अरण्यकाण्ड, सर्ग 19
तां तथा पतितां दृष्ट्वा विरूपां शोणितोक्षिताम् । भगिनीं क्रोधसंतप्तः खरः पप्रच्छ राक्षसः ॥ १ ॥
भावार्थ
अपनी बहिनको इस प्रकार अङ्गहीन और रक्तसे भीगी हुई अवस्थामें पृथ्वीपर पड़ी देख राक्षस खर क्रोधसे जल उठा और इस प्रकार पूछने लगा—॥ १ ॥
उत्तिष्ठ तावदाख्याहि प्रमोहं जहि सम्भ्रमम् । व्यक्तमाख्याहि केन त्वमेवंरूपा विरूपिता ॥ २ ॥
भावार्थ
‘बहिन उठो और अपना हाल बताओ । मूर्च्छा और घबराहट छोड़ो तथा साफ-साफ कहो, किसने तुम्हें इस तरह रूपहीन बनाया है ? ॥ २ ॥
कः कृष्णसर्पमासीनमाशीविषमनागसम् । तुदत्यभिसमापन्नमङ्गुल्यग्रेण लीलया ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘कौन अपने सामने आकर चुपचाप बैठे हुए निरपराध एवं विषैले काले साँपको अपनी अँगुलियोंके अग्रभागसे खेल-खेलमें पीड़ा दे रहा है ? ॥ ३ ॥
कालपाशं समासज्य कण्ठे मोहान्न बुध्यते । यस्त्वामद्य समासाद्य पीतवान् विषमुत्तमम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘जिसने आज तुमपर आक्रमण करके तुम्हारे नाक-कान काटे हैं, उसने उच्चकोटिका विष पी लिया है तथा अपने गलेमें कालका फंदा डाल लिया है, फिर भी मोहवश वह इस बातको समझ नहीं रहा है ॥ ४ ॥
बलविक्रमसम्पन्ना कामगा कामरूपिणी । इमामवस्थां नीता त्वं केनान्तकसमागता ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘तुम तो स्वयं ही दूसरे प्राणियोंके लिये यमराजके समान हो, बल और पराक्रमसे सम्पन्न हो तथा इच्छानुसार सर्वत्र विचरने और अपनी रुचिके अनुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हो, फिर भी तुम्हें किसने इस दुरवस्थामें डाला है; जिससे दुखी होकर तुम यहाँ आयी हो ? ॥ ५ ॥
देवगन्धर्वभूतानामृषीणां च महात्मनाम् । कोऽयमेवं महावीर्यस्त्वां विरूपां चकार ह ॥ ६ ॥ नहि पश्याम्यहं लोके यः कुर्यान्मम विप्रियम् । अमरेषु सहस्राक्षं महेन्द्रं पाकशासनम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘देवताओं, गन्धर्वों, भूतों तथा महात्मा ऋषियोंमें यह कौन ऐसा महान् बलशाली है, जिसने तुम्हें रूपहीन बना दिया ? ॥ ‘संसारमें तो मैं किसीको ऐसा नहीं देखता, जो मेरा अप्रिय कर सके । देवताओंमें सहस्रनेत्रधारी पाकशासन इन्द्र भी ऐसा साहस कर सकें, यह मुझे नहीं दिखायी देता ॥ ७ ॥
अद्याहं मार्गणैः प्राणानादास्ये जीवितान्तगैः । सलिले क्षीरमासक्तं निष्पिबन्निव सारसः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘जैसे हंस जलमें मिले हुए दूधको पी लेता है, उसी प्रकार मैं आज इन प्राणान्तकारी बाणोंसे तुम्हारे अपराधीके शरीरसे उसके प्राण ले लूँगा ॥ ८ ॥
निहतस्य मया संख्ये शरसंकृत्तमर्मणः । सफेनं रुधिरं कस्य मेदिनी पातुमिच्छति ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘युद्धमें मेरे बाणोंसे जिसके मर्मस्थान छिन्न-भिन्न हो गये हैं तथा जो मेरे हाथों मारा गया है, ऐसे किस पुरुषके फेनसहित गरम-गरम रक्तको यह पृथ्वी पीना चाहती है ? ॥ ९ ॥
कस्य पत्ररथाः कायान्मांसमुत्कृत्य संगताः । प्रहृष्टा भक्षयिष्यन्ति निहतस्य मया रणे ॥ १० ॥
भावार्थ
‘रणभूमिमें मेरेद्वारा मारे गये किस व्यक्तिके शरीरसे मांस कुतर-कुतरकर ये हर्षमें भरे हुए झुंड-के-झुंड पक्षी खायँगे ? ॥ १० ॥
तं न देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः । मयापकृष्टं कृपणं शक्तास्त्रातुं महाहवे ॥ ११ ॥ उपलभ्य शनैः संज्ञां तं मे शंसितुमर्हसि । येन त्वं दुर्विनीतेन वने विक्रम्य निर्जिता ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘जिसे मैं महासमरमें खींच लूँ, उस दीन अपराधीको देवता, गन्धर्व, पिशाच और राक्षस भी नहीं बचा सकते ॥ ‘धीरे-धीरे होशमें आकर तुम मुझे उसका नाम बताओ, जिस उद्दण्डने वनमें तुमपर बलपूर्वक आक्रमण करके तुम्हें परास्त किया है’ ॥ १२ ॥
इति भ्रातुर्वचः श्रुत्वा क्रुद्धस्य च विशेषतः । ततः शूर्पणखा वाक्यं सबाष्पमिदमब्रवीत् ॥ १३ ॥ तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ । पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥ १४ ॥
भावार्थ
भाईका विशेषतः क्रोधमें भरे हुए भाई खरका यह वचन सुनकर शूर्पणखा नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई इस प्रकार बोली—॥ ‘भैया ! वनमें दो तरुण पुरुष आये हैं, जो देखनेमें बड़े ही सुकुमार, रूपवान् और महान् बलवान् हैं । उन दोनोंके बड़े-बड़े नेत्र ऐसे जान पड़ते हैं मानो खिले हुए कमल हों । वे दोनों ही वल्कल-वस्त्र और मृगचर्म पहने हुए हैं ॥ १४ ॥
फलमूलाशनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ । पुत्रौ दशरथस्यास्तां भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १५ ॥ गन्धर्वराजप्रतिमौ पार्थिवव्यञ्जनान्वितौ । देवौ वा दानवौ वेतौ न तर्कयितुमुत्सहे ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘फल और मूल ही उनका भोजन है । वे जितेन्द्रिय, तपस्वी और ब्रह्मचारी हैं । दोनों ही राजा दशरथके पुत्र और आपसमें भाई-भाई हैं । उनके नाम राम और लक्ष्मण हैं ॥ ‘वे दो गन्धर्वराजोंके समान जान पड़ते हैं और राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न हैं । ये दोनों भाई देवता अथवा दानव हैं, यह मैं अनुमानसे भी नहीं जान सकती ॥ १६ ॥
तरुणी रूपसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता । दृष्टा तत्र मया नारी तयोर्मध्ये सुमध्यमा ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘उन दोनोंके बीचमें एक तरुण अवस्थावाली रूपवती स्त्री भी वहाँ देखी है, जिसके शरीरका मध्यभाग बड़ा ही सुन्दर है । वह सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित है ॥ १७ ॥
ताभ्यामुभाभ्यां सम्भूय प्रमदामधिकृत्य ताम् । इमामवस्थां नीताहं यथानाथासती तथा ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘उस स्त्रीके ही कारण उन दोनोंने मिलकर मेरी एक अनाथ और कुलटा स्त्रीकी भाँति ऐसी दुर्गति की है ॥ १८ ॥
तस्याश्चानृजुवृत्तायास्तयोश्च हतयोरहम् । सफेनं पातुमिच्छामि रुधिरं रणमूर्धनि ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘मैं युद्धमें उस कुटिल आचारवाली स्त्रीके और उन दोनों राजकुमारोंके भी मारे जानेपर उनका फेनसहित रक्त पीना चाहती हूँ ॥ १९ ॥
एष मे प्रथमः कामः कृतस्तत्र त्वया भवेत् । तस्यास्तयोश्च रुधिरं पिबेयमहमाहवे ॥ २० ॥
भावार्थ
‘रणभूमिमें उस स्त्रीका और उन पुरुषोंका भी रक्त मैं पी सकूँ—यह मेरी पहली और प्रमुख इच्छा है, जो तुम्हारे द्वारा पूर्ण की जानी चाहिये ॥ २० ॥
इति तस्यां ब्रुवाणायां चतुर्दश महाबलान् । व्यादिदेश खरः क्रुद्धो राक्षसानन्तकोपमान् ॥ २१ ॥
भावार्थ
शूर्पणखाके ऐसा कहनेपर खरने कुपित होकर अत्यन्त बलवान् चौदह राक्षसोंको, जो यमराजके समान भयंकर थे, यह आदेश दिया—॥ २१ ॥
मानुषौ शस्त्रसम्पन्नौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ । प्रविष्टौ दण्डकारण्यं घोरं प्रमदया सह ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘वीरो ! इस भयंकर दण्डकारण्यके भीतर चीर और काला मृगचर्म धारण किये दो शस्त्रधारी मनुष्य एक युवती स्त्रीके साथ घुस आये हैं ॥ २२ ॥
तौ हत्वा तां च दुर्वृत्तामुपावर्तितुमर्हथ । इयं च भगिनी तेषां रुधिरं मम पास्यति ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘तुमलोग वहाँ जाकर पहले उन दोनों पुरुषोंको मार डालो; फिर उस दुराचारिणी स्त्रीके भी प्राण ले लो । मेरी यह बहिन उन तीनोंका रक्त पीयेगी ॥ २३ ॥
मनोरथोऽयमिष्टोऽस्या भगिन्या मम राक्षसाः । शीघ्रं सम्पाद्यतां गत्वा तौ प्रमथ्य स्वतेजसा ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘राक्षसो ! मेरी इस बहिनका यह प्रिय मनोरथ है । तुम वहाँ जाकर अपने प्रभावसे उन दोनों मनुष्योंको मार गिराओ और बहिनके इस मनोरथको शीघ्र पूरा करो ॥ २४ ॥
युष्माभिर्निहतौ दृष्ट्वा तावुभौ भ्रातरौ रणे । इयं प्रहृष्टा मुदिता रुधिरं युधि पास्यति ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘रणभूमिमें उन दोनों भाइयोंको तुम्हारे द्वारा मारा गया देख यह हर्षसे खिल उठेगी और आनन्दमग्न होकर युद्धस्थलमें उनका रक्त पान करेगी’ ॥ २५ ॥
इति प्रतिसमादिष्टा राक्षसास्ते चतुर्दश । तत्र जग्मुस्तया सार्धं घना वातेरिता इव ॥ २६ ॥
भावार्थ
खरकी ऐसी आज्ञा पाकर वे चौदहों राक्षस हवाके उड़ाये हुए बादलोंके समान विवश हो शूर्पणखाके साथ पञ्चवटीको गये ॥ २६ ॥
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