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अरण्यकाण्ड, सर्ग 31

त्वरमाणस्ततो गत्वा जनस्थानादकम्पनः । प्रविश्य लङ्कां वेगेन रावणं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

तदनन्तर जनस्थानसे अकम्पन नामक राक्षस बड़ी उतावलीके साथ लङ्काकी ओर गया और शीघ्र ही उस पुरीमें प्रवेश करके रावणसे इस प्रकार बोला—॥ १ ॥

जनस्थानस्थिता राजन् राक्षसा बहवो हताः । खरश्च निहतः संख्ये कथंचिदहमागतः ॥ २ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! जनस्थानमें जो बहुत-से राक्षस रहते थे, वे मार डाले गये । खर भी युद्धमें मारा गया । मैं किसी तरह जान बचाकर यहाँ आया हूँ’ ॥ २ ॥

एवमुक्तो दशग्रीवः क्रुद्धः संरक्तलोचनः । अकम्पनमुवाचेदं निर्दहन्निव तेजसा ॥ ३ ॥

भावार्थ

अकम्पनके ऐसा कहते ही दशमुख रावण क्रोधसे जल उठा और लाल आँखें करके उससे इस तरह बोला, मानो उसे अपने तेजसे जलाकर भस्म कर डालेगा ॥ ३ ॥

केन भीमं जनस्थानं हतं मम परासुना । को हि सर्वेषु लोकेषु गतिं नाधिगमिष्यति ॥ ४ ॥

भावार्थ

वह बोला—‘कौन मौतके मुखमें जाना चाहता है, जिसने मेरे भयंकर जनस्थानका विनाश किया है ? कौन वह दुःसाहसी है, जिसे समस्त लोकोंमें कहीं भी ठौर-ठिकाना नहीं मिलनेवाला है ? ॥ ४ ॥

न हि मे विप्रियं कृत्वा शक्यं मघवता सुखम् । प्राप्तुं वैश्रवणेनापि न यमेन च विष्णुना ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘मेरा अपराध करके इन्द्र, यम, कुबेर और विष्णु भी चैनसे नहीं रह सकेंगे ॥ ५ ॥

कालस्य चाप्यहं कालो दहेयमपि पावकम् । मृत्युं मरणधर्मेण संयोजयितुमुत्सहे ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘मैं कालका भी काल हूँ, आगको भी जला सकता हूँ तथा मौतको भी मृत्युके मुखमें डाल सकता हूँ ॥ ६ ॥

वातस्य तरसा वेगं निहन्तुमपि चोत्सहे । दहेयमपि संक्रुद्धस्तेजसाऽऽदित्यपावकौ ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘यदि मैं क्रोधमें भर जाऊँ तो अपने वेगसे वायुकी गतिको भी रोक सकता हूँ तथा अपने तेजसे सूर्य और अग्निको भी जलाकर भस्म कर सकता हूँ’ ॥ ७ ॥

तथा क्रुद्धं दशग्रीवं कृताञ्जलिरकम्पनः । भयात् संदिग्धया वाचा रावणं याचतेऽभयम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

रावणको इस प्रकार क्रोधसे भरा देख भयके मारे अकम्पनकी बोलती बंद हो गयी । उसने हाथ जोड़कर संशययुक्त वाणीमें रावणसे अभयकी याचना की ॥ ८ ॥

दशग्रीवोऽभयं तस्मै प्रददौ रक्षसां वरः । स विस्रब्धोऽब्रवीद् वाक्यमसंदिग्धमकम्पनः ॥ ९ ॥

भावार्थ

तब राक्षसोंमें श्रेष्ठ दशग्रीवने उसे अभयदान दिया । इससे अकम्पनको अपने प्राण बचनेका विश्वास हुआ और वह संशयरहित होकर बोला—॥ ९ ॥

पुत्रो दशरथस्यास्ते सिंहसंहननो युवा । रामो नाम महास्कन्धो वृत्तायतमहाभुजः ॥ १० ॥ श्यामः पृथुयशाः श्रीमानतुल्यबलविक्रमः । हतस्तेन जनस्थाने खरश्च सहदूषणः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘राक्षसराज ! राजा दशरथके नवयुवक पुत्र श्रीराम पञ्चवटीमें रहते हैं । उनके शरीरकी गठन सिंहके समान है, कंधे मोटे और भुजाएँ गोल तथा लंबी हैं, शरीरका रंग साँवला है । वे बड़े यशस्वी और तेजस्वी दिखायी देते हैं । उनके बल और पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं है । उन्होंने जनस्थानमें रहनेवाले खर और दूषण आदिका वध किया है’ ॥ १०-११ ॥

अकम्पनवचः श्रुत्वा रावणो राक्षसाधिपः । नागेन्द्र इव निःश्वस्य इदं वचनमब्रवीत् ॥ १२ ॥

भावार्थ

अकम्पनकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावणने नागराज ( महान् सर्प ) की भाँति लंबी साँस खींचकर इस प्रकार कहा—॥ १२ ॥

स सुरेन्द्रेण संयुक्तो रामः सर्वामरैः सह । उपयातो जनस्थानं ब्रूहि कच्चिदकम्पन ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘अकम्पन ! बताओ तो सही क्या राम सम्पूर्ण देवताओं तथा देवराज इन्द्रके साथ जनस्थानमें आये हैं ?’ ॥ १३ ॥

रावणस्य पुनर्वाक्यं निशम्य तदकम्पनः । आचचक्षे बलं तस्य विक्रमं च महात्मनः ॥ १४ ॥

भावार्थ

रावणका यह प्रश्न सुनकर अकम्पनने महात्मा श्रीरामके बल और पराक्रमका पुनः इस प्रकार वर्णन किया—॥ १४ ॥

रामो नाम महातेजाः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् । दिव्यास्त्रगुणसम्पन्नः परं धर्मं गतो युधि ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘लङ्केश्वर ! जिनका नाम राम है, वे संसारके समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ और अत्यन्त तेजस्वी हैं। दिव्यास्त्रोंके प्रयोगका जो गुण है, उससे भी वे पूर्णतः सम्पन्न हैं। युद्धकी कलामें तो वे पराकाष्ठाको पहुँचे हुए हैं ॥ १५ ॥

तस्यानुरूपो बलवान् रक्ताक्षो दुन्दुभिस्वनः । कनीयाँल्लक्ष्मणो भ्राता राकाशशिनिभाननः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘श्रीरामके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी हैं, जो उन्हींके समान बलवान् हैं। उनका मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर है। उनकी आँखें कुछ-कुछ लाल हैं और स्वर दुन्दुभिके समान गम्भीर है ॥ १६ ॥

स तेन सह संयुक्तः पावकेनानिलो यथा । श्रीमान् राजवरस्तेन जनस्थानं निपातितम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘जैसे अग्निके साथ वायु हों, उसी प्रकार अपने भाईके साथ संयुक्त हुए राजाधिराज श्रीमान् राम बड़े प्रबल हैं। उन्होंने ही जनस्थानको उजाड़ डाला है॥ १७ ॥

नैव देवा महात्मानो नात्र कार्या विचारणा । शरा रामेण तूत्सृष्टा रुक्मपुङ्खाः पतत्रिणः ॥ १८ ॥ सर्पाः पञ्चाननाभूत्वा भक्षयन्ति स्म राक्षसान् ।

भावार्थ

‘उनके साथ न कोई देवता हैं, न महात्मा मुनि । इस विषयमें आप कोई विचार न करें । श्रीरामके छोड़े हुए सोनेकी पाँखवाले बाण पाँच मुखवाले सर्प बनकर राक्षसोंको खा जाते थे ॥ १८½ ॥

येन येन च गच्छन्ति राक्षसा भयकर्षिताः ॥ १९ ॥ तेन तेन स्म पश्यन्ति राममेवाग्रतः स्थितम् । इत्थं विनाशितं तेन जनस्थानं तवानघ ॥ २० ॥

भावार्थ

‘भयसे कातर हुए राक्षस जिस-जिस मार्गसे भागते थे, वहाँ-वहाँ वे श्रीरामको ही अपने सामने खड़ा देखते थे । अनघ ! इस प्रकार अकेले श्रीरामने ही आपके जनस्थानका विनाश किया है’ ॥ १९-२० ॥

अकम्पनवचः श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् । गमिष्यामि जनस्थानं रामं हन्तुं सलक्ष्मणम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

अकम्पनकी यह बात सुनकर रावणने कहा— ‘मैं अभी लक्ष्मणसहित रामका वध करनेके लिये जनस्थानको जाऊँगा’ ॥ २१ ॥

अथैवमुक्ते वचने प्रोवाचेदमकम्पनः । शृणु राजन् यथावृत्तं रामस्य बलपौरुषम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

उसके ऐसा कहनेपर अकम्पन बोला—‘राजन् ! श्रीरामका बल और पुरुषार्थ जैसा है, उसका यथावत् वर्णन मुझसे सुनिये ॥ २२ ॥

असाध्यः कुपितो रामो विक्रमेण महायशाः । आपगायास्तु पूर्णाया वेगं परिहरेच्छरैः ॥ २३ ॥ सताराग्रहनक्षत्रं नभश्चाप्यवसादयेत् ।

भावार्थ

‘महायशस्वी श्रीराम यदि कुपित हो जायँ तो उन्हें अपने पराक्रमके द्वारा कोई भी काबूमें नहीं कर सकता । वे अपने बाणोंसे भरी हुई नदीके वेगको भी पलट सकते हैं तथा तारा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित सम्पूर्ण आकाशमण्डलको पीड़ा दे सकते हैं ॥ २३½ ॥

असौ रामस्तु सीदन्तीं श्रीमानभ्युद्धरेन्महीम् ॥ २४ ॥ भित्त्वा वेलां समुद्रस्य लोकानाप्लावयेद् विभुः । वेगं वापि समुद्रस्य वायुं वा विधमेच्छरैः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘वे श्रीमान् भगवान् राम समुद्रमें डूबती हुई पृथ्वीको ऊपर उठा सकते हैं, महासागरकी मर्यादाका भेदन करके समस्त लोकोंको उसके जलसे आप्लावित कर सकते हैं तथा अपने बाणोंसे समुद्रके वेग अथवा वायुको भी नष्ट कर सकते हैं ॥ २४–२५ ॥

संहृत्य वा पुनर्लोकान् विक्रमेण महायशाः । शक्तः श्रेष्ठः स पुरुषः स्रष्टुं पुनरपि प्रजाः ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘वे महायशस्वी पुरुषोत्तम अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण लोकोंका संहार करके पुनः नये सिरेसे प्रजाकी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं ॥ २६ ॥

नहि रामो दशग्रीव शक्यो जेतुं रणे त्वया । रक्षसां वापि लोकेन स्वर्गः पापजनैरिव ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘दशग्रीव ! जैसे पापी पुरुष स्वर्गपर अधिकार नहीं प्राप्त कर सकते, उसी प्रकार आप अथवा समस्त राक्षस-जगत् भी युद्धमें श्रीरामको नहीं जीत सकते ॥ २७ ॥

न तं वध्यमहं मन्ये सर्वैर्देवासुरैरपि । अयं तस्य वधोपायस्तन्ममैकमनाः शृणु ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘मेरी समझमें सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी उनका वध नहीं कर सकते । उनके वधका यह एक उपाय मुझे सूझा है, उसे आप मेरे मुखसे एकचित्त होकर सुनिये ॥ २८ ॥

भार्या तस्योत्तमा लोके सीता नाम सुमध्यमा । श्यामा समविभक्ताङ्गी स्त्रीरत्नं रत्नभूषिता ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘श्रीरामकी पत्नी सीता संसारकी सर्वोत्तम सुन्दरी है । उसने यौवनके मध्यमें पदार्पण किया है । उसके अङ्ग-प्रत्यङ्ग सुन्दर और सुडौल हैं। वह रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित रहती है । सीता सम्पूर्ण स्त्रियोंमें एक रत्न है ॥ २९ ॥

नैव देवी न गन्धर्वी नाप्सरा न च पन्नगी । तुल्या सीमन्तिनी तस्या मानुषी तु कुतो भवेत् ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘देवकन्या, गन्धर्वकन्या, अप्सरा अथवा नागकन्या कोई भी रूपमें उसकी समानता नहीं कर सकती, फिर मनुष्य-जातिकी दूसरी कोई नारी उसके समान कैसे हो सकती है ॥ ३० ॥

तस्यापहर भार्यां त्वं तं प्रमथ्य महावने । सीतया रहितो रामो न चैव हि भविष्यति ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘उस विशाल वनमें जिस किसी भी उपायसे श्रीरामको घोखेमें डालकर आप उनकी पत्नीका अपहरण कर लें । सीतासे बिछुड़ जानेपर श्रीराम कदापि जीवित नहीं रहेंगे’ ॥ ३१ ॥

अरोचयत तद्वाक्यं रावणो राक्षसाधिपः । चिन्तयित्वा महाबाहुरकम्पनमुवाच ह ॥ ३२ ॥

भावार्थ

राक्षसराज रावणको अकम्पनकी वह बात पसंद आ गयी । उस महाबाहु दशग्रीवने कुछ सोचकर अकम्पनसे कहा—॥ ३२ ॥

बाढं कल्यं गमिष्यामि ह्येकः सारथिना सह । आनेष्यामि च वैदेहीमिमां हृष्टो महापुरीम् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘ठीक है, कल प्रातःकाल सारथिके साथ मैं अकेला ही जाऊँगा और विदेहकुमारी सीताको प्रसन्नतापूर्वक इस महापुरीमें ले आऊँगा’ ॥ ३३ ॥

तदेवमुक्त्वा प्रययौ खरयुक्तेन रावणः । रथेनादित्यवर्णेन दिशः सर्वाः प्रकाशयन् ॥ ३४ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर रावण गधोंसे जुते हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ वहाँसे चला ॥ ३४ ॥

स रथो राक्षसेन्द्रस्य नक्षत्रपथगो महान् । चञ्चूर्यमाणः शुशुभे जलदे चन्द्रमा इव ॥ ३५ ॥

भावार्थ

नक्षत्रोंके मार्गपर विचरता हुआ राक्षसराजका वह विशाल रथ बादलोंकी आड़में प्रकाशित होनेवाले चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था ॥ ३५ ॥

स दूरे चाश्रमं गत्वा ताटकेयमुपागमत् । मारीचेनार्चितो राजा भक्ष्यभोज्यैरमानुषैः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

कुछ दूरपर स्थित एक आश्रममें जाकर वह ताटका-पुत्र मारीचसे मिला । मारीचने अलौकिक भक्ष्य-भोज्य अर्पित करके राजा रावणका स्वागत-सत्कार किया ॥ ३६ ॥

तं स्वयं पूजयित्वा तु आसनेनोदकेन च । अर्थोपहितया वाचा मारीचो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३७ ॥

भावार्थ

आसन और जल आदिके द्वारा स्वयं ही उसका पूजन करके मारीचने अर्थयुक्त वाणीमें पूछा—॥ ३७ ॥

कच्चित् सुकुशलं राजँल्लोकानां राक्षसाधिप । आशङ्के नाधिजाने त्वं यतस्तूर्णमुपागतः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

‘राक्षसराज ! तुम्हारे राज्यमें लोगोंकी कुशल तो है न ? तुम बड़ी उतावलीके साथ आ रहे हो, इसलिये मेरे मनमें कुछ खटका हुआ है । मैं समझता हूँ, तुम्हारे यहाँका अच्छा हाल नहीं है’ ॥ ३८ ॥

एवमुक्तो महातेजा मारीचेन स रावणः । ततः पश्चादिदं वाक्यमब्रवीद् वाक्यकोविदः ॥ ३९ ॥

भावार्थ

मारीचके इस प्रकार पूछनेपर बातचीतकी कलाको जाननेवाले महातेजस्वी रावणने इस प्रकार कहा—॥ ३९ ॥

आरक्षो मे हतस्तात रामेणाक्लिष्टकारिणा । जनस्थानमवध्यं तत् सर्वं युधि निपातितम् ॥ ४० ॥

भावार्थ

‘तात ! अनायास ही महान् पराक्रम दिखानेवाले श्रीरामने मेरे राज्यकी सीमाके रक्षक खर-दूषण आदिको मार डाला है तथा जो जनस्थान अवध्य समझा जाता था, वहाँके सारे राक्षसोंको उन्होंने युद्धमें मार गिराया है ॥ ४० ॥

तस्य मे कुरु साचिव्यं तस्य भार्यापहारणे । राक्षसेन्द्रवचः श्रुत्वा मारीचो वाक्यमब्रवीत् ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘अतः इसका बदला लेनेके लिये मैं उनकी स्त्रीका अपहरण करना चाहता हूँ । इस कार्यमें तुम मेरी सहायता करो ।’ राक्षसराज रावणका यह वचन सुनकर मारीच बोला—॥ ४१ ॥

आख्याता केन वा सीता मित्ररूपेण शत्रुणा । त्वया राक्षसशार्दूल को न नन्दति नन्दितः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘निशाचरशिरोमणे ! मित्रके रूपमें तुम्हारा वह कौन-सा ऐसा शत्रु है, जिसने तुम्हें सीताको हर लेनेकी सलाह दी है ? कौन ऐसा पुरुष है, जो तुमसे सुख और आदर पाकर भी प्रसन्न नहीं है, अतः तुम्हारी बुराई करना चाहता है ? ॥ ४२ ॥

सीतामिहानयस्वेति को ब्रवीति ब्रवीहि मे । रक्षोलोकस्य सर्वस्य कः शृङ्गं छेत्तुमिच्छति ॥ ४३ ॥

भावार्थ

‘कौन कहता है कि तुम सीताको यहाँ हर ले आओ ? मुझे उसका नाम बताओ । वह कौन है, जो समस्त राक्षस-जगत्का सींग काट लेना चाहता है ? ॥ ४३ ॥

प्रोत्साहयति यश्च त्वां स च शत्रुरसंशयम् । आशीविषमुखाद् दंष्ट्रामुद्धर्तुं चेच्छति त्वया ॥ ४४ ॥

भावार्थ

‘जो इस कार्यमें तुम्हें प्रोत्साहन दे रहा है, वह तुम्हारा शत्रु है, इसमें संशय नहीं है । वह तुम्हारे हाथों विषधर सर्पके मुखसे उसके दाँत उखड़वाना चाहता है ॥ ४४ ॥

कर्मणानेन केनासि कापथं प्रतिपादितः । सुखसुप्तस्य ते राजन् प्रहृतं केन मूर्धनि ॥ ४५ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! किसने तुम्हें ऐसी खोटी सलाह देकर कुमार्गपर पहुँचाया है ? किसने सुखपूर्वक सोते समय तुम्हारे मस्तकपर लात मारी है ॥ ४५ ॥

विशुद्धवंशाभिजनाग्रहस्त- तेजोमदः संस्थितदोर्विषाणः । उदीक्षितुं रावण नेह युक्तः स संयुगे राघवगन्धहस्ती ॥ ४६ ॥

भावार्थ

‘रावण ! राघवेन्द्र श्रीराम वह गन्धयुक्त गजराज हैं, जिसकी गन्ध सूँघकर ही गजरूपी योद्धा दूर भाग जाते हैं । विशुद्ध कुलमें जन्म ग्रहण करना ही उस राघवरूपी गजराजका शुण्डदण्ड है, प्रताप ही मद है और सुडौल बाँहें ही दोनों दाँत हैं । युद्धस्थलमें उनकी ओर देखना भी तुम्हारे लिये उचित नहीं है; फिर जूझनेकी तो बात ही क्या है ॥ ४६ ॥

असौ रणान्तःस्थितिसंधिवालो विदग्धरक्षोमृगहा नृसिंहः । सुप्तस्त्वया बोधयितुं न शक्यः शराङ्गपूर्णो निशितासिदंष्ट्रः ॥ ४७ ॥

भावार्थ

‘वे श्रीराम मनुष्यके रूपमें एक सिंह हैं । रणभूमिके भीतर स्थित होना ही उनके अङ्गोंकी संधियाँ तथा बाल हैं । वह सिंह चतुर राक्षसरूपी मृगोंका वध करनेवाला है, बाणरूपी अङ्गोंसे परिपूर्ण है तथा तलवारें ही उसकी तीखी दाढ़ें हैं । उस सोते हुए सिंहको तुम नहीं जगा सकते ॥ ४७ ॥

चापापहारे भुजवेगपङ्के शरोर्मिमाले सुमहाहवौघे । न रामपातालमुखेऽतिघोरे प्रस्कन्दितुं राक्षसराज युक्तम् ॥ ४८ ॥

भावार्थ

‘राक्षसराज ! श्रीराम एक पातालतलव्यापी महासागर हैं, धनुष ही उस समुद्रके भीतर रहनेवाला ग्राह है, भुजाओंका वेग ही कीचड़ है, बाण ही तरंगमालाएँ हैं और महान् युद्ध ही उसकी अगाध जलराशि है । उसके अत्यन्त भयंकर मुख अर्थात् बड़वानलमें कूद पड़ना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है ॥ ४८ ॥

प्रसीद लङ्केश्वर राक्षसेन्द्र लङ्कां प्रसन्नो भव साधु गच्छ । त्वं स्वेषु दारेषु रमस्व नित्यं रामः सभार्यो रमतां वनेषु ॥ ४९ ॥

भावार्थ

‘लंकेश्वर ! प्रसन्न होओ । राक्षसराज ! सानन्द रहो और सकुशल लंकाको लौट जाओ । तुम सदा पुरीमें अपनी स्त्रियोंके साथ रमण करो और राम अपनी पत्नीके साथ वनमें विहार करें’ ॥ ४९ ॥

एवमुक्तो दशग्रीवो मारीचेन स रावणः । न्यवर्तत पुरीं लङ्कां विवेश च गृहोत्तमम् ॥ ५० ॥

भावार्थ

मारीचके ऐसा कहनेपर दशमुख रावण लंकाको लौटा और अपने सुन्दर महलमें चला गया ॥ ५० ॥

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