अरण्यकाण्ड, सर्ग 20
ततः शूर्पणखा घोरा राघवाश्रममागता । राक्षसानाचचक्षे तौ भ्रातरौ सह सीतया ॥ १ ॥
भावार्थ
तदनन्तर भयानक राक्षसी शूर्पणखा श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमपर आयी । उसने सीतासहित उन दोनों भाइयोंका उन राक्षसोंको परिचय दिया ॥ १ ॥
ते रामं पर्णशालायामुपविष्टं महाबलम् । ददृशुः सीतया सार्धं लक्ष्मणेनापि सेवितम् ॥ २ ॥
भावार्थ
राक्षसोंने देखा—महाबली श्रीराम सीताके साथ पर्णशालामें बैठे हैं और लक्ष्मण भी उनकी सेवामें उपस्थित हैं ॥ २ ॥
तां दृष्ट्वा राघवः श्रीमानागतांस्तांश्च राक्षसान् । अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं दीप्ततेजसम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
इधर श्रीमान् रघुनाथजीने भी शूर्पणखा तथा उसके साथ आये हुए उन राक्षसोंको भी देखा । देखकर वे उद्दीप्त तेजवाले अपने भाई लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले—॥ ३ ॥
मुहूर्तं भव सौमित्रे सीतायाः प्रत्यनन्तरः । इमानस्या वधिष्यामि पदवीमागतानिह ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘सुमित्राकुमार ! तुम थोड़ी देरतक सीताके पास खड़े हो जाओ । मैं इस राक्षसीके सहायक बनकर पीछे-पीछे आये हुए इन निशाचरोंका यहाँ अभी वध कर डालूँगा’ ॥ ४ ॥
वाक्यमेतत् ततः श्रुत्वा रामस्य विदितात्मनः । तथेति लक्ष्मणो वाक्यं राघवस्य प्रपूजयन् ॥ ५ ॥
भावार्थ
अपने स्वरूपको समझनेवाले श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर लक्ष्मणने इसकी भूरि-भूरि सराहना करते हुए ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की ॥ ५ ॥
राघवोऽपि महच्चापं चामीकरविभूषितम् । चकार सज्यंधर्मात्मा तानि रक्षांसि चाब्रवीत् ॥ ६ ॥
भावार्थ
तब धर्मात्मा रघुनाथजीने अपने सुवर्णमण्डित विशाल धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और उन राक्षसोंसे कहा—॥ ६ ॥
पुत्रौ दशरथस्यावां भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । प्रविष्टौ सीतया सार्धं दुश्चरं दण्डकावनम् ॥ ७ ॥ फलमूलाशनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ । वसन्तौ दण्डकारण्ये किमर्थमुपहिंसथ ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘हम दोनों भाई राजा दशरथके पुत्र राम और लक्ष्मण हैं तथा सीताके साथ इस दुर्गम दण्डकारण्यमें आकर फल-मूलका आहार करते हुए इन्द्रियसंयमपूर्वक तपस्यामें संलग्न हैं और ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं। इस प्रकार दण्डकवनमें निवास करनेवाले हम दोनों भाइयोंकी तुम किसलिये हिंसा करना चाहते हो ? ॥ ७-८ ॥
युष्मान् पापात्मकान् हन्तुं विप्रकारान् महाहवे । ऋषीणां तु नियोगेन सम्प्राप्तः सशरासनः ॥ ९ ॥ तिष्ठतैवात्र संतुष्टा नोपवर्तितुमर्हथ । यदि प्राणैरिहार्थो वो निवर्तध्वं निशाचराः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘देखो, तुम सब-के-सब पापात्मा तथा ऋषियोंका अपराध करनेवाले हो । उन ऋषि-मुनियोंकी आज्ञासे ही मैं धनुष-बाण लेकर महासमरमें तुम्हारा वध करनेके लिये यहाँ आया हूँ ॥ ‘निशाचरो ! यदि तुम्हें युद्धसे संतोष प्राप्त होता हो तो यहाँ खड़े ही रहो, भाग मत जाना और यदि तुम्हें प्राणोंका लोभ हो तो लौट जाओ ( एक क्षणके लिये भी यहाँ न रुको )’ ॥ १० ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसास्ते चतुर्दश । ऊचुर्वाचं सुसंक्रुद्धा ब्रह्मघ्नाः शूलपाणयः ॥ ११ ॥ संरक्तनयना घोरा रामं संरक्तलोचनम् । परुषा मधुराभाषं हृष्टा दृष्टपराक्रमम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
श्रीरामकी यह बात सुनकर वे चौदहों राक्षस अत्यन्त कुपित हो उठे । ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाले वे घोर निशाचर हाथोंमें शूल लिये क्रोधसे लाल आँखें करके कठोर वाणीमें हर्ष और उत्साहके साथ स्वभावतः लाल नेत्रोंवाले मधुरभाषी श्रीरामसे, जिनका पराक्रम वे देख चुके थे, यों बोले—॥ ११-१२ ॥
क्रोधमुत्पाद्य नो भर्तुः खरस्य सुमहात्मनः । त्वमेव हास्यसे प्राणान्सद्योऽस्माभिर्हतो युधि ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘अरे ! तूने हमारे स्वामी महाकाय खरको क्रोध दिलाया हैं; अतः हमलोगोंके हाथसे युद्धमें मारा जाकर तू स्वयं ही तत्काल अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा ॥ १३ ॥
का हि ते शक्तिरेकस्य बहूनां रणमूर्धनि । अस्माकमग्रतः स्थातुं किं पुनर्योद्धुमाहवे ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘हम बहुत-से हैं और तू अकेला, तेरी क्या शक्ति है कि तू हमारे सामने रणभूमिमें खड़ा भी रह सके, फिर युद्ध करना तो दूरकी बात है ॥ १४ ॥
एभिर्बाहुप्रयुक्तैश्च परिघैः शूलपट्टिशैः । प्राणांस्त्यक्ष्यसि वीर्यं च धनुश्च करपीडितम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘हमारी भुजाओंद्वारा छोड़े गये इन परिघों, शूलों और पट्टिशोंकी मार खाकर तू अपने हाथमें दबाये हुए इस धनुषको, बल-पराक्रमके अभिमानको तथा अपने प्राणोंको भी एक साथ ही त्याग देगा’ ॥ १५ ॥
इत्येवमुक्त्वा संरब्धा राक्षसास्ते चतुर्दश । उद्यतायुधनिस्त्रिंशा राममेवाभिदुद्रुवुः ॥ १६ ॥ चिक्षिपुस्तानि शूलानि राघवं प्रति दुर्जयम् । तानि शूलानि काकुत्स्थः समस्तानि चतुर्दश ॥ १७ ॥ तावद्भिरेव चिच्छेद शरैः काञ्चनभूषितैः ।
भावार्थ
ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए वे चौदहों राक्षस तरह-तरहके आयुध और तलवारें लिये श्रीरामपर ही टूट पड़े ॥ उन राक्षसोंने दुर्जय वीर श्रीराघवेन्द्रपर वे शूल चलाये, परंतु ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजीने उन समस्त चौदहों शूलोंको उतने ही सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा काट डाला ॥१७½॥
ततः पश्चान्महातेजा नाराचान् सूर्यसंनिभान् ॥ १८ ॥ जग्राह परमक्रुद्धश्चतुर्दश शिलाशितान् । गृहीत्वा धनुरायम्य लक्ष्यानुद्दिश्य राक्षसान् ॥ १९ ॥ मुमोच राघवो बाणान् वज्रानिव शतक्रतुः ।
भावार्थ
तत्पश्चात् महातेजस्वी रघुनाथजीने अत्यन्त कुपित हो शानपर चढ़ाकर तेज किये गये सूर्यतुल्य तेजस्वी चौदह नाराच हाथमें लिये । फिर धनुष लेकर उसपर उन बाणोंको रखा और कानतक खींचकर राक्षसोंको लक्ष्य करके छोड़ दिया । मानो इन्द्रने वज्रोंका प्रहार किया हो ॥१८-१९½॥
ते भित्त्वा रक्षसां वेगाद् वक्षांसि रुधिरप्लुताः ॥ २० ॥ विनिष्पेतुस्तदा भूमौ वल्मीकादिव पन्नगाः ।
भावार्थ
वे बाण बड़े वेगसे उन राक्षसोंकी छाती छेदकर रुधिरमें डूबे हुए निकले और बाँबीसे बाहर आये हुए सर्पोंकी भाँति तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २०½ ॥
तैर्भग्नहृदया भूमौ छिन्नमूला इव द्रुमाः ॥ २१ ॥ निपेतुः शोणितस्नाता विकृता विगतासवः ।
भावार्थ
उन नाराचोंसे हृदय विदीर्ण हो जानेके कारण वे राक्षस जड़से कटे हुए वृक्षोंकी भाँति धराशायी हो गये । वे सब-के-सब खूनसे नहा गये थे । उनके शरीर विकृत हो गये थे । उस अवस्थामें उनके प्राणपखेरू उड़ गये ॥ २१½ ॥
तान् भूमौ पतितान् दृष्ट्वा राक्षसी क्रोधमूर्छिता ॥ २२ ॥ उपगम्य खरं सा तु किंचित्संशुष्कशोणिता । पपात पुनरेवार्ता सनिर्यासेव वल्लरी ॥ २३ ॥
भावार्थ
उन सबको पृथ्वीपर पड़ा देख वह राक्षसी क्रोधसे मूर्च्छित हो गयी और खरके पास जाकर पुनः आर्तभावसे गिर पड़ी । उसके कटे हुए कानों और नाकोंका खून सूख गया था इसलिये गोंदयुक्त लताके समान प्रतीत होती थी ॥ २२-२३ ॥
भ्रातुः समीपे शोकार्ता ससर्ज निनदं महत् । सस्वरं मुमुचे बाष्पं विवर्णवदना तदा ॥ २४ ॥
भावार्थ
भाईके निकट शोकसे पीड़ित हुई शूर्पणखा बड़े जोरसे आर्तनाद करने और फूट-फूटकर रोने तथा आँसू बहाने लगी । उस समय उसके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी ॥ २४ ॥
निपातितान् प्रेक्ष्य रणे तु राक्षसान् प्रधाविता शूर्पणखा पुनस्ततः । वधं च तेषां निखिलेन रक्षसां शशंस सर्वं भगिनी खरस्य सा ॥ २५ ॥
भावार्थ
रणभूमिमें उन राक्षसोंको मारा गया देख खरकी बहिन शूर्पणखा पुनः वहाँसे भागी हुई आयी । उसने उन समस्त राक्षसोंके वधका सारा समाचार भाईसे कह सुनाया ॥ २५ ॥
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