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अरण्यकाण्ड, सर्ग 18

तां तु शूर्पणखां रामः कामपाशावपाशिताम् । स्वेच्छया श्लक्ष्णया वाचा स्मितपूर्वमथाब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

श्रीरामने कामपाशसे बँधी हुई उस शूर्पणखासे अपनी इच्छाके अनुसार मधुर वाणीमें मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा—॥ १ ॥

कृतदारोऽस्मि भवति भार्येयं दयिता मम । त्वद्विधानां तु नारीणां सुदुःखा ससपत्नता ॥ २ ॥

भावार्थ

‘आदरणीया देवि ! मैं विवाह कर चुका हूँ । यह मेरी प्यारी पत्नी विद्यमान है । तुम-जैसी स्त्रियोंके लिये तो सौतका रहना अत्यन्त दुःखदायी ही होगा ॥ २ ॥

अनुजस्त्वेष मे भ्राता शीलवान् प्रियदर्शनः । श्रीमानकृतदारश्च लक्ष्मणो नाम वीर्यवान् ॥ ३ ॥ अपूर्वी भार्यया चार्थी तरुणः प्रियदर्शनः । अनुरूपश्च ते भर्ता रूपस्यास्य भविष्यति ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘ये मेरे छोटे भाई श्रीमान् लक्ष्मण बड़े शीलवान्, देखनेमें प्रिय लगनेवाले और बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं । इनके साथ स्त्री नहीं है। ये अपूर्व गुणोंसे सम्पन्न हैं। ये तरुण तो हैं ही, इनका रूप भी देखनेमें बड़ा मनोरम है । अतः यदि इन्हें भार्याकी चाह होगी तो ये ही तुम्हारे इस सुन्दर रूपके योग्य पति होंगे ॥ ३-४ ॥

एनं भज विशालाक्षि भर्तारं भ्रातरं मम । असपत्ना वरारोहे मेरुमर्कप्रभा यथा ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘विशाललोचने ! वरारोहे ! जैसे सूर्यकी प्रभा मेरुपर्वतका सेवन करती है, उसी प्रकार तुम मेरे इन छोटे भाई लक्ष्मणको पतिके रूपमें अपनाकर सौतके भयसे रहित हो इनकी सेवा करो’ ॥ ५ ॥

इति रामेण सा प्रोक्ता राक्षसी काममोहिता । विसृज्य रामं सहसा ततो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ ६ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर वह कामसे मोहित हुई राक्षसी उन्हें छोड़कर सहसा लक्ष्मणके पास जा पहुँची और इस प्रकार बोली—॥ ६ ॥

अस्य रूपस्य ते युक्ता भार्याहं वरवर्णिनी । मया सह सुखं सर्वान् दण्डकान् विचरिष्यसि॥ ७ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! तुम्हारे इस सुन्दर रूपके योग्य मैं ही हूँ, अतः मैं ही तुम्हारी परम सुन्दरी भार्या हो सकती हूँ। मुझे अङ्गीकार कर लेनेपर तुम मेरे साथ समूचे दण्डकारण्यमें सुखपूर्वक विचरण कर सकोगे’ ॥ ७ ॥

एवमुक्तस्तु सौमित्री राक्षस्या वाक्यकोविदः । ततः शूर्पणखीं स्मित्वा लक्ष्मणो युक्तमब्रवीत् ॥ ८ ॥

भावार्थ

उस राक्षसीके ऐसा कहनेपर बातचीतमें निपुण सुमित्राकुमार लक्ष्मण मुसकराकर सूप-जैसे नखवाली उस निशाचरीसे यह युक्तियुक्त बात बोले–॥ ८ ॥

कथं दासस्य मे दासी भार्या भवितुमिच्छसि । सोऽहमार्येण परवान् भ्रात्रा कमलवर्णिनि ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘लाल कमलके समान गौरवर्णवाली सुन्दरि!मैं तो दास हूँ, अपने बड़े भाई भगवान् श्रीरामके अधीन हूँ, तुम मेरी स्त्री होकर दासी बनना क्यों चाहती हो ? ॥ ९ ॥

समृद्धार्थस्य सिद्धार्था मुदितामलवर्णिनी । आर्यस्य त्वं विशालाक्षि भार्या भव यवीयसी ॥ १० ॥

भावार्थ

‘विशाललोचने ! मेरे बड़े भैया सम्पूर्ण ऐश्वर्यों ( अथवा सभी अभीष्ट वस्तुओं ) से सम्पन्न हैं । तुम उन्हींकी छोटी स्त्री हो जाओ । इससे तुम्हारे सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँगे और तुम सदा प्रसन्न रहोगी । तुम्हारे रूप-रंग उन्हींके योग्य निर्मल हैं ॥ १० ॥

एतां विरूपामसतीं करालां निर्णतोदरीम् । भार्यां वृद्धां परित्यज्य त्वामेवैष भजिष्यति ॥ ११ ॥ को हि रूपमिदं श्रेष्ठं संत्यज्य वरवर्णिनि । मानुषीषु वरारोहे कुर्याद् भावं विचक्षणः ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘कुरूप, ओछी, विकृत, धँसे हुए पेटवाली और वृद्धा भार्याको त्यागकर ये तुम्हें ही सादर ग्रहण करेंगे*॥ ‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली वरवर्णिनि ! कौन ऐसा बुद्धिमान् मनुष्य होगा, जो तुम्हारे इस श्रेष्ठ रूपको छोड़कर मानव-कन्याओंसे प्रेम करेगा ?’ ॥ १२ ॥

इति सा लक्ष्मणेनोक्ता कराला निर्णतोदरी । मन्यते तद्वचः सत्यं परिहासाविचक्षणा ॥ १३ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणके इस प्रकार कहनेपर परिहासको न समझनेवाली उस लंबे पेटवाली विकराल राक्षसीने उनकी बातको सच्ची माना ॥ १३ ॥

सा रामं पर्णशालायामुपविष्टं परंतपम् । सीतया सह दुर्धर्षमब्रवीत् काममोहिता ॥ १४ ॥

भावार्थ

वह पर्णशालामें सीताके साथ बैठे हुए शत्रुसंतापी दुर्जय वीर श्रीरामचन्द्रजीके पास लौट आयी और कामसे मोहित होकर बोली—॥ १४ ॥

इमां विरूपामसतीं करालां निर्णतोदरीम् । वृद्धां भार्यामवष्टभ्य न मां त्वं बहु मन्यसे ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘राम ! तुम इस कुरूप, ओछी, विकृत, धँसे हुए पेटवाली और वृद्धाका आश्रय लेकर मेरा विशेष आदर नहीं करते हो ॥ १५ ॥

अद्येमां भक्षयिष्यामि पश्यतस्तव मानुषीम् । त्वया सह चरिष्यामि निःसपत्ना यथासुखम् ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘अतः आज तुम्हारे देखते-देखते मैं इस मानुषीको खा जाऊँगी और इस सौतके न रहनेपर तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचरण करूँगी’ ॥ १६ ॥

इत्युक्त्वा मृगशावाक्षीमलातसदृशेक्षणा । अभ्यगच्छत् सुसंक्रुद्धा महोल्का रोहिणीमिव॥ १७ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर दहकते हुए अंगारोंके समान नेत्रोंवाली शूर्पणखा अत्यन्त क्रोधमें भरकर मृगनयनी सीताकी ओर झपटी, मानो कोई बड़ी भारी उल्का रोहिणी नामक तारेपर टूट पड़ी हो ॥ १७ ॥

तां मृत्युपाशप्रतिमामापतन्तीं महाबलः । विगृह्य रामः कुपितस्ततो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ १८ ॥

भावार्थ

महाबली श्रीरामने मौतके फंदेकी तरह आती हुई उस राक्षसीको हुंकारसे रोककर कुपित हो लक्ष्मणसे कहा—॥१८॥

क्रूरैरनार्यैः सौमित्रे परिहासः कथंचन । न कार्यः पश्य वैदेहीं कथंचित् सौम्य जीवतीम् ॥ १९ ॥ इमां विरूपामसतीमतिमत्तां महोदरीम् । राक्षसीं पुरुषव्याघ्र विरूपयितुमर्हसि ॥ २० ॥

भावार्थ

‘सुमित्रानन्दन ! क्रूर कर्म करनेवाले अनार्योंसे किसी प्रकारका परिहास भी नहीं करना चाहिये । सौम्य ! देखो न, इस समय सीताके प्राण किसी प्रकार बड़ी मुश्किलसे बचे हैं॥ ‘पुरुषसिंह ! तुम्हें इस कुरूपा, कुलटा, अत्यन्त मतवाली और लंबे पेटवाली राक्षसीको कुरूप—किसी अङ्गसे हीन कर देना चाहिये’ ॥ २० ॥

इत्युक्तो लक्ष्मणस्तस्याः क्रुद्धो रामस्य पश्यतः । उद्धृत्य खड्गं चिच्छेद कर्णनासे महाबलः ॥ २१ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार आदेश देनेपर क्रोधमें भरे हुए महाबली लक्ष्मणने उनके देखते-देखते म्यानसे तलवार खींच ली और शूर्पणखाके नाक-कान काट लिये ॥ २१ ॥

निकृत्तकर्णनासा तु विस्वरं सा विनद्य च । यथागतं प्रदुद्राव घोरा शूर्पणखा वनम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

नाक और कान कट जानेपर भयंकर राक्षसी शूर्पणखा बड़े जोरसे चिल्लाकर जैसे आयी थी, उसी तरह वनमें भाग गयी ॥ २२ ॥

सा विरूपा महाघोरा राक्षसी शोणितोक्षिता । ननाद विविधान् नादान् यथा प्रावृषि तोयदः ॥ २३ ॥

भावार्थ

खूनसे भीगी हुई वह महाभयंकर एवं विकराल रूपवाली निशाचरी नाना प्रकारके स्वरोंमें जोर-जोरसे चीत्कार करने लगी, मानो वर्षाकालमें मेघोंकी घटा गर्जन-तर्जन कर रही हो ॥ २३ ॥

सा विक्षरन्ती रुधिरं बहुधा घोरदर्शना । प्रगृह्य बाहू गर्जन्ती प्रविवेश महावनम् ॥ २४ ॥ ततस्तु सा राक्षससङ्घसंवृतं खरं जनस्थानगतं विरूपिता । उपेत्य तं भ्रातरमुग्रतेजसं पपात भूमौ गगनाद् यथाशनिः॥ २५ ॥

भावार्थ

वह देखनेमें बड़ी भयानक थी । उसने अपने कटे हुए अङ्गोंसे बारंबार खूनकी धारा बहाते और दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर चिग्घाड़ते हुए एक विशाल वनके भीतर प्रवेश किया॥ लक्ष्मणके द्वारा कुरूप की गयी शूर्पणखा वहाँसे भागकर राक्षससमूहसे घिरे हुए भयंकर तेजवाले जनस्थाननिवासी भ्राता खरके पास गयी और जैसे आकाशसे बिजली गिरती है, उसी प्रकार वह पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २५ ॥

ततः सभार्यं भयमोहमूर्च्छिता सलक्ष्मणं राघवमागतं वनम् । विरूपणं चात्मनि शोणितोक्षिता शशंस सर्वं भगिनी खरस्य सा ॥ २६ ॥

भावार्थ

खरकी वह बहन रक्तसे नहा गयी थी और भय तथा मोहसे अचेत-सी हो रही थी। उसने वनमें सीता और लक्ष्मणके साथ श्रीरामचन्द्रजीके आने और अपने कुरूप किये जानेका सारा वृत्तान्त खरसे कह सुनाया ॥ २६ ॥

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