अरण्यकाण्ड, सर्ग 29
खरं तु विरथं रामो गदापाणिमवस्थितम् । मृदुपूर्वं महातेजाः परुषं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
खरको रथहीन होकर गदा हाथमें लिये सामने उपस्थित देख महातेजस्वी भगवान् श्रीराम पहले कोमल और फिर कठोर वाणीमें बोले—॥ १ ॥
गजाश्वरथसम्बाधे बले महति तिष्ठता । कृतं ते दारुणं कर्म सर्वलोकजुगुप्सितम् ॥ २ ॥ उद्वेजनीयो भूतानां नृशंसः पापकर्मकृत् । त्रयाणामपि लोकानामीश्वरोऽपि न तिष्ठति ॥ ३ ॥ कर्म लोकविरुद्धं तु कुर्वाणं क्षणदाचर । तीक्ष्णं सर्वजनो हन्ति सर्पं दुष्टमिवागतम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘निशाचर ! हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई विशाल सेनाके बीचमें खड़े रहकर ( असंख्य राक्षसोंके स्वामित्वका अभिमान लेकर ) तूने सदा जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, उसकी समस्त लोकोंद्वारा निन्दा हुई है । जो समस्त प्राणियोंको उद्वेगमें डालनेवाला, क्रूर और पापाचारी है, वह तीनों लोकोंका ईश्वर हो तो भी अधिक कालतक टिक नहीं सकता । जो लोकविरोधी कठोर कर्म करनेवाला है, उसे सब लोग सामने आये हुए दुष्ट सर्पकी भाँति मारते हैं ॥ २-४ ॥
लोभात् पापानि कुर्वाणः कामाद् वा यो न बुध्यते । हृष्टः पश्यति तस्यान्तं ब्राह्मणी करकादिव ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘जो वस्तु प्राप्त नहीं हुई है, उसकी इच्छाको ‘काम’ कहते हैं और प्राप्त हुई वस्तुको अधिक-से-अधिक संख्यामें पानेकी इच्छाका नाम ‘लोभ’ है । जो काम अथवा लोभसे प्रेरित हो पाप करता है और उसके ( विनाशकारी ) परिणाम-को नहीं समझता है, उलटे उस पापमें हर्षका अनुभव करता है, वह उसी प्रकार अपना विनाशरूप परिणाम देखता है जैसे वर्षाके साथ गिरे हुए ओलेको खाकर ब्राह्मणी (रक्तपुच्छिका) नामवाली कीड़ी अपना विनाश देखती है*॥५॥
वसतो दण्डकारण्ये तापसान् धर्मचारिणः । किं नु हत्वा महाभागान् फलं प्राप्स्यसि राक्षस ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘राक्षस ! दण्डकारण्यमें निवास करनेवाले तपस्यामें संलग्न धर्मपरायण महाभाग मुनियोंकी हत्या करके न जाने तू कौन-सा फल पायेगा ? ॥ ६ ॥
न चिरं पापकर्माणः क्रूरा लोकजुगुप्सिताः । ऐश्वर्यं प्राप्य तिष्ठन्ति शीर्णमूला इव द्रुमाः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘जिनकी जड़ खोखली हो गयी हो, वे वृक्ष जैसे अधिक कालतक नहीं खड़े रह सकते, उसी प्रकार पापकर्म करनेवाले लोकनिन्दित क्रूर पुरुष ( किसी पूर्वपुण्यके प्रभावसे ) ऐश्वर्यको पाकर भी चिरकालतक उसमें प्रतिष्ठित नहीं रह पाते ( उससे भ्रष्ट हो ही जाते हैं ) ॥ ७ ॥
अवश्यं लभते कर्ता फलं पापस्य कर्मणः । घोरं पर्यागते काले द्रुमः पुष्पमिवार्तवम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘जैसे समय आनेपर वृक्षमें ऋतुके अनुसार फूल लगते ही हैं, उसी प्रकार पापकर्म करनेवाले पुरुषको समयानुसार अपने उस पापकर्मका भयंकर फल अवश्य ही प्राप्त होता है ॥ ८ ॥
नचिरात् प्राप्यते लोके पापानां कर्मणां फलम् । सविषाणामिवान्नानां भुक्तानां क्षणदाचर ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘निशाचर ! जैसे खाये हुए विषमिश्रित अन्नका परिणाम तुरंत ही भोगना पड़ता है, उसी प्रकार लोकमें किये गये पापकर्मोंका फल शीघ्र ही प्राप्त होता है ॥ ९ ॥
पापमाचरतां घोरं लोकस्याप्रियमिच्छताम् । अहमासादितो राज्ञा प्राणान् हन्तुं निशाचर ॥ १० ॥
भावार्थ
‘राक्षस ! जो संसारका बुरा चाहते हुए घोर पापकर्ममें लगे हुए हैं, उन्हें प्राणदण्ड देनेके लिये मेरे पिता महाराज दशरथने मुझे यहाँ वनमें भेजा है ॥ १० ॥
अद्य भित्त्वा मया मुक्ताः शराः काञ्चनभूषणाः । विदार्योतिपतिष्यन्ति वल्मीकमिव पन्नगाः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘आज मेरे छोड़े हुए सुवर्णभूषित बाण जैसे सर्प बाँबीको छेदकर निकलते हैं, उसी प्रकार तेरे शरीरको फाड़कर पृथ्वीको भी विदीर्ण करके पातालमें जाकर गिरेंगे ॥ ११ ॥
ये त्वया दण्डकारण्ये भक्षिता धर्मचारिणः । तानद्य निहतः संख्ये ससैन्योऽनुगमिष्यसि ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘तूने दण्डकारण्यमें जिन धर्मपरायण ऋषियोंका भक्षण किया है, आज युद्धमें मारा जाकर सेनासहित तू भी उन्हींका अनुसरण करेगा ॥ १२ ॥
अद्य त्वां निहतं बाणैः पश्यन्तु परमर्षयः । निरयस्थं विमानस्था ये त्वया निहताः पुरा ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘पहले तूने जिनका वध किया है, वे महर्षि विमानपर बैठकर आज तुझे मेरे बाणोंसे मारा गया और नरकतुल्य कष्ट भोगता हुआ देखें ॥ १३ ॥
प्रहरस्व यथाकामं कुरु यत्नं कुलाधम । अद्य ते पातयिष्यामि शिरस्तालफलं यथा ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘कुलाधम ! तेरी जितनी इच्छा हो, प्रहार कर । जितना सम्भव हो । मुझे परास्त करनेका प्रयत्न कर, किंतु आज मैं तेरे मस्तकको ताड़के फलकी भाँति अवश्य काट गिराऊँगा’ ॥ १४ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण क्रुद्धः संरक्तलोचनः । प्रत्युवाच ततो रामं प्रहसन् क्रोधमूर्च्छितः ॥ १५ ॥ प्राकृतान् राक्षसान् हत्वा युद्धे दशरथात्मज । आत्मना कथमात्मानमप्रशस्यं प्रशंससि ॥ १६ ॥
भावार्थ
श्रीरामके ऐसा कहनेपर खर कुपित हो उठा । उसकी आँखें लाल हो गयीं । वह क्रोधसे अचेत-सा होकर हँसता हुआ श्रीरामको इस प्रकार उत्तर देने लगा—॥ ‘दशरथकुमार ! तुम साधारण राक्षसोंको युद्धमें मारकर स्वयं ही अपनी इतनी प्रशंसा कैसे कर रहे हो ? तुम प्रशंसाके योग्य कदापि नहीं हो ॥ १६ ॥
विक्रान्ता बलवन्तो वा ये भवन्ति नरर्षभाः । कथयन्ति न ते किंचित् तेजसा चातिगर्विताः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘जो श्रेष्ठ पुरुष पराक्रमी अथवा बलवान् होते हैं, वे अपने प्रतापके कारण अधिक घमंडमें भरकर कोई बात नहीं कहते हैं ( अपने विषयमें मौन ही रहते हैं ) ॥ १७ ॥
प्राकृतास्त्वकृतात्मानो लोके क्षत्रियपांसनाः । निरर्थकं विकत्थन्ते यथा राम विकत्थसे ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘राम ! जो क्षुद्र, अजितात्मा और क्षत्रियकुलकलंक होते हैं, वे ही संसारमें अपनी बड़ाईके लिये व्यर्थ डींग हाँका करते हैं; जैसे इस समय तुम ( अपने विषयमें ) बढ़-बढ़कर बातें बना रहे हो ॥ १८ ॥
कुलं व्यपदिशन् वीरः समरे कोऽभिधास्यति । मृत्युकाले तु सम्प्राप्ते स्वयमप्रस्तवे स्तवम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘जब कि मृत्युके समान युद्धका अवसर उपस्थित है, ऐसे समयमें बिना किसी प्रस्तावके ही समराङ्गणमें कौन वीर अपनी कुलीनता प्रकट करता हुआ आप ही अपनी स्तुति करेगा ? ॥ १९ ॥
सर्वथा तु लघुत्वं ते कत्थनेन विदर्शितम् । सुवर्णप्रतिरूपेण तप्तेनेव कुशाग्निना ॥ २० ॥
भावार्थ
‘जैसे पीतल सुवर्णशोधक आगमें तपाये जानेपर अपनी लघुता ( कालेपन ) को ही व्यक्त करता है, उसी प्रकार अपनी झूठी प्रशंसाके द्वारा तुमने सर्वथा अपने ओछेपनका ही परिचय दिया है ॥ २० ॥
न तु मामिह तिष्ठन्तं पश्यसि त्वं गदाधरम् । धराधरमिवाकम्प्यं पर्वतं धातुभिश्चितम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘क्या तुम नहीं देखते कि मैं नाना प्रकारके धातुओंकी खानोंसे युक्त तथा पृथ्वीको धारण करनेवाले अविचल कुलपर्वतके समान यहाँ स्थिरभावसे तुम्हारे सामने गदा लेकर खड़ा हूँ ॥ २१ ॥
पर्याप्तोऽहं गदापाणिर्हन्तुं प्राणान् रणे तव । त्रयाणामपि लोकानां पाशहस्त इवान्तकः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘मैं अकेला ही पाशधारी यमराजकी भाँति गदा हाथमें लेकर रणभूमिमें तुम्हारे और तीनों लोकोंके भी प्राण लेनेकी शक्ति रखता हूँ ॥ २२ ॥
कामं बह्वपि वक्तव्यं त्वयि वक्ष्यामि न त्वहम् । अस्तं प्राप्नोति सविता युद्धविघ्नस्ततो भवेत् ॥ २३ ॥
भावार्थ
यद्यपि तुम्हारे विषयमें मैं इच्छानुसार बहुत कुछ कह सकता हूँ तथापि इस समय कुछ नहीं कहूँगा; क्योंकि सूर्यदेव अस्ताचलको जा रहे हैं, अतः युद्धमें विघ्न पड़ जायगा ॥ २३ ॥
चतुर्दश सहस्राणि राक्षसानां हतानि ते । त्वद्विनाशात् करोम्यद्य तेषामश्रुप्रमार्जनम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘तुमने चौदह हजार राक्षसोंका संहार किया है, अतः आज तुम्हारा भी विनाश करके मैं उन सबके आँसू पोछूँगा— उनकी मौतका बदला चुकाऊँगा’ ॥ २४ ॥
इत्युक्त्वा परमक्रुद्धः स गदां परमाङ्गदाम् । खरश्चिक्षेप रामाय प्रदीप्तामशनिं यथा ॥ २५ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए खरने उत्तम वलय ( कड़े ) से विभूषित तथा प्रज्वलित वज्रके समान भयंकर गदाको श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर चलाया ॥ २५ ॥
खरबाहुप्रमुक्ता सा प्रदीप्ता महती गदा । भस्म वृक्षांश्च गुल्मांश्च कृत्वागात् तत्समीपतः ॥ २६ ॥
भावार्थ
खरके हाथोंसे छूटी हुई वह दीप्तिमान् विशाल गदा वृक्षों और लताओंको भस्म करके उनके समीप जा पहुँची ॥ २६ ॥
तामापतन्तीं महतीं मृत्युपाशोपमां गदाम् । अन्तरिक्षगतां रामश्चिच्छेद बहुधा शरैः ॥ २७ ॥
भावार्थ
मृत्युके पाशकी भाँति उस विशाल गदाको अपने ऊपर आती देख श्रीरामचन्द्रजीने अनेक बाण मारकर आकाशमें ही उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ २७ ॥
सा विशीर्णा शरैर्भिन्ना पपात धरणीतले । गदा मन्त्रौषधिबलैर्व्यालीव विनिपातिता ॥ २८ ॥
भावार्थ
बाणोंसे विदीर्ण एवं चूर-चूर होकर वह गदा पृथ्वीपर गिर पड़ी, मानो कोई सर्पिणी मन्त्र और ओषधियोंके बलसे गिरायी गयी हो ॥ २८ ॥
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