अरण्यकाण्ड, सर्ग 26
दूषणस्तु स्वकं सैन्यं हन्यमानं विलोक्य च। संदिदेश महाबाहुर्भीमवेगान् दुरासदान् ॥ १ ॥ राक्षसान् पञ्चसाहस्रान् समरेष्वनिवर्तिनः।
भावार्थ
महाबाहु दूषणने जब देखा कि मेरी सेना बुरी तरहसे मारी जा रही है, तब उसने युद्धसे पीछे पैर न हटानेवाले भयंकर वेगशाली पाँच हजार राक्षसोंको, जिन्हें जीतना बड़ा ही कठिन था, आगे बढ़नेकी आज्ञा दी ॥ १½ ॥
ते शूलैः पट्टिशैः खड्गैः शिलावर्षैर्द्रुमैरपि ॥ २ ॥ शरवर्षैरविच्छिन्नं ववर्षुस्तं समन्ततः।
भावार्थ
वे श्रीरामपर चारों ओरसे शूल, पट्टिश, तलवार, पत्थर, वृक्ष और बाणोंकी लगातार वर्षा करने लगे ॥ २½ ॥
तद् द्रुमाणां शिलानां च वर्षं प्राणहरं महत् ॥ ३ ॥ प्रतिजग्राह धर्मात्मा राघवस्तीक्ष्णसायकैः।
भावार्थ
यह देख धर्मात्मा श्रीरघुनाथजीने वृक्षों और शिलाओंकी उस प्राणहारिणी महावृष्टिको अपने तीखे सायकोंद्वारा रोका ॥ ३½ ॥
प्रतिगृह्य च तद् वर्षं निमीलित इवर्षभः ॥ ४ ॥ रामः क्रोधं परं लेभे वधार्थं सर्वरक्षसाम्।
भावार्थ
उस सारी वर्षाको रोककर आँख मूँदे हुए साँड़की भाँति अविचल भावसे खड़े हुए श्रीरामने समस्त राक्षसोंके वधके लिये महान् क्रोध धारण किया ॥ ४½ ॥
ततः क्रोधसमाविष्टः प्रदीप्त इव तेजसा ॥ ५ ॥ शरैरभ्यकिरत् सैन्यं सर्वतः सहदूषणम्।
भावार्थ
क्रोधसे युक्त और तेजसे उद्दीप्त हुए श्रीरामने दूषणसहित सारी राक्षस-सेनापर चारों ओरसे बाणकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ५½ ॥
ततः सेनापतिः क्रुद्धो दूषणः शत्रुदूषणः ॥ ६ ॥ शरैरशनिकल्पैस्तं राघवं समवारयत्।
भावार्थ
इससे शत्रुदूषण सेनापति दूषणको बड़ा क्रोध हुआ और उसने वज्रके समान बाणोंसे श्रीरामचन्द्रजीको रोका ॥ ६½ ॥
ततो रामः सुसंक्रुद्धः क्षुरेणास्य महद् धनुः ॥ ७ ॥ चिच्छेद समरे वीरश्चतुर्भिश्चतुरो हयान्। हत्वा चाश्वाञ्शरैस्तीक्ष्णैरर्धचन्द्रेण सारथेः ॥ ८ ॥ शिरो जहार तद्रक्षस्त्रिभिर्विव्याध वक्षसि।
भावार्थ
तब अत्यन्त कुपित हुए वीर श्रीरामने समराङ्गणमें क्षुरनामक बाणसे दूषणके विशाल धनुषको काट डाला और चार तीखे सायकोंसे उसके चारों घोड़ोंको मौतके घाट उतारकर एक अर्धचन्द्राकार बाणसे सारथिका भी सिर उड़ा दिया तथा तीन बाणोंसे उस राक्षसकी भी छातीमें चोट पहुँचायी ॥ ७-८½ ॥
स चिच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः ॥ ९ ॥ जग्राह गिरिशृङ्गाभं परिघं रोमहर्षणम्। वेष्टितं काञ्चनैः पट्टैर्देवसैन्याभिमर्दनम् ॥ १० ॥
भावार्थ
धनुष कट जाने और घोड़ों तथा सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुए दूषणने पर्वतशिखरके समान एक रोमाञ्चकारी परिघ हाथमें लिया, जिसके ऊपर सोनेके पत्र मढ़े गये थे। वह परिघ देवताओंकी सेनाको भी कुचल डालनेवाला था ॥ ९-१० ॥
आयसैः शङ्कुभिस्तीक्ष्णैः कीर्णं परवसोक्षितम्। वज्राशनिसमस्पर्शं परगोपुरदारणम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
उसपर चारों ओरसे लोहेकी तीखी कीलें लगी हुई थीं। वह शत्रुओंकी चर्बीसे लिपटा हुआ था। उसका स्पर्श हीरे तथा वज्रके समान कठोर एवं असह्य था। वह शत्रुओंके नगरद्वारको विदीर्ण कर डालनेमें समर्थ था ॥ ११ ॥
तं महोरगसंकाशं प्रगृह्य परिघं रणे। दूषणोऽभ्यपतद् रामं क्रूरकर्मा निशाचरः ॥ १२ ॥
भावार्थ
रणभूमिमें बहुत बड़े सर्पके समान भयंकर उस परिघको हाथमें लेकर वह क्रूरकर्मा निशाचर दूषण श्रीरामपर टूट पड़ा ॥ १२ ॥
तस्याभिपतमानस्य दूषणस्य च राघवः। द्वाभ्यां शराभ्यां चिच्छेद सहस्ताभरणौ भुजौ ॥ १३ ॥
भावार्थ
उसे अपने ऊपर आक्रमण करते देख श्रीरामचन्द्रजीने दो बाणोंसे आभूषणोंसहित उसकी दोनों भुजाएँ काट डालीं ॥ १३ ॥
भ्रष्टस्तस्य महाकायः पपात रणमूर्धनि। परिघश्छिन्नहस्तस्य शक्रध्वज इवाग्रतः ॥ १४ ॥
भावार्थ
युद्धके मुहानेपर जिसकी दोनों भुजाएँ कट गयी थीं, उस दूषणके हाथसे खिसककर वह विशालकाय परिघ इन्द्रध्वजके समान सामने गिर पड़ा ॥ १४ ॥
कराभ्यां च विकीर्णाभ्यां पपात भुवि दूषणः। विषाणाभ्यां विशीर्णाभ्यां मनस्वीव महागजः ॥ १५ ॥
भावार्थ
जैसे दोनों दाँतोंके उखाड़ लिये जानेपर महान् मनस्वी गजराज उनके साथ ही धराशायी हो जाता है, उसी प्रकार कटकर गिरी हुई अपनी भुजाओंके साथ ही दूषण भी पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १५ ॥
दृष्ट्वा तं पतितं भूमौ दूषणं निहतं रणे । साधु साध्विति काकुत्स्थं सर्वभूतान्यपूजयन् ॥ १६ ॥
भावार्थ
रणभूमिमें मारे गये दूषणको धराशायी हुआ देख समस्त प्राणियोंने ‘साधु-साधु’ कहकर भगवान् श्रीरामकी प्रशंसा की ॥१६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धास्त्रयः सेनाग्रयायिनः । संहत्याभ्यद्रवन् रामं मृत्युपाशावपाशिताः ॥ १७ ॥ महाकपालः स्थूलाक्षः प्रमाथी च महाबलः ।
भावार्थ
इसी समय सेनाके आगे चलनेवाले महाकपाल, स्थूलाक्ष और महाबली प्रमाथी—ये तीन राक्षस कुपित हो मौतके फंदेमें फँसकर संगठितरूपसे श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर टूट पड़े ॥ १७½ ॥
महाकपालो विपुलं शूलमुद्यम्य राक्षसः ॥ १८ ॥ स्थूलाक्षः पट्टिशं गृह्य प्रमाथी च परश्वधम् ।
भावार्थ
राक्षस महाकपालने एक विशाल शूल उठाया, स्थूलाक्षने पट्टिश हाथमें लिया और प्रमाथीने फरसा सँभालकर आक्रमण किया ॥ १८½ ॥
दृष्ट्वावपततस्तांस्तु राघवः सायकैः शितैः ॥ १९ ॥ तीक्ष्णाग्रैः प्रतिजग्राह सम्प्राप्तानतिथीनिव ।
भावार्थ
उन तीनोंको अपनी ओर आते देख भगवान् श्रीरामने तीखे अग्रभागवाले पैने सायकोंद्वारा द्वारपर आये हुए अतिथियोंके समान उनका स्वागत किया ॥ १९½ ॥
महाकपालस्य शिरश्चिच्छेद रघुनन्दनः ॥ २० ॥ असंख्येयैस्तु बाणौघैः प्रममाथ प्रमाथिनम् । स्थूलाक्षस्याक्षिणी स्थूले पूरयामास सायकैः ॥ २१ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनन्दनने महाकपालका सिर एवं कपाल उड़ा दिया । प्रमाथीको असंख्य बाणसमूहोंसे मथ डाला और स्थूलाक्षकी स्थूल आँखोंको सायकोंसे भर दिया ॥ २०-२१ ॥
स पपात हतो भूमौ विटपीव महाद्रुमः । दूषणस्यानुगान् पञ्चसाहस्रान् कुपितः क्षणात् ॥ २२ ॥ हत्वा तु पञ्चसाहस्रैरनयद् यमसादनम् ।
भावार्थ
तीनों अग्रगामी सैनिकोंका वह समूह अनेक शाखावाले विशाल वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा । तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने कुपित हो दूषणके अनुयायी पाँच हजार राक्षसोंको उतने ही बाणोंका निशाना बनाकर क्षणभरमें यमलोक पहुँचा दिया ॥ २२½ ॥
दूषणं निहतं श्रुत्वा तस्य चैव पदानुगान् ॥ २३ ॥ व्यादिदेश खरः क्रुद्धः सेनाध्यक्षान् महाबलान् । अयं विनिहतः संख्ये दूषणः सपदानुगः ॥ २४ ॥ महत्या सेनया सार्धं युद्ध्वा रामं कुमानुषम् । शस्त्रैर्नानाविधाकारैर्हनध्वं सर्वराक्षसाः ॥ २५ ॥
भावार्थ
दूषण और उसके अनुयायी मारे गये—यह सुनकर खरको बड़ा क्रोध हुआ । उसने अपने महाबली सेनापतियोंको आज्ञा दी—‘वीरो ! यह दूषण अपने सेवकोंसहित युद्धमें मार डाला गया । अतः अब तुम सभी राक्षस बहुत बड़ी सेनाके साथ धावा करके इस दुष्ट मनुष्य रामके साथ युद्ध करो और नाना प्रकारके शस्त्रोंद्वारा इसका वध कर डालो’ ॥ २३–२५ ॥
एवमुक्त्वा खरः क्रुद्धो राममेवाभिदुद्रुवे । श्येनगामी पृथुग्रीवो यज्ञशत्रुर्विहंगमः ॥ २६ ॥ दुर्जयः करवीराक्षः परुषः कालकार्मुकः । हेममाली महामाली सर्पास्यो रुधिराशनः ॥ २७ ॥ द्वादशैते महावीर्या बलाध्यक्षाः ससैनिकाः । राममेवाभ्यधावन्त विसृजन्तः शरोत्तमान् ॥ २८ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर कुपित हुए खरने श्रीरामपर ही धावा किया । साथ ही श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, त्रिहङ्गम, दुर्जय,करवीराक्ष,परुष, कालकार्मुक,हेममाली, महामाली, सर्पास्य तथा रुधिराशन—ये बारह महापराक्रमी सेनापति भी उत्तम बाणोंकी वर्षा करते हुए अपने सैनिकोंके साथ श्रीरामपर ही टूट पड़े ॥ २६–२८ ॥
ततः पावकसंकाशैर्हेमवज्रविभूषितैः । जघान शेषं तेजस्वी तस्य सैन्यस्य सायकैः ॥ २९ ॥
भावार्थ
तब तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने सोने और हीरोंसे विभूषित अग्नितुल्य तेजस्वी सायकोंद्वारा उस सेनाके बचे खुचे सिपाहियोंका भी संहार कर डाला ॥ २९ ॥
ते रुक्मपुङ्खा विशिखाः सधूमा इव पावकाः । निजघ्नुस्तानि रक्षांसि वज्रा इव महाद्रुमान् ॥ ३० ॥ रक्षसां तु शतं रामः शतेनैकेन कर्णिना । सहस्रं तु सहस्रेण जघान रणमूर्धनि ॥ ३१ ॥
भावार्थ
जैसे वज्र बड़े-बड़े वृक्षोंको नष्ट कर डालते हैं, उसी प्रकार धूमयुक्त अग्निके समान प्रतीत होनेवाले उन सोनेकी पाँखवाले बाणोंने उन समस्त राक्षसोंका विनाश कर डाला ॥ उस युद्धके मुहानेपर श्रीरामने कर्णिनामक सौ बाणोंसे सौ राक्षसोंका और सहस्र बाणोंसे सहस्र निशाचरोंका एक साथ ही संहार कर डाला ॥ ३१ ॥
तैर्भिन्नवर्माभरणाश्छिन्नभिन्नशरासनाः । निपेतुः शोणितादिग्धा धरण्यां रजनीचराः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
उन बाणोंसे निशाचरोंके कवच, आभूषण और धनुष छिन्न-भिन्न हो गये तथा वे खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३२ ॥
तैर्मुक्तकेशैः समरे पतितैः शोणितोक्षितैः । विस्तीर्णा वसुधा कृत्स्ना महावेदिः कुशैरिव ॥ ३३ ॥
भावार्थ
कुशोंसे ढकी हुई विशाल वेदीके समान युद्धमें लोहू-लुहान होकर गिरे हुए खुले केशवाले राक्षसोंसे सारी रणभूमि पट गयी ॥ ३३ ॥
तत्क्षणे तु महाघोरं वनं निहतराक्षसम् । बभूव निरयप्रख्यं मांसशोणितकर्दमम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
राक्षसोंके मारे जानेसे उस समय वहाँ रक्त और मांसकी कीचड़ जम गयी; अतः वह महाभयंकर वन नरकके समान प्रतीत होने लगा ॥ ३४ ॥
चतुर्दशसहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम् । हतान्येकेन रामेण मानुषेण पदातिना ॥ ३५ ॥
भावार्थ
मानवरूपधारी श्रीराम अकेले और पैदल थे, तो भी उन्होंने भयानक कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसोंको तत्काल मौतके घाट उतार दिया ॥ ३५ ॥
तस्य सैन्यस्य सर्वस्य खरः शेषो महारथः । राक्षसस्त्रिशिराश्चैव रामश्च रिपुसूदनः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
उस समूची सेनामें केवल महारथी खर और त्रिशिरा-ये दो ही राक्षस बच रहे । उधर शत्रुसंहारक भगवान् श्रीराम ज्यों-के-त्यों युद्धके लिये डटे रहे ॥ ३६ ॥
शेषा हता महावीर्या राक्षसा रणमूर्धनि । घोरा दुर्विषहाः सर्वे लक्ष्मणस्याग्रजेन ते ॥ ३७ ॥
भावार्थ
उपर्युक्त दो राक्षसोंको छोड़कर शेष सभी निशाचर, जो महान् पराक्रमी, भयंकर और दुर्धर्ष थे, युद्धके मुहानेपर लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीरामके हाथों मारे गये ॥ ३७ ॥
ततस्तु तद्भीमबलं महाहवे समीक्ष्य रामेण हतं बलीयसा । रथेन रामं महता खरस्ततः समासदादिन्द्र इवोद्यताशनिः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर महासमरमें महाबली श्रीरामके द्वारा अपनी भयंकर सेनाको मारी गयी देख खर एक विशाल रथके द्वारा श्रीरामका सामना करनेके लिये आया, मानो वज्रधारी इन्द्रने किसी शत्रुपर आक्रमण किया हो ॥ ३८ ॥
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