अरण्यकाण्ड, सर्ग 23
तत्प्रयातं बलं घोरं मशिवं शोणितोदकम् । अभ्यवर्षन्महाघोरस्तुमुलो गर्दभारुणः ॥ १ ॥
भावार्थ
उस सेनाके प्रस्थान करते समय आकाशमें गधेके समान धूसर रंगवाले बादलोंकी महाभयंकर घटा घिर आयी । उसकी तुमुल गर्जना होने लगी तथा सैनिकोंके ऊपर घोर अमङ्गलसूचक रक्तमय जलकी वर्षा आरम्भ हो गयी ॥ १ ॥
निपेतुस्तुरगास्तस्य रथयुक्ता महाजवाः । समे पुष्पचिते देशे राजमार्गे यदृच्छया ॥ २ ॥
भावार्थ
खरके रथमें जुते हुए महान् वेगशाली घोड़े फूल बिछे हुए समतल स्थानमें सड़कपर चलते-चलते अकस्मात् गिर पड़े ॥ २ ॥
श्यामं रुधिरपर्यन्तं बभूव परिवेषणम् । अलातचक्रप्रतिमं प्रतिगृह्य दिवाकरम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
सूर्यमण्डलके चारों ओर अलातचक्रके समान गोलाकार घेरा दिखायी देने लगा, जिसका रंग काला और किनारेका रंग लाल था ॥ ३ ॥
ततो ध्वजमुपागम्य हेमदण्डं समुच्छ्रितम् । समाकम्य महाकायस्तस्थौ गृध्रः सुदारुणः ॥ ४ ॥
भावार्थ
तदनन्तर खरके रथकी सुवर्णमय दण्डवाली ऊँची ध्वजापर एक विशालकाय गीध आकर बैठ गया, जो देखनेमें बड़ा ही भयंकर था ॥ ४ ॥
जनस्थानसमीपे च समाक्रम्य खरस्वनाः । विस्वरान् विविधान् नादान् मांसादा मृगपक्षिणः ॥ ५ ॥ व्याजह्रुर्भिदीप्तायां दिशि वै भैरवस्वनम् । अशिवं यातुधानानां शिवा घोरा महास्वनाः ॥ ६ ॥ प्रभिन्नगजसंकाशास्तोयशोणितधारिणः । आकाशं तदनाकाशं चक्रुर्भीमाम्बुवाहकाः ॥ ७ ॥
भावार्थ
कठोर स्वरवाले मांसभक्षी पशु और पक्षी जनस्थानके पास आकर विकृत स्वरमें अनेक प्रकारके विकट शब्द बोलने लगे तथा सूर्यकी प्रभासे प्रकाशित हुई दिशाओंमें जोर-जोरसे चीत्कार करनेवाले और मुँहसे आग उगलनेवाले भयंकर गीदड़ राक्षसोंके लिये अमङ्गलजनक भैरवनाद करने लगे ॥ भयंकर मेघ, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके समान दिखायी देते थे और जलकी जगह रक्त धारण किये हुए थे, तत्काल घिर आये । उन्होंने समूचे आकाशको ढक दिया । थोड़ा-सा भी अवकाश नहीं रहने दिया ॥ ७ ॥
बभूव तिमिरं घोरमुद्धतं रोमहर्षणम् । दिशो वा प्रदिशो वापि सुव्यक्तं न चकाशिरे ॥ ८ ॥
भावार्थ
सब ओर अत्यन्त भयंकर तथा रोमाञ्चकारी घना अन्धकार छा गया । दिशाओं अथवा कोणोंका स्पष्टरूपसे भान नहीं हो पाता था ॥ ८ ॥
क्षतजार्द्रसवर्णाभा संध्या कालं विना बभौ । खरं चाभिमुखं नेदुस्तदा घोरा मृगाः खगाः ॥ ९ ॥
भावार्थ
बिना समयके ही खूनसे भीगे हुए वस्त्रके समान रंगवाली संध्या प्रकट हो गयी। उस समय भयंकर पशु-पक्षी खरके सामने आकर गर्जना करने लगे ॥ ९ ॥
कङ्कगोमायुगृध्राश्च चुक्रुशुर्भयशंसिनः। नित्याशिवकरा युद्धे शिवा घोरनिदर्शनाः ॥ १० ॥ नेदुर्बलस्याभिमुखं ज्वालोद्गारिभिराननैः।
भावार्थ
भयकी सूचना देनेवाले कङ्क ( सफेद चील ), गीदड़ और गीध खरके सामने चीत्कार करने लगे। युद्धमें सदा अमङ्गल सूचित करनेवाली और भय दिखानेवाली गीदड़ियाँ खरकी सेनाके सामने आकर आग उगलनेवाले मुखोंसे घोर शब्द करने लगीं ॥ १०½ ॥
कबन्धः परिघाभासो दृश्यते भास्करान्तिके ॥ ११ ॥ जग्राह सूर्यं स्वर्भानुरपर्वणि महाग्रहः। प्रवाति मारुतः शीघ्रं निष्प्रभोऽभूद् दिवाकरः ॥ १२ ॥
भावार्थ
सूर्यके निकट परिघके समान कबन्ध ( सिर कटा हुआ धड़ ) दिखायी देने लगा। महान् ग्रह राहु अमावास्याके बिना ही सूर्यको ग्रसने लगा। हवा तीव्र गतिसे चलने लगी एवं सूर्यदेवकी प्रभा फीकी पड़ गयी ॥ ११-१२ ॥
उत्पेतुश्च विना रात्रिं ताराः खद्योतसप्रभाः। संलीनमीनविहगा नलिन्यः शुष्कपङ्कजाः ॥ १३ ॥
भावार्थ
बिना रातके ही जुगनूके समान चमकनेवाले तारे आकाशमें उदित हो गये। सरोवरोंमें मछली और जलपक्षी विलीन हो गये। उनके कमल सूख गये ॥ १३ ॥
तस्मिन् क्षणे बभूवुश्च विना पुष्पफलैर्द्रुमाः। उद्धूतश्च विना वातं रेणुर्जलधरारुणः ॥ १४ ॥
भावार्थ
उस क्षणमें वृक्षोंके फूल और फल झड़ गये। बिना हवाके ही बादलोंके समान धूसर रंगकी धूल ऊपर उठकर आकाशमें छा गयी ॥ १४ ॥
चीचीकूचीति वाश्यन्त्यो बभूवुस्तत्र सारिकाः। उल्काश्चापि सनिर्घोषा निपेतुर्घोरदर्शनाः ॥ १५ ॥
भावार्थ
वहाँ वनकी सारिकाएँ चें-चें करने लगीं। भारी आवाजके साथ भयानक उल्काएँ आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगीं ॥ १५ ॥
प्रचचाल मही चापि सशैलवनकानना। खरस्य च रथस्थस्य नर्दमानस्य धीमतः ॥ १६ ॥ प्राकम्पत भुजः सव्यः स्वरश्चास्यावसज्जत। साश्रा सम्पद्यते दृष्टिः पश्यमानस्य सर्वतः ॥ १७ ॥
भावार्थ
पर्वत, वन और काननोंसहित धरती डोलने लगी। बुद्धिमान् खर रथपर बैठकर गर्जना कर रहा था। उस समय उसकी बायीं भुजा सहसा काँप उठी। स्वर अवरुद्ध हो गया और सब ओर देखते समय उसकी आँखोंमें आँसू आने लगे ॥ १६-१७ ॥
ललाटे च रुजो जाता न च मोहान्न्यवर्तत। तान् समीक्ष्य महोत्पातानुत्थितान् रोमहर्षणान् ॥ १८ ॥ अब्रवीद् राक्षसान् सर्वान् प्रहसन् स खरस्तदा।
भावार्थ
उसके सिरमें दर्द होने लगा, फिर भी मोहवश वह युद्धसे निवृत्त नहीं हुआ। उस समय प्रकट हुए उन बड़े-बड़े रोमाञ्चकारी उत्पातोंको देखकर खर जोर-जोरसे हँसने लगा और समस्त राक्षसोंसे बोला—॥ १८½ ॥
महोत्पातानिमान् सर्वानुत्थितान् घोरदर्शनान् ॥ १९ ॥ न चिन्तयाम्यहं वीर्याद् बलवान् दुर्बलानिव। तारा अपि शरैस्तीक्ष्णैः पातयेयं नभस्तलात् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘ये जो भयानक दिखायी देनेवाले बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हो रहे हैं, इन सबकी मैं अपने बलके भरोसे कोई परवा नहीं करता; ठीक उसी तरह, जैसे बलवान् वीर दुर्बल शत्रुओंको कुछ नहीं समझता है। मैं अपने तीखे बाणोंद्वारा आकाशसे तारोंको भी गिरा सकता हूँ ॥ १९-२० ॥
मृत्युं मरणधर्मेण संक्रुद्धो योजयाम्यहम्। राघवं तं बलोत्सिक्तं भ्रातरं चापि लक्ष्मणम् ॥ २१ ॥ अहत्वा सायकैस्तीक्ष्णैर्नोपावर्तितुमुत्सहे।
भावार्थ
‘यदि कुपित हो जाऊँ तो मृत्युको भी मौतके मुखमें डाल सकता हूँ। आज बलका घमंड रखनेवाले राम और उसके भाई लक्ष्मणको तीखे बाणोंसे मारे बिना मैं पीछे नहीं लौट सकता ॥ २१½ ॥
यन्निमित्तं तु रामस्य लक्ष्मणस्य विपर्ययः ॥ २२ ॥ सकामा भगिनी मेऽस्तु पीत्वा तु रुधिरं तयोः।
भावार्थ
‘जिसे दण्ड देनेके लिये राम और लक्ष्मणकी बुद्धिमें विपरीत विचार ( क्रूरतापूर्ण कर्म करनेके भाव ) का उदय हुआ है, वह मेरी बहिन शूर्पणखा उन दोनोंका खून पीकर सफलमनोरथ हो जाय ॥ २२½ ॥
न कश्चित् प्राप्तपूर्वो मे संयुगेषु पराजयः ॥ २३ ॥ युष्माकमेतत् प्रत्यक्षं नानृतं कथयाम्यहम्।
भावार्थ
‘आजतक जितने युद्ध हुए हैं, उनमेंसे किसीमें भी पहले मेरी कभी पराजय नहीं हुई है; यह तुमलोगोंने प्रत्यक्ष देखा है। मैं झूठ नहीं कहता हूँ ॥ २३½ ॥
देवराजमपि क्रुद्धो मत्तैरावतगामिनम् ॥ २४ ॥ वज्रहस्तं रणे हन्यां किं पुनस्तौ च मानवौ।
भावार्थ
‘मैं मतवाले ऐरावतपर चलनेवाले वज्रधारी देवराज इन्द्रको भी रणभूमिमें कुपित होकर कालके गालमें डाल सकता हूँ, फिर उन दो मनुष्योंकी तो बात ही क्या है ?’ ॥ २४½ ॥
सा तस्य गर्जितं श्रुत्वा राक्षसानां महाचमूः ॥ २५ ॥ प्रहर्षमतुलं लेभे मृत्युपाशावपाशिता।
भावार्थ
खरकी यह गर्जना सुनकर राक्षसोंकी वह विशाल सेना, जो मौतके पाशसे बँधी हुई थी, अनुपम हर्षसे भर गयी ॥ २५½ ॥
समेयुश्च महात्मानो युद्धदर्शनकाङ्क्षिणः ॥ २६ ॥ ऋषयो देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः । समेत्य चोचुः सहितास्तेऽन्योन्यं पुण्यकर्मणः॥ २७ ॥
भावार्थ
उस समय युद्ध देखनेकी इच्छावाले बहुत-से पुण्यकर्मा महात्मा, ऋषि, देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण वहाँ एकत्र हो गये । एकत्र हो वे सभी मिलकर एक-दूसरेसे कहने लगे--॥२६-२७ ॥
स्वस्ति गोब्राह्मणेभ्यस्तु लोकानां येच सम्मताः । जयतां राघवो युद्धे पौलस्त्यान् रजनीचरान् ॥ २८ ॥ चक्रहस्तो यथा विष्णुः सर्वानसुरसत्तमान् ।
भावार्थ
‘गौओं और ब्राह्मणोंका कल्याण हो तथा जो अन्य लोकप्रिय महात्मा हैं, वे भी कल्याणके भागी हों । जैसे चक्रधारी भगवान् विष्णु समस्त असुरशिरोमणियोंको परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार रघुकुलभूषण श्रीराम युद्धमें इन पुलस्त्यवंशी निशाचरोंको पराजित करें’ ॥ २८½ ॥
एतच्चान्यच्च बहुशो ब्रुवाणाः परमर्षयः ॥ २९ ॥ जातकौतूहलास्तत्र विमानस्थाश्च देवताः । ददृशुर्वाहिनीं तेषां राक्षसानां गतायुषाम् ॥ ३० ॥
भावार्थ
ये तथा और भी बहुत-सी मङ्गलकामनासूचक बातें कहते हुए वे महर्षि और देवता कौतूहलवश विमानपर बैठकर जिनकी आयु समाप्त हो चली थी, उन राक्षसोंकी उस विशाल वाहिनीको देखने लगे ॥ २९-३० ॥
रथेन तु खरो वेगात् सैन्यस्याग्राद् विनिःसृतः। श्येनगामी पृथुग्रीवो यज्ञशत्रुर्विहंगमः ॥ ३१ ॥ दुर्जयः करवीराक्षः परुषः कालकार्मुकः । हेममाली महामाली सर्पास्यो रुधिराशनः ॥ ३२ ॥ द्वादशैते महावीर्याः प्रतस्थुरभितः खरम् ।
भावार्थ
खर रथके द्वारा बड़े वेगसे चलकर सारी सेनासे आगे निकल आया और श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, विहंगम, दुर्जय, करवीराक्ष, परुष, कालकार्मुक, हेममाली, महामाली, सर्पास्य तथा रुधिराशन—ये बारह महापराक्रमी राक्षस खरको दोनों ओरसे घेरकर उसके साथ-साथ चलने लगे ३१-३२½
महाकपालः स्थूलाक्षः प्रमाथस्त्रिशिरास्तथा । चत्वार एते सेनाग्रे दूषणं पृष्ठतोऽन्वयुः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
महाकपाल, स्थूलाक्ष, प्रमाथ और त्रिशिरा—ये चार राक्षस वीर सेनाके आगे और सेनापति दूषणके पीछे-पीछे चल रहे थे ॥ ३३ ॥
सा भीमवेगा समराभिकाङ्क्षिणी सुदारुणा राक्षसवीरसेना । तौ राजपुत्रौ सहसाभ्युपेता माला ग्रहाणामिव चन्द्रसूर्यौ ॥ ३४ ॥
भावार्थ
राक्षस वीरोंकी वह भयंकर वेगवाली अत्यन्त दारुण सेना, जो युद्धकी अभिलाषासे आ रही थी, सहसा उन दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मणके पास जा पहुँची, मानो ग्रहोंकी पंक्ति चन्द्रमा और सूर्यके समीप प्रकाशित हो रही हो ॥ ३४ ॥
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