प्रकट किया ॥१९॥
जातस्वेदस्ततो रामो रोषरक्तान्तलोचनः । निर्बिभेद सहस्रेण बाणानां समरे खरम् ॥ २० ॥
भावार्थ
उस समय श्रीरामके शरीरमें पसीना आ गया । उनके नेत्रप्रान्त रोषसे रक्तवर्णके हो गये । उन्होंने सहस्रों बाणोंका प्रहार करके समराङ्गणमें खरको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ २०॥
तस्य बाणान्तराद् रक्तं बहु सुस्राव फेनिलम् । गिरेः प्रस्रवणस्येव धाराणां च परिस्रवः ॥ २१ ॥
भावार्थ
उनके बाणोंके आघातसे उस निशाचरके शरीरमें जो घाव हुए थे, उनसे अधिक मात्रामें फेनयुक्त रक्त प्रवाहित होने लगा, मानो पर्वतके झरनेसे जलकी धाराएँ गिर रही हों ॥२१॥
विकलः स कृतो बाणैः खरो रामेण संयुगे । मत्तो रुधिरगन्धेन तमेवाभ्यद्रवद् द्रुतम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
श्रीरामने युद्धस्थलमें अपने बाणोंकी मारसे खरको व्याकुल कर दिया; तो भी ( उसका साहस कम नहीं हुआ ।) वह खूनकी गन्धसे उन्मत्त होकर बड़े वेगसे श्रीरामकी ओर ही दौड़ा ॥ २२ ॥
तमापतन्तं संक्रुद्धं कृतास्त्रो रुधिराप्लुतम् । अपासर्पद् द्वित्रिपदं किंचिस्त्वरितविक्रमः ॥ २३ ॥
भावार्थ
अस्त्र-विद्याके ज्ञाता भगवान् श्रीरामने देखा कि यह राक्षस खूनसे लथपथ होनेपर भी अत्यन्त क्रोधपूर्वक मेरी ही ओर बढ़ा आ रहा है तो वे तुरंत चरणोंका संचालन करके दो-तीन पग पीछे हट गये ( क्योंकि बहुत निकट होनेपर बाण चलाना सम्भव नहीं हो सकता था ) ॥ २३ ॥
ततः पावकसंकाशं वधाय समरे शरम् । खरस्य रामो जग्राह ब्रह्मदण्डमिवापरम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
तदनन्तर श्रीरामने समराङ्गणमें खरका वध करनेके लिये एक अग्निके समान तेजस्वी बाण हाथमें लिया, जो दूसरे ब्रह्मदण्डके समान भयंकर था ॥ २४ ॥
स तद् दत्तं मघवता सुरराजेन धीमता । संदधे च स धर्मात्मा मुमोच च खरं प्रति ॥ २५ ॥
भावार्थ
वह बाण बुद्धिमान् देवराज इन्द्रका दिया हुआ था । धर्मात्मा श्रीरामने उसे धनुषपर रखा और खरको लक्ष्य करके छोड़ दिया ॥ २५ ॥
स विमुक्तो महाबाणो निर्घातसमनिःस्वनः । रामेण धनुरायम्य खरस्योरसि चापतत् ॥ २६ ॥
भावार्थ
उस महाबाणके छूटते ही वज्रपातके समान भयानक शब्द हुआ । श्रीरामने अपने धनुषको कानतक खींचकर उसे छोड़ा था । वह खरकी छातीमें जा लगा ॥ २६ ॥
स पपात खरो भूमौ दह्यमानः शराग्निना । रुद्रेणेव विनिर्दग्धः श्वेतारण्ये यथान्धकः ॥ २७ ॥
भावार्थ
जैसे श्वेतवनमें भगवान् रुद्रने अन्धकासुरको जलाकर भस्म किया था, उसी प्रकार दण्डकवनमें श्रीरामके उस बाणकी आगमें जलता हुआ निशाचर खर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥२७॥
स वृत्र इव वज्रेण फेनेन नमुचिर्यथा । बलो वेन्द्राशनिहतो निपपात हतः खरः ॥ २८ ॥
भावार्थ
जैसे वज्रसे वृत्रासुर, फेनसे नमुचि और इन्द्रकी अशनिसे बलासुर मारा गया था, उसी प्रकार श्रीरामके उस बाणसे आहत होकर खर धराशायी हो गया ॥ २८ ॥
एतस्मिन्नन्तरे देवाश्चारणैः सह संगताः । दुन्दुभींश्चाभिनिघ्नन्तः पुष्पवर्षं समन्ततः ॥ २९ ॥ रामस्योपरि संहृष्टा ववर्षुर्विस्मितास्तदा । अर्धाधिकमुहूर्तेन रामेण निशितैः शरैः ॥ ३० ॥ चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां कामरूपिणाम् । खरदूषणमुख्यानां निहतानि महामृधे ॥ ३१ ॥
भावार्थ
इसी समय देवता चारणोंके साथ मिलकर आये और हर्षमें भरकर दुन्दुभि बजाते हुए वहाँ श्रीरामके ऊपर चारों ओरसे फूलोंकी वर्षा करने लगे । उस समय उन्हें यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ था कि श्रीरामने अपने पैने बाणोंसे डेढ़ मुहूर्तमें ही इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले खर-दूषण आदि चौदह हजार राक्षसोंका इस महासमरमें संहार कर डाला ॥ २९-३१ ॥
अहो बत महत्कर्म रामस्य विदितात्मनः । अहो वीर्यमहो दार्ढ्यं विष्णोरिव हि दृश्यते ॥ ३२ ॥
भावार्थ
वे बोले—‘अहो ! अपने स्वरूपको जाननेवाले भगवान् श्रीरामका यह कर्म महान् और अद्भुत है, इनका बल-पराक्रम भी अद्भुत है और इनमें भगवान् विष्णुकी भाँति आश्चर्यजनक दृढ़ता दिखायी देती है’ ॥ ३२ ॥
इत्येवमुक्त्वा ते सर्वे ययुर्देवा यथागतम् । ततो राजर्षयः सर्वे संगताः परमर्षयः ॥ ३३ ॥ सभाज्य मुदिता रामं सागस्त्या इदमब्रुवन् ।
भावार्थ
ऐसा कहकर वे सब देवता जैसे आये थे, वैसे ही चले गये । तदनन्तर बहुत-से राजर्षि और अगस्त्य आदि महर्षि मिलकर वहाँ आये तथा प्रसन्नतापूर्वक श्रीरामका सत्कार करके उनसे इस प्रकार बोले—॥ ३३½ ॥
एतदर्थं महातेजा महेन्द्रः पाकशासनः ॥ ३४ ॥ शरभङ्गाश्रमं पुण्यमाजगाम पुरंदरः । आनीतस्त्वमिमं देशमुपायेन महर्षिभिः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! इसीलिये महातेजस्वी पाकशासन पुरंदर इन्द्र शरभङ्ग मुनिके पवित्र आश्रमपर आये थे और इसी कार्यकी सिद्धिके लिये महर्षियोंने विशेष उपाय करके आपको पञ्चवटीके इस प्रदेशमें पहुँचाया था ॥ ३४-३५ ॥
एषां वधार्थं शत्रूणां रक्षसां पापकर्मणाम् । तदिदं नः कृतं कार्यं त्वया दशरथात्मज ॥ ३६ ॥ स्वधर्मे प्रचरिष्यन्ति दण्डकेषु महर्षयः ।
भावार्थ
‘मुनियोंके शत्रुरूप इन पापाचारी राक्षसोंके वधके लिये ही आपका यहाँ शुभागमन आवश्यक समझा गया था । दशरथनन्दन ! आपने हमलोगोंका यह बहुत बड़ा कार्य सिद्ध कर दिया । अब बड़े-बड़े ऋषि-मुनि दण्डकारण्यके विभिन्न प्रदेशोंमें निर्भय होकर अपने धर्मका अनुष्ठान करेंगे’ ॥३६½॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरो लक्ष्मणः सह सीतया ॥ ३७ ॥ गिरिदुर्गाद् विनिष्क्रम्य संविवेशाश्रमे सुखी ।
भावार्थ
इसी बीचमें वीर लक्ष्मण भी सीताके साथ पर्वतकी कन्दरासे निकलकर प्रसन्नतापूर्वक आश्रममें आ गये ॥ ३७½ ॥
ततो रामस्तु विजयी पूज्यमानो महर्षिभिः ॥ ३८ ॥ प्रविवेशाश्रमं वीरो लक्ष्मणेनाभिपूजितः ।
भावार्थ
तत्पश्चात् महर्षियोंसे प्रशंसित और लक्ष्मणसे पूजित विजयी वीर श्रीरामने आश्रममें प्रवेश किया ॥ ३८½ ॥
तं दृष्ट्वा शत्रुहन्तारं महर्षीणां सुखावहम् ॥ ३९ ॥ बभूव हृष्टा वैदेही भर्तारं परिषस्वजे । मुदा परमया युक्ता दृष्ट्वा रक्षोगणान् हतान् । रामं चैवाव्ययं दृष्ट्वा तुतोष जनकात्मजा ॥ ४० ॥
भावार्थ
महर्षियोंको सुख देनेवाले अपने शत्रुहन्ता पतिका दर्शन करके विदेहराजनन्दिनी सीताको बड़ा हर्ष हुआ । उन्होंने परमानन्दमें निमग्न होकर अपने स्वामीका आलिङ्गन किया । राक्षस-समूह मारे गये और श्रीरामको कोई क्षति नहीं पहुँची— यह देख और जानकर जानकीजीको बहुत संतोष हुआ ३९-४०
ततस्तु तं राक्षससङ्घमर्दनं सम्पूज्यमानं मुदितैर्महात्मभिः । पुनः परिष्वज्य मुदान्वितानना बभूव हृष्टा जनकात्मजा तदा ॥ ४१ ॥
भावार्थ
प्रसन्नतासे भरे हुए महात्मा मुनि जिनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे तथा जिन्होंने राक्षसोंके समुदायको कुचल डाला था, उन प्राणवल्लभ श्रीरामका बारंबार आलिङ्गन करके उस समय जनकनन्दिनी सीताको बड़ा हर्ष हुआ । उनका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा ॥ ४१ ॥
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