मंगल भवन अमंगल हारी
रामानंद सागर की रामायण (1987), संगीत रवीन्द्र जैन
श्री राम मंगल के धाम हैं और अमंगल को हरने वाले हैं। रामानंद सागर की रामायण (1987) का गीत मंगल भवन अमंगल हारी, गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस की सात चौपाइयों और पारंपरिक नाम कीर्तन को एक साथ लाता है। संगीत रवींद्र जैन का है। इन चौपाइयों में श्री राम की कृपा, सच्चा प्रेम, संकट में धीरज और वचन निभाने की सीख मिलती है।
सम्पूर्ण बोल
बंदउँ बालरूप सोइ रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥ मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥ २ ॥
Bandau baalroop soi Ramu. Sab sidhi sulabh japat jisu naamu.Mangal bhavan amangal haari. Dravau so Dasrath ajir bihaari.
राम सिया राम सिया राम जय जय राम
Ram Siya Ram Siya Ram Jai Jai Ram
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥४॥
Hoihi soi jo Ram rachi raakha. Ko kari tark badhaavai saakha.As kahi lage japan Harinaama. Gain Sati jahan Prabhu sukhdhaama.
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥ बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥४॥
Dheeraj dharam mitra aru naari. Aapad kaal parikhiahin chaari.Briddh rogabas jad dhanheena. Andh badhir krodhi ati deena.
तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर कै दासी॥ जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥३॥
Tau Bhagavaanu sakal ur baasi. Karihi mohi Raghubar kai daasi.Jehi ken jehi par satya sanehu. So tehi milai na kachhu sandehu.
राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे॥ जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥२॥
Raaj samaaj biraajat roore. Udagan mahun janu jug bidhu poore.Jinh ken rahi bhaavana jaisi. Prabhu moorati tinh dekhi taisi.
झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू॥ रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥२॥
Jhoothehun hamahi doshu jani dehu. Dui kai chaari maagi maku lehu.Raghukul reeti sada chali aayi. Praan jaaye par vachan na jaaye.
गाया जाता है: Praan jaaye par vachan na jaaye
हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥ रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥३॥
Hari anant Harikatha ananta. Kahahin sunahin bahubidhi sab Santa.Ramchandra ke charit suhaaye. Kalap koti lagi jaahin na gaaye.
हर पंक्ति का अर्थ
बंदउँ बालरूप सोइ रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥ मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥ २ ॥
मैं उन्हीं श्रीरामचन्द्रजीके बालरूपकी वन्दना करता हूँ, जिनका नाम जपनेसे सब सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। मङ्गलके धाम, अमङ्गलके हरनेवाले और श्रीदशरथजीके आँगनमें खेलनेवाले वे ( बालरूप ) श्रीरामचन्द्रजी मुझपर कृपा करें॥
राम सिया राम सिया राम जय जय राम
राम, सिया, राम। श्रीराम की जय हो, जय हो।
Traditional naam kirtan
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥४॥
जो कुछ रामने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा ( विस्तार ) बढ़ावे। [ मनमें ] ऐसा कहकर शिवजी भगवान् श्रीहरिका नाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गयीं जहाँ सुखके धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे॥
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥ बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥४॥
धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री—इन चारोंकी विपत्तिके समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अन्धा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन— ॥
तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर कै दासी॥ जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥३॥
तो सबके हृदयमें निवास करनेवाले भगवान् मुझे रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीकी दासी अवश्य बनायेंगे। जिसका जिसपर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है॥
राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे॥ जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥२॥
वे राजाओंके समाजमें ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो तारागणोंके बीच दो पूर्ण चन्द्रमा हों। जिनकी जैसी भावना थी, प्रभुकी मूर्ति उन्होंने वैसी ही देखी॥
झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू॥ रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥२॥
मुझे झूठ-मूठ दोष मत दो। चाहे दोके बदले चार माँग लो। रघुकुलमें सदासे यही रीति चली आयी है कि प्राण भले ही चले जायँ, पर वचन नहीं जाता॥
हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥ रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥३॥
श्रीहरि अनन्त हैं ( उनका कोई पार नहीं पा सकता ) और उनकी कथा भी अनन्त है; सब संतलोग उसे बहुत प्रकारसे कहते-सुनते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर चरित्र करोड़ कल्पोंमें भी गाये नहीं जा सकते॥
गीत के बारे में
बालरूप श्री राम से कृपा माँगने वाली प्रार्थना से इस गीत का नाम आता है। यह रामानंद सागर की रामायण (1987) का गीत है और इसका संगीत रवींद्र जैन ने दिया है। चौपाइयाँ गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस से हैं। नाम कीर्तन पारंपरिक है। अलग प्रसंगों की ये पंक्तियाँ श्री राम के स्मरण में एक साथ गाई जाती हैं। कहीं चौपाई का एक ही भाग लिया जाता है, तो कहीं गाने में अवधी के शब्द सरल रूप में सुनाई देते हैं। हर चौपाई का अपना कथा प्रसंग है।
Ramanand Sagar's Ramayan (1987). Music by Ravindra Jain. The verses are by Goswami Tulsidas from the Ramcharitmanas, with the traditional naam kirtan refrain.
प्रसंग
भगवान शिव, माता पार्वती को श्री राम की कथा सुनाने से पहले उनके बालरूप की वंदना करते हैं। बालकाण्ड के दूसरे प्रसंग में सती, श्री राम की परीक्षा लेने जाती हैं। भगवान शिव उनकी इच्छा स्वीकार कर हरिनाम जपते हैं। अरण्यकाण्ड में अनसूयाजी, माता सीता को अपने पास बिठाकर समझाती हैं कि संकट में धीरज, धर्म, मित्र और पत्नी की परीक्षा होती है। धनुष के प्रसंग में माता सीता को अपने सच्चे प्रेम पर भरोसा है। राजसभा में लोग श्री राम को अपने भाव के अनुसार देखते हैं। अयोध्याकाण्ड में राजा दशरथ, कैकेयी से कहते हैं कि रघुकुल में प्राण देकर भी वचन निभाया जाता है। अंतिम चौपाई में भगवान शिव बताते हैं कि श्री राम के चरित अनंत हैं और संत उन्हें अनेक प्रकार से कहते और सुनते हैं।
यह गीत क्या सिखाता है
श्री राम का स्मरण हमारे व्यवहार में भी उतरना चाहिए। इन चौपाइयों से तीन बातें सीखें: कृपा पर भरोसा रखें, कठिन समय में धर्म निभाएँ और प्रेम तथा वचन को सच्चा रखें।
द्रवउ का भाव है, मुझ पर कृपा कीजिए। दशरथजी के आँगन में खेलने वाले श्री राम से यह विनती की जाती है। उनके बालरूप का स्मरण करें। मन में उनके लिए अपनापन रखें।
अनसूयाजी समझाती हैं कि धीरज और धर्म की परीक्षा संकट में होती है। मित्र और पत्नी की निष्ठा भी ऐसे समय पहचानी जाती है। भगवान शिव, श्री राम की इच्छा स्वीकार करके नाम जपते हैं। भरोसे के साथ अपना धर्म निभाना भी सीखें।
माता सीता अपने प्रेम की सच्चाई पर भरोसा रखती हैं। राजा दशरथ वचन निभाने के लिए प्राणों तक की बात कहते हैं। गाने से पहले कुछ क्षण श्री राम का स्मरण कीजिए। फिर अपने किसी एक वचन को याद करके उसे पूरा कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मंगल भवन अमंगल हारी का संगीत और चौपाइयाँ किसकी हैं?
रामानंद सागर की रामायण (1987) में इस गीत का संगीत रवींद्र जैन का है। सात चौपाइयाँ गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस से हैं। नाम कीर्तन पारंपरिक है।
मंगल भवन अमंगल हारी का अर्थ क्या है?
श्री राम मंगल के धाम हैं और अमंगल को हरने वाले हैं। चौपाई में दशरथजी के आँगन में खेलने वाले बालरूप श्री राम से कृपा की प्रार्थना की गई है।
मंगल भवन अमंगल हारी की पंक्तियाँ कहाँ से ली गई हैं?
सात चौपाइयाँ गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड और अरण्यकाण्ड से हैं। इनके कथा प्रसंग अलग हैं। साथ में गाया जाने वाला पारंपरिक नाम कीर्तन इन चौपाइयों से अलग है।
गाने के कुछ शब्द रामचरितमानस से अलग क्यों सुनाई देते हैं?
गाने में कहीं चौपाई का एक ही भाग लिया जाता है और कहीं अवधी के शब्द सरल रूप में गाए जाते हैं। वचन निभाने वाली पंक्ति इसका एक उदाहरण है। पूरी चौपाई उसके प्रसंग के साथ पढ़ने से वक्ता और बात का आशय समझ में आता है।
मंगल भवन अमंगल हारी से क्या सीख मिलती है?
इन चौपाइयों से श्री राम का स्मरण, उनकी इच्छा पर भरोसा, संकट में धीरज और धर्म, सच्चा प्रेम तथा वचन निभाने की सीख मिलती है। अलग प्रसंगों में भक्ति प्रार्थना, मन के भाव और आचरण में दिखाई देती है।
इसे ऐसे भी लिखा जाता है: Mangal Bhavan Amangal Hari · Mangal Bhawan Amangal Haari · Mangal Bhavan Amangal Haari · Mangal Bhawan Amangal Hari · मंगल भवन अमंगल हारी · मंगल भवन अमंगल हरि · Ram Siya Ram · Raghukul Reet Sada Chali Aayi