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अरण्यकाण्ड, सर्ग 25

अवष्टब्धधनुं रामं क्रुद्धं तं रिपुघातिनम् । ददर्शाश्रममागम्य खरः सह पुरःसरैः ॥ १ ॥ तं दृष्ट्वा सगुणं चापमुद्यम्य खरनिःस्वनम् । रामस्याभिमुखं सूतं चोद्यतामित्यचोदयत् ॥ २ ॥

भावार्थ

खरने अपने अग्रगामी सैनिकोंके साथ आश्रमके पास पहुँचकर क्रोधमें भरे हुए शत्रुघाती श्रीरामको देखा, जो हाथमें धनुष लिये खड़े थे । उन्हें देखते ही अपने तीव्र टंकार करनेवाले प्रत्यञ्चासहित धनुषको उठाकर सूतको आज्ञा दी—‘मेरा रथ रामके सामने ले चलो’ ॥ १-२ ॥

स खरस्याज्ञया सूतस्तुरगान् समचोदयत् । यत्र रामो महाबाहुरेको धुन्वन् धनुः स्थितः ॥ ३ ॥

भावार्थ

खरकी आज्ञासे सारथिने घोड़ोंको उधर ही बढ़ाया, जहाँ महाबाहु श्रीराम अकेले खड़े होकर अपने धनुषकी टंकार कर रहे थे ॥ ३ ॥

तं तु निष्पतितं दृष्ट्वा सर्वतो रजनीचराः । मुञ्चमाना महानादं सचिवाः पर्यवारयन् ॥ ४ ॥

भावार्थ

खरको श्रीरामके समीप पहुँचा देख श्येनगामी आदि उसके निशाचर मन्त्री भी बड़े जोरसे सिंहनाद करके उसे चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ४ ॥

स तेषां यातुधानानां मध्ये रथगतः खरः । बभूव मध्ये ताराणां लोहिताङ्ग इवोदितः ॥ ५ ॥

भावार्थ

उन राक्षसोंके बीचमें रथपर बैठा हुआ खर तारोंके मध्यभागमें उगे हुए मङ्गलकी भाँति शोभा पा रहा था ॥ ५ ॥

ततः शरसहस्रेण राममप्रतिमौजसम् । अर्दयित्वा महानादं ननाद समरे खरः ॥ ६ ॥

भावार्थ

उस समय खरने समराङ्गणमें सहस्रों बाणोंद्वारा अप्रतिम बलशाली श्रीरामको पीड़ित-सा करके बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ६ ॥

ततस्तं भीमधन्वानं क्रुद्धाः सर्वे निशाचराः । रामं नानाविधैः शस्त्रैरभ्यवर्षन्त दुर्जयम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए समस्त निशाचर भयंकर धनुष धारण करनेवाले दुर्जय वीर श्रीरामपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे ॥ ७ ॥

मुद्गरैरायसैः शूलैः प्रासैः खड्गैः परश्वधैः । राक्षसाः समरे शूरं निजघ्नू रोषतत्पराः ॥ ८ ॥ ते बलाहकसंकाशा महाकाया महाबलाः । अभ्यधावन्त काकुत्स्थं रथैर्वाजिभिरेव च ॥ ९ ॥ गजैः पर्वतकूटाभै रामं युद्धे जिघांसवः ।

भावार्थ

उस समराङ्गणमें रुष्ट हुए राक्षसोंने शूरवीर श्रीरामपर लोहेके मुद्गरों,शूलों,प्रासों, खड्गों और फरसोंद्वारा प्रहार किया ॥ वे मेघोंके समान काले, विशालकाय और महाबली निशाचर रथों, घोड़ों और पर्वतशिखरके समान गजराजोंद्वारा ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामपर चारों ओरसे टूट पड़े । वे युद्धमें उन्हें मार डालना चाहते थे ॥ ९½ ॥

ते रामे शरवर्षाणि व्यसृजन् रक्षसां गणाः ॥ १० ॥ शैलेन्द्रमिव धाराभिर्वर्षमाणा महाघनाः ।

भावार्थ

जैसे बड़े-बड़े मेघ गिरिराजपर जलकी धाराएँ बरसा रहे हों, उसी प्रकार वे राक्षसगण श्रीरामपर बाणोंकी वृष्टि कर रहे थे ॥ १०½ ॥

सर्वैः परिवृतो रामो राक्षसैः क्रूरदर्शनैः ॥ ११ ॥ तिथिष्विव महादेवो वृतः पारिषदां गणैः ।

भावार्थ

क्रूरतापूर्ण दृष्टिसे देखनेवाले उन सभी राक्षसोंने श्रीरामको उसी प्रकार घेर रक्खा था, जैसे प्रदोषसंज्ञक तिथियोंमें भगवान् शिवके पार्षदगण उन्हें घेरे रहते हैं ॥ ११½ ॥

तानि मुक्तानि शस्त्राणि यातुधानैः स राघवः ॥ १२ ॥ प्रतिजग्राह विशिखैर्नद्योघानिव सागरः ।

भावार्थ

श्रीरघुनाथजीने राक्षसोंके छोड़े हुए उन अस्त्र-शस्त्रोंको अपने बाणोंद्वारा उसी तरह ग्रस लिया, जैसे समुद्र नदियोंके प्रवाहको आत्मसात् कर लेता है ॥ १२½ ॥

स तैः प्रहरणैर्घोरैर्भिन्नगात्रो न विव्यथे ॥ १३ ॥ रामः प्रदीप्तैर्बहुभिर्वज्रैरिव महाचलः । स विद्धः क्षतजादिग्धः सर्वगात्रेषु राघवः ॥ १४ ॥ बभूव रामः संध्याभ्रैर्दिवाकर इवावृतः ।

भावार्थ

उन राक्षसोंके घोर अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहारसे यद्यपि श्रीरामका शरीर क्षत-विक्षत हो गया था तो भी वे व्यथित या विचलित नहीं हुए, जैसे बहुसंख्यक दीप्तिमान् वज्रोंके आघात सहकर भी महान् पर्वत अडिग बना रहता है ॥ श्रीरघुनाथजीके सारे अङ्गोंमें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे घाव हो गया था । वे लहू-लुहान हो रहे थे, अतः उस समय संध्याकालके बादलोंसे घिरे हुए सूर्यदेवके समान शोभा पा रहे थे ॥ १४½ ॥

विषेदुर्देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ १५ ॥ पकं सहस्रैर्बहुभिस्तदा दृष्ट्वा समावृतम् ।

भावार्थ

श्रीराम अकेले थे । उस समय उन्हें अनेक सहस्र शत्रुओंसे घिरा हुआ देख देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षि विषादमें डूब गये ॥ १५½ ॥

ततो रामस्तु संक्रुद्धो मण्डलीकृतकार्मुकः ॥ १६ ॥ ससर्ज निशितान् बाणाञ्छतशोऽथ सहस्रशः । दुरावारान् दुर्विषहान् कालपाशोपमान् रणे ॥ १७ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त कुपित हो अपने धनुषको इतना खींचा कि वह गोलाकार दिखायी देने लगा । फिर तो वे उस धनुषसे रणभूमिमें सैकड़ों, हजारों ऐसे पैने बाण छोड़ने लगे, जिन्हें रोकना सर्वथा कठिन था, जो दुःसह होनेके साथ ही कालपाशके समान भयंकर थे ॥ १६-१७ ॥

मुमोच लीलया कङ्कपत्रान् काञ्चनभूषणान् । ते शराः शत्रुसैन्येषु मुक्ता रामेण लीलया ॥ १८ ॥ आददू रक्षसां प्राणान् पाशाः कालकृता इव ।

भावार्थ

उन्होंने खेल-खेलमें ही चीलके परोंसे युक्त असंख्य सुवर्णभूषित बाण छोड़े । शत्रुके सैनिकोंपर श्रीरामद्वारा लीलापूर्वक छोड़े गये वे बाण कालपाशके समान राक्षसोंके प्राण लेने लगे ॥ १८½ ॥

भित्त्वा राक्षसदेहांस्तांस्ते शरा रुधिराप्लुताः ॥ १९ ॥ अन्तरिक्षगता रेजुर्दीप्ताग्निसमतेजसः ।

भावार्थ

राक्षसोंके शरीरोंको छेदकर खूनमें डूबे हुए वे बाण जब आकाशमें पहुँचते, तब प्रज्वलित अग्निके समान तेजसे प्रकाशित होने लगते थे ॥ १९½ ॥

असंख्येयास्तु रामस्य सायकाश्चापमण्डलात् ॥ २० ॥ विनिष्पेतुरतीवोग्रा रक्षःप्राणापहारिणः ।

भावार्थ

श्रीरामके मण्डलाकार धनुषसे अत्यन्त भयंकर और राक्षसोंके प्राण लेनेवाले असंख्य बाण छूटने लगे ॥ २०½ ॥

तैर्धनूंषि ध्वजाग्राणि चर्माणि कवचानि च ॥ २१ ॥ बाहून् सहस्ताभरणानूरून् करिकरोपमान् । चिच्छेद रामः समरे शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २२ ॥

भावार्थ

उन बाणोंद्वारा श्रीरामने समराङ्गणमें शत्रुओंके सैकड़ों-हजारों धनुष, ध्वजाओंके अग्रभाग, ढाल, कवच, आभूषणोंसहित भुजाएँ तथा हाथीकी सूँड़के समान जाँघें काट डालीं ॥ २१-२२ ॥

हयान् काञ्चनसंनाहान् रथयुक्[UNCLEAR]न् ससारथीन् । गजांश्च सगजारोहान् सहयान् सादिनस्तदा ॥ २३ ॥ चिच्छिदुर्बिभिदुश्चैव रामबाणा गुणच्युताः । पदातीन् समरे हत्वा ह्यनयद् यमसादनम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

प्रत्यञ्चासे छूटे हुए श्रीरामके बाणोंने उस समय सोनेके साज-बाज एवं कवचसे सजे और रथोंमें जुते हुए घोड़ों, सारथियों, हाथियों, हाथीसवारों, घोड़ों और घुड़सवारों-को भी छिन्न-भिन्न कर डाला । इसी प्रकार श्रीरामने समरभूमिमें पैदल सैनिकोंको भी मारकर यमलोक पहुँचा दिया ॥ २३-२४ ॥

ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभिः । भीममार्तस्वरं चक्रुश्छिद्यमाना निशाचराः ॥ २५ ॥

भावार्थ

उस समय उनके नालीक, नाराच और तीखे अग्रभागवाले विकर्णी नामक बाणोंद्वारा छिन्न-भिन्न होते हुए निशाचर भयंकर आर्तनाद करने लगे ॥ २५ ॥

तत्सैन्यं विविधैर्बाणैरर्दितं मर्मभेदिभिः । न रामेण सुखं लेभे शुष्कं वनमिवाग्निना ॥ २६ ॥

भावार्थ

श्रीरामके चलाये हुए नाना प्रकारके मर्मभेदी बाणोंद्वारा पीड़ित हुई वह राक्षससेना आगसे जलते हुए सूखे वनकी भाँति सुख-शान्ति नहीं पाती थी ॥ २६ ॥

केचिद् भीमबलाः शूराः प्रासाञ्शूलान् परश्वधान् । चिक्षिपुः परमक्रुद्धा रामाय रजनीचराः ॥ २७ ॥ तेषां बाणैर्महाबाहुः शस्त्राण्यावार्य वीर्यवान् । जहार समरे प्राणांश्चिच्छेद च शिरोधरान् ॥ २८ ॥

भावार्थ

कुछ भयंकर बलशाली शूरवीर निशाचर अत्यन्त कुपित हो श्रीरामपर प्रासों, शूलों और फरसोंका प्रहार करने लगे ॥ परंतु पराक्रमी महाबाहु श्रीरामने रणभूमिमें अपने बाणोंद्वारा उनके उन अस्त्र-शस्त्रोंको रोककर उनके गले काट डाले और प्राण हर लिये ॥ २८ ॥

ते छिन्नशिरसः पेतुश्छिन्नचर्मशरासनाः । सुपर्णवातविक्षिप्ता जगत्यां पादपा यथा ॥ २९ ॥ अवशिष्टाश्च ये तत्र विषण्णास्ते निशाचराः । खरमेवाभ्यधावन्त शरणार्थं शराहताः ॥ ३० ॥

भावार्थ

सिर, ढाल और धनुषके कट जानेपर वे निशाचर गरुड़के पंखकी हवासे टूटकर गिरनेवाले नन्दनवनके वृक्षोंकी भाँति धराशायी हो गये । जो बचे थे, वे राक्षस भी श्रीरामके बाणोंसे आहत हो विषादमें डूब गये और अपनी रक्षाके लिये खरके पास ही दौड़े गये ॥ २९-३० ॥

तान् सर्वान् धनुरादाय समाश्वास्य च दूषणः । अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धः क्रुद्धं क्रुद्ध इवान्तकः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

परंतु बीचमें दूषणने धनुष लेकर उन सबको आश्वासन दिया और अत्यन्त कुपित हो रोषमें भरे हुए यमराजकी भाँति वह क्रुद्ध होकर युद्धके लिये डटे हुए श्रीरामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा ॥ ३१ ॥

निवृत्तास्तु पुनः सर्वे दूषणाश्रयनिर्भयाः । राममेवाभ्यधावन्त सालतालशिलायुधाः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

दूषणका सहारा मिल जानेसे निर्भय हो वे सब-के-सब फिर लौट आये और साखू, ताड़ आदिके वृक्ष तथा पत्थर लेकर पुनः श्रीरामपर ही टूट पड़े ॥ ३२ ॥

शूलमुद्गरहस्ताश्च पाशहस्ता महाबलाः । सृजन्तः शरवर्षाणि शस्त्रवर्षाणि संयुगे ॥ ३३ ॥

भावार्थ

उस युद्धस्थलमें अपने हाथोंमें शूल, मुद्गर और पाश धारण किये वे महाबली निशाचर बाणों तथा अन्य अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३३ ॥

द्रुमवर्षाणि मुञ्चन्तः शिलावर्षाणि राक्षसाः । तद् बभूवाद्भुतं युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥ ३४ ॥ रामस्यास्य महाघोरं पुनस्तेषां च रक्षसाम् ।

भावार्थ

कोई राक्षस वृक्षोंकी वर्षा करने लगे तो कोई पत्थरोंकी । उस समय इन श्रीराम और उन निशाचरोंमें पुनः बड़ा ही अद्भुत, महाभयंकर, घमासान और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा ॥ ३४½ ॥

ते समन्तादभिक्रुद्धा राघवं पुनरार्दयन् ॥ ३५ ॥ ततः सर्वा दिशो दृष्ट्वा प्रदिशश्च समावृताः । राक्षसैः सर्वतः प्राप्तैः शरवर्षाभिरावृतः ॥ ३६ ॥ स कृत्वा भैरवं नादमस्त्रं परमभास्वरम् । समयोजयद् गान्धर्वं राक्षसेषु महाबलः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

वे राक्षस कुपित होकर चारों ओरसे पुनः श्रीरामचन्द्रजीको पीड़ित करने लगे । तब सब ओरसे आये हुए राक्षसोंसे सम्पूर्ण दिशाओं और उपदिशाओंको घिरी हुई देख बाण-वर्षासे आच्छादित हुए महाबली श्रीरामने भैरव-नाद करके उन राक्षसोंपर परम तेजस्वी गान्धर्व नामक अस्त्रका प्रयोग किया ॥ ३५–३७ ॥

ततः शरसहस्राणि निर्ययुश्चापमण्डलात् । सर्वा दश दिशो बाणैरापूर्यन्त समागतैः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

फिर तो उनके मण्डलाकार धनुषसे सहस्रों बाण छूटने लगे । उन बाणोंसे दसों दिशाएँ पूर्णतः आच्छादित हो गयीं ॥ ३८ ॥

नाददानं शरान् घोरान् विमुञ्चन्तं शरोत्तमान् । विकर्षमाणं पश्यन्ति राक्षसास्ते शरार्दिताः ॥ ३९ ॥

भावार्थ

बाणोंसे पीड़ित राक्षस यह नहीं देख पाते थे कि श्रीरामचन्द्रजी कब भयंकर बाण हाथमें लेते हैं और कब उन उत्तम बाणोंको छोड़ देते हैं । वे केवल उनको धनुष खींचते देखते थे ॥ ३९ ॥

शरान्धकारमाकाशमावृणोत् सदिवाकरम् । बभूवावस्थितो रामः प्रक्षिपन्निव ताञ्छरान् ॥ ४० ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके बाणसमुदायरूपी अन्धकारने सूर्य-सहित सारे आकाशमण्डलको ढक दिया । उस समय श्रीराम उन बाणोंको लगातार छोड़ते हुए एक स्थानपर खड़े थे ॥ ४० ॥

युगपत्पतमानैश्च युगपच्च हतैर्भृशम् । युगपत्पतितैश्चैव विकीर्णा वसुधाभवत् ॥ ४१ ॥

भावार्थ

एक ही समय बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल हो एक साथ ही गिरते और गिरे हुए बहुसंख्यक राक्षसोंकी लाशोंसे वहाँकी भूमि पट गयी ॥ ४१ ॥

निहताः पतिताः क्षीणाश्छिन्ना भिन्ना विदारिताः । तत्र तत्र स्म दृश्यन्ते राक्षसास्ते सहस्रशः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

जहाँ-जहाँ दृष्टि जाती थी, वहीं-वहीं वे हजारों राक्षस मरे- गिरे, क्षीण हुए, कटे-पिटे और विदीर्ण हुए दिखायी देते थे ॥ ४२ ॥

सोष्णीषैरुत्तमाङ्गैश्च साङ्गदैर्बाहुभिस्तथा । ऊरुभिर्बाहुभिश्छिन्नैर्नानारूपैर्विभूषणैः ॥ ४३ ॥ हयैश्च द्विपमुख्यैश्च रथैर्भिन्नैरनेकशः । चामरव्यजनैश्छत्रैर्ध्वजैर्नानाविधैरपि ॥ ४४ ॥ रामेण बाणाभिहतैर्विच्छिन्नैः शूलपट्टिशैः । खड्गैः खण्डीकृतैः प्रासैर्विकीर्णैश्च परश्वधैः ॥ ४५ ॥ चूर्णिताभिः शिलाभिश्च शर्ङ्गैश्चित्रैरनेकशः । विच्छिन्नैः समरे भूमिर्विस्तीर्णाभूद् भयंकरा ॥ ४६ ॥

भावार्थ

वहाँ श्रीरामके बाणोंसे कटे हुए पगड़ियोंसहित मस्तकों, बाजूबंदसहित भुजाओं, जाँघों, बाँहों, भाँति-भाँतिके आभूषणों, घोड़ों, श्रेष्ठ हाथियों, टूटे-फूटे अनेकानेक रथों, चँवरों, व्यजनों, छत्रों, नाना प्रकारकी ध्वजाओं, छिन्न-भिन्न हुए शूलों, पट्टिशों, खण्डित खड्गों, बिखरे प्रासों, फरसों, चूर-चूर हुई शिलाओं तथा टुकड़े-टुकड़े हुए बहुतेरे विचित्र बाणोंसे पटी हुई वह समरभूमि अत्यन्त भयंकर दिखायी देती थी ॥ ४३–४६ ॥

तान् दृष्ट्वा निहतान् सर्वे राक्षसाः परमातुराः । न तत्र चलितुं शक्ता रामं परपुरंजयम् ॥ ४७ ॥

भावार्थ

उन सबको मारा गया देख शेष राक्षस अत्यन्त आतुर हो वहाँ शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले श्रीरामके सम्मुख जानेमें असमर्थ हो गये ॥ ४७ ॥

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