Ramayana.com

अरण्यकाण्ड, सर्ग 24

आश्रमं प्रतियाते तु खरे खरपराक्रमे । तानेवौत्पातिकान् रामः सह भ्रात्रा ददर्श ह ॥ १ ॥

भावार्थ

प्रचण्ड पराक्रमी खर जब श्रीरामके आश्रमकी ओर चला, तब भाईसहित श्रीरामने भी उन्हीं उत्पातसूचक लक्षणोंको देखा ॥ १ ॥

तानुत्पातान् महाघोरान् रामो दृष्ट्वात्यमर्षणः । प्रजानामहितान् दृष्ट्वा वाक्यं लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ २ ॥

भावार्थ

प्रजाके अहितकी सूचना देनेवाले उन महाभयंकर उत्पातोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंके उपद्रवका विचार करके अत्यन्त अमर्षमें भर गये और लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले--॥ २ ॥

इमान् पश्य महाबाहो सर्वभूतापहारिणः । समुत्थितान् महोत्पातान् संहर्तुं सर्वराक्षसान्॥ ३ ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! ये जो बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हो रहे हैं, इनकी ओर दृष्टिपात करो । समस्त भूतोंके संहारकी सूचना देनेवाले ये महान् उत्पात इस समय इन सारे राक्षसोंका संहार करनेके लिये उत्पन्न हुए हैं ॥ ३ ॥

अमी रुधिरधारास्तु विसृजन्ते खरस्वनाः । व्योम्नि मेघा निवर्तन्ते परुषा गर्दभारुणाः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘आकाशमें जो गधोंके समान धूसर वर्णवाले बादल इधर-उधर विचर रहे हैं, ये प्रचण्ड गर्जना करते हुए खूनकी धाराएँ बरसा रहे हैं ॥ ४ ॥

सधूमाश्च शराः सर्वे मम युद्धाभिनन्दिताः । रुक्मपृष्ठानि चापानि विचेष्टन्ते विचक्षण ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘युद्धकुशल लक्ष्मण ! मेरे सारे बाण उत्पातवश उठनेवाले धूमसे सम्बद्ध हो युद्धके लिये मानो आनन्दित हो रहे हैं तथा जिनके पृष्ठभागमें सुवर्ण मढ़ा हुआ है, वे मेरे धनुष भी प्रत्यञ्चासे जुड़ जानेके लिये स्वयं ही चेष्टाशील जान पड़ते हैं ॥ ५ ॥

यादृशा इह कूजन्ति पक्षिणो वनचारिणः । अग्रतो नोऽभयं प्राप्तं संशयो जीवितस्य च ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘यहाँ जैसे-जैसे वनचारी पक्षी बोल रहे हैं, उनसे हमारे लिये भविष्यमें अभयकी और राक्षसोंके लिये प्राणसंकटकी प्राप्ति सूचित हो रही है ॥ ६ ॥

सम्प्रहारस्तु सुमहान् भविष्यति न संशयः । अयमाख्याति मे बाहुः स्फुरमाणो मुहुर्मुहुः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘मेरी यह दाहिनी भुजा बारंबार फड़ककर इस बातकी सूचना देती है कि कुछ ही देरमें बहुत बड़ा युद्ध होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ७ ॥

संनिकर्षे तु नः शूर जयं शत्रोः पराजयम् । सुप्रभं च प्रसन्नं च तव वक्त्रं हि लक्ष्यते ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘शूरवीर लक्ष्मण ! परंतु निकटभविष्यमें ही हमारी विजय और शत्रुकी पराजय होगी; क्योंकि तुम्हारा मुख कान्तिमान् एवं प्रसन्न दिखायी दे रहा है ॥ ८ ॥

उद्यतानां हि युद्धार्थं येषां भवति लक्ष्मण । निष्प्रभं वदनं तेषां भवत्यायुःपरिक्षयः ॥ ९ ॥ रक्षसां नर्दतां घोरः श्रूयतेऽयं महाध्वनिः । आहतानां च भेरीणां राक्षसैः क्रूरकर्मभिः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! युद्धके लिये उद्यत होनेपर जिनका मुख प्रभाहीन ( उदास ) हो जाता है, उनकी आयु नष्ट हो जाती है ॥ ‘गरजते हुए राक्षसोंका यह घोर नाद सुनायी देता है तथा क्रूरकर्मा राक्षसोंद्वारा बजायी गयी भेरियोंकी यह महाभयंकर ध्वनि कानोंमें पड़ रही है ॥ १० ॥

अनागतविधानं तु कर्तव्यं शुभमिच्छता । आपदं शङ्कमानेन पुरुषेण विपश्चिता ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘अपना कल्याण चाहनेवाले विद्वान् पुरुषको उचित है कि आपत्तिकी आशङ्का होनेपर पहलेसे ही उससे बचनेका उपाय कर ले ॥ ११ ॥

तस्माद् गृहीत्वा वैदेहीं शरपाणिर्धनुर्धरः । गुहामाश्रय शैलस्य दुर्गां पादपसंकुलाम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘इसलिये तुम धनुष-बाण धारण करके विदेहकुमारी सीताको साथ ले पर्वतकी उस गुफामें चले जाओ, जो वृक्षोंसे आच्छादित है ॥ १२ ॥

प्रतिकूलितुमिच्छामि न हि वाक्यमिदं त्वया । शापितो मम पादाभ्यां गम्यतां वत्स मा चिरम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘वत्स ! तुम मेरे इस वचनके प्रतिकूल कुछ कहो या करो, यह मैं नहीं चाहता । अपने चरणोंकी शपथ दिलाकर कहता हूँ, शीघ्र चले जाओ ॥ १३ ॥

त्वं हि शूरश्च बलवान् हन्या एतान् न संशयः । स्वयं निहन्तुमिच्छामि सर्वानेव निशाचरान् ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘इसमें संदेह नहीं कि तुम बलवान् और शूरवीर हो तथा इन राक्षसोंका वध कर सकते हो; तथापि मैं स्वयं ही इन निशाचरोंका संहार करना चाहता हूँ ( इसलिये तुम मेरी बात मानकर सीताको सुरक्षित रखनेके लिये इसे गुफामें ले जाओ )’ ॥ १४ ॥

एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः सह सीतया । शरानादाय चापं च गुहां दुर्गां समाश्रयत् ॥ १५ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण धनुष-बाण ले सीताके साथ पर्वतकी दुर्गम गुफामें चले गये ॥ १५ ॥

तस्मिन् प्रविष्टे तु गुहां लक्ष्मणे सह सीतया । हन्त निर्युक्तमित्युक्त्वा रामः कवचमाविशत् ॥ १६ ॥

भावार्थ

सीतासहित लक्ष्मणके गुफाके भीतर चले जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने ‘हर्षकी बात है, लक्ष्मणने शीघ्र मेरी बात मान ली और सीताकी रक्षाका समुचित प्रबन्ध हो गया’ ऐसा कहकर कवच धारण किया ॥ १६ ॥

स तेनाग्निनिकाशेन कवचेन विभूषितः । बभूव रामस्तिमिरे महानग्निरिवोत्थितः ॥ १७ ॥

भावार्थ

प्रज्वलित आगके समान प्रकाशित होनेवाले उस कवचसे विभूषित हो श्रीराम अन्धकारमें प्रकट हुए महान् अग्निदेवके समान शोभा पाने लगे ॥ १७ ॥

स चापमुद्यम्य महच्छरानादाय वीर्यवान् । सम्बभूवास्थितस्तत्र ज्यास्वनैः पूरयन् दिशः ॥ १८ ॥

भावार्थ

पराक्रमी श्रीराम महान् धनुष एवं बाण हाथमें लेकर युद्धके लिये डटकर खड़े हो गये और प्रत्यञ्चाकी टंकारसे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाने लगे ॥ १८ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः । समेयुश्च महात्मानो युद्धदर्शनकाङ्क्षया ॥ १९ ॥

भावार्थ

तदनन्तर श्रीराम और राक्षसोंका युद्ध देखनेकी इच्छासे देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण आदि महात्मा वहाँ एकत्र हो गये ॥ १९ ॥

ऋषयश्च महात्मानो लोके ब्रह्मर्षिसत्तमाः । समेत्य चोचुः सहितास्तेऽन्योन्यं पुण्यकर्मणः ॥ २० ॥ स्वस्ति गोब्राह्मणानां च लोकानां चेति संस्थिताः । जयतां राघवो युद्धे पौलस्त्यान् रजनीचरान् ॥ २१ ॥ चक्रहस्तो यथा युद्धे सर्वानसुरपुंगवान् ।

भावार्थ

इनके सिवा, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध ब्रह्मर्षिशिरोमणि पुण्यकर्मा महात्मा ऋषि हैं, वे सभी वहाँ जुट गये और एक साथ खड़े हो परस्पर मिलकर यों कहने लगे—‘गौओं, ब्राह्मणों और समस्त लोकोंका कल्याण हो । जैसे चक्रधारी भगवान् विष्णु युद्धमें समस्त श्रेष्ठ असुरोंको परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार इस संग्राममें श्रीरामचन्द्रजी पुलस्त्यवंशी निशाचरोंपर विजय प्राप्त करें’ ॥ २०-२१½ ॥

एवमुक्त्वा पुनः प्रोचुरालोक्य च परस्परम् ॥ २२ ॥ चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम् । एकश्च रामो धर्मात्मा कथं युद्धं भविष्यति ॥ २३ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर वे पुनः एक दूसरेकी ओर देखते हुए बोले—‘एक ओर भयंकर कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षस हैं और दूसरी ओर अकेले धर्मात्मा श्रीराम हैं, फिर यह युद्ध कैसे होगा ?’ ॥ २२-२३ ॥

इति राजर्षयः सिद्धाः सगणाश्च द्विजर्षभाः । जातकौतूहलास्तस्थुर्विमानस्थाश्च देवताः ॥ २४ ॥

भावार्थ

ऐसी बातें करते हुए राजर्षि, सिद्ध, विद्याधर आदि देवयोनिगणसहित श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि तथा विमानपर स्थित हुए देवता कौतूहलवश वहाँ खड़े हो गये ॥ २४ ॥

आविष्टं तेजसा रामं संग्रामशिरसि स्थितम् । दृष्ट्वा सर्वाणि भूतानि भयाद् विव्यथिरे तदा ॥ २५ ॥

भावार्थ

युद्धके मुहानेपर वैष्णव तेजसे आविष्ट हुए श्रीरामको खड़ा देख उस समय सब प्राणी ( उनके प्रभावको न जाननेके कारण ) भयसे व्यथित हो उठे ॥ २५ ॥

रूपमप्रतिमं तस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः । बभूव रूपं क्रुद्धस्य रुद्रस्येव महात्मनः ॥ २६ ॥

भावार्थ

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले तथा रोषमें भरे हुए महात्मा श्रीरामका वह रूप कुपित हुए रुद्रदेवके समान तुलनारहित प्रतीत होता था ॥ २६ ॥

इति सम्भाष्यमाणे तु देवगन्धर्वचारणैः । ततो गम्भीरनिर्ह्रादं घोरचर्मायुधध्वजम् ॥ २७ ॥ अनीकं यातुधानानां समन्तात् प्रत्यपद्यत ।

भावार्थ

जब देवता, गन्धर्व और चारण पूर्वोक्तरूपसे श्रीरामकी मङ्गलकामना कर रहे थे, उसी समय भयंकर ढाल-तलवार आदि आयुधों और ध्वजाओंसे उपलक्षित होनेवाली निशाचरोंकी वह सेना गम्भीर गर्जना करती हुई चारों ओरसे श्रीरामजीके पास आ पहुँची ॥ २७½ ॥

वीरालापान् विसृजतामन्योन्यमभिगच्छताम् ॥ २८ ॥ चापानि विस्फारयतां जृम्भतां चाप्यभीक्ष्णशः । विप्रघुष्टस्वनानां च दुन्दुभींश्चापि निघ्नताम् ॥ २९ ॥ तेषां सुतुमुलः शब्दः पूरयामास तद् वनम् । तेन शब्देन वित्रस्ताः श्वापदा वनचारिणः ॥ ३० ॥ दुद्रुवुर्यत्र निःशब्दं पृष्ठतो नावलोकयन् ।

भावार्थ

वे राक्षस-सैनिक वीरोचित वार्तालाप करते, युद्धका ढंग बतानेके लिये एक-दूसरेके सामने जाते, धनुषोंको खींचकर उनकी टंकार फैलाते, बारंबार मदमत्त होकर उछलते, जोर-जोरसे गर्जना करते और नगाड़े पीटते थे । उनका वह अत्यन्त तुमुल नाद उस वनमें सब ओर गूँजने लगा ॥ उस शब्दसे डरे हुए वनचारी हिंसक जन्तु उस वनमें गये, जहाँ किसी प्रकारका कोलाहल नहीं सुनायी पड़ता था । वे वनजन्तु भयके मारे पीछे फिरकर देखते भी नहीं थे ॥ ३०½ ॥

तच्चानीकं महावेगं रामं समनुवर्तत ॥ ३१ ॥ धृतनानाप्रहरणं गम्भीरं सागरोपमम् ।

भावार्थ

वह सेना बड़े वेगसे श्रीरामकी ओर चली । उसमें नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले सैनिक थे । वह समुद्रके समान गम्भीर दिखायी देती थी ॥ ३१½ ॥

रामोऽपि चारयंश्चक्षुः सर्वतो रणपण्डितः ॥ ३२ ॥ ददर्श खरसैन्यं तद् युद्धायाभिमुखो गतः ।

भावार्थ

युद्धकलाके विद्वान् श्रीरामचन्द्रजीने भी चारों ओर दृष्टिपात करते हुए खरकी सेनाका निरीक्षण किया और वे युद्धके लिये उसके सामने बढ़ गये ॥ ३२½ ॥

वितत्य च धनुर्भीमं तूण्याश्चोद्धृत्य सायकान् ॥ ३३ ॥ क्रोधमाहारयत् तीव्रं वधार्थं सर्वरक्षसाम् । दुष्प्रेक्ष्यश्चाभवत् क्रुद्धो युगान्ताग्निरिव ज्वलन् ॥ ३४ ॥

भावार्थ

फिर उन्होंने तरकससे अनेक बाण निकाले और अपने भयंकर धनुषको खींचकर सम्पूर्ण राक्षसोंका वध करनेके लिये तीव्र क्रोध प्रकट किया । कुपित होनेपर वे प्रलयकालिक अग्निके समान प्रज्वलित होने लगे । उस समय उनकी ओर देखना भी कठिन हो गया ॥ ३३-३४ ॥

तं दृष्ट्वा तेजसाऽऽविष्टं प्राव्यथन् वनदेवताः । तस्य रुष्टस्य रूपं तु रामस्य दृदृशे तदा । दक्षस्येव क्रतुं हन्तुमुद्यतस्य पिनाकिनः ॥ ३५ ॥

भावार्थ

तेजसे आविष्ट हुए श्रीरामको देखकर वनके देवता व्यथित हो उठे । उस समय रोषमें भरे हुए श्रीरामका रूप दक्षयज्ञका विनाश करनेके लिये उद्यत हुए पिनाकधारी महादेवजीके समान दिखायी देने लगा ॥ ३५ ॥

तत्कार्मुकैराभरणै रथैश्च तद्वर्मभिश्चाग्निसमानवर्णैः । बभूव सैन्यं पिशिताशनानां सूर्योदये नीलमिवाभ्रजालम् ॥ ३६ ॥

भावार्थ

धनुषों, आभूषणों, रथों और अग्निके समान कान्तिवाले चमकीले कबचोंसे युक्त वह पिशाचोंकी सेना सूर्योदयकालमें नीले मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होती थी ॥ ३६ ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें