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अरण्यकाण्ड, सर्ग 22

एवमाधर्षितः शूरः शूर्पणख्या खरस्ततः । उवाच रक्षसां मध्ये खरः खरतरं वचः ॥ १ ॥

भावार्थ

शूर्पणखाद्वारा इस प्रकार तिरस्कृत होकर शूरवीर खरने राक्षसोंके बीच अत्यन्त कठोर वाणीमें कहा–॥ १ ॥

तवापमानप्रभवः क्रोधोऽयमतुलो मम । न शक्यते धारयितुं लवणाम्भ इवोल्वणम् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘बहिन ! तुम्हारे अपमानके कारण मुझे बेतरह क्रोध चढ़ आया है । इसे धारण करना या दबा देना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे पूर्णिमाको प्रचण्ड वेगसे बढ़े हुए खारे पानीके समुद्रके जलको ( अथवा यह उसी प्रकार असह्य है, जैसे घावपर नमकीन पानीका छिड़कना ) ॥ २ ॥

न रामं गणये वीर्यान्मानुषं क्षीणजीवितम् । आत्मदुश्चरितैः प्राणान् हतो योऽद्य विमोक्ष्यते ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘मैं पराक्रमकी दृष्टिसे रामको कुछ भी नहीं गिनता हूँ; क्योंकि उस मनुष्यका जीवन अब क्षीण हो चला है । वह अपने दुष्कर्मोंसे ही मारा जाकर आज प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा ॥ ३ ॥

बाष्पः संधार्यतामेष सम्भ्रमश्च विमुच्यताम् । अहं रामं सह भ्रात्रा नयामि यमसादनम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘तुम अपने आँसुओंको रोको और यह घबराहट छोड़ो । मैं भाईसहित रामको अभी यमलोक पहुँचा देता हूँ ॥ ४ ॥

परश्वधहतस्याद्य मन्दप्राणस्य भूतले । रामस्य रुधिरं रक्तमुष्णं पास्यसि राक्षसि ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘राक्षसी ! आज मेरे फरसेकी मारसे निष्प्राण होकर धरतीपर पड़े हुए रामका गरम-गरम रक्त तुम्हें पीनेको मिलेगा’ ॥ ५ ॥

सम्प्रहृष्टा वचः श्रुत्वा खरस्य वदनाच्च्युतम् । प्रशशंस पुनर्मौर्ख्याद् भ्रातरं रक्षसां वरम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

खरके मुखसे निकली हुई इस बातको सुनकर शूर्पणखाको बड़ी प्रसन्नता हुई । उसने मूर्खतावश राक्षसोंमें श्रेष्ठ भाई खरकी पुनः भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ६ ॥

तया परुषितः पूर्वं पुनरेव प्रशंसितः । अब्रवीद् दूषणं नाम खरः सेनापतिं तदा ॥ ७ ॥

भावार्थ

उसने पहले जिसका कठोर वाणीद्वारा तिरस्कार किया और पुनः जिसकी अत्यन्त सराहना की, उस खरने उस समय अपने सेनापति दूषणसे कहा—॥ ७ ॥

चतुर्दश सहस्राणि मम चित्तानुवर्तिनाम् । रक्षसां भीमवेगानां समरेष्वनिवर्तिनाम् ॥ ८ ॥ नीलजीमूतवर्णानां लोकहिंसाविहारिणाम् । सर्वोद्योगमुदीर्णानां रक्षसां सौम्य कारय ॥ ९ ॥ उपस्थापय मे क्षिप्रं रथं सौम्य धनूंषि च । शरांश्च चित्रान् खड्गांश्च शक्तीश्च विविधाः शिताः॥

भावार्थ

‘सौम्य ! मेरे मनके अनुकूल चलनेवाले, युद्धके मैदान-से पीछे न हटनेवाले, भयंकर वेगशाली, मेघोंकी काली घटाके समान काले रंगवाले, लोगोंकी हिंसासे ही क्रीड़ा-विहार करनेवाले तथा युद्धमें उत्साहपूर्वक आगे बढ़नेवाले चौदह सहस्र राक्षसोंको युद्धके लिये भेजनेकी पूरी तैयारी कराओ ॥ ‘सौम्य सेनापते ! तुम शीघ्र ही मेरा रथ भी यहाँ मँगवा लो । उसपर बहुत-से धनुष, बाण, विचित्र-विचित्र खड्ग और नाना प्रकारकी तीखी शक्तियोंको भी रख दो ॥ १० ॥

अग्रे निर्यातुमिच्छामि पौलस्त्यानां महात्मनाम् । वधार्थं दुर्विनीतस्य रामस्य रणकोविद ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘रणकुशल वीर ! मैं इस उद्दण्ड रामका वध करनेके लिये महामनस्वी पुलस्त्यवंशी राक्षसोंके आगे-आगे जाना चाहता हूँ’ ॥ ११ ॥

इति तस्य ब्रुवाणस्य सूर्यवर्णं महारथम् । सदश्वैः शबलैर्युक्तमाचचक्षेऽथ दूषणः ॥ १२ ॥

भावार्थ

उसके इस प्रकार आज्ञा देते ही एक सूर्यके समान प्रकाशमान और चितकबरे रंगके अच्छे घोड़ोंसे जुता हुआ विशाल रथ वहाँ आ गया । दूषणने खरको इसकी सूचना दी ॥ १२ ॥

तं मेरुशिखराकारं तप्तकाञ्चनभूषणम् । हेमचक्रमसम्बाधं वैदूर्यमयकूबरम् ॥ १३ ॥ मत्स्यैः पुष्पैर्द्रुमैः शैलैश्चन्द्रसूर्यैश्च काञ्चनैः । माङ्गल्यैः पक्षिसङ्घैश्च ताराभिश्च समावृतम् ॥ १४ ॥ ध्वजनिस्त्रिंशसम्पन्नं किङ्किणीवरभूषितम् । सदश्वयुक्तं सोऽमर्षादारुरोह खरस्तदा ॥ १५ ॥

भावार्थ

वह रथ मेरुपर्वतके शिखरकी भाँति ऊँचा था, उसे तपाये हुए सोनेके बने हुए साज-बाजसे सजाया गया था, उसके पहियोंमें सोना जड़ा हुआ था, उसका विस्तार बहुत बड़ा था, उस रथके कूबर वैदूर्यमणिसे जड़े गये थे, उसकी सजावटके लिये सोनेके बने हुए मत्स्य, फूल, वृक्ष, पर्वत, चन्द्रमा, सूर्य, माङ्गलिक पक्षियोंके समुदाय तथा तारिकाओंसे वह रथ सुशोभित हो रहा था, उसपर ध्वजा फहरा रही थी तथा रथके भीतर खड्ग आदि अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे, छोटी-छोटी घण्टियों अथवा सुन्दर घुँघुरुओंसे सजे और उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए उस रथपर राक्षसराज खर उस समय आरूढ़ हुआ। अपनी बहिनके अपमानका स्मरण करके उसके मनमें बड़ा अमर्ष हो रहा था ॥ १३–१५ ॥

खरस्तु तन्महत्सैन्यं रथचर्मायुधध्वजम् । निर्यातेत्यब्रवीत् प्रेक्ष्य दूषणः सर्वराक्षसान् ॥ १६ ॥

भावार्थ

रथ, ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वजसे सम्पन्न उस विशाल सेनाकी ओर देखकर खर और दूषणने समस्त राक्षसोंसे कहा—‘निकलो, आगे बढ़ो’ ॥ १६ ॥

ततस्तद् राक्षसं सैन्यं घोरचर्मायुधध्वजम् । निर्जगाम जनस्थानान्महानादं महाजवम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

कूच करनेकी आज्ञा प्राप्त होते ही भयंकर ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वजासे युक्त वह विशाल राक्षस-सेना जोर-जोरसे गर्जना करती हुई जनस्थानसे बड़े वेगके साथ निकली ॥ १७ ॥

मुद्गरैः पट्टिशैः शूलैः सुतीक्ष्णैश्च परश्वधैः । खड्गैश्चक्रैश्च हस्तस्थैर्भ्राजमानैः सतोमरैः ॥ १८ ॥ शक्तिभिः परिघैर्घोरैरतिमात्रैश्च कार्मुकैः । गदासिमुसलैर्वज्रैर्गृहीतैर्भीमदर्शनैः ॥ १९ ॥ राक्षसानां सुघोराणां सहस्राणि चतुर्दश । निर्यातानि जनस्थानात् खरचित्तानुवर्तिनाम् ॥ २० ॥ तांस्तु निर्धावतो दृष्ट्वा राक्षसान् भीमदर्शनान् । खरस्याथ रथः किंचिज्जगाम तदनन्तरम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

सैनिकोंके हाथमें मुद्गर, पट्टिश, शूल, अत्यन्त तीखे फरसे, खड्ग, चक्र और तोमर चमक उठे । शक्ति, भयंकर परिघ, विशाल धनुष, गदा, तलवार, मुसल तथा वज्र ( आठ कोण-वाले आयुधविशेष ) उन राक्षसोंके हाथोंमें आकर बड़े भयानक दिखायी दे रहे थे । इन अस्त्र-शस्त्रोंसे उपलक्षित और खरके मनकी इच्छाके अनुसार चलनेवाले अत्यन्त भयंकर चौदह हजार राक्षस जनस्थानसे युद्धके लिये चले ॥ उन भयंकर दिखायी देनेवाले राक्षसोंको धावा करते देख खरका रथ भी कुछ देर सैनिकोंके निकलनेकी प्रतीक्षा करके उनके साथ ही आगे बढ़ा ॥ २१ ॥

ततस्ताञ्छबलानश्वांस्तप्तकाञ्चनभूषितान् । खरस्य मतमाज्ञाय सारथिः पर्यचोदयत् ॥ २२ ॥

भावार्थ

तदनन्तर खरका अभिप्राय जानकर उसके सारथिने तपाये हुए सोनेके आभूषणोंसे विभूषित उन चितकबरे घोड़ोंको हाँका ॥ २२ ॥

संचोदितो रथः शीघ्रं खरस्य रिपुघातिनः । शब्देनापूरयामास दिशः सप्रदिशस्तथा ॥ २३ ॥

भावार्थ

उसके हाँकनेपर शत्रुघाती खरका रथ शीघ्र ही अपने घर-घर शब्दसे सम्पूर्ण दिशाओं तथा उपदिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगा ॥ २३ ॥

प्रवृद्धमन्युस्तु खरः खरस्वरो रिपोर्वधार्थं त्वरितो यथान्तकः । अचूचुदत् सारथिमुन्नदन् पुन- र्महाबलो मेघ इवाश्मवर्षवान् ॥ २४ ॥

भावार्थ

उस समय खरका क्रोध बढ़ा हुआ था । उसका स्वर भी कठोर हो गया था । वह शत्रुके वधके लिये उतावला होकर यमराजके समान भयानक जान पड़ता था । जैसे ओलोंकी वर्षा करनेवाला मेघ बड़े जोरसे गर्जना करता है, उसी प्रकार महाबली खरने उच्चस्वरसे सिंहनाद करके पुनः सारथिको रथ हाँकनेके लिये प्रेरित किया ॥ २४ ॥

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