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अरण्यकाण्ड, सर्ग 27

खरं तु रामाभिमुखं प्रयान्तं वाहिनीपतिः । राक्षसस्त्रिशिरा नाम संनिपत्येदमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

खरको भगवान् श्रीरामके सम्मुख जाते देख सेनापति राक्षस त्रिशिरा तुरंत उसके पास आ पहुँचा और इस प्रकार बोला—॥ १ ॥

मां नियोजय विक्रान्तं त्वं निवर्तस्व साहसात् । पश्य रामं महाबाहुं संयुगे विनिपातितम् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘राक्षसराज ! मुझ पराक्रमी वीरको इस युद्धमें लगाइये और स्वयं इस साहसपूर्ण कार्यसे अलग रहिये । देखिये, मैं अभी महाबाहु रामको युद्धमें मार गिराता हूँ ॥ २ ॥

प्रतिजानामि ते सत्यमायुधं चाहमालभे । यथा रामं वधिष्यामि वधार्हं सर्वरक्षसाम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘आपके सामने मैं सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ और अपने हथियार छूकर शपथ खाता हूँ कि जो समस्त राक्षसोंके लिये वधके योग्य हैं, उन रामका मैं अवश्य वध करूँगा ॥ ३ ॥

अहं वास्य रणे मृत्युरेष वा समरे मम । विनिवर्त्य रणोत्साहं मुहूर्तं प्राश्निको भव ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘इस युद्धमें या तो मैं इनकी मृत्यु बनूँगा, या ये ही समराङ्गणमें मेरी मृत्युका कारण होंगे । आप इस समय अपने युद्धविषयक उत्साहको रोककर एक मुहूर्तके लिये जय-पराजयका निर्णय करनेवाले साक्षी बन जाइये ॥ ४ ॥

प्रहृष्टो वा हते रामे जनस्थानं प्रयास्यसि । मयि वा निहते रामं संयुगाय प्रयास्यसि ॥ ५ ॥ खरस्त्रिशिरसा तेन मृत्युलोभात् प्रसादितः । गच्छ युध्येत्यनुज्ञातो राघवाभिमुखो ययौ ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘यदि मेरेद्वारा राम मारे गये तो आप प्रसन्नतापूर्वक जनस्थानको लौट जाइये अथवा यदि रामने ही मुझे मार दिया तो आप युद्धके लिये इनपर धावा बोल दीजियेगा’ ॥ भगवान्के हाथसे मृत्युका लोभ होनेके कारण जब त्रिशिराने इस प्रकार खरको राजी किया, तब उसने आज्ञा दे दी—‘अच्छा जाओ, युद्ध करो । आज्ञा पाकर वह श्रीरामचन्द्रजीकी ओर चला ॥ ६ ॥

त्रिशिरास्तु रथेनैव वाजियुक्तेन भास्वता । अभ्यद्रवद् रणे रामं त्रिशृङ्ग इव पर्वतः ॥ ७ ॥

भावार्थ

घोड़े जुते हुए एक तेजस्वी रथके द्वारा त्रिशिराने रणभूमिमें श्रीरामपर आक्रमण किया । उस समय वह तीन शिखरोंवाले पर्वतके समान जान पड़ता था ॥ ७ ॥

शरधारासमूहान् स महामेघ इवोत्सृजन् । व्यसृजत् सदृशं नादं जलार्द्रस्येव दुन्दुभेः ॥ ८ ॥

भावार्थ

उसने आते ही बड़े भारी मेघकी भाँति बाणरूपी धाराओंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी और वह जलसे भीगे हुए नगाड़ेकी तरह विकट गर्जना करने लगा ॥ ८ ॥

आगच्छन्तं त्रिशिरसं राक्षसं प्रेक्ष्य राघवः । धनुषा प्रतिजग्राह विधुन्वन् सायकाञ्शितान् ॥ ९ ॥

भावार्थ

त्रिशिरानामक राक्षसको आते देख श्रीरघुनाथजीने धनुषके द्वारा पैने बाण छोड़ते हुए उसे अपने प्रतिद्वन्द्वीके रूपमें ग्रहण किया ( अथवा उसे आगे बढ़नेसे रोक दिया )॥९॥

स सम्प्रहारस्तुमुलो रामत्रिशिरसोस्तदा । सम्बभूवातिबलिनोः सिंहकुञ्जरयोरिव ॥ १० ॥

भावार्थ

अत्यन्त बलशाली श्रीराम और त्रिशिराका वह संग्राम महाबली सिंह और गजराजके युद्धकी भाँति बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ १० ॥

ततस्त्रिशिरसा बाणैर्ललाटे ताडितस्त्रिभिः । अमर्षी कुपितो रामः संरब्ध इदमब्रवीत् ॥ ११ ॥ अहो विक्रमशूरस्य राक्षसस्येदृशं बलम् । पुष्पैरिव शरैर्योऽहं ललाटेऽस्मि परिक्षतः ॥ १२ ॥ ममापि प्रतिगृह्णीष्व शरांश्चापगुणाच्च्युतान् ।

भावार्थ

उस समय त्रिशिराने तीन बाणोंसे श्रीरामचन्द्रजीके ललाटको बींध डाला। श्रीराम उसकी यह उद्दण्डता सहन न कर सके । वे कुपित हो रोषावेशमें भरकर इस प्रकार बोले–॥ ‘अहो ! पराक्रम प्रकट करनेमें शूरवीर राक्षसका ऐसा ही बल है, जो तुमने फूलों-जैसे बाणोंद्वारा मेरे ललाटपर प्रहार किया है । अच्छा, अब धनुषकी डोरीसे छूटे हुए मेरे बाणोंको भी ग्रहण करो’ ॥ १२½ ॥

एवमुक्त्वा सुसंरब्धः शरानाशीविषोपमान् ॥ १३ ॥ त्रिशिरोवक्षसि क्रुद्धो निजघान चतुर्दश ।

भावार्थ

ऐसा कहकर रोषमें भरे हुए श्रीरामने त्रिशिराकी छातीमें क्रोधपूर्वक चौदह बाण मारे, जो विषधर सर्पोंके समान भयंकर थे ॥ १३½ ॥

चतुर्भिस्तुरगानस्य शरैः संनतपर्वभिः ॥ १४ ॥ न्यपातयत तेजस्वी चतुरस्तस्य वाजिनः । अष्टभिः सायकैः सूतं रथोपस्थे न्यपातयत् ॥ १५ ॥

भावार्थ

तदनन्तर तेजस्वी रघुनाथजीने छुकी गाँठवाले चार बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको मार गिराया । फिर आठ सायकोंद्वारा उसके सारथिको भी रथकी बैठकमें ही सुला दिया ॥१४-१५॥

रामश्चिच्छेद बाणेन ध्वजं चास्य समुच्छ्रितम् । ततो हतरथात् तस्मादुत्पतन्तं निशाचरम् ॥ १६ ॥ चिच्छेद रामस्तं बाणैर्हृदये सोऽभवज्जडः ।

भावार्थ

इसके बाद श्रीरामने एक बाणसे उसकी ध्वजा भी काट डाली । तदनन्तर जब वह उस नष्ट हुए रथसे कूदने लगा, उसी समय श्रीराघवेन्द्रने अनेक बाणोंद्वारा उस निशाचरकी छाती छेद डाली । फिर तो वह जडवत् हो गया ॥ १६½ ॥

सायकैश्चाप्रमेयात्मा सामर्षस्तस्य रक्षसः ॥ १७ ॥ शिरांस्यपातयत् त्रीणि वेगवद्भिस्त्रिभिः शरैः ।

भावार्थ

इसके बाद अप्रमेयस्वरूप श्रीरामने अमर्षमें भरकर तीन वेगशाली एवं विनाशकारी बाणोंद्वारा उस राक्षसके तीनों मस्तक काट गिराये ॥ १७½ ॥

स धूमशोणितोद्गारी रामबाणाभिपीडितः ॥ १८ ॥ न्यपतत् पतितैः पूर्वं समरस्थो निशाचरः । हतशेषास्ततो भग्ना राक्षसाः खरसंश्रयाः ॥ १९ ॥ द्रवन्ति स्म न तिष्ठन्ति व्याघ्रत्रस्ता मृगा इव ।

भावार्थ

समराङ्गणमें खड़ा हुआ वह निशाचर श्रीरामचन्द्रजीके बाणोंसे पीड़ित हो अपने धड़से भापसहित रुधिर उगलता हुआ पहले गिरे हुए मस्तकोंके साथ ही धराशायी हो गया ॥ तत्पश्चात् खरकी सेवामें रहनेवाले राक्षस, जो मरनेसे बचे हुए थे, भाग खड़े हुए । वे व्याघ्रसे डरे हुए मृगोंके समान भागते ही चले जाते थे, खड़े नहीं होते थे ॥ १९½ ॥

तान् खरो द्रवतो दृष्ट्वा निवर्त्य रुषितस्त्वरन् । राममेवाभिदुद्राव राहुश्चन्द्रमसं यथा ॥ २० ॥

भावार्थ

उन्हें भागते देख रोषमें भरे हुए खरने तुरंत लौटाया और जैसे राहु चन्द्रमापर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उसने श्रीरामपर ही धावा किया ॥ २० ॥

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